क्या भारत रूसी हथियारों पर निर्भरता कम कर सकता है?

वाजपेयी और क्लिंटन

इमेज स्रोत, Getty Images

    • Author, ज़ुबैर अहमद
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

आज से क़रीब 22 साल पहले भारत और अमेरिका के बीच दोस्ती का एक नया दौर शुरू हुआ था. साल 2000 के मार्च महीने के वो सात दिन एक दौर के आगाज़ के गवाह बने थे.

तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति बिल क्लिंटन भारत आए तो उनका भव्य स्वागत हुआ.

मध्य-पूर्व और दक्षिण एशिया पर अमेरिकी विदेश नीति के विशेषज्ञ ब्रूस रिडेल कहते हैं, "राष्ट्रपति क्लिंटन की भारत यात्रा ने 1998 में भारत के दूसरे परमाणु परीक्षण के बाद पैदा हुए तनाव को खत्म कर दिया. इससे पहले, 1999 में उन्होंने भारत और पाकिस्तान के बीच कारगिल युद्ध को समाप्त करने में हस्तक्षेप किया था. इस दौरान उनका झुकाव भारत की तरफ साफ़ दिखा था."

लेकिन ये सब इतना सीधा-सादा नहीं है, अमेरिका और रूस, दोनों को दोस्त बनाए रखना एक मुश्किल चुनौती है क्योंकि इसकी जड़ें शीत युद्ध के ज़माने से चली आ रहीं हैं जब पूरी दुनिया के देशों पर दबाव रहता था कि वे अपनी स्थिति स्पष्ट करें यानी तो वे पूरी तरह अमेरिका के साथ हों या पूरी तरह रूस के साथ. इस मामले में भारत की स्थिति काफ़ी पेचीदा रही है.

22 साल पहले के दौरे में अमेरिकी राष्ट्रपति की कोशिश ये भी थी कि भारत उनके सुरक्षा उद्योग का एक बड़ा खरीदार बन जाए लेकिनदशकों से रूस पर निर्भर भारत के लिए ये इतना आसान नहीं था.

ठीक उसी समय जब अमेरिकी राष्ट्रपति दिल्ली, मुंबई, जयपुर और हैदराबाद का दौरा कर रहे थे, भारतीय वायु सेना के पायलटों का एक ग्रुप मॉस्को में था.

वे लड़ाकू विमानों को उड़ाने और उन विमानों में इस्तेमाल होने वाली नई टेक्नोलॉजी की ट्रेनिंग हासिल करने मॉस्को गए थे. वहाँ मेरी मुलाक़ात इन भारतीय पायलटों से उस होटल की लिफ्ट में हुई जहाँ हम लोग ठहरे हुए थे.

उन दिनों रूस का सियासी माहौल गर्म था. राष्ट्रपति पद के लिए चुनाव हो रहे थे और खुद को भारत का करीबी दोस्त बताने वालेव्लादिमीर पुतिन सबसे तगड़े उम्मीदवार बनकर उभरे थे. उनकी जीत पक्की मानी जा रही थी और हुआ भी ऐसा ही.

इन पायलटों ने हमें चाय पर बुलाया और बातचीत के दौरान मैंने हँसते हुए कहा कि उधर भारत में क्लिंटन हथियार बेचने आए हैं औरआप रूस में हथियार खरीदने आए हैं.

इस पर उनका जवाब था कि भारत के सशस्त्र बल रूसी हथियारों और डिफेन्स सिस्टम पर आधारित है. उन्होंने कहा, "रूस अकेला ऐसादेश है जो हमें हथियार बेचने के साथ इसकी टेक्नोलॉजी ट्रांसफर के लिए भी तैयार रहता है. इसके अलावा ट्रेनिंग और मेंटेनेंस किसी भीहथियार की बिक्री का अहम हिस्सा होते हैं."

रूसी हथियारों पर निर्भरता

सुखोई विमान

इमेज स्रोत, Getty Images

क्लिंटन के भारत के दौरे और पुतिन के पहली बार रूसी राष्ट्रपति चुने जाने के ठीक 22 साल बाद आज भी भारत की रूसी हथियारों पर निर्भरता क़ायम है.

इस सच को समझने के लिए एक नज़र तथ्यों पर डालें—अमेरिका के बाद रूस हथियार बेचने वाला दुनिया का दूसरे नंबर का देश है.

भारत रूसी हथियारों और डिफेन्स सिस्टम का दुनिया का सबसे बड़ा खरीदार है. भारतीय वायु सेना, नौसेना और थल सेना के लगभग 85 प्रतिशत हथियार रूसी हैं और भारत के कुल सुरक्षा के सामानों के आयात का 60 प्रतिशत हिस्सा रूस से आता है.

ज़रा इन बातों पर ग़ौर करें—भारतीय वायु सेना रूसी सुखोई एसयू-30 एमकेआई, मिग-29 और मिग-21 लड़ाकू विमानों पर निर्भर है, इसके अलावा आईएल-76 और एंटोनोव एएन-32 ट्रांसपोर्ट विमान, एमआई-35 और एमआई-17वी5 हेलीकॉप्टर हैं और हाल ही मेंली गई एस-400 वायु रक्षा प्रणाली भी रूसी है.

भारत की सेना रूसी T72 और T90 युद्धक टैंकों का इस्तेमाल करती है, नौसेना का आईएनएस विक्रमादित्य विमान वाहक पोत पहलेएडमिरल गोर्शकोव था.

भारत की नौसेना आइएल 38 समुद्री निगरानी विमान और कामोव के-31 हेलीकॉप्टर भी उड़ाती है, भारत के पास रूस से पट्टे पर ली हुईएक परमाणु पनडुब्बी है और वह भारत को अपनी परमाणु पनडुब्बी बनाने में भी मदद कर रहा है.

क्लिंटन के बाद अमेरिका के सभी राष्ट्रपतियों ने भारत को हथियार बेचने की काफ़ी कोशिश की है लेकिन उनकी सफलता सीमित रही है.

रूस के यूक्रेन पर आक्रमण के बाद अमेरिका के विदेश मंत्री एंटनी ब्लिंकेन ने एक बार फिर भारत की मदद की पेशकश की है.

भारत की कठिनाइयां

टी 90 टैंक

इमेज स्रोत, Getty Images

इमेज कैप्शन, भारत की टी-72 और टी-90 टैंकों के पुर्ज़े यूक्रेन से आते हैं लेकिन अब उनके सप्लाई पर प्रश्न चिन्ह लग गए हैं.

यूक्रेन पर रूसी हमले को लेकर भारत पर अमेरिका का दबाव है कि वो रूस की निंदा करे. रूस के खिलाफ प्रस्ताव पर पिछले पांच मौकोंपर अनुपस्थित रहने के बाद भारत को संयुक्त राष्ट्र महासभा में बुधवार को एक बार फिर अमेरिकी आह्वान को टालना है.

विशेषज्ञ कहते हैं कि अगर रूस और यूक्रेन संघर्ष लंबा चला तो भारत पर न केवल कूटनीतिक स्तर पर अहम फैसले लेने का दबाव बढ़ेगा बल्कि सुरक्षा के स्तर पर भी उसकी कठिनाइयां बढ़ेंगी.

भारत को मध्य अवधि से दीर्घावधि तक मुख्य रूप से दो तरह की कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा है: पहला, रूस पर लगी पाबंदियों के कारण भारत को रूसी हथियार के ऑर्डर की डिलीवरी में दिक़्क़त होगी. भारत को दूसरी समस्या ये होगी कि प्रतिबंध केकारण रूस से डॉलर में व्यापार कैसे किया जाए.

रूस और यूक्रेन दोनों से रक्षा के क्षेत्र में खरीदारी होती रही है. रक्षा मामलों की पत्रकार अमृता नायक कहती हैं कि भारतीय वायु सेना के लिए एएन विमान काफ़ी अहम है जिसके पार्ट-पुर्ज़े यूक्रेन से आते हैं.

इसके अलावा टी-72 और टी-90 टैंकों के पुर्ज़े भी यूक्रेन से आते हैं लेकिन अब उनके सप्लाई पर प्रश्न चिन्ह लग गए हैं.

वो कहती हैं, "सेना के शीर्ष अधिकारी बताते हैं कि भारतीय लंबे समय तक हथियार प्रणालियों के लिए पुर्जों की आपूर्ति में देरी औरसेना, नौसेना और भारतीय वायु सेना के रखरखाव के उपायों के बारे में चिंतित है, और समाधान निकालने के लिए विकल्प तलाश रहा है."

रूस-चीन नज़दीकियां चिंता का सबब?

पुतिन और शी

इमेज स्रोत, Getty Images

भारत ने अक्टूबर 2018 में तत्कालीन ट्रम्प प्रशासन की चेतावनी के बावजूद एस-400 सिस्टम की पांच इकाइयों को खरीदने के लिए रूस के साथ 5 अरब डॉलर के समझौते पर हस्ताक्षर किए थे. इसकी पहली खेप दिसंबर आई थी. चार आने बाक़ी हैं. अब इनका क्याहोगा?

कूटनीतिक स्तर पर भी एक नज़र डालें तो पता चलेगा रूस भारत का एक भरोसेमंद साथी है.

वाशिंगटन के थिंक टैंक, यूनाइटेड स्टेट्स इंस्टिट्यूट ऑफ़ पीस से जुड़े सतीश पुनियार कहते हैं कि रूस भारत के शत्रु देश चीन का गहरा दोस्त है और इसे भारत नज़र अंदाज़ नहीं कर सकता.

वे कहते हैं, "जिस तरह से भारत के उत्तरी पड़ोसी देश (चीन और पाकिस्तान) केसाथ रूस का मज़बूत कूटनीतिक संबंध है, उस तरह से भारत का कोई भी क्वाड पार्टनर देश चीन से गहरी दोस्ती का दावा नहीं करसकता. भारत और चीन के सैनिकों के जून 2020 में गलवान के सीमावर्ती इलाके में झड़प के बाद दोनों देशों के बीच पहली बातचीतमास्को में हुई थी. रूस अमेरिका की तुलना में चीन से अधिक गहरे रिश्ते रखता है."

दूसरी तरफ़, भारत के विदेश मंत्रालय में ये सोच है कि आगे चलकर जब अमेरिका, दूसरे पश्चिमी देश और यूक्रेन, रूस के साथ बातचीतकरना चाहेंगे तो इसमें भारत की एक अहम भूमिका हो सकती है.

भारत के रिश्ते रूस , यूक्रेन और अमेरिका तीनों के साथ मज़बूत हैं. इस भूमिका को निभाने के लिए भारत ये तर्क दे सकता है किमध्यक्षता के लिए उसका निष्पक्ष रहना ज़रूरी है.

रूस के यूक्रेन पर आक्रमण की निंदा के लिए अमेरिका ने भारत पर दबाव बनाया हुआ है. यूक्रेन चाहता है कि भारत मध्यस्थता करेजबकि रूस इस बात से फ़िलहाल संतुष्ट है कि भारत ने रूस की निंदा नहीं की है.

तीनों दोस्त देशों से दोस्ती बनाये रखना भारत की विदेश नीति का एक महत्वपूर्ण परीक्षा है.

आत्मनिर्भरता ही एक विकल्प

तेजस

इमेज स्रोत, Getty Images

भारत लगातार इस बात की कोशिश कर रहा है कि रूस से हथियारों की खरीदारी कुछ कम हो. कुछ विशेषज्ञ मानते हैं कि भारतसरकार की रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता ही एकमात्र सही पॉलिसी है.

लेकिन इसमें एक लंबा समय लगेगा, फिलहाल रूस पर निर्भरता जारी रहने के पूरे आसार मौजूद हैं.

सतीश पुनियार बात को समझाने के लिए मोबाइल फ़ोन की मिसाल देते हुए कहते हैं, "आप अगर लैपटॉप, फ़ोन और डेस्कटॉप वग़ैरहएंड्राइड ऑपरेटिंग सिस्टम से चलाते हैं तो आपको ऐप्पल वाले मोबाइल फ़ोन, लैपटॉप और डेस्कटॉप पसंद नहीं आएँगे और ये काफीमहंगे भी लगेंगे. रक्षा क्षेत्र में रूस पर भारत की निर्भरता कुछ ऐसी ही है."

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)