महाराष्ट्र: दशहरा पर सुनाई देगी हिंदुत्व और आरक्षण की गूंज, छह आयोजनों में किसका क्या दांव पर

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- Author, दीपाली जगताप
- पदनाम, बीबीसी मराठी संवाददाता
दशहरा और सियासी सभाओं का आयोजन, महाराष्ट्र की राजनीति में कोई नई बात नहीं है.
लेकिन इस साल दशहरे के दिन (मंगलवार को) राज्य में एक-दो नहीं, बल्कि छह अलग-अलग राजनीतिक सभा आयोजित हो रही हैं.
राज्य में बदले राजनीतिक हालात, विचारधाराओं की लड़ाई, आरक्षण और सरकारी नौकरियों में भर्ती को लेकर विवाद के मुद्दे पर सत्तारूढ़ दल और विपक्षी गठबंधन एक दूसरे के आमने-सामने हैं.
राजनीति के कई जानकारों की राय है कि इन सभी कार्यक्रमों से ऐसे संदेश सामने आ सकते हैं जिनका राज्य सियासत पर असर देखने को मिल सकता है.

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1. शिव सेना के ठाकरे गुट की सभा, स्थान- शिवाजी पार्क, दादर
शिव सेना के संस्थापक बाल ठाकरे ने 30 अक्टूबर 1966 को, शिवाजी पार्क में पहली दशहरा सभा आयोजित की. इस साल भी शिव सेना के ठाकरे गुट की दशहरा सभा दादर के शिवाजी पार्क में होगी.
शिव सेना में विभाजन के बाद यह दूसरा 'दशहरा मिलन' समारोह है. पिछले साल भी शिव सेना के दोनों गुटों ने अलग-अलग दशहरा सभा का आयोजन किया था.
इस बार दशहरा सभा की ख़ास बात ये है कि शिव सेना में फूट के बाद आने वाले चुनाव के मद्देनजर उद्धव ठाकरे का गुट अपनी संगठनात्मक ताक़त दिखाने की कोशिश करेगा.
इसके अलावा जहाँ एक तरफ़ विधायकों की अयोग्यता को लेकर क़ानूनी लड़ाई चल रही है, वहीं दूसरी तरफ़ उद्धव ठाकरे अपने भाषण के ज़रिए जनता की अदालत में 'न्याय की गुहार' लगाते नजर आ सकते हैं.
दरअसल, दशहरा मेले का इस्तेमाल बाल ठाकरे, महत्वपूर्ण राजनीतिक घोषणाओं के लिए भी करते थे.
1982 में बाल ठाकरे ने मिल मज़दूरों की हड़ताल के सिलसिले में शरद पवार और जॉर्ज फर्नांडीस को बुलाया. शरद पवार तब कांग्रेस में थे.
1996 में बाल ठाकरे के नेतृत्व में शिव सेना में शिव उद्योग सेना की शुरुआत हुई. दशहरा सभा के मंच से ही उन्होंने 'भारत-पाकिस्तान क्रिकेट मैच के विरोध' की भी घोषणा की थी.
इसके बाद 2010 में उन्होंने अपने पोते और विधायक आदित्य ठाकरे को तलवार दी और सक्रिय राजनीति में ले आए.
अब शिव सेना में फूट के बाद उद्धव ठाकरे ने बीजेपी को बड़ी चुनौती दी है. इसी के चलते वे अक्सर यह कहते नज़र आते हैं कि उनकी 'हिंदुत्व की परिभाषा' बीजेपी से कितनी अलग है.
इस साल के दशहरा समागम के मौक़े पर उद्धव ठाकरे एक बार फिर शिव सैनिकों को अपनी बात समझाने की कोशिश करते नज़र आ सकते हैं.

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2. शिंदे की शिव सेना का समारोह, स्थान- आज़ाद मैदान, दक्षिण मुंबई
पिछले साल से ही शिव सेना के प्रमुख नेता एकनाथ शिंदे अलग से दशहरा सभा का आयोजन कर रहे हैं. इस साल का दशहरा मेला, शिव सेना के शिंदे गुट के लिए भी उतना ही अहम है.
वजह ये है कि शिंदे गुट के विधायकों पर अयोग्यता की तलवार लटकी हुई है. राज्य सरकार का मुखिया होने के नाते एकनाथ शिंदे के सामने कई चुनौतियां हैं.
एक तरफ़ जनता को यह समझाने की चुनौती है कि वो शिव सेना और बालासाहेब के विचारों को आगे बढ़ा रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ़ मुख्यमंत्री के तौर पर उनके सामने कई परस्पर विरोधी मुद्दों का समाधान ढूंढ़ने की चुनौती है.
उनके सामने सरकारी भर्तियों, विभिन्न समुदायों की आरक्षण की मांगों, क़ानून व्यवस्था, स्वास्थ्य व्यवस्था, और पुरानी पेंशन योजना लागू करने के भी सवाल हैं.
इस वजह से इस साल के दशहरा मेले में एकनाथ शिंदे के भाषण में निशाने पर भले ही उद्धव ठाकरे रहें, लेकिन मुख्यमंत्री रहते हुए राज्य की जनता के लिए वे क्या कहते हैं, इस पर भी सबकी नज़रें होंगी.

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3. रोहित की संघर्ष यात्रा और शरद पवार की सभा, स्थान- पुणे
एनसीपी में फूट के बाद अध्यक्ष शरद पवार एक बार फिर मैदान में उतर गए हैं और पार्टी को खड़ा करने का काम शुरू कर दिया है.
अजित पवार और उनके साथ बड़ी संख्या में विधायकों के साथ छोड़ने के बाद शरद पवार के पोते विधायक रोहित पवार ने राज्यव्यापी संघर्ष यात्रा की घोषणा की है.
पुणे से नागपुर के रूट पर यह यात्रा 45 दिनों की होगी. इस अवसर पर विभिन्न ज़िलों के नागरिकों की समस्याओं, विशेषकर युवाओं की समस्याओं पर विचार किया जायेगा.
इस यात्रा के जरिए शक्ति प्रदर्शन भी किया जाएगा. इस संघर्ष यात्रा की शुरुआत शरद पवार की मौजूदगी में होगी. इसके चलते दशहरे पर महाविकास अघाड़ी के दो अहम नेताओं के भाषण होंगे.
पुणे में शरद पवार और मुंबई में उद्धव ठाकरे का भाषण होगा.

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4. पंकजा मुंडे का आयोजन, स्थान- भगवान भक्ति गढ़
दिवंगत बीजेपी नेता गोपीनाथ मुंडे ने बीड के भगवान भक्ति गढ़ में दशहरा सभा की परंपरा शुरू की थी.
इसके बाद उनकी बेटी और अब बीजेपी की राष्ट्रीय महासचिव पंकजा मुंडे ने भी इस परंपरा को जारी रखते हुए भगवान भक्ति गढ़ में दशहरा सभा का आयोजन शुरू किया.
वह अक्सर अपने दशहरा भाषणों में भावनात्मक अपील करती देखी जाती हैं. उन्होंने अक्सर अपनी उपेक्षा को भी मुद्दा बनाया है.
अब अपनी मौजूदा राजनीतिक सोच, पार्टी में नाराज़गी और चीनी मिल पर कार्रवाई के बाद पंकजा मुंडे इस साल के भाषण में क्या बड़ा एलान करेंगी, इस बात पर सभी की नज़र होगी.

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5. संघ का विजयादशमी उत्सव, स्थान- नागपुर, आरएसएस मुख्यालय
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के मुख्यालय नागपुर में हर साल विजयादशमी मनाई जाती है. आरएसएस की स्थापना 1925 में विजयादशमी के ही दिन हुई थी.
उस दिन, आरएसएस का एक मार्च होता है, एक ड्रिल के बाद आरएसएस नेताओं का संबोधन होता है.
आने वाले चुनाव के साथ देश के राजनीतिक और धार्मिक माहौल को देखते हुए मोहन भागवत राष्ट्रीय राजनीति के लिए कौन सी दिशा ले रहे हैं, इस पर सभी की नज़र है.

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6. धनगर आरक्षण के लिए जुटान, स्थान- चौंडी, अहमदनगर
मराठा आरक्षण का मुद्दा सरकार के सामने है. ओबीसी समुदाय का विरोध और एसटी वर्ग से आरक्षण पाने के लिए धनगर समुदाय ने भी आंदोलन छेड़ा हुआ है. फिलहाल ये लगता है कि राज्य में एक बार फिर से आरक्षण की राजनीति शुरू हो गई है.
धनगर समुदाय की यशवंत सेना ने इस समुदाय को अनुसूचित जाति में शामिल करने की मांग को लेकर अहमदनगर ज़िले के चौंडी में दशहरा सभा के आयोजन का फ़ैसला किया है.
इससे पहले भी धनगर समाज के नेताओं ने आरक्षण के लिए भूख हड़ताल की थी. राज्य सरकार के साथ बैठक के बाद अनशन ख़त्म कर दिया गया.
धनगर समुदाय के नेताओं का कहना है कि उनके लिए एसटी वर्ग के आरक्षण के लिए सरकारी प्रावधान मौजूद हैं और कुछ अन्य राज्यों ने भी इसे लागू किया है.
इस सभा की घोषणा अहिल्याबाई होल्कर की जन्मस्थली चौंडी में जाकर की गई है. यह देखना अहम होगा कि यशवंत सेना राज्य सरकार को क्या संदेश देती है.

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दशहरा का महाराष्ट्र में राजनीतिक महत्व
महाराष्ट्र में दशहरा दिवस ने सांस्कृतिक के साथ-साथ राजनीतिक महत्व भी हासिल कर लिया है, यही वजह है कि इस दिन राजनीतिक सभाओं की संख्या बढ़ी है.
कोल्हापुर की शिवाजी यूनिवर्सिटी में राजनीति विज्ञान के प्रोफेसर और राजनीतिक विश्लेषक प्रकाश पवार कहते हैं, “हिंदू अलग हैं और हिंदुत्व अलग है. महाराष्ट्र में दशहरा आयोजन का हिंदू जनमानस में महत्वपूर्ण स्थान है. इस दिन होने वाली राजनीतिक बैठकें हिंदू धर्म के विस्तार के लिए होती हैं, लेकिन इस बहाने पार्टी और कार्यकर्ताओं को नेता अपना संदेश भी दे देते हैं.”
जानकारों की राय में एक महत्वपूर्ण बदलाव या नया चलन ये दिखा है कि 'हिंदुत्व' को केंद्र में रखकर राजनीति करने वाले दलों के अलावा अन्य पार्टियां भी दशहरा जैसे दिन पर असर दिखाने की कोशिश कर रही हैं.
आम राय है कि संस्कृति और हिंदुत्व जैसे मुद्दों पर अब तक बीजेपी का अधिकार जैसा रहा है. अब ऐसा लगता है कि अन्य पार्टियों को भी यह एहसास हो गया है कि उन्हें भी हिंदुत्व से जुड़े मुद्दों और प्रतीकों को आजमाना चाहिए.
हालांकि, तमाम राजनीतिक और गैर राजनीतिक संगठनों में दशहरा सभा शिव सेना के लिए सबसे अधिक महत्वपूर्ण है.
वरिष्ठ पत्रकार संदीप प्रधान कहते हैं, “अब महाराष्ट्र में दो पार्टियां चार पार्टियां बन गई हैं. इसके चलते राजनीतिक घटनाक्रम भी बढ़ गया है. चुनाव सिर पर हैं. तभी इस साल दशहरे के राजनीतिक कार्यक्रम ज़्यादा दिख रहे हैं.”
संदीप प्रधान के मुताबिक, “इसे जनता के सामने अपनी पार्टियों की छवि चमकाने के प्रयास के रूप में देखा जा सकता है. पहले बाला साहेब ठाकरे की दशहरा सभा में भाषण के लिए लाखों शिवसैनिक जुटते थे. अब शिवसेना दो गुट में बंट गई. दोनों समूहों के अपने-अपने मुद्दे और भूमिकाएँ हैं. इसे राजनीतिक प्रतिस्पर्धा के रूप में भी देखा जा सकता है."

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इस बार दशहरा क्यों है अहम
महाराष्ट्र में स्थानीय निकायों के चुनाव लंबित हैं. अगले दस से ग्यारह महीने में लोकसभा और फिर विधानसभा चुनाव होंगे.
महाराष्ट्र की राजनीतिक परिस्थितियों और समीकरणों में अमूल चूल परिवर्तन हुए हैं. इस वजह से इस साल दशहरा सभा का राजनीतिक महत्व बढ़ गया है.
इससे पहले भी दशहरा के दिन नई घोषणाएं होती रही हैं. किसी नई पहल या नए राजनीतिक रुख़ की घोषणा करने के लिए भी दशहरा का दिन चुना जाता है.
वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक हेमंत देसाई कहते हैं, “आगामी चुनावों के मद्देनज़र, हम दशहरे पर राजनीतिक घटनाओं को एक साथ होते हुए देख रहे हैं. संयोगवश कुछ घटनाएं भी घट रही हैं. रोहित पवार की संघर्ष यात्रा युवाओं को आकर्षित करने और लोकसभा की तैयारी के लिए है. इससे पहले वह अपने निर्वाचन क्षेत्र में एमआईडीसी का मुद्दा उठा चुके हैं. यह कार्यक्रम रोज़गार, भर्ती के कारण युवा पीढ़ी को पार्टी की ओर मोड़ने के लिए है.”
उन्होंने कहा, “दूसरी ओर आरक्षण का मुद्दा चुनाव के लिहाज़ से भी अहम है. हमें याद है कि कुछ दिन पहले भंडारे में मंत्री राधाकृष्ण विखे पाटिल पर पथराव किया गया था. पिछले चुनाव में बारामती में गोपीचंद पडलकर के कार्यक्रम के दौरान देवेंद्र फडणवीस ने धनगर समुदाय को आरक्षण देने का वादा किया था. ओबीसी जनगणना का मुद्दा कांग्रेस राष्ट्रीय स्तर पर उठा रही है. इससे महाराष्ट्र में भी ओबीसी जनगणना का मुद्दा गरमा जाएगा.”
आरक्षण के मुद्दे पर हेमंत देसाई कहते हैं, “लालू प्रसाद यादव ने बिहार चुनाव के दौरान राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के आरक्षण के विरोध वाले बयान का फ़ायदा उठाने की कोशिश की. इसके बाद संघ ने अपनी ग़लती सुधारी और आरक्षण के पक्ष में बयान दिया. उसके बाद से ही मोहन भागवत ने लगातार यही रुख़ अपनाया कि आरक्षण बरक़रार रखना होगा.”
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