केरल के कासरगोड में हुए भीषण धमाके की वजह क्या और आख़िर क्यों नहीं रुक रहे ऐसे हादसे?

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- Author, इमरान क़ुरैशी
- पदनाम, बीबीसी हिन्दी के लिए
थेय्यम महोत्सव देखने के लिए पेशे से इंजीनियर अश्विन वीजे क़रीब 400 किलोमीटर का सफर तय करके केरल के कासरगोड ज़िले के नीलेश्वरम पहुंचे थे.
ये प्रतिष्ठित कार्यक्रम उत्तर मालाबार के अंजुताम्बलम वीरेरकावु मंदिर में शुरू होने वाले उत्सव का शुभारंभ था.
लेकिन अश्विन ने इस बात की उम्मीद नहीं थी कि वहां उन्हें 'आग के गोले' दिखेंगे.
वो बताते हैं, ''सिर्फ़ 5 सेकेंड के भीतर मंदिर के पास शेड में विस्फोट हुआ और लोग इधर-उधर भागने लगे.''
मंगलवार, 29 अक्टूबर को लगी इस भीषण आग की वजह से 154 लोगों को अस्पताल जाना पड़ा, जिसमें 8 लोग गंभीर तौर पर झुलसने की वजह से आईसीयू में भर्ती हुए.

हादसे में घायल हुए 97 लोगों को एक रात के लिए अस्पताल में रखा गया, वहीं बाकी बचे लोगों का इलाज करके उसी दिन घर भेज दिया गया.
बीबीसी हिंदी से अश्विन कहते हैं, "हमने 10 लोगों को इलाज के लिए मंगलुरु पहुंचाया. आज सुबह (मंगलवार) चोट पर मरहम पट्टी करके उनमें से एक मरीज को आईसीयू में भेज दिया गया. उन 10 लोगों में एक स्कूली छात्र और 2 कॉलेज के लड़के हैं, जिनके शरीर का 50 फ़ीसदी हिस्सा चल चुका है"
उनके पास मरीजों की जो सूची है उसमें ऐसी महिलाएं और बच्चे शामिल हैं जो थेय्यम उत्सव के समय आगे की पंक्ति में बैठे थे.
मरीजों की पूरी सूची सामने नहीं आई है लेकिन चश्मदीद गवाहों और वहां मौजूद लोगों का कहना है कि मंदिर के नज़दीक गोदाम में रखे गए पटाखों में हुए विस्फ़ोट का खामियाजा महिलाओं और बच्चों को भुगतना पड़ा है.
रात 12 बजे के बाद जहां पटाखे फोड़े गए, वो जगह गोदाम से बेहद नज़दीक थी.
उसी समय एक या दो पटाखे गोदाम में चले गए और अगले ही पल एक ऐसा बड़ा धमाका हुआ जिससे अश्विन समेत वहां मौजूद दूसरे लोग चपेट में आ गए.
गोदाम के पास हुआ पटाखों का विस्फोट?

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कासरगोड से लोकसभा सांसद राजमोहन उन्नीथन बीबीसी हिंदी से कहते हैं, "थेय्यम त्योहार की शुरुआत नीलेश्वरम के उत्तर मालाबार से हुई और ये बहुत बड़ा त्योहार है. थेय्यम को भगवान के प्रतिनिधि के रूप में देखा जाता है. ये सभी समुदायों के लोगों को आकर्षित करता है."
उन्होंने कहा, "दो प्रकार के पटाखे होते हैं. एक जिससे हल्का धमाका होता है, जैसा यहां हुआ था और दूसरा वह होता है जो त्रिशूर पूरम के दौरान त्रिशूर में होता है. ये छोटा होता है लेकिन खतरनाक होता है. यहां विस्फोटक कहां रखा गया था, पुलिस को इसकी जांच करनी चाहिए थी."
कासरगोड के कलेक्टर इनबासखर के का कहना है कि मंदिर के अधिकारियों ने पटाखों के भंडारण या इस्तेमाल के लिए अनुमति या लाइसेंस नहीं लिया था.
इनबासखर के कहते हैं, "सीधे तौर पर कहें तो मंदिर समिति ने सुरक्षा मानदंडों और दिशानिर्देशों का उल्लंघन किया था. पुलिस ने तुरंत एफआईआर दर्ज की और मंदिर समिति के अध्यक्ष और सचिव को गिरफ्तार कर लिया."
पुलिस ने भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) की धारा 288, 125 (ए और बी) और 3 (5), विस्फोटक पदार्थ अधिनियम की धारा 3 (ए) और 6 के तहत आरोप लगाए हैं.
ये धाराएं विस्फोटक पदार्थों के साथ लापरवाही, दूसरों की जान या व्यक्तिगत सुरक्षा को खतरे में डालने वाले कार्य, और कई लोगों द्वारा मिलकर किए गए खतरनाक कार्यों से संबंधित हैं.
इतिहास के रिटायर्ड प्रोफेसर और नीलेश्वरम नगर निगम के पूर्व चेयरमैन केपी जयराजन बीबीसी हिंदी से कहते हैं, "पटाखे गोदाम के पास फोड़े गए, जबकि पहले इन्हें कम से कम 100 मीटर दूर फोड़ा जाता था."
वे कहते हैं, "यह कोई बड़ी आतिशबाज़ी नहीं थी, जैसा कि हम आमतौर पर देखते हैं. ये सिर्फ छोटे चीनी पटाखे थे जो मंदिर के पास गोदाम पर गिरे."
मंदिर के उत्सवों में आग लगने की घटनाएं क्यों होती हैं?

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मंदिर के त्योहारों के समय आग लगने की दुर्घटनाओं के मामले में केरल का इतिहास रहा है.
16 अप्रैल, 2016 में कोल्लम के पुत्तिंगल देवी मंदिर में पटाखे फोड़ने के कारण लगी आग में 100 से भी ज्यादा लोगों की मौत हुई थी और 200 से ज्यादा घायल हो गए थे.
ये घटना मंगलवार को हुई घटना से बहुत अलग नहीं थी. जहां पटाखों से निकली कुछ चिंगारियां एक शेड पर गिरी, जहां मंदिर के अधिकारियों द्वारा पटाखे रखे गए थे.
इस धमाके ने पास के देवासम बोर्ड कार्यालय को हिलाकर रख दिया, जिसके कारण कई भक्तों की मौत हो गई थी.
1952 में सबरीमाला में आतिशबाजी के कारण हुए हादसे में 68 लोगों की जान गई थी. इस दुर्घटना के बाद देवासम बोर्ड ने ये फैसला लिया था कि आगे से आतिशबाजी नहीं होगी. इस फैसले को अब सात दशक हो गए हैं.
ऐसे में केरल के मंदिर सबरीमाला के लिए गए इस फैसले का पालन क्यों नहीं करते हैं?
इतिहासकार और श्री पद्मनाभस्वामी मंदिर (दुनिया का सबसे धनवान मंदिर) पर पुस्तक के लेखक शशिभूषण एमजी इसे "एक प्रकार के मुक़ाबले" से जोड़ते हैं.
उन्होंने बीबीसी हिंदी से कहा, "पढ़ने लिखने में ज्यादा अच्छा होने के कारण अन्य राज्यों के लोगों की तुलना में केरलवासियों को अधिक समझदार माना जाता है. फिर भी मंदिर के त्योहारों में इस तरह के मुक़ाबले देखने को मिलते हैं."
वे कहते हैं, "मंदिर उत्सवों में आप पाएंगे कि राज्य के दक्षिण और उत्तर के लोग वर्चस्व स्थापित करने और उत्सव को और रंगीन बनाने की कोशिश करते हैं.''
उन्होंने त्रिशूर पूरम का उदाहरण दिया जहां दो मंदिरों के बीच प्रचंड मुक़ाबला होता है. जहां से देवी, भगवान शिव से मिलने के लिए जुलूस में जाती हैं. छतरियों के साथ सजाय हुए हाथी जुलूस में रंग भरते हैं.
राजनीतिक प्रतिस्पर्धा

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राजनीतिक क्षेत्र में भी प्रतिस्पर्धा की इस भावना को देखा जा सकता है, जहां आरएसएस और मार्क्सवादियों के बीच के मुक़ाबले का जिक्र करते हुए शशिभूषण इसे समान मानते हैं. वो कहते हैं कि यहां प्रतिस्पर्धा की जड़ें बहुत गहरी हैं.
हाल के दिनों में त्रिशूर पूरम विवाद एक राजनीतिक मुद्दा बन गया, जिसमें मंदिर उत्सवों के दौरान आतिशबाजी के नियमों को सख्ती से लागू किया गया.
आरोप था कि आतिशबाजी पर सख्त नियम लागू करने से लोकसभा चुनाव से कुछ दिन पहले बीजेपी को लाभ मिला, जिससे पहली बार संसदीय चुनाव में जीत हुई. सुरेश गोपी चुने गए और मुख्यमंत्री पिनराई विजयन को सफाई देनी पड़ी.
नीलेश्वरम के निवासी आर गिरिधर कहते हैं, "लेकिन उस मुक़ाबले की भावना ने आग दुर्घटना के पीड़ितों को कोझिकोड से पड़ोसी कर्नाटक के मंगलुरु तक अलग-अलग अस्पतालों में ले जाने के लिए मजबूर किया है. उत्तरी केरल में दक्षिण केरल की तरह अस्पतालों की सुविधा नहीं है.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित
















