पीएम मोदी और राष्ट्रपति पुतिन की केमिस्ट्री का भारत-रूस संबंधों पर कितना असर

मोदी, पुतिन

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    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की तारीफ़ करते हुए कहा है कि 'मोदी ने भारत के हितों की रक्षा के लिए सख़्त रुख अपनाया और वो किसी दबाव में नहीं आए.'

पुतिन ने यह टिप्पणी ‘रशिया कॉलिंग’ फ़ोरम में की. उन्होंने कहा कि 'भारत और रूस के बीच रिश्ते हर क्षेत्र में मज़बूत हो रहे हैं.'

पुतिन ने कहा है कि वो ये कल्पना नहीं कर सकते हैं कि ‘मोदी को डराया जा सकता है या कोई ऐसा क़दम उठाने या निर्णय लेने के लिए मजबूर किया जा सकता है, जो भारत के लोगों या भारत के हितों के विपरीत हो.’

रूस की समाचार सेवा तास के मुताबिक़ पुतिन ने ये भी कहा है कि पीएम मोदी और उनके बीच इस विषय पर कभी कोई चर्चा नहीं हुई है.

पुतिन ने कहा, “जो हो रहा है मैं उसे सिर्फ़ बाहर से देख रहा हैं, और कई बार, स्पष्ट रूप से कहूं, तो मैं भारत के राष्ट्रीय हितों की रक्षा के लिए उनके इस सख़्त रुख़ से हैरान भी हो जाता हूं.”

यह पहला मौक़ा नहीं है जब रूसी राष्ट्रपति ने नरेंद्र मोदी की तारीफ़ की है.

इससे पहले जून में उन्होंने कहा था, ''नरेंद्र मोदी रूस के गहरे दोस्त हैं. पीएम मोदी ने कुछ साल पहले मेक इन इंडिया योजना को लागू किया था. इस योजना का भारत की अर्थव्यवस्था पर सकारात्मक असर पड़ा. अगर हम भी मेक इन इंडिया का अनुकरण करें तो इसमें कोई हानि नहीं है. भले ही यह हमारी योजना नहीं है लेकिन हमारे दोस्त की है.''

अक्तूबर महीने में भी भारत और भारतीय प्रधानमंत्री के संदर्भ में दिया पुतिन का एक बयान काफ़ी चर्चा में रहा. अपने इस बयान में पुतिन ने मोदी को एक बहुत ही बुद्धिमान शख़्स बताया था. उन्होंने कहा था कि पीएम मोदी के नेतृत्व में भारत विकास के क्षेत्र में काफ़ी प्रगति कर रहा है.

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साल 2000 में रूस के पूर्व राष्ट्रपति बोरिस येल्तसिन ने सोवियत कम्युनिस्ट पार्टी से इस्तीफ़ा दे दिया था और रूस के नए राष्ट्रपति चुने गए- व्लादिमीर पुतिन.

इसके एक साल बाद यानी साल 2001 में भारत के पश्चिमी तट पर स्थित राज्य गुजरात में नरेंद्र मोदी मुख्यमंत्री बने.

मुख्यमंत्री का पद संभाले एक महीना भी नहीं हुआ था कि उन्हें तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के साथ मॉस्को की यात्रा करने का अवसर मिला. वो वाजपेयी के साथ रूस पहुंचे और उनकी मुलाक़ात रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन से हुई. बतौर मुख्यमंत्री किसी देश के प्रमुख से ये उनकी पहली मुलाक़ात थी.

इसलिए, जब साल 2018 में रूसी राष्ट्रपति के न्योते पर बतौर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी मॉस्को पहुंचे तो उन्होंने इस घटना का ज़िक्र करते हुए बताया कि रूस और व्लादिमीर पुतिन उनके लिए ख़ास क्यों है.

उसके बाद से व्लादिमीर पुतिन, अलग-अलग मौक़ों पर विभिन्न मंचों से प्रधानमंत्री मोदी की तारीफ़ करते रहे हैं. कभी पुतिन ने उन्हें 'सच्चा देशभक्त' बताया तो कभी उनके कार्यकाल में भारत की स्वतंत्र विदेश नीति की सराहना की.

नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारत ने भी रूस के साथ अपने संबंधों का हमेशा बचाव किया है. फ़रवरी 2022 में यूक्रेन पर आक्रमण के बाद पश्चिमी देशों ने रूस पर सख़्त प्रतिबंध लगाए थे. इस युद्ध को लेकर भारत ने कभी सार्वजनिक रूप से रूस की आलोचना नहीं की है और और पश्चिमी प्रतिबंधों के बावजूद रूस से तेल ख़रीदा है.

भारत के विदेश मंत्री एस. जयशंकर भी कह चुके हैं कि 'तमाम चुनौतियों के बावजूद रूस और भारत के संबंध अडिग हैं.'

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पुतिन और मोदी के रिश्ते

पुतिन के ताज़ा बयान के अलग-अलग मायने निकाले जा रहे हैं, लेकिन विश्लेषकों का मानना है कि ये बहुत ही स्वाभाविक सी बात है. इसके पीछे वो पुतिन और मोदी की गहरी दोस्ती का हवाला देते हैं.

जेएनयू में रूस और मध्य एशिया अध्ययन केंद्र के प्रोफ़ेसर संजय कुमार पांडे कहते हैं कि पुतिन और मोदी दोनों ही नेताओं में काफ़ी समानताएं हैं.

वो कहते हैं, "दोनों ही अपने देश में बेहद लोकप्रिय हैं. दोनों ही नेताओं की करिश्माई और ताकतवर छवि है. पुतिन और मोदी दोनों ही खुद को एक सच्चे देशभक्त की तरह प्रोजेक्ट करते है. राष्ट्रहित को सर्वोपरि रखने का दावा करते हैं."

मोदी पुतिन

पांडे के मुताबिक, "पुतिन ने घोषणा कर दी है कि वो अगला राष्ट्रपति चुनाव लड़ने जा रहे हैं. वहीं प्रधानमंत्री मोदी पहले ही कह चुके हैं कि वो अभी कहीं जाने वाले नहीं. यानी दोनों की साझेदारी अभी लंबी चलने वाली है."

जहां तक दोनों नेताओं के रिश्ते का सवाल है, पिछले डेढ़ सालों में भारत पर अमेरिका और नेटो संगठन का काफ़ी दबाव रहा है. ख़ासकर यूक्रेन और रूस के बीच जंग शुरू होने के बाद से दबाव बढ़ता रहा है.

इसके बावजूद भारत ने व्लादिमीर पुतिन और रूस की खुलकर निंदा करने से परहेज़ किया है.

प्रधानमंत्री मोदी ने इसे लेकर सबसे कड़ा बयान समरकंद में एससीओ सम्मेलन के दौरान दिया. उन्होंने तब कहा, "ये युद्ध का युग नहीं है".

इसके अलावा भारत ने हमेशा एक सधी हुई प्रतिक्रिया दी और कभी ऐसा कोई कदम नहीं उठाया जो रूस के हितों के ख़िलाफ़ हो. रूस के ख़िलाफ़ किसी भी प्रस्ताव का समर्थन नहीं किया.

अटकलों पर विराम!

शी जिनपिंग और पुतिन के साथ मोदी

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सबसे हालिया उदाहरण जी 20 का नई दिल्ली घोषणापत्र है, जिसकी किसी को उम्मीद नहीं थी इसलिए रूस और रूसी राष्ट्रपति इस बात को बख़ूबी समझते हैं कि भारत और भारतीय प्रधानमंत्री उनके लिए क्या मायने रखते हैं.

वहीं वरिष्ठ पत्रकार और रूसी मामलों के जानकार विनय शुक्ला बताते हैं कि रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के हालिया बयान से दो दिन पूर्व ही चीन की मीडिया के हवाले से रूसी अख़बारों में ये ख़बर छपी थी कि पुतिन ने पीएम मोदी के साथ रूखा बर्ताव किया और वो ये दबाव डाल रहे हैं कि भारत को तेल केवल युआन (चीन की मुद्रा) में मिलेगा.

वो कहते हैं, "लेकिन दो दिन बाद ही पुतिन ने इन तमाम अफ़वाहों को ख़ारिज कर दिया. उन्होंने न केवल पीएम मोदी की जमकर तारीफ़ की है, बल्कि कहा है कि दोनों देशों के बीच अपनी राष्ट्रीय करेंसी में ही व्यापार होगा. अभी इसे प्रभावी बनाने में बस थोड़ी मुश्किलें आ रही हैं, इनको जल्द दूर किया जाएगा और भारतीय-रूसी मुद्राओं में व्यापार होगा."

यानी मोदी और पुतिन के संबंधों में खटास की सभी ख़बरें झूठी साबित हुईं.

सालाना मुलाक़ातें और अहम समझौते

मोदी पुतिन

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साल 2014 के बाद से प्रधानमंत्री मोदी और व्लादिमीर पुतिन की लगभग अलग-अलग मौके पर सालाना मुलाक़ात होती रही हैं. इन मुलाक़ातों में दोनों देशों के बीच कई अहम समझौतों की बुनियाद रखी गई.

जुलाई 2014- ब्रिक्स सम्मेलन के साइडलाइन में बतौर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की पहली मुलाक़ात रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन से हुई. तब प्रधानमंत्री मोदी ने रूस के राष्ट्रपति से कहा था, '' सवा सौ करोड़ भारतीयों से अगर आप पूछेंगे कि भारत का सबसे क़रीबी मित्र कौन है, तो हर बच्चा कहता है कि रूस हमारा सबसे अच्छा दोस्त है. हर संकट की घड़ी में कोई एक देश जो बिना किसी समझौते भारत के साथ खड़ा रहा, तो वो रूस ही है.''

जुलाई, 2015 - 7वें ब्रिक्स सम्मेलन के इतर दोनों देशों के नेताओं की दोबारा बैठक हुई. रूस ने जिस तरह अतंरराष्ट्रीय योग दिवस मनाया, प्रधानमंत्री मोदी ने इसकी सराहना की. पुतिन ने कहा कि उन्होंने कभी योग नहीं किया लेकिन आने वाले समय में वो योग करने के इच्छुक हैं. उन्होंने कहा कि रूस भारतीय संस्कृति में काफ़ी दिलचस्पी रखता है.

पहली द्विपक्षीय वार्ता - ठीक पांच महीने बाद दिसंबर, 2015 में 16 वें भारत-रूस वार्षिक सम्मेलन में हिस्सा लेने प्रधानमंत्री मोदी रूस पहुंचे. इस दौरान दोनों नेताओं के बीच पहली द्विपक्षीय वार्ता हुई. इस दौरान दोनों देशों के बीच रक्षा और परमाणु ऊर्जा से जुड़े 16 समझौते हुए. रूस ने घोषणा की कि वो भारत में अगले बीस सालों में कम से कम छह न्यूक्लियर पावर यूनिट बनाने की योजना बना रहा है. इस दौरान प्रधानमंत्री मोदी ने पुतिन को तोहफ़े के रूप में महात्मा गांधी की हास्तलिखित डायरी का एक पन्ना दिया. बदले में पुतिन ने मोदी को 18वीं सदी की एक तलवार भेंट की.

फिर साल 2016 में 8वें ब्रिक्स सम्मेलन का आयोजन गोवा में हुआ. इस दौरान भी दोनों देशों के नेताओं ने मुलाक़ात की. दो घंटे लंबी चली बातचीत के बाद दोनों देशों के बीच रक्षा सौदे सहित 16 अहम समझौतों पर दस्तखत हुए. भारत और रूस के बीच 200 कामोव हेलीकॉप्टरों के संयुक्त उत्पादन के लिए करार पर दस्तख़त हुए. इसके अलावा चार नौसैनिक फ्रिगेट और पांच S-400 सुपरसोनिक एयर डिफेंस सिस्टम की खरीदारी के लिए करार पर भी हस्ताक्षर किए गए.

साल 2017 जून - 18वें भारत-रूस वार्षिक सम्मेलन में हिस्सा लेने प्रधानमंत्री मोदी रूस के सेंट पीटर्सबर्ग पहुंचे थे. उन्होंने तब कहा था कि दोनों देशों के रिश्ते संस्कृति से सुरक्षा तक हैं. व्यापार में प्राइवेट सेक्टर के महत्व पर बात करते हुए दोनों देशों ने साल 2025 तक 30 बिलियन अमेरिकी डॉलर के निवेश के लक्ष्य को जल्द छूने की बात कही थी. इस मुलाक़ात के दौरान दोनों नेताओं की कई तस्वीरें दुनिया ने देखीं, जिनमें वो हंसते, हाथ मिलाते और साथ टहलते नज़र आए.

साल 2018, मई - पुतिन और मोदी के बीच पहली इनफॉर्मल बैठक रूस के सोची शहर में हुई. दोनों नेता इस बात पर सहमत हुए कि भारत और रूस के बीच विशेष और विशेषाधिकार प्राप्त रणनीतिक साझेदारी वैश्विक शांति और स्थिरता के लिए एक ज़रूरी पहलू है.

साल 2019, सितंबर - मोदी और पुतिन ने रूस के व्लादिवोस्तोक में पूर्व आर्थिक मंच (ईईएफ) से इतर मुलाकात की थी. इस दौरान उन्होंने दोनों देशों के बीच स्पेशल और प्रिविलेज स्ट्रेटेजिक पार्टनरशिप को आगे बढ़ाने के तरीकों पर चर्चा की. पीएम मोदी ने कहा कि भारत और रूस की दोस्ती सरकारी बातचीत तक ही सीमित नहीं है.

साल 2019, नवंबर – ब्राज़ील की राजधानी ब्रासिलिया में आयोजित ब्रिक्स सम्मेलन में हिस्सा लेने पहुंचे दोनों नेताओं की एक दूसरे के साथ द्विपक्षीय बैठक हुई.

साल 2021, दिसंबर - भारत-रूस के 21वें वार्षिक सम्मेलन में हिस्सा लेने पुतिन भारत पहुंचे थे. कोविड महामारी के बाद पुतिन की ये दूसरी विदेश यात्रा थी. अपनी पहली यात्रा पर जून में वो अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडन से मिलने जेनेवा गए थे.

इस यात्रा के दौरान भारत और रूस के बीच कुल 28 समझौते हुए. इनमें से कुछ एमओयू थे और दो ऐसे समझौते थे जिससे अमेरिका सचेत था, जैसे - S-400 मिसाइल डिफेंस सिस्टम और दूसरा अमेठी में AK-203 राइफलों का प्रोडक्शन. यहां साढ़े सात लाख AK-203 राइफलें बनाई जानी हैं. दुनिया में पहली बार यह राइफलें रूस से बाहर बनाई जाने की घोषणा की गई.

इस यात्रा के दौरान दोनों देशों के रक्षा मंत्रियों के बीच टू-प्लस-टू बैठक भी हुई.

साल 2022, सितंबर – समरकंद में पुतिन और मोदी की मुलाक़ात हुई थी. इसी मुलाक़ात के दौरान मोदी ने पुतिन से कहा था कि ये 'युद्द का युग नहीं है.'

पुतिन और वाजपेयी की साझेदारी

पुतिन

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अगर बीते 23 सालों की बात करें तो रूस में व्लादिमीर पुतिन की कमान कायम रही लेकिन भारत ने तीन अलग-अलग प्रधानमंत्रियों को देखा.

जिनमें सबसे पहला नाम आता है अटल बिहारी वाजपेयी का. साल 1998 में एनडीए की सरकार में अटल बिहारी वाजपेयी देश के प्रधानमंत्री चुने गए. उनका कार्यकाल साल 2004 में ख़त्म हुआ. इस दौरान रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने (अक्तूबर 2000) पहली बार भारत का दौरा किया.

ये दौरा कई मायनों में ऐतिहासिक साबित हुआ. भारत और रूस ने रणनीतिक साझेदारी की घोषणा पर हस्ताक्षर किए. फिर लगभग एक साल के अंतराल के बाद अटल बिहारी वाजपेयी भी रूसी राष्ट्रपति के निमंत्रण पर रूस पहुंचे.

विनय शुक्ला दोनों नेताओं के रिश्ते को बेहद मधुर बताते हैं. एक किस्सा सुनाते हुए वो बताते हैं, "पाकिस्तान के राष्ट्रपति परवेज़ मुशर्रफ मॉस्को आ रहे थे और उनका विमान लैंड करने ही वाला था, तभी पुतिन ने वाजपेयी जी को कॉल किया और उन्हें सूचित किया कि मुशर्रफ पहुंचने वाले हैं और वो उनसे भारत की समस्या जैसे आंतकवाद के मुद्दे पर भी बात करेंगे. बाद में जब मुशर्रफ रूस से रवाना हुए, तब भी बिना देर के पुतिन ने वाजपेयी को इसकी सूचना दी, ताकि दोनों देशों के बीच कोई भी गलतफ़हमी न पनपे."

वहीं संजय पांडे कहते हैं, ''अटल बिहारी वाजपेयी के कार्यकाल में जब पहली बार पुतिन भारत आए तो उन्होंने संसद के दोनों सदनों के संयुक्त सत्र को संबोधित किया. इसके बाद ऐसा संबोधन कभी नहीं हुआ. इसी दौर में दोनों देशों के बीच रणनीतिक साझेदारी से जुड़े समझौते पर हस्ताक्षर भी हुए. तो स्वभावत: वो ऐसा समय था जब दोनों देशों की विदेश नीति में भारी बदलाव हो रहे थे.''

पुतिन-मनमोहन के सम्बंध

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फिर साल 2004 में यूपीए-1 और फिर 2009 यानी यूपीए-2 के दौरान देश के प्रधानमंत्री बने मनमोहन सिंह.

विश्लेषक मानते हैं कि मनमोहन सिंह के साथ भी पुतिन के रिश्ते अच्छे रहे लेकिन आत्मीय नहीं बन सके.

संजय पांडे बताते हैं, "ये वो दौर था जब भारत की नज़दीकी अमेरिका से बढ़ रही थी. लेकिन इन तमाम चीज़ों के बावजूद भारत की रूस के प्रति कटिबद्धता बरकरार रही. साल 2010 में दोनों देशों के बीच प्रिविलेज पार्टनरशिप के एक नए समझौते पर हस्ताक्षर हुए और अमेरिका के साथ लगातार बातचीत होने के बावजूद भी कुछ ठोस परिणाम नहीं मिले. वहीं दूसरी तरफ़ कुडनकुलम परमाणु ऊर्जा संयंत्र का भी काम चलता रहा.’’

विनय शुक्ला

विनय शुक्ला बताते हैं कि मनमोहन सिंह और पीएम मोदी के व्यक्तित्व में काफ़ी अंतर है.

वह कहते हैं, "जो सहजता मोदी और पुतिन में देखने को मिलती है, वो मनमोहन सिंह के साथ नहीं दिखती थी. वहीं उस ज़माने में यूपीए की जो सरकार थी, वो निजी रिश्तों पर काम नहीं करती थी. पुतिन मनमोहन सिंह का आदर करते थे लेकिन वो ये भी जानते थे कि मनमोहन सिंह स्वतंत्र रूप से सारे फ़ैसले नहीं ले रहे.’’

द्विपक्षीय रिश्ते

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भारतीय विदेश मंत्रालय रूस को भारत का दीर्घकालिक और समय की कसौटियों पर खरा उतरने वाले साझेदार के रूप में परिभाषित करता है.

1950 के दशक से ही शीत युद्ध के दौरान भारत ने सोवियत यूनियन से मज़बूत संबंध बनाना शुरू कर दिया था.

सोवियत यूनियन ने 1965 में भारत और पाकिस्तान के बीच युद्ध ख़त्म कराने में मध्यस्थ की भूमिका निभाई थी. 1971 में पाकिस्तान के साथ भारत की जंग हुई तो सोवियत यूनियन ने संयुक्त राष्ट्र में भारत के समर्थन में वीटो पावर का इस्तेमाल किया था.

भारत और सोवियत यूनियन के बीच 1971 में पीस, फ़्रेंडशिप एंड कोऑपरेशन ट्रीटी हुई थी. जब सोवियत संघ का पतन हुआ तो जनवरी 1993 में यह संधि इंडो-रशियन फ्रेंडशिप एंड कोऑपरेशन ट्रीटी में बदल गई थी.

फ़रवरी 2022 में रूस ने यूक्रेन पर हमला किया तो भारत संयुक्त राष्ट्र में रूस के ख़िलाफ़ वोटिंग से बचता रहा.

यूक्रेन पर हमले के बाद से पश्चिमी देश रूस को कूटनयिक तौर पर अलग-थलग करने की कोशिश करते रहे. कई पश्चिमी कंपनियों ने रूस में अपना कारोबार बंद कर दिया है और निवेश भी रोक दिया है.

कारोबारी संबंध

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रूस पर लगे प्रतिबंधों के बाद रूसी तेल की क़ीमत में भारी गिरावट आई है, भारत ने भारी मात्रा में रूसी तेल खरीदना इसलिए शुरू किया क्योंकि रूस ने कच्चे तेल के दाम में भारत को भारी छूट देना शुरू कर दिया.

दिसंबर 2022 में, जी-7 देशों के समूह ने रूसी तेल पर 60 डॉलर प्रति बैरल की मूल्य सीमा लगा दी. जबकि यूरोपीय संघ ने रूस से लगभग सभी तेल आयात पर प्रतिबंध लगा दिया. ब्लूमबर्ग के मुताबिक़, मॉस्को ने तब से चीन और भारत को साल 2023 में प्रतिदिन लगभग 3.5 मिलियन बैरल तेल निर्यात किया है.

भारत के वाणिज्य एवं उद्योग मंत्रालय के आंकड़ों के मुताबिक भारत का कुल आयात जनवरी-सितंबर (साल 2022) के बीच 544,115.27 मिलियन अमेरिकी डॉलर था, जो कि जनवरी-सितंबर (साल 2023) के बीच घटकर 4,94,259.43 मिलियन अमेरिकी डॉलर हो गया है.

लेकिन अगर इसे रूस के संदर्भ में देखा जाए तो जनवरी-सितंबर 2022 की तुलना में जनवरी-सितंबर (2023) के बीच भारत का रूस से कुल आयात में 113 फ़ीसदी का इज़ाफ़ा हुआ है.

रूस

भारत दुनिया के कुल 231 देशों से सामान आयात करता है. जो शीर्ष पांच देश हैं- उनमें चीन, रूस, अमेरिका, संयुक्त अरब अमीरात और सऊदी अरब है.

भारत रूसी हथियारों और डिफेन्स सिस्टम का दुनिया का सबसे बड़ा खरीदार है. भारतीय वायु सेना, नौसेना और थल सेना के लगभग 85 प्रतिशत हथियार रूसी हैं और भारत के कुल सुरक्षा के सामानों के आयात का 60 प्रतिशत हिस्सा रूस से आता है.

कच्चे तेल के अलावा भारत रूस से खाने का तेल और फ़र्टिलाइज़र भी आयात कर रहा है.

भारत

दोनों देशों ने स्थानीय मुद्रा (रुपया और रूबल) में व्यापार करने का भी फ़ैसला किया था. लेकिन इसमें अभी कुछ और समय लग सकता है.

इधर हाल ही भारत में रूस के राजदूत डेनिस एलिपोव प्रधानमंत्री मोदी के गृह राज्य गुजरात के दौरे पर थे. यहां उनकी मुलाक़ात गुजरात के मुख्यमंत्री भूपेंद्र पटेल से हुई. दोनों के बीच व्यापार, औद्योगिक उत्पादन, बुनियादी ढांचे, शिक्षा के साथ-साथ गुजरात और अलग-अलग रूसी ​​प्रांतों के बीच संबंधों में द्विपक्षीय सहयोग के विस्तार पर चर्चा हुई.

गुजरात एक दशक से ज़्यादा समय से रूसी निवेश के प्रमुख स्थलों में से एक रहा है.

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