चुनाव में कितने तरह से हो सकती है धांधली और इसे कैसे रोका जा सकता है?

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- Author, इसारिया प्रेथोंजियएम
- पदनाम, बीबीसी वर्ल्ड सर्विस
इस साल दुनिया के 60 से अधिक देशों में चार अरब से अधिक लोग मतदान करेंगे.
विशेषज्ञों को लगता है कि लोकतंत्र मौजूदा समय में नाज़ुक दौर से गुजर रहा है.
उन्हें डर है कि चुनावी प्रक्रिया में कई तरह से धांधली की जा सकती है और वो इसे रोकने के उपाय सुझाते हैं.
चुनावी अखंडता क्या है?
यूरोपीय संघ के एक चुनाव अधिकारी रिकार्डो चेलेरी कहते हैं कि जब पूरी चुनावी प्रक्रिया मतदाताओं की इच्छा और वे कैसे वोट करते हैं, इसे प्रतिबिंबत करती हो तो इसे चुनावी अखंडता कहा जा सकता है.
वो कहते हैं कि यह ज़रूरी है कि लोग प्रक्रिया पर भरोसा करें जिससे वो मतदान के दिन वोट करने के लिए बाहर निकलेंगे.
यूरोपीय संघ के विदेश सेवा में डेमोक्रेसी एंड इलेक्टोरल ऑब्ज़र्वेशन विभाग में काम करने वाले चेलेरी कहते हैं, "चुनाव को पारदर्शी तरीके से कराया जाना ज़रूरी है ताकि हर किसी को ज़रूरी जानकारी मिलना सुनिश्चित हो सके."
उनके मुताबिक, "चुनाव समावेशी होना चाहिए. यह सिर्फ मतदाताओं को मतदान की इजाज़ देना नहीं है. सभी राजनीतिक पार्टियों को इसमें हिस्सा लेने और बिना हिंसा के चुनाव प्रचार करने की इजाज़त हो."
ब्रिटेन की बर्मिंघम यूनिवर्सिटी में डेमोक्रेसी के प्रोफ़ेसर डॉ. निक चीज़मैन का कहना है कि उनका शोध दिखाता है कि चुनाव की गुणवत्ता, जिसमें उम्मीदवार और नागरिक स्वतंत्र होकर हिस्सा ले सकें और उनके वोटों की गिनती ठीक से हो, दुनिया के हर हिस्से में गिर रही है.
वो कहते हैं कि इस बात का ख़तरा है कि ख़राब गुणवत्ता वाले चुनाव ढर्रा बन जाएंगे.
डॉ. चीज़मैन के अनुसार, "कोई भी चुनाव परफ़ेक्ट नहीं होता लेकिन अच्छी गुणवत्ता वाले चुनाव, अपनी सरकार चुनने और अपने नेताओं को जवाबदेह ठहराने के लिए मतदाताओं को सशक्त बनाते हैं."
चुनावी हेरफेर क्या है?

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चुनावी प्रक्रिया, एक चुनाव के ख़त्म होने से लेकर दूसरे चुनाव की तैयारियों तक चलती है. एक्सपर्ट का कहना है कि इस चक्र में किसी भी समय मतदाताओं में हेरा फेरी हो सकती है.
डॉ. चीज़मैन कहते हैं, "चुनाव के दिन केवल नौसिखिए ही धांधली करते हैं. पेशेवर लोग एक साल पहले ही चुनाव में हेरा फेरी करते हैं."
इन तरीक़ों में शामिल है- सत्ताधारी सरकार द्वारा विपक्ष को डराने धमकाने के लिए सुरक्षा बलों का बड़े पैमाने पर इस्तेमाल, विपक्ष के संदेश को रोकने के लिए मीडिया पर सेंसरशिप और सत्ताधारी पार्टियों का पक्ष लेने के लिए चुनावी रजिस्ट्रेशन प्रक्रिया में फ़िक्सिंग करना.
चेलेरी कहते हैं, "आम तौर पर क्या होता है कि सत्तारूढ़ दल ऐसे जजों को नियुक्त करता है जो स्वतंत्र नहीं हैं, ताकि अंतिम नतीजे के ख़िलाफ़ कोई अपील स्वीकार नहीं हो सके."
इसको लेकर बड़े पैमाने पर डर होने के बावजूद अमेरिका में ये नहीं हुआ.
अमेरिकी राष्ट्रपति रहते डोनाल्ड ट्रंप ने सुप्रीम कोर्ट में तीन जजों की नियुक्ति की थी, जिससे सर्वोच्च अदालत में 6-3 से कंज़र्वेटिव बहुमत हो गया. लेकिन जब 2020 के राष्ट्रपति चुनाव में जो बाइडन से मिली हार को चुनौती देते हुए मुकदमा दायर किया तो सुप्रीम कोर्ट ने भारी बहुमत से इसके ख़िलाफ़ आदेश दिया.

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चुनाव में हेराफेरी करने का एक और तरीक़ा है चालबाज़ी यानी अनुचित लाभ की नीयत से चुनावी क्षेत्रों का फिर से परिसीमन करना.
सत्ताधारी पार्टियां या सरकारें अपने प्रचार अभियान चलाने, चुनावी प्रक्रिया को बदनाम करने के लिए ग़लत सूचनाएं फैलाने और वोट खरीदने के लिए सरकारी खजाने का इस्तेमाल भी करती हैं.
डॉ. चीज़मैन कहते हैं, "अमेरिका में, पुनः परिसीमन, मतदाताओं को दबाना और ग़लत सूचनाएं बड़ी चिंता का विषय हैं."
"हमने पहले ही फ़ेक डिज़िटल संदेश देखा है जिसमें राष्ट्रपति की आवाज़ में लोगों से मतदान को लेकर परेशान न होने की अपील की गई’ जबकि चुनाव प्रचार की सरगर्मी अभी शुरू भी नहीं हुई है."
उन्होंने कहा कि इस बात का भी ख़तरा है कि अल सल्वादोर और श्रीलंका में चुनावों के दौरान फ़ेक न्यूज़, चुनावी हेराफेरी और राजनीतिक हिंसा हो सकती है.
चुनावी धांधलेबाज़ी क्या है?

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मतदान के बाद चुनाव के नतीजे को बदलने की यह एक तरह की कोशिश है.
इसमें हो सकता है कि पहले से भरे हुए मतदान पत्रों को मतपेटी में रख दिया जाए, वोट डालने के बाद मिलान को बदल दिया जाए या विपक्ष के वोटों को रद्द करने के लिए मतपेटियों को नष्ट कर दिया जाए.
रूस में 2021 के संसदीय चुनाव के दौरान तीन दिनों के मतदान में बड़े पैमाने पर चुनावी धांधली के आरोप लगे, जिसमें दूसरी सामग्री से मतपेटियों को भरना और चुनाव पर्यवेक्षकों को धमकियां देना शामिल थीं.
बड़े पैमाने पर साझा किए गए वीडियो में दिखा कि लोग मतपेटियों में काग़ज भर रहे थे.
हालांकि रूसी सरकार ने कहा कि उसने कोई 'गंभीर उल्लंघन' दर्ज नहीं किया था.
'हॉउ टु रिग ऐन इलेक्शन' किताब के सह लेखक डॉ. चीज़मैन कहते हैं, "लेकिन अगर प्रक्रिया पर आपका पूरा नियंत्रण है, आप सीधे 'झूठ' बोल सकते हैं."
वो कहते हैं कि वोटों में धांधली कहीं भी हो सकती है, उन देशों में भी जहां चुनावी तंत्र बहुत दुरुस्त है.
इन देशों में, घरेलू पर्यवेक्षक और राजनीतिक पार्टी के एजेंट कई मतदान केंद्रों पर मौजूद होते हैं ताकि वो वोटों का रिकॉर्ड रख सकें और अपने नतीजों से मिलान कर सकें.

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डॉ. चीज़मैन, घाना में 2016 के राष्ट्रपति चुनाव का ज़िक्र करते हैं जहां विपक्षी पार्टियों ने नतीज़े पता करने के लिए एक मोबाइल फ़ोन का ऐप का इस्तेमाल किया था.
इस बीच ज़ाम्बिया में 2021 में घरेलू पर्यवेक्षकों और चर्च ग्रुपों ने अंतरराष्ट्रीय जगत के साथ काम किया और एक समानांतर वोट सूची तैयार की. इसने सही नतीजे जारी करने के लिए चुनाव आयोग पर दबाव बनाया.
डॉ. चीज़मैन कहते हैं कि हालांकि ये तरीक़ा भी पिछले 10 सालों में और मुश्किल होता गया है क्योंकि एकाधिकारवादी सरकारों ने चुनाव प्रक्रिया के दौरान नागरिक समाज और एनजीओ की गतिविधियों पर लगाम लगाने के क़ानून बना दिए हैं.
चेलेरी का कहना है कि चुनाव पर्यवेक्षक चुनावी प्रक्रिया के केवल अंतिम हिस्से का गवाह बनता है और शुरुआती चरणों में हुई धांधली को रोक नहीं सकते.
क्या विपक्षी पार्टियां चुनावी धांधली कर सकती हैं?
डॉ. चीज़मैन का कहना है कि विपक्ष ऐसे काम भी कर सकता है जो "गोपनीय" हैं और वे इससे बच निकल सकते हैं.
वो कहते हैं, "डोनाल्ड ट्रंप की तरह कोई, जोकि इस समय विपक्ष में हैं, सभी तरह के आरोपों की झड़ी लगा दे, कुछ सही और अधिकांश ग़लत, और इसका इस्तेमाल सरकार को झुकाने की कोशिश के रूप में करे."
क्या लोकतंत्र ख़तरे में है?

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यूरोपीय संघ के अधिकारी रिकार्डो चेलेरी कहते हैं, "हमें खुद को धोखा देने की ज़रूरत नहीं. हम वैश्विक स्तर पर लोकतंत्र के बुरे दौर में हैं."
"मुझे लगता है कि पिछले पांच सालों में लोकतंत्र में गिरावट आई है."
उनका कहना है कि इसका कारण है कमज़ोर अर्थव्यवस्था और कॉन्स्पिरेसी थ्योरी फैलाने में सोशल मीडिया का नकारात्मक असर.
डॉ. चीज़मैन का कहना है कि लोकतंत्र का भविष्य इस साल चुनाव के नतीजों पर निर्भर करता है.
वो कहते हैं, "अगर लोग ऐसे लोकतंत्र में रहते हैं जहां हमेशा से ही चुनावी धांधली होती है, देर सवेर, उन्हें इसके नतीजे का सामना करना पड़ेगा."
"अगर सिस्टम हमें असली चुनाव करने का अधिकार नहीं देता तो वोटिंग या राजनीतिक हिस्सेदारी का क्या मतलब है?"
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