You’re viewing a text-only version of this website that uses less data. View the main version of the website including all images and videos.
लेबनान के वो लोग, जिनके घरों को इसराइल बना रहा है खंडहर
- Author, करीन तोरबी
- पदनाम, बीबीसी अरबी, बेरूत
लगातार बढ़ते तनाव और सीमा पार से होने वाले हमलों में लेबनान में अब तक 70 से ज्यादा नागरिकों की मौत हो गई है.
इन हमलों ने दक्षिणी लेबनान के कुछ हिस्सों को लगभग बर्बाद सा कर दिया है.
यहां रहने वाले लोग भाग गए हैं. छोड़े गए घर खंडहर में बदल सकते हैं. लेकिन लोग इसका जोखिम लिए इन्हें छोड़ गए हैं.
संयुक्त राष्ट्र के शांति रक्षक दल के साथ बीबीसी इन इलाकों में ये देखने के लिए पहुंचा कि आख़िर यहां हुआ क्या है.
इलाके में घुसते ही हमें बड़े गड्ढे में एक गद्दा दिखा. धूल और पत्थरों में दबा. ये गद्दा कुछ दिनों पहले यहां मौजूद एक बिल्डिंग के बाईं ओर पड़ा था.
यारिन में एक लेबनानी सेना के एक अफसर ने कहा, ''हम इसे ‘द पूल’ कहते हैं.''
यारिन संघर्ष वाले इलाके में मोर्चे के नज़दीक बसा शहर है.
यारिन संयुक्त राष्ट्र की ओर से निर्धारित ब्लू लाइन से एक किलोमीटर दूर है.
ये बेहद अशांत, संघर्ष से घिरा इलाका है और इसराइल- लेबनान के बीच आधिकारिक सीमा भी.
ब्लू लाइन के नजदीक शहर में एक ही जैसा मंज़र है. इमारतें पूरी तरह धूल में मिल गई हैं या फिर बड़े-बड़े गड्ढों में समा गई हैं.
कुछ इमारतें ध्वस्त हो गई हैं. कुछ बची हुई हैं. इसके बाद आगे बढ़ने पर गड्ढे ही गड्ढे दिखाई पड़ रहे हैं.
इसराइल और हिज़बुल्लाह के बीच संघर्ष का नतीजा
यारिन से चार किलोमीटर पश्चिम में अलमान अल शाब है.
यहां स्थित एक विला पूरी तरह ध्वस्त हो चुका है. सामने खड़ी कारें भी ध्वस्त हो गई हैं.
सिर्फ़ एक बाड़ा बच गया है जिसके चारों ओर पत्थरों के ढेर लगे हैं. विस्फोट से अगल-बगल के घरों की खिड़कियां पूरी तरह टूट गई हैं.
विला के 75 वर्षीय मालिक नदीम साया कहते हैं, ''हम सब इसकी कीमत चुका रहे हैं.''
नदीम साया ने कहा कि वो इस उम्मीद में हर वक़्त बत्ती जलाए रखते थे कि इससे उनका ये पारिवारिक घर शायद हमले से बच जाए.
वो कहते हैं, ''लेकिन अब सब कुछ खत्म हो गया है. घर में रखा सामान और यहां खड़ी कारें. लेकिन मैं जितनी जल्दी हो सके लौटूंगा, भले ही मुझे टेंट में रहना पड़े.''
एक सैनिक ने उस तरफ इशारा करते हुए कहा,'' एक मिसाइल ने ये सब कर दिया.''
हिज़बुल्लाह ने हमास के समर्थन में इसराइल पर रॉकेट दागने शुरू कर दिए थे.
इसके बाद से ही इसराइल ने दक्षिण लेबनान पर हमले शुरू कर दिए थे. ये हमले रोज़ हो रहे थे. इसके बाद दोनों ओर से हमले तेज़ हो गए थे.
इन हमलों की वजह से ये पूरा इलाका बेहद ख़तरनाक हो गया है. ख़तरे का अंदाज इस बात से लगाया जा सकता है कि तीन रिपोर्टर यहां मारे जा चुके हैं.
इनमें एक रिपोर्टर रॉयटर्स के थे और दो मयादीन के. दोनों मीडिया संगठनों ने इसके लिए इसराइल को दोषी ठहराया है.
बीबीसी की संयुक्त राष्ट्र शांति रक्षक दल यूनिफिल के साथ इन सीमाई इलाकों में पहुंची. इसराइल का कहना है कि पत्रकार उसके हमलों में नहीं मारे गए हैं.
इसराइली सेना का 'कहर'
इसराइल ने 1978 में इस इलाके पर हमला किया था और फिर लौट गया था. लेकिन यूनिफिल तभी से यहां तैनात है.
अभी हाल तक यूनिफिल इस बात पर गर्व करता था कि यहां उसने लेबनान और इसराइल के बीच सबसे लंबे समय तक शांति देखी. हिज़बुल्लाह और इसराल के बीच 2006 में लड़ाई हुई थी और तब से लेकर अब तक यानी लगभग 16 साल से अधिक समय तक शांति रही.
जब बीबीसी टीम वहां शूट कर रही थी तो ऐसा लगा कि कोई इसराइली ड्रोन चला आ रहा है.
कुछ ही देर बाद थोड़ी दूरी से धुएं का विशाल गुबार उठता दिखा. साफ था कि ये इसराइली हमला है. ये देखना मुश्किल था कि किस चीज पर हमला किया गया.
इसराइली सेना का कहना है कि वो हिज़बुल्लाह के लड़ाकों और उनके इन्फ्रास्ट्रक्चर पर हमले कर रही है.
उसका ये भी कहना है कि वह उत्तरी इसराइल के अपने सैनिक अड्डों पर हो रहे हमले का जवाब दे रही है.
लेकिन कुछ लेबनानी अधिकारियों का कहना है कि इसराइली सेना इस इलाके में ‘स्कॉर्च्ड अर्थ टेक्टिक्स’ का इस्तेमाल कर रही है. इस रणनीति के तहत किसी इलाके में पानी, जानवरों, पेड़-पौधे से लेकर सब कुछ कुछ खत्म कर दिया जाता है ताकि दुश्मन की सेना लड़ ही ना पाए.
इस वजह से ऐसे इलाके लोगों के रहने लायक नहीं रहते. जिन लोगों ने इस तरह के आरोप लगाए हैं उनमें लेबनान के कार्यवाहक प्रधानमंत्री और पार्लियामेंट के स्पीकर शामिल हैं.
फिलहाल दक्षिण लेबनान के कई गांवों में ज़िंदगी का कोई निशान नहीं दिखाई देता. लोग इन गांवों को छोड़ कर भाग गए हैं. ये गांव अब बिल्कुल वीरान हैं.
अब तक 90 हज़ार लेबनानी विस्थापित हो चुके हैं
इंटरनेशनल ऑर्गेनाइजेशन ऑफ माइग्रेशन (आईओएम) के मुताबिक़ अब तक 90 हजार लेबनानी विस्थापित हो चुके हैं.
इसराइल की तरफ़ 80 हजार लोगों को उनके घरों से कहीं और ले जाया गया है.
इसराइल के रक्षा मंत्री ने कहा है कि उत्तरी इलाकों में रहने वाले इसराइली लोग तब तक अपने घरों में नहीं लौट सकते, जब तक हिजबुल्लाह लड़ाके सीमा से पीछे नहीं धकेले जाते.
लेबनानी शहर आइता-अल-शाब इसराइल से सिर्फ 700 मीटर की दूरी पर है.
इस संघर्ष में अब तक सबसे ज्यादा नुकसान इसी शहर को हुआ है. जिस दिन हम इस शहर में थे, उस दिन इसराइल ने कहा था कि उसने यहां 40 हमले किए हैं.
आइता-अल-शाब के हुसैन जवाद कहते हैं, ''हमें पता है कि हमारा घर बुरी तरह क्षतिग्रस्त हुआ है लेकिन अभी भी अपनी जगह खड़ा है.''
कंस्ट्रक्शन वर्कर पत्नी और अपने सात बच्चोंं के साथ उन्होंने पिछले साल अक्टूबर में ही घर छोड़ दिया था. अब वो बेरूत के बाहरी इलाके एक अपार्टमेंट में रह रहे हैं.
वो कहते हैं, ''हमें मालूम नहीं था कि ये सब इतना लंबा चलेगा. हमने सोचा था कि ये सब चंद दिनों की बात है. सब जल्दी सुलझ जाएगा. उनकी पत्नी मरियम कहती हैं,’’हमें पता है कि ये सब अभी और चलेगा.’’
हमने हुसैन को उनके शहर का वो वीडियो दिखाया, जिसे हमने कुछ दिनों पहले बनाया था.
उन्होंने कुछ जगहों की पहचान की.
वीडियो देखते हुए वो बोले, ''ये मकान अब पूरी तरह ध्वस्त हो गया है. वो वाला अब खत्म ही हो गया समझो. इस लाइन की सारी दुकानें तो अब पूरी तरह जमीन में मिल गई हैं,’’
इस बीच वो एक बार अपने शहर गए थे. हफ्तों पहले वो एक शख़्स को दफनाए जाने के समय वहां थे.
उजड़े हुए लोगों की घर वापसी सबसे बड़ी चुनौती
सिविल डिफेंस स्टाफ या मेयर से वो जब-तब अपने घर के बारे में अपडेट लेते रहते हैं. मेयर ने अभी शहर नहीं छोड़ा है.
अमेरिका स्थित मॉनटरिंग संगठन आर्म्ड कॉन्फ्लिक्ट एंड इवेंट डेटा प्रोजेक्ट (एसीएलईडी) के मुताबिक़, पिछले साल अक्टूबर से इसराइल और हिजबुल्लाह के बीच सीमा के दोनों ओर से 5400 हमले हो चुके हैं.
उसका कहना है कि इनमें से 80 फीसदी हमले इसराइल ने किए हैं.
इसराइली सेना ने पिछले महीने कहा कि उसने हिज़बुल्लाह के 4300 से अधिक ठिकानों पर हमले किए हैं.
सेना ने कहा है कि 2 अप्रैल को लेबनान की धरती से इसराइल पर 3100 रॉकेट गए. लेबनान की ओर से हुए इस हमले में नौ नागरिक मारे गए.
हुसैन को उम्मीद नहीं है कि निकट भविष्य में वो अपने घर लौट पाएंगे.
अब हम इस सड़क पर हैं, जहां यूनिफिल के इटली के सैनिकों के दल कर्नल अल्बर्टो सल्वाडोर कहते हैं कि शांति रक्षक दल की भूमिका काफी अहम है.
उनका कहना है कि यहां चल रही हिंसा के बीच शांति रक्षक दल की भूमिका काफी महत्वपूर्ण हो जाती है.
वो कहते हैं, ''हम देख रहे हैं कि सीमा के दोनों ओर लोग इस हालात से थक चुके हैं. अब शांति की ज़रूरत है.''
वो कहते हैं, ''यूनिफिल की अगली चुनौती स्थानीय आबादी को उनके घरों में लौटने में मदद करने की है.''
लेकिन इसराइल और हिज़बुल्लाह के बीच संघर्ष जिस स्तर पर है, वहां फिलहाल ये संभावनाएं धूमिल ही लगती हैं.
(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)