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म्यांमार हिंसा: भारत की चुप्पी के पीछे आख़िर क्या मजबूरी है?
- Author, ज़ुबैर अहमद
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
म्यांमार में सैन्य प्रशासन के ख़िलाफ़ जारी विरोध प्रदर्शनों और अब तक 400 से अधिक प्रदर्शनकारियों की मौत पर अमेरिका समेत दूसरे कई पश्चिमी देशों ने तीखी प्रतिक्रिया ज़ाहिर की है.
लेकिन ऐसा लगता है कि इस मामले में भारत सरकार अब तक ख़ामोश है.
म्यांमार में शनिवार को सेना की कार्रवाई पर औपचारिक रूप से अब तक भारत का कोई बयान सामने नहीं आया है.
इस साल फरवरी में सैन्य तख़्तापलट के बाद से थोड़ी बहुत प्रतिक्रियाएँ आई हैं, लेकिन वो भी दबी-दबी सी.
भारत की इस ख़ामोशी की वजह क्या हो सकती है?
पड़ोसी मुल्क होने की मुश्किल
म्यांमार से जुड़े मामलों के जानकार और म्यांमार में भारत के राजदूत रहे राजीव भाटिया कहते हैं कि म्यांमार भारत का पड़ोसी है, इसलिए ये दुविधा बढ़ जाती है.
राजीव कहते हैं कि हज़ारों मील दूर अमेरिका जिस तरह प्रतिक्रिया ज़ाहिर कर सकता है, एक पड़ोसी देश नहीं कर सकता.
वो कहते हैं, "देखिए, जब मेरे एक पड़ोसी के घर आग लगी हो तो मुझे तो सबसे ज़्यादा चिंता होगी क्योंकि वो आग मेरे घर में भी आ सकती है, दूसरी तरफ़, वो व्यक्ति जो हज़ारों किलोमीटर दूर बैठा है, उसको उतनी चिंता नहीं होगी. उसके पास आज़ादी है, वो जो चाहे बोल सकता है."
"अमेरिका, यूरोपीय संघ और ब्रिटेन जो कह रहे हैं, वो पहले भी वही बातें कह चुके हैं (1988 के सैन्य तख़्तापलट के दौरान) और उसका कोई नतीजा नहीं निकला. तो वो लोग अगर फिर से ग़लतियाँ दोहरा रहे हैं, इसकी उन्हें आज़ादी है. लेकिन भारत एक ऐसा देश है, जो अपने इतिहास को नहीं भूला है."
राजीव भाटिया के अनुसार भारत की मजबूरी ये है कि म्यांमार भारत का पड़ोसी मुल्क है. वो कहते हैं, "यही एक बड़ी वजह है कि भारत क्यों खुलकर कोई पोज़िशन नहीं ले सकता? लेकिन फिर भी भारत ने हमेशा ये कहा है कि वो म्यांमार में प्रजातंत्र को फलते-फूलते देखना चाहता है."
"हमें ये देखना है कि जनता के दुख जल्द से जल्द दूर हो सके. भारत ने ये भी कहा है कि जनता के ख़िलाफ़ जो इतनी हिंसा हो रही है, उसे शीघ्र समाप्त कर देना चाहिए. लेकिन साथ ही हमें ये भी ध्यान रखना है कि म्यांमार सरकार के साथ हमारे अच्छे संबंध हैं.''
राजीव भाटिया कहते हैं, ''म्यांमार की सेना के साथ भी हमारे अच्छे संबंध रहे हैं, तो उनका इस्तेमाल करते हुए, हमें जैसे भी हो सके इस देश की सहायता करनी है."
ख़ुद भारत में सरकार की इस बात के लिए आलोचना हो रही है कि भारत उन आठ देशों में क्यों शामिल हुआ, जिन्होंने 27 मार्च को नेपीडाव में म्यांमार सशस्त्र सेना दिवस सैन्य परेड में भाग लिया था.
यह आयोजन उस दिन हुआ था, जब सैनिकों की गोलियों से क़रीब 100 नागरिकों की मौत हो गई. आयोजन में भाग लेने वालों में भारत के प्रतिनिधि के अलावा पाकिस्तान, चीन और रूस के नुमाइंदे भी शामिल थे.
विपक्ष ने इस पर सवाल उठाए हैं. कांग्रेस की प्रवक्ता शमा महमूद ने एक ट्वीट में कहा, "तख्तापलट के दो महीने बाद, भारत ने म्यांमार में सैन्य परेड में भाग लिया. म्यांमार के लोगों पर सेना की क्रूर कार्रवाई के बाद इस क़दम को हिंसा का समर्थन माना जाएगा. लोकतांत्रिक आदर्शों के लिए भारत की प्रतिबद्धता पर सवाल किए जाएँगे."
भारत ने भी की है आलोचना
रविवार को कई देशों के रक्षा प्रमुखों ने एक संयुक्त बयान जारी करके म्यांमार की हिंसक सैन्य कार्रवाई की निंदा की है.
बयान में कहा गया है, "कोई भी पेशेवर सेना आचरण के मामले में अंतरराष्ट्रीय मानकों का पालन करती है और उसकी ज़िम्मेदारी अपने देश के लोगों को नुक़सान पहुँचाने की नहीं, बल्कि उन्हें बचाने की होती है."
भारत म्यांमार के मामले में बिल्कुल ही ख़ामोश है, ऐसा भी नहीं है. एक फ़रवरी को तख्तापलट के बाद भारत के विदेश मंत्रालय ने एक बयान जारी करके म्यांमार के घटनाक्रम पर 'गहरी चिंता' व्यक्त की थी.
बयान में कहा गया था, "म्यांमार में लोकतांत्रिक परिवर्तन की प्रक्रिया के लिए भारत हमेशा अपना दृढ़ समर्थन देता रहा है. हमारा मानना है कि क़ानून के शासन और लोकतांत्रिक प्रक्रिया को बरकरार रखा जाना चाहिए."
इसके अलावा 26 फ़रवरी को संयुक्त राष्ट्र में म्यांमार के मामले पर एक बहस में संयुक्त राष्ट्र में भारत के स्थायी प्रतिनिधि टीएस त्रिमूर्ति ने कहा था, "भारत म्यांमार के साथ ज़मीनी और समुद्री सीमा साझा करता है और यहाँ शांति और स्थिरता का होना उसके हित में है. इसलिए म्यांमार के हालिया घटनाक्रम पर भारत द्वारा कड़ी निगरानी रखी जा रही है. हम इस बात से चिंतित हैं कि म्यांमार द्वारा लोकतंत्र की दिशा में पिछले दशकों में उठाए गए क़दम को कमज़ोर न किया जाए."
चीन की सुलह की पेशकश
दूसरी तरफ़ चीन ने म्यांमार के मामले में देश की सियासी पार्टियों और सैन्य प्रशासन के बीच सुलह कराने की पेशकश की है. हालाँकि राजीव भाटिया के मुताबिक़ चीन को इसमें कोई सफलता नहीं मिलेगी.
वो कहते हैं, "मेरे ख़याल से इसके सफल होने की शून्य प्रतिशत संभावना है. इतिहास बताता है कि जब भी इस क्षेत्र में समस्या खड़ी होती है, चीन सबसे पहले सुलह कराने का प्रस्ताव रखता है. आपको याद होगा कि चीन ने रोहिंग्या और बांग्लादेश के बीच एक समझौता कराने की बात भी कही थी लेकिन इसे ज़ीरो सफलता मिली."
जानकार कहते हैं कि म्यांमार की जनता के बीच चीन के प्रति अच्छी भावना नहीं है. आम धारणा यह है कि भारत के प्रति लोगों के दिलों में अधिक प्यार है और निकटता भी.
ऐसे में भारत के लिए ये एक अच्छा अवसर है कि वो म्यांमार की जनता और लोकतांत्रिक पार्टियों की आवाज़ सुने और बातचीत के ज़रिए उनकी सहायता करे.
मगर 37 साल तक भारत के राजनयिक रहे राजीव भाटिया के मुताबिक़ ये इतना आसान नहीं होगा. उनके विचार में भारत को सावधानी से क़दम उठाना पड़ेगा. साथ ही चीन भी ऐसा नहीं होने देगा.
वो कहते हैं, म्यांमार में चीन जो कुछ करने का प्रयत्न करता है, भारत उसका विरोध करता है और भारत जो कुछ करने की कोशिश करेगा, चीन उसका विरोध करेगा."
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सुलह की कोशिशें
जानकारों के अनुसार इंडोनेशिया के नेतृत्व में दक्षिण पूर्व राष्ट्रों के संघ (आसियान) की तरफ़ से सुलह की कोशिशें जारी हैं और ऐसा संभव है कि अप्रैल के मध्य में एक शांति सम्मलेन का आयोजन हो. म्यांमार भी आसियान के सदस्य देशों में से एक है.
इंडोनेशिया की मीडिया के मुताबिक़ आसियान की कोशिश यह है कि म्यांमार की सियासी पार्टियाँ और सैन्य अधिकारी एक मेज़ पर बैठ कर आपस में बातचीत करें, ताकि देश में फिर से लोकतंत्र की बहाली हो सके.
राजीव भाटिया भी आसियान की तरफ़ से जारी कोशिशों का समर्थन करते हैं.
वो कहते हैं, ''म्यांमार में इस वक़्त जो झगड़ा चल रहा है, वो सिर्फ़ बातचीत के ज़रिए ही सुलझ सकता है. म्यांमार के नेताओं और वहाँ के सैन्य अधिकारियों को मिल कर ही इस समस्या को सुलझाना पड़ेगा. अन्य लोग सहायता कर तो सकते हैं, लेकिन उनके पास कोई जादू की छड़ी नहीं है."
भाटिया कहते हैं, "इस मामले में बीच बचाव कौन करा सकता है? यह अमेरिका, संयुक्त राष्ट्र, भारत या चीन नहीं करा सकता. हर एक की अपनी-अपनी ख़ामियाँ हैं, जिसके कारण वो ये नहीं करा सकते.''
''अगर कोई ये काम कर सकता है तो वो है आसियान जैसा मंच. अच्छी क़िस्मत यह है कि इंडोनेशिया आसियान का नेतृत्व करते हुए अपनी तरफ़ से पहल कर चुका है. मैं समझता हूँ कि दुनिया को इस पहल का समर्थन करना चाहिए."
म्यांमार में क्या हुआ था?
म्यांमार के इतिहास में ये दूसरा बड़ा जन आंदोलन है. पहला 1988 में सैन्य शासन के ख़िलाफ़ छात्रों ने एक बड़ा आंदोलन शुरू किया था.
इस आंदोलन में आंग सान सू ची एक राष्ट्रीय नेता बनकर उभरीं थीं. इसके बाद जब 1990 में सैन्य प्रशासन ने चुनाव कराया, तो उनकी पार्टी, नेशनल लीग फ़ॉर डेमोक्रेसी ने ज़बरदस्त जीत हासिल की.
सैन्य प्रशासन ने चुनाव के नतीजों खारिज कर दिया और आंग सान सू ची को उनके घर पर नज़रबंद कर दिया गया.
यह नज़रबंदी साल 2010 में ख़त्म हुई. इसके बाद से उन्होंने देश में लोकतंत्र लाने की कोशिशों में बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया. वो 2016 से लेकर 2021 तक म्यांमार की स्टेट कौंसिलर (प्रधानमंत्री के बराबर पद) रहीं और विदेश मंत्री भी रहीं.
इस साल फ़रवरी की पहली तारीख़ को सेना ने म्यांमार सरकार का तख़्तापलट किया और प्रशासन अपने हाथ में ले लिया. तब से देश में आंदोलन चल रहा है, जिसका नेतृत्व युवा पीढ़ी और छात्र कर रहे हैं.
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