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म्यांमार से लगी सीमा पर भारत का बाड़ लगाने का फ़ैसला कितना सही
- Author, अनंत प्रकाश
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने बताया है कि भारत सरकार म्यांमार से लगने वाली अपनी 1643 किलोमीटर लंबी सीमा पर बाड़ लगाने जा रही है.
इसमें से 10 किलोमीटर लंबी सीमा पर बाड़ लगाने का काम पूरा भी हो चुका है.
शाह ने लिखा है, “मोदी सरकार अभेद सीमाएं बनाने के लिए प्रतिबद्ध है. सरकार ने भारत-म्यांमार के बीच 1643 किलोमीटर लंबी सीमा पर बाड़ लगाने का फ़ैसला किया है."
"बेहतर ढंग से निगरानी के लिए बाड़ के साथ-साथ एक पट्रोलिंग ट्रैक भी बनाया जाएगा. कुल सीमा में से मणिपुर के मोरेह में स्थित 10 किलोमीटर की दूरी वाले हिस्से में पहले ही बाड़ लगाई जा चुकी है."
गृह मंत्री ने अपने ट्वीट में ये भी बताया है कि 'हाइब्रिड सर्विलांस सिस्टम के ज़रिए बाड़ लगाने के लिए दो पायलट प्रोजेक्ट चलाए जा रहे हैं. इसके तहत अरुणाचल प्रदेश और मणिपुर में एक-एक किलोमीटर लंबी सीमा पर बाड़ लगाई जाएगी. और मणिपुर में 10 किलोमीटर लंबे सीमा पर बाड़ लगाने के काम को मंज़ूरी दे दी गई है, जिस पर जल्द ही काम शुरू होगा.”
बाड़ के औचित्य पर बहस
केंद्र सरकार के इस एलान के बाद से इस क़दम की तार्किकता से लेकर इसकी जटिलताओं पर बहस जारी है.
इसकी जटिलता पर सवाल उठाने वालों में सबसे अहम नाम पूर्व सेनाध्यक्ष मनोज मुकुंद नरवणे का है.
नरवणे ने अंग्रेजी वेबसाइट ‘द प्रिंट’ पर छपे अपने लेख में लिखा है, “बाड़ लगाने की बात कहना जितना आसान है, उस पर अमल करना उतना मुश्किल है. वो भी तब जब ये बाड़ भारत-म्यांमार सीमा पर जंगलों से ढके मुश्किल पहाड़ी इलाक़े में लगानी हो. सड़कों की बात छोड़ दीजिए, कई इलाक़े ऐसे हैं, जहाँ पगडंडियों के रास्ते भी नहीं पहुंचा जा सकता. ये इलाक़ा भारत-पाक सीमा जैसा नहीं है, जहाँ सीमा पर बाड़ लगाना आसान है."
"यही नहीं, अगर आप बाड़ लगा भी लें तो भी इसका फ़ायदा तभी होगा जब आप उस पर नज़र रख पाएं और पूरे इलाक़े में गश्त लगा पाएं. वहीं, अगर घुसपैठ होने की स्थिति में आप पलटवार नहीं कर पाते हैं तो भी बाड़ का बहुत ज़्यादा अर्थ नहीं है.”
नरवणे ने अपने इस लेख में इस परियोजना में होने वाले ख़र्च को रेखांकित किया है. उन्होंने इस क्षेत्र में रहने वाले लोगों की चिंताओं को ध्यान में रखने की बात भी कही है.
उन्होंने लिखा है कि स्थानीय समुदाय को अलग-थलग करने वाला कोई भी प्रस्ताव सीमावर्ती इलाक़ों में पहले से नाज़ुक क़ानून-व्यवस्था को ख़राब ही करेगा.
केंद्र सरकार ने बाड़ लगाने के साथ-साथ साल 2018 में आई फ्री मूवमेंट रिज़ीम पर भी पुनर्विचार करने का संकेत दिया है. फ्री मूवमेंट रिज़ीम मोदी सरकार की ही एक्ट ईस्ट नीति से निकला हुआ समझौता है.
ऐसे में सरकार के इस रुख़ ने म्यांमार के साथ भारत के ऐतिहासिक और हालिया रिश्तों पर एक सवाल खड़ा कर दिया है.
कैसे रहे हैं भारत म्यांमार के रिश्ते?
भारत के पूर्व में स्थित म्यांमार एक ऐसा मुल्क है जो अपनी आज़ादी के बाद से ही गृह युद्ध, अशांति और अनिश्चतताओं का शिकार रहा है.
साल 1948 में ब्रितानी हुकूमत से आज़ाद होने के बाद बर्मा (म्यांमार) के भारत के साथ राजनयिक रिश्ते स्थापित हुए. लेकिन इन रिश्तों की उम्र लंबी नहीं रही.
साल 1962 में सैन्य तख़्तापलट के साथ ही इन रिश्तों में एक गिरावट का दौर देखा गया जो एक तरह से साल 1987 तक जारी रहा.
साल 1987 में राजीव गांधी के रूप में पहली बार भारत का कोई प्रधानमंत्री बर्मा के दौरे पर गया. लेकिन इसके ठीक दो साल बाद 1989 में एक बार फिर सत्ता सेना के हाथ में आ गई. इसके साथ ही बर्मा का नाम बदलकर म्यांमार कर दिया गया.
इसके बाद भी म्यांमार में लोकतंत्र की बहाली के लिए संघर्ष जारी रहे, जिसका अंत साल 2011 में हुए आम चुनाव से हुआ, जिसमें आंग सान सूची की पार्टी की जीत हुई.
दिल्ली के लेडी श्रीराम कॉलेज में शिक्षा ग्रहण करने वाली आंग सान सूची के सत्ता में आने के साथ भारत के साथ द्विपक्षीय रिश्तों में एक बार फिर उछाल देखा गया.
और भारतीय प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह साल 2012 में म्यांमार के दौरे पर गए. ये किसी भारतीय प्रधानमंत्री का म्यांमार में पहला राजकीय दौरा था.
लेकिन इसके ठीक दस साल बाद साल 2021 में एक बार सैन्य तख़्तापलट हुआ, जिससे जुंटा सेना सत्ता में आ गई है.
ऐसे में अब एक बार फिर भारत के साथ म्यांमार के रिश्तों में एक तरह की दूरी का भाव नज़र आ रहा है.
लेकिन क्या म्यांमार के साथ लगती सीमा पर बाड़ लगाने का फ़ैसला दोनों देशों के बीच रिश्तों में सबसे बड़ी गिरावट के रूप में देखा जाना चाहिए.
इस सवाल का जवाब जवाहरलाल जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में पढ़ाने वाले प्रोफेसर संजय भारद्वाज देते हैं.
भारद्वाज कहते हैं, “हमें इस क़दम को इस रूप में नहीं देखना चाहिए कि ये भारत की एक्ट ईस्ट पॉलिसी के ख़िलाफ़ जाएगा. इसका उदाहरण बांग्लादेश के साथ हमारे रिश्ते हैं. उस सीमा पर भी बाड़ लगाने का काम किया जा रहा है."
क्यों मजबूर हुआ भारत?
लेकिन सवाल ये उठता है कि आख़िर भारत को म्यांमार के साथ लगती सीमा पर बाड़ लगाने का क़दम उठाने के लिए मजबूर क्यों होना पड़ा.
ये सवाल इसलिए खड़ा होता है क्योंकि साल 2018 में भी भारत ने म्यांमार के साथ फ्री मूवमेंट रिज़ीम पर हस्ताक्षर किए हैं.
इसके तहत भारत-म्यांमार सीमा के इर्द-गिर्द रहने वाले लोग सीमा के 16 किलोमीटर भीतर तक बिना किसी काग़ज़ी जांच के आ जा सकते हैं.
इस समझौते की वजह यहां रहने वाले समुदाय हैं, जो सीमा के इस पार से लेकर उस पार तक बसे हुए हैं. ऐसे में इस समझौते का मक़सद लोगों के बीच संपर्क बढ़ाने के साथ-साथ स्थानीय व्यापार था.
ऐसे में सवाल उठता है कि जब केंद्र में सत्तारूढ़ बीजेपी सरकार ने अब से छह साल पहले इस समझौते को अमल में लाने की ओर क़दम बढ़ाया था तो अब इस रुख़ की वजह क्या है.
इस सवाल का जवाब देते हुए संजय भारद्वाज कहते हैं, “इसकी तीन मुख्य वजह हैं. पहली वजह ये है कि सरकार म्यांमार में बढ़ती अशांति को अपने क्षेत्र में पैर पसारने से रोकना चाहती है. दूसरी वजह इस क्षेत्र में बढ़ता हुआ अवैध ड्रग्स कारोबार और हथियारों की तस्करी को रोकना है."
तीसरी एवं अंतिम वजह इस क्षेत्र में चीन के बढ़ते प्रभाव को रोकना है. भारत का मानना ये रहा है कि म्यांमार की सैन्य सत्ता पर चीन का काफ़ी गहरा प्रभाव है. उसे हथियारों की आपूर्ति भी चीन से ही होती है."
"ऐसे में भारत ये चाहता है कि जब इस क्षेत्र में स्थितियां संवेदनशील हो रही हैं तो म्यांमार से लगने वाली सीमाओं पर चौकसी बढ़ाई जाए. जैसा कि बांग्लादेश के साथ किया गया.”
पिछले कुछ दिनों में इस क्षेत्र की बाड़बंदी करने की मांग अशांति से जूझ रहे उत्तर-पूर्वी राज्य मणिपुर के मुख्यमंत्री एन बीरेन सिंह की ओर से उठाई गई है.
उनका कहना था कि सीमा पर बाड़ नहीं होने की वजह से दूसरी ओर के लोग इसका ग़लत फायदा उठाते हैं.
औचित्य पर सवाल
हालांकि, सरकार के इस फ़ैसले की तार्किकता पर सवाल उठाने वालों में पूर्व राजनयिक गौतम मुखोपाध्याय भी शामिल हैं जो साल 2013 से 2016 तक म्यांमार में भारत के राजदूत रहे है.
बीबीसी के साथ बातचीत में वह कहते हैं, “इसकी तार्किकता के लिए कौन से कारण ज़िम्मेदार हैं, मुझे इसकी जानकारी नहीं है. इस मुद्दे पर गृह मंत्री का ट्वीट और पीआईबी की ओर से जारी प्रेस रिलीज़ में भी इन वजहों को ज़ाहिर नहीं किया गया."
"सिर्फ़ इतना कहा गया है कि सीमाओं को अभेद बनाना है. इस क़दम के निशाने पर म्यांमार नहीं है. लेकिन ये संदेश देना कि म्यांमार ऐसी अनचाही गतिविधियों का स्रोत है, जिनकी रोकथाम के लिए इतना बड़ा क़दम उठाना पड़ रहा है. इस क़दम को एक पड़ोसी के प्रति अच्छे क़दम के रूप में नहीं देखा जाएगा.”
वहीं, अंग्रेजी अख़बार द डेक्कन हेराल्ड में प्रकाशित अपने लेख में मुखोपाध्याय इस कदम को अतार्किक बताते हैं.
वह लिखते हैं, “अगर फ्री मूवमेंट अग्रीमेंट निरस्त करना ऐतिहासिक और राजनीतिक दृष्टि से अतार्किक है तो सीमा पर बाड़ लगाना इससे भी ज़्यादा सवाल उठाने लायक है. हालांकि, सीमा पर बाड़ लगाने के लिए कई कारणों को ज़िम्मेदार ठहराया जा सकता है. जैसे म्यांमार में सेना के ख़िलाफ़ शुरू होते संघर्ष के चलते शरणार्थियों या उग्रवाद को भारत में पैर पसारने से रोकना और ड्रग्स, गोल्ड, सुपारी और लकड़ी के बढ़ते हुए अवैध व्यापार को रोकना. इनके साथ – साथ कई और कारण भी हैं. इनमें से कई वजहें ग़लत धारणाओं पर आधारित हैं. लेकिन इन तमाम समस्याओं का हल बाड़ लगाने से नहीं निकल सकता.”
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