नीतीश कुमार की विपक्ष को एक साथ लाने की कोशिश नरेंद्र मोदी के लिए कितनी बड़ी चुनौती?

    • Author, चंदन कुमार जजवाड़े
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता, पटना से

हर पार्टी के पास चुनाव लड़ने का समान अवसर होना लोकतंत्र की बुनियादी ज़रूरत है, लेकिन मौजूदा समय में साधन और कैडर के मामले में बीजेपी सभी दलों पर भारी दिखती है.

बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार विपक्ष को एकजुट कर इसी अंतर को पाटने की कोशिश में लगे हैं. नीतीश कुमार इसके लिए एक के बाद एक, अलग-अलग पार्टियों के नेताओं से मिल रहे हैं.

उन्होंने मंगलवार को कहा, "हमने कई पार्टियों के नेताओं से मुलाक़ात की है. कांग्रेस कर्नाटक चुनावों में व्यस्त है. सरकार बनने की प्रक्रिया पूरी हो जाने के बाद हम विपक्षी गठबंधन की बैठक की तारीख़ तय करेंगे."

अभी तक इन नेताओं से मिल चुके हैं नीतीश कुमार

  • 11 मई 2023 : एनसीपी के अध्यक्ष शरद पवार और शिवसेना (यूबीटी) नेता उद्धव ठाकरे
  • 10 मई 2023 : झारखंड के सीएम हेमंत सोरेन
  • 9 मई 2023 : ओडिशा के मुख्यमंत्री नवीन पटनायक
  • 24 अप्रैल 2023: उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव
  • 24 अप्रैल 2023: पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री और तृणमूल कांग्रेस की प्रमुख ममता बनर्जी
  • 21 अप्रैल 2023: उत्तराखंड के पूर्व मुख्यमंत्री और कांग्रेस वर्किंग कमेटी के सदस्य हरीश रावत
  • 12 अप्रैल 2023 : कांग्रेस नेता राहुल गांधी और कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे
  • 12 अप्रैल 2023: दिल्ली के सीएम और आम आदमी पार्टी के नेता अरविंद केजरीवाल
  • 31 अगस्त 2022 : तेलंगाना के सीएम और टीआरएस नेता केसीआर

दरअसल विपक्षी एकता के लिए नीतीश के इन नेताओं से मिलने के कुछ ख़ास मायने हैं.

तेलंगाना, दिल्ली, पश्चिम बंगाल, उत्तर प्रदेश, ओडिशा, झारखंड और महाराष्ट्र की कुल 220 लोकसभा सीटों में अकेले बीजेपी के पास 133 सीटें हैं.

यहां विपक्ष का गठबंधन सफल हुआ तो बीजेपी को बड़ा नुक़सान हो सकता है.

2019 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी की बड़ी जीत से केंद्र की राजनीति में बीजेपी विरोधी दलों की हैसियत कम हुई है. इसलिए हाल के समय में विपक्षी एकता को लेकर लगातार चर्चा हो रही है.

क्या कहते हैं आंकड़े?

2019 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी को क़रीब 38 फ़ीसदी वोट के साथ 303 सीटें मिली थीं. वहीं दूसरे नंबर पर कांग्रेस रही थी, जिसे क़रीब 20 फ़ीसदी वोट और महज़ 52 सीटें मिली थीं.

इसमें ममता बनर्जी की टीएमसी को 4 फ़ीसदी से ज़्यादा वोट मिले थे और उसने 22 सीटें जीती थीं. जबकि एनसीपी को देश भर में क़रीब डेढ़ फ़ीसदी वोट मिले थे और उसके 5 सांसद जीते थे. वहीं शिव सेना 18, जेडीयू 16 और समाजवादी पार्टी 5 सीटें जीत सकी थी.

इन चुनावों में एनडीए को बिहार की 40 में से 39 सीटें मिली थीं, लेकिन अब जेडीयू और बीजेपी के अलग होने के बाद राज्य में राजनीतिक समीकरण पूरी तरह बदले नज़र आते हैं.

इसमें बीजेपी को 24 फ़ीसदी वोट मिले थे, जबकि उसकी प्रमुख सहयोगी जेडीयू को क़रीब 22 फ़ीसदी और एलजेपी को 8 फ़ीसदी वोट मिले थे.

इन चुनावों में एलजेपी से दोगुना वोट पाने के बाद भी आरजेडी को एक भी सीट नहीं मिली थी, जबकि कांग्रेस को क़रीब 8 फ़ीसदी वोट मिलने के बाद महज़ एक ही सीट मिल पाई थी.

इन्हीं आंकड़ों में विपक्षी एकता की ज़रूरत भी छिपी है और इसी में नीतीश कुमार को एक उम्मीद भी दिखती है.

बिहार में एलजेपी और उपेंद्र कुशवाहा की राष्ट्रीय लोक जनता दल के अधिकतम वोट एनडीए के पास आने पर ये 35 फ़ीसदी के क़रीब दिखता है. जबकि राज्य में महागठबंधन के पास 45 फ़ीसदी से ज़्यादा वोट हैं.

क्या कहते हैं जानकार?

टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ़ सोशल साइंस के पूर्व प्रोफ़ेसर और राजनीतिक मामलों के जानकार पुष्पेंद्र कुमार का मानना है कि बिहार में यह समीकरण पूरी तरह से महागठबंधन के पक्ष में है और इससे अगले लोकसभा चुनावों में ज़्यादातर सीटों पर उसकी बढ़त दिखती है.

वहीं चुनाव विश्लेषक और सीएसडीएस के प्रोफ़ेसर संजय कुमार के मुताबिक़ देशभर में विपक्षी एकता बन भी जाए तो ऐसा नहीं होगा कि बीजेपी 150-160 सीटों तक सिमट जाए.

इस स्थिति में भी बीजेपी ही नंबर एक पर होगी. कांग्रेस नंबर दो पर रहकर भी क़रीब 80 सीटों पर ही होगी."

आंकड़ों के लिहाज से विपक्ष के लिए बहुत बड़ी सफलता नहीं दिखती है, लेकिन पुष्पेंद्र कुमार का मानना है कि विपक्ष को अभी के लिए यही चाहिए.

पुष्पेंद्र कुमार कहते हैं, "बीजेपी को अगर देशभर में 50-60 सीटों का भी नुक़सान हो गया तो उसके लिए मुश्किलें शुरू हो जाएंगी. ऐसी स्थिति में उसके कई सहयोगी उसका साथ छोड़ सकते हैं."

किसका साथ सबसे ज़रूरी

अगले लोकसभा चुनाव में दक्षिण के राज्यों में किसी गठबंधन की ज़रूरत कम दिखती है. इनमें राज्यों की पार्टियां और कांग्रेस ही चुनावी मुक़ाबले में नज़र आती हैं.

पुष्पेंद्र कुमार का मानना है कि न तो सारी विपक्षी पार्टियां एक साथ आ सकती हैं और न ही यह ज़रूरी है.

वो कहते हैं, "जैसे केरल और तमिलनाडु में विपक्षी गठबंधन की ज़रूरत नहीं है, उसी तरह जिन राज्यों में बीजेपी और कांग्रेस के बीच सीधा मुक़ाबला है वहां भी इसकी ज़रूरत नहीं है."

विपक्षी एकता के केंद्र में कांग्रेस और अन्य दलों में तृणमूल कांग्रेस और आम आदमी पार्टी का होना ज़रूरी है. इसके लिए शिवसेना के उद्धव ठाकरे गुट का साथ भी ज़रूरी दिखता है.

पुष्पेंद्र कुमार के मुताबिक़, "आम आदमी पार्टी का आधार दिल्ली और पंजाब में मज़बूत है. इसके अलावा वो गोवा, गुजरात और राजस्थान में विस्तार की योजना बना रही है. अगर विपक्षी एकता नहीं बनी तो इन राज्यों में कांग्रेस को नुक़सान हो सकता है."

यही हाल ममता बनर्जी का है जो पश्चिम बंगाल के अलावा असम, उत्तर-पूर्व के राज्यों और गोवा में कांग्रेस को नुक़सान पहुंचा सकती है. इसलिए ममता बनर्जी को साथ लेना भी विपक्ष के लिए ज़रूरी है.

ममता बनर्जी और अरविंद केजरीवाल दो ऐसे नेता हैं जो देशभर में क़रीब 100 सीटों पर कांग्रेस के वोट में सेंध लगा सकते हैं. इसका सीधा फायदा बीजेपी को होगा.

बीजेपी के लिए मुश्किल

पुष्पेंद्र कुमार के मुताबिक़ अगर विपक्षी गठबंधन बीजेपी को नुक़सान पहुंचाता है तो इसकी भरपाई आसान नहीं होगी, क्योंकि उत्तर प्रदेश, गुजरात, राजस्थान, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और झारखंड जैसे राज्यों में जहां बीजेपी मज़बूत है वहां पहले से ही ज़्यादातर सीटों पर उसका कब्ज़ा है.

पुष्पेंद्र कुमार मानते हैं कि अगले लोकसभा चुनावों में पश्चिम बंगाल, उत्तराखंड, कर्नाटक और तेलंगाना में ख़ुद ही बीजेपी को कुछ नुक़सान हो सकता है.

पिछले लोकसभा चुनावों में बीजेपी पश्चिम बंगाल की 42 में 18 सीटें जीतने में सफल रही थी और उसे 40 फ़ीसदी से ज़्यादा वोट मिले थे. जबकि ममता बनर्जी की टीएमसी क़रीब 44 फ़ीसदी वोट पाने में सफल रही थी और उसे 22 सीटें मिली थीं.

यहां कांग्रेस को क़रीब 6 फ़ीसदी वोट और 2 सीटें मिली थीं. सीपीएम को भी क़रीब 6 फीसदी वोट मिले लेकिन उसे एक भी सीट पर जीत नहीं मिल पाई थी.

इन आंकड़ों के बीच अगर ममता बनर्जी विपक्षी एकता के साथ जुड़ती हैं, तो यहां बीजेपी को बड़ा नुक़सान उठाना पड़ सकता है.

महाराष्ट्र की बात करें तो साल 2019 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी को क़रीब 28 फ़ीसदी वोट और 23 सीटें मिली थीं, जबकि उसकी सहयोगी शिवसेना को 23.5 फ़ीसदी वोट के साथ 18 सीटें मिली थीं.

यानी यहां भी उद्धव ठाकरे, एनसीपी और कांग्रेस मिलकर चुनाव लड़ें तो बीजेपी के लिए चुनौती बन सकते हैं.

कहां फंस सकता है पेंच?

नीतीश कुमार जिस विपक्षी एकता की कोशिश में लगे हैं, उसके लिए ममता बनर्जी और अरविंद केजरीवाल सबसे बड़ी मुश्किल बन सकते हैं. ममता बीजेपी, कांग्रेस और लेफ़्ट पार्टियों को अकेले दम पर चुनौती दे रही हैं.

वह उत्तर-पूर्वी राज्यों में भी पार्टी के विस्तार में लगी हैं और गठबंधन में कांग्रेस के साथ सीटों के बंटवारे के मुद्दे पर उनका मामला फंस सकता है.

यही हाल आम आदमी पार्टी के अरविंद केजरीवाल के साथ भी है.

दिल्ली के बाद पंजाब में सरकार बनाने वाली आम आदमी पार्टी की मांग बढ़ सकती है. पिछले दिनों जालंधर लोकसभा उपचुनाव जीतने से उनका यह दावा और मज़बूत हो सकता है.

इतना ही नहीं दिल्ली नगर निगम का चुनाव जीतने और पिछले साल गुजरात में विधानसभा चुनावों में खाता खोलने के बाद 'आप' दिल्ली से लेकर गुजरात तक समझौते में बड़ी मांग रख सकती है.

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