उत्तर प्रदेश: हाथियों का हमला, एक महीने में तीन लोगों की मौत

कतर्नियाघाट सेंक्चुरी

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इमेज कैप्शन, कतर्नियाघाट सेंक्चुरी (जहां ये घटना हुई) तराई क्षेत्र में फैला करीब 400 वर्ग किलोमीटर का संरक्षित क्षेत्र है और दुधवा टाइगर रिजर्व का हिस्सा है
    • Author, अरशद अफज़ाल ख़ान
    • पदनाम, बीबीसी न्यूज़ हिन्दी के लिए
  • पढ़ने का समय: 5 मिनट

उत्तर प्रदेश के बहराइच ज़िले में 22 मार्च को कतर्नियाघाट वाइल्डलाइफ़ सेंक्चुरी के पास 80 साल की एक महिला को हाथी ने कुचलकर मार डाला. पिछले एक महीने में हाथियों के हमले में हुई यह तीसरी मौत है.

कतर्नियाघाट सेंक्चुरी तराई क्षेत्र में फैला करीब 400 वर्ग किलोमीटर का संरक्षित क्षेत्र है और दुधवा टाइगर रिजर्व का हिस्सा है.

वन अधिकारियों के अनुसार, बहराइच के भवनियापुर गांव की निवासी कुनवरिया सुबह के समय अपनी बकरियों को चराने ले गई थीं.

जब कुछ बकरियां जंगल की ओर चली गईं, तो उन्हें वापस लाने की कोशिश के दौरान हाथी ने उन पर हमला कर दिया.

डिविजनल फॉरेस्ट ऑफिसर अपूर्व दीक्षित ने बताया, "भवनियापुर अभयारण्य के कोर क्षेत्र में आता है और इस इलाके में बाघ, तेंदुए और हाथियों की अच्छी-खासी संख्या है."

उन्होंने बताया कि घटना के बाद फील्ड स्टाफ मौके पर पहुंचा और पैरों के निशान से पुष्टि हुई कि महिला पर एक टस्कर (दांत वाले हाथी) ने हमला किया था.

स्थानीय लोगों ने शोर मचाकर हाथी को भगाने की कोशिश की, लेकिन महिला बच नहीं सकी.

वन विभाग के अनुसार, हाथी ने उन्हें सुरक्षित स्थान पर पहुंचने से पहले ही पटक दिया, जिससे मौके पर ही उनकी मौत हो गई. बाद में शव को पोस्टमॉर्टम के लिए भेज दिया गया.

एक महीने में तीसरी घटना

कतर्नियाघाट वाइल्डलाइफ़ सेंक्चुरी, दुधवा टाइगर रिजर्व का हिस्सा है

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15 फ़रवरी के बाद से बहराइच में हाथियों के हमले में हुई यह तीसरी मौत है. उस दिन हाथियों ने जंगल क्षेत्र में झोपड़ी में रहने वाले एक 100 वर्षीय साधु सुरेश दास पर हमला किया. अगले दिन ग्रामीणों को उनका शव मिला.

इसके अगले ही दिन, 45 वर्षीय मुन्नी देवी की बिछिया-कतर्नियाघाट सड़क पर उस समय मौत हो गई, जब वह अपने बेटे सुरेश के साथ बाइक से घर लौट रही थीं और एक टस्कर (दांत वाले हाथी) ने उन पर हमला कर दिया.

इस हमले में उनका बेटा गंभीर रूप से घायल हो गया. राहगीरों ने उन्हें देखा और पुलिस को सूचना दी.

जान-माल के नुकसान के अलावा हाथियों के हमले के कारण आर्थिक असर भी गंभीर है.

ग्रामीणों के अनुसार, फसलों का बड़े पैमाने पर नुक़सान हो रहा है और घर भी टूट रहे हैं.

भरतपुर गांव के बनवारी लाल ने बताया, "पिछले साल हाथियों ने करीब 27 घरों को नुकसान पहुंचाया. पूरी फसल बर्बाद हो जाती है और फसल नुकसान का मुआवजा भी पर्याप्त नहीं मिलता."

भरतपुर गांव प्रधान इकरार अहमद ने बताया कि हाथी अक्सर अम्बा, वेरदिया, चफरिया, मटेही और जमुनहिया गांवों से गुजरते हैं और गन्ना, धान, गेहूं और मक्का की फसलों को नुकसान पहुंचाते हैं.

क्यों बढ़ रही हैं घटनाएं

हाथी

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अधिकारियों के अनुसार, बढ़ते इंसान-जानवर संघर्ष के पीछे इकॉलॉजिकल कारण हैं.

दुधवा टाइगर रिजर्व के फील्ड डायरेक्टर एच. राजामोहन ने कहा कि नेपाल सीमा के पार आवास में बदलाव और व्यवधान के कारण हाथी कतर्नियाघाट और आसपास के जंगलों की ओर आ रहे हैं. उनकी संख्या भी बढ़ी है- यह 2017 में 232 से बढ़कर 2025 में 257 हो गई है, जिससे भोजन और जगह को लेकर प्रतिस्पर्धा बढ़ रही है.

विशेषज्ञों के मुताबिक, हाथियों के मूवमेंट वाली जगहों का ब्लॉक होना और जंगल किनारे उगाई जाने वाली फसलें भी इन हमलों की वजह हैं. ये फसलें हाथियों को आकर्षित करती हैं.

अकेले घूमने वाले नर हाथी अक्सर अधिक आक्रामक होते हैं और हमलों में शामिल रहते हैं. युवा नर हाथियों के कुछ समूह, जिन्हें स्थानीय रूप से "मलजुरिया" कहा जाता है, फसलों को नुकसान पहुंचाने और लोगों का पीछा करने के लिए कुख्यात हैं.

स्थिति से निपटने के लिए वन विभाग ने नेचर एनवायरनमेंट एंड वाइल्डलाइफ सोसाइटी (NEWS) के सहयोग से छह प्रभावित गांवों में करीब 100 ग्रामीणों को "गजमित्र" के रूप में प्रशिक्षित किया है.

ये स्वयंसेवक हाथियों की गतिविधियों पर नज़र रखते हैं, लोगों को सतर्क करते हैं और मिर्ची के धुएं जैसे उपायों से उन्हें भगाने की कोशिश करते हैं. बहराइच के वन अधिकारी (डीएफ़ओ) अपूर्व दीक्षित के अनुसार, एक व्हाट्सएप आधारित अलर्ट सिस्टम भी शुरू किया गया है.

इसके बावजूद डर का माहौल बना हुआ है. शाम होते ही ग्रामीण जल्दी घरों में लौट आते हैं.

इसी क्षेत्र में 2024 के मार्च से सितंबर के बीच भेड़ियों के लगातार हमलों की एक सिरीज़ में कम से कम नौ लोगों की मौत हुई जिनमें ज्यादातर बच्चे थे. इन हमलों में कई लोग घायल भी हुए थे. नेपाल सीमा के पास लगभग 30 गांवों में फैली इन घटनाओं के बाद "ऑपरेशन भेड़िया" चलाया गया, जिसमें कई भेड़ियों को पकड़ा गया.

कतर्नियाघाट वन क्षेत्र

कतर्नियाघाट वन क्षेत्र

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कतर्नियाघाट वन क्षेत्र 1975-76 में स्थापित एक संरक्षित इलाका है, जो दुधवा टाइगर रिजर्व का हिस्सा है.

यहां साल के जंगल, घास के मैदान और घाघरा नदी का क्षेत्र शामिल है. यह भारत के बाघ आवासों को नेपाल के बर्दिया नेशनल पार्क से जोड़ता है.

2026 की शुरुआत में तेंदुओं के हमलों की घटनाएं भी सामने आई हैं. 6 मार्च 2026 को निशानगढ़ा रेंज में 7-8 साल के एक बच्चे रघुवीर की मौत हो गई, जबकि जनवरी के अंत में 4 वर्षीय सीमा की भी जान गई थी.

इन घटनाओं के बाद वन विभाग ड्रोन और पिंजरों की मदद से तेंदुओं को पकड़ने की कोशिश कर रहा है.

अधिकांश हमले कतर्नियाघाट सेंक्चुरी के आसपास, खासकर निशानगढ़ा और मिहिनपुरवा/मोतीपुर क्षेत्रों में हो रहे हैं.

शाम के समय घरों या खेतों के पास खेल रहे बच्चों को निशाना बनाए जाने की घटनाएं सामने आई हैं.

जनता के विरोध और दबाव के बाद अधिकारियों ने निगरानी टीमों और पिंजरों की व्यवस्था की है. विशेषज्ञों का मानना है कि वन्यजीव गलियारों के टूटने और गांवों में रात के समय पर्याप्त रोशनी न होने से तेंदुओं का बस्तियों में आना बढ़ा है.

वाइल्डलाइफ ट्रस्ट ऑफ इंडिया और उत्तर प्रदेश वन विभाग मिलकर कतर्नियाघाट क्षेत्र में मानव-वन्यजीव संघर्ष पर ट्रेनिंग कार्यक्रम चलाते हैं.

भारतीय वन सेवा के वरिष्ठ अधिकारी बी. शिवशंकर के अनुसार, कतर्नियाघाट में मानव-वन्यजीव संघर्ष का मुख्य कारण घटता वन क्षेत्र और हाथियों और बाघों के लिए हाथियों के मूवमेंट वाली जगहों का ब्लॉक होना है. नेपाल से हाथियों की बढ़ती आवाजाही, बाघ और तेंदुओं का नए क्षेत्रों में फैलाव, और बफ़र ज़ोन में मानव अतिक्रमण और कृषि गतिविधियां इस संघर्ष को और बढ़ा रही हैं.

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित