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पटना में मिले 15 विपक्षी दल लेकिन दिल मिलने में कितनी दूरियां
चंदन जजवाड़े
बीबीसी संवाददाता
पटना में हुई विपक्षी दलों की बैठक में राहुल गांधी के सामने दो मुद्दे थे. एक आम आदमी पार्टी के अरविंद केजरीवाल की शर्त और दूसरा आरजेडी नेता लालू प्रसाद यादव की सलाह.
बिहार की राजधानी में शुक्रवार हुई यह बैठक कई मायनों में ऐतिहासिक रही. इसमें बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार बीजेपी विरोधी 15 राजनीतिक दलों को एक मंच पर लाने में सफल रहे.
क़रीब साढ़े तीन घंटे की बैठक में विपक्षी दल बीजेपी के ख़िलाफ़ एक होकर चुनाव लड़ने पर सहमत हो गए हैं.
बैठक के बाद पत्रकारों के साथ बातचीत में लालू यादव ने बताया कि जुलाई में अगली बैठक शिमला में होगी जिसमें आगे की रणनीति तय की जाएगी.
हालांकि कुछ ऐसे मुद्दे भी उठे जिसकी तस्वीर बैठक के बाद पत्रकारों के सामने आए नेताओं के चेहरे पर भी दिखी.
इसमें सबसे ख़ास ये रहा कि अरविंद केजरीवाल को लेकर नीतीश समेत किसी और नेता ने खुलकर कोई जवाब नहीं दिया.
विपक्ष का केंद्र पर वार
कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने आरोप लगाया के मौजूदा माहौल में देश की नींव पर हमला हो रहा है.
वहीं जम्मू कश्मीर की पूर्व मुख्यमंत्री महबूबा मुफ़्ती ने कहा कि जो कश्मीर से शुरू हुआ, वो अब पूरे देश में हो रहा है.
कश्मीर के ही पूर्व मुख्यमंत्री और नेशनल कॉफ़्रेंस के नेता उमर अब्दुल्ला ने आरोप लगाया, “मैं और महबूबा मुफ़्ती ऐसे बदनसीब इलाक़े से ताल्लुक रखते हैं, जहां गणतंत्र का गला दबाया जा रहा है. कश्मीर में 5 साल से राष्ट्रपति शासन लगा हुआ है.”
वहीं पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने विपक्षी दलों की बैठक में दावा है कि इतिहास यहां से शुरू होता है. पर ममता बनर्जी जिस नए इतिहास की बात कर रही हैं, उसके पहले पन्ने पर ही आम आदमी पार्टी के अरविंद केजरीवाल ने स्याही छिड़क दी है.
केजरीवाल किसी भी सहमति से पहले अपनी शर्त पूरी कराना चाहते हैं.
लिहाज़ा बैठक ख़त्म होने के बाद जब सारे नेता प्रेस से बातचीत के लिए आए तो उनके चेहरे पर जीत का कोई भाव नहीं दिख रहा था.
प्रेस वालों की नज़रें अरविंद केजरीवाल, भगवंत मान और आम आदमी पार्टी के बाक़ी नेताओं को तलाशती रहीं. जिनका ध्यान आप नेताओं की ग़ैरमौजूदगी पर नहीं था, जम्मू कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने उन्हें भी बता दिया कि विपक्षी एकता में कुछ कमी है.
उमर अब्दुल्ला ने कहा, “इतने लोगों को इकट्ठा करना आसान काम नहीं है, लेकिन आप ये ख़बर नहीं बनाएंगे कि यहां कौन-कौन मौजूद हैं, बल्कि ये ख़बर बनाएंगे कि यहां कौन नहीं है.”
बाद में झारखंड के मुख्यमंत्री और जेएमएम नेता हेमंत सोरेन ने भी अरविंद केजरीवाल का नाम लिए बग़ैर कुछ नेताओं की ग़ैरमौजूदगी की तरफ़ इशारा किया और उम्मीद जताई कि भविष्य में कुछ नए लोग भी इस मुहिम में शामिल हो सकते हैं.
उम्मीद कहां दिखी?
विपक्षी दलों की इस बैठक के बाद सबसे ज़्यादा उत्साह में पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी दिखीं. ममता के जवाब में पश्चिम बंगाल में उनके विरोधी और सीपीएम नेता सीताराम येचुरी का रवैया भी काफ़ी सकारात्मक दिख रहा था.
ममता बनर्जी ने पत्रकारों से बातचीत में कहा, "हमें ‘विरोधी’ न कहें, हम भी इस देश के नागरिक और देशभक्त हैं."
ममता ने कहा, “हम तीन बातों पर सहमत हुए हैं. पहला ये कि हम एक हैं, दूसरा, हम एक होकर लड़ेंगे और तीसरा, हम सब बीजेपी के एजेंडे का एक होकर विरोध करेंगे.”
ममता बनर्जी ने आरोप लगाया कि बीजेपी ने राजभवन (राज्यपाल) को वैकल्पिक सरकार बना दिया है. ममता का आरोप है कि विपक्षी नेताओं को न केवल ईडी और सीबीआई के ज़रिए परेशान किया जाता है बल्कि वकीलों से कोर्ट में उनके ख़िलाफ़ केस दर्ज़ करवाया जाता है.
ममता बनर्जी का इशारा संभवतः कांग्रेस नेता राहुल गांधी की तरफ था.
कोर्ट ने मानहानी के मामले में उन्हें दोषी ठहराया था. उसके बाद राहुल गांधी की लोकसभा सदस्यता ख़त्म हो गई है. बैठक में मौजूद नेता इस बात पर सहमत दिखे कि कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक विपक्षी दल मोदी सरकार के ख़िलाफ़ एकजुट हैं.
दबाव बनाना चाहते हैं केजरीवाल?
पटना में ‘द इंडियन एक्सप्रेस’ अख़बार के वरिष्ठ सहायक संपादक संतोष सिंह कहते हैं कि इस मीटिंग में केवल आम आदमी पार्टी अपने मुद्दे पर अलग दिखी. अरविंद केजरीवाल चाहते हैं कि दिल्ली के अध्यादेश के मुद्दे पर कांग्रेस पहले अपना रुख़ स्पष्ट करे.
सुप्रीम कोर्ट ने इसी साल 11 मई को राज्य के अधिकारियों की नियुक्ति और तबादले का अधिकार दिल्ली सरकार को दे दिया था. इस फ़ैसले के ख़िलाफ़ केंद्र सरकार 19 मई को एक अध्यादेश लेकर आई और सुप्रीम कोर्ट से मिले अधिकार राज्य सरकार से छीनकर दिल्ली के उपराज्यपाल को दे दिए.
अब केंद्र के इस अध्यादेश को छह महीने के अंदर संसद के दोनों सदनों से पास कराना ज़रूरी है, तभी यह क़ानून बन पाएगा. ऐसा न हो पाने से केंद्र सरकार का अध्यादेश ख़ुद ही ख़त्म हो जाएगा.
अरविंद केजरीवाल चाहते हैं कि राज्य सरकार के अधिकारों की रक्षा के लिए बीजेपी विरोधी दल इस मामले में उनका साथ दें और इसे राज्यसभा में पास न होने दें.
संतोष सिंह कहते हैं, “मुझे नहीं लगता है कि यह कोई बड़ा मुद्दा है. कांग्रेस पहले ही दिल्ली के अध्यादेश पर अपनी नाराज़गी ज़ाहिर कर चुकी है. हो सकता है कि अगली मीटिंग से पहले अरविंद केजरीवाल सीटों के बंटवारे को लेकर दबाव बनाना चाहते हों.”
सीपीआई (एमएल) ने क्या कहा?
पटना की बैठक में सीपीआइ (एमएल) के नेता दीपांकर भट्टाचार्य भी मौजूद थे. उन्होंने बीबीसी को बताया है कि दिल्ली के अध्यादेश के मुद्दे पर अरविंद केजरीवाल को निश्चिंत रहना चाहिए.
दरअसल बैठक के बाद आप का कोई नेता प्रेस के सामने नहीं आया और इसी दौरान आम आदमी पार्टी ने एक बयान जारी कर कहा कि अगर दिल्ली के अध्यादेश पर कांग्रेस अपनी नीति स्पष्ट नहीं करती है तो कांग्रेस के साथ ऐसे किसी भी गठबंधन की बैठक में शामिल होना उसके लिए मुश्किल होगा.
दीपांकर भट्टाचार्य का कहना है, “हर पार्टी में फ़ैसला लेने का एक फोरम होता है. केजरीवाल के मन में दिल्ली के अध्यादेश को लेकर कोई संदेह है तो यह भ्रामक और दुर्भाग्यपूर्ण है, कांग्रेस ने भी मीटिंग में कहा है कि वो राज्यसभा में बिल आने पर इसका विरोध करेंगे.”
पंजाब का पेंच
दरअसल आम आदमी पार्टी और कांग्रेस के बीच दिल्ली के अध्यादेश के अलावा कई राज्यों की लोकसभा सीटों पर समझौते का भी पेंच है. जिसपर दोनों ही पार्टी अपना बड़ा दावा करने के लिए दबाव की राजनीति का सहारा ले सकती हैं.
साल 2009 के लोकसभा चुनावों में जहां कांग्रेस ने दिल्ली की सभी सात लोकसभा सीटें जीती थीं, वहीं साल 2014 और 2019 में यही सफलता बीजेपी को मिली थी.
ख़ास बात यह है कि साल 2019 में कांग्रेस को क़रीब 23 फ़ीसद वोट मिले थे, जबकि आम आदमी पार्टी को 18 फ़ीसदी वोट ही मिले थे.
दिल्ली की सीटों पर दोनों दलों के बीच साल 2019 के लोकसभा चुनावों में भी समझौता नहीं हो पाया था.
पटना की बैठक में अरविंद केजरीवाल के साथ पंजाब के मुख्यमंत्री भगवंत मान भी पहुंचे थे. आम आदमी पार्टी ने साल 2022 में पंजाब विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को हराकर अपनी सरकार बनाई थी.
हालांकि साल 2019 के लोकसभा चुनावों में आप को पंजाब में क़रीब आठ फ़ीसद वोट और एक सीट मिली थी. वहीं कांग्रेस ने 40 फ़ीसद से ज़्यादा वोट के साथ पंजाब की 13 में से आठ लोकसभा सीटें अपने कब्ज़े में की थी. यह एक ऐसा राज्य है जहां दोनों का समझौता सबसे पेचीदा मामला हो सकता है.
संतोष सिंह कहते हैं, “जुलाई में विपक्ष की अगली मीटिंग में राज्यों में सीटों के समझौते पर बात होगी, जिसमें दिल्ली और पंजाब जैसे राज्यों पर भी चर्चा होगी. पंजाब में सीटों के समझौते का मामला कांग्रेस और आप के लिए सम्मान का मामला भी है.”
संतोष सिंह का मानना है कि अगली मीटिंग तक यह मामला सुलझ भी सकता है, क्योंकि पंजाब और दिल्ली की 20 लोकसभा सीटों पर समझौते के लिए अगर केजरीवाल गठबंधन से अलग हो जाते हैं तो आरोप उनपर भी लग सकता है कि बीजेपी विरोध के इस बड़े मौक़े से उन्होंने महज़ कुछ सीट के लिए ख़ुद को अलग कर लिया.
आप ने क्या ऑफर दिया?
अरविंद केजरीवाल के साथ सीटों के बंटवारे का यह मामला गुजरात, राजस्थान और मध्य प्रदेश से भी जुड़ा है.
आप नेता सौरभ भारद्वाज ने पटना की बैठक से महज़ कुछ घंटे पहले कहा था कि कांग्रेस अगर पंजाब और दिल्ली में लोकसभा चुनाव न लड़े तो आप मध्य प्रदेश और राजस्थान में अपने उम्मीदवार नहीं उतारेगी.
वहीं गुजरात में भी आप ने कांग्रेस को नुक़सान पहुंचाया है. साल 2017 के विधानसभा चुनावों में कांग्रेस को राज्य में क़रीब 43 फ़ीसद वोट और 77 सीटें मिली थीं, पिछले साल हुए विधानसभा चुनावों में कांग्रेस को महज़ 28 फ़ीसद वोट और 17 सीटें ही मिलीं थीं.
पिछले साल हुए विधानसभा चुनावों में आप को क़रीब 13 फ़ीसद वोट के साथ 5 सीटें मिली थीं. इस तरह से भले राज्य की सभी 26 लोकसभा सीटों पर फ़िलहाल बीजेपी का कब्ज़ा है. लेकिन आप की मौजूदगी से गुजरात में कांग्रेस की संभावनाओं को झटका लग सकता है.
दीपांकर भट्टाचार्य के मुताबिक़, “पहली बार एक बड़े दायरे में मीटिंग दिखी है. इसमें सभी दलों की एक गंभीर भागीदारी हुई है. भारत बड़ा देश है इसलिए राज्यों के हिसाब से सीटों के बंटवारे वगैरह पर अलग से बात करनी होगी.”
लालू की मौजूदगी
पटना की बैठक में आरजेडी प्रमुख और बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव एक बार फिर से अपने पुराने अंदाज़ में दिखे. लालू लंबे समय से बीमार थे, उन्होंने कुछ महीने पहले ही सिंगापुर में किडनी ट्रांसप्लांट भी कराया था. लालू ने कांग्रेस नेता राहुल गांधी को शादी करने की सलाह भी दे दी.
बैठक के बाद लालू ने कहा, “अब हम फिर से पूरी तरह से फिट हो गए हैं. अब बढ़िया से मोदी को और बीजेपी को फिट कर देना है. देश टूट के कगार पर खड़ा है. हम एकजुट होकर नहीं रहते हैं इसलिए हमारा वोट बंट जाता है.”
पटना में बनी विपक्षी दलों की एकता साल 2024 के लोकसभा चुनावों तक बनी रही तो बीजेपी को बड़ी चुनौती मिल सकती है. इससे पहले साल 2019 या साल 2014 के लोकसभा चुनावों में बीजेपी और नरेंद्र मोदी को कभी भी संगठित विपक्ष का सामना नहीं करना पड़ा है. विपक्ष के बिखरे वोटों के बीच बीजेपी ने इन चुनावों में आसानी से जीत हासिल कर ली थी.
संतोष सिंह कहते हैं, “पटना की बैठक में बड़ी-बड़ी पार्टियां शामिल हुई हैं और एक ही मीटिंग में कोई कॉमन मिनिमम प्रोग्राम नहीं बन सकता. अभी अगले 20 दिनों तक पर्दे के पीछे कई तरह की बातचीत होगी ताकि एक समाधान तक पहुंचा जा सके.”
सीटों के बंटवारे के लिए विपक्षी दलों की अगली बैठक अब कांग्रेस के नेतृत्व में जुलाई में शिमला में होगी. फ़िलहाल पटना की बैठक एक आम सहमति पर ख़त्म हुई है लेकिन आगे विपक्षी एकता के सामने चुनौतियां कम नहीं होगी.
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