'पहले बच्चा गया, फिर बेटी चली गई', नांदेड़ के अस्पताल में अपनों को गंवाने वालों की आपबीती- ग्राउंड रिपोर्ट

लक्ष्मीबाई टोम्पे
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    • Author, श्रीकांत बंगाले
    • पदनाम, बीबीसी मराठी संवाददाता

चार अक्टूबर को दोपहर 12 बजे नांदेड़ के सरकारी अस्पताल के बाहर एक महिला रो रही थीं. उसकी आवाज़ सुनकर काफ़ी लोग उनके पास इकट्ठा हो गए .

महिला का नाम लक्ष्मीबाई टोम्पे था. लक्ष्मीबाई की बेटी अंजलि वाघमारे और उनके दो दिन के नवजात बच्चे की इस अस्पताल में मौत हो गई.

टोम्पो परिवार का कहना है कि अंजलि को 30 सितंबर को डिलीवरी के लिए अस्पताल में भर्ती कराया गया था जहां एक अक्टूबर की रात को उन्होंने बच्चे को जन्म दिया.

अंजलि की मां लक्ष्मीबाई बताती हैं, "डिलीवरी नॉर्मल हुई, सब कुछ सामान्य था. बच्चा भी नॉर्मल था. मेरी बेटी ने मुझसे दो दिन बात की. उसने बताया कि सब कुछ ठीक है. उसने अपने बच्ची के रोने की आवाज़ भी मुझे सुनाई. दूसरे दिन वो कोमा में चली गई. उसे एक घंटे बुखार रहा. उसके बावजूद डॉक्टर ने उसे देखा नहीं. हम जो इतने सारे रुपये खर्च कर के दवाइयां लाए थे उसे उन्होंने कहां रखा, पता नहीं."

30 सितंबर से एक अक्टूबर के दरम्यान नांदेड़ के डॉ. शंकरराव चव्हाण सरकारी अस्पताल में 24 घंटे में 24 मरीज़ों की मौत हुई. इसमें 12 नवजात भी शामिल थे. इनमें से एक अंजलि वाघमारे की बच्ची भी थी.

यह अस्पताल नांदेड़ के विष्णुपुरी इलाके में है.

लक्ष्मीबाई टोम्पे
इमेज कैप्शन, लक्ष्मीबाई टोम्पे (रोते हुए), बगल में उनका बेटा राजेश टोम्पे

अस्पताल ने बेटा बताया, परिवार का दावा- बेटी हुई थी

लक्ष्मीबाई की बगल में बैठे अंजलि वाघमारे के भाई राजेश टोम्पे ने हमें बताया, "सोमवार की सुबह चार बजे हमें बताया गया कि मेरी दीदी का बच्चा अब नहीं रहा. हमें बताया गया कि उसको टॉयलेट हुआ और उससे जुड़े किसी कारण की वजह से उसकी मौत हो गई. पहले ये बताया गया था कि सब कुछ ठीक है. हम वहां जाते थे तो कहते थे कि सबकुछ ठीक है. आप अंदर नहीं आएं."

अस्पताल की तरफ से जारी नोटिफ़िकेशन में कहा गया है कि अंजलि वाघमारे के बच्चे का वजन चार किलो था और उसकी मौत का कारण मेकोनियम एस्पिरेशन सिंड्रोम विद बर्थ एस्फिक्सिया को बताया गया.

हॉपकिंस मेडिसिन के अनुसार, मेकोनियम एस्पिरेशन सिंड्रोम तब होता है जब एक नवजात शिशु प्रसव के समय फेफड़े में मेकोनियम और एमनियोटिक लिक्विड के मिश्रण को ले लेता है.

अंजलि वाघमारे

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इसका मतलब प्रवस के दौरान बच्चे का पेशाब और गर्भ का पानी उसके फ़ेफ़ड़े में चले जाने से सांस की तकलीफ़ होती है और यह उसकी मौत का कारण बनता है.

अस्पताल की प्रेस विज्ञप्ति में बताया गया है कि अंजलि ने एक लड़के को जन्म दिया था जबकि टोम्पे परिवार का दावा है कि अंजलि ने लड़की को जन्म दिया है.

4 अक्टूबर को अंजलि वाघमारे की भी इलाज के दौरान मौत हो गई.

तीन से चार अक्टूबर के 24 घंटों के दरम्यान भी इस अस्पताल में कुल 14 लोगों की मौत हुई, इसमें तीन नवजात भी थे. अस्पताल ने बताया कि ये प्रीमैच्योर बच्चे थे.

असप्ताल के डीन डॉ. एस आर वाकोडे
इमेज कैप्शन, असप्ताल के डीन डॉ. एस आर वाकोडे

अस्पताल के डीन क्या बोले?

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कई मरीज़ों के परिजन ने हमें बताया कि नांदेड़ के इस अस्पताल में दवाएं उपलब्ध नहीं हैं.

हमने अस्पताल के कुछ कर्मचारियों से भी बात की. जिन्होंने हमें 'ऑफ़ रिकॉर्ड' बताया कि यहां डॉक्टरों की भी कमी है.

एक कारण यह भी बताया गया कि अस्पताल में दवाएं सप्लाई करने वालों के करोड़ों रुपये के बिल चुकाए गए हैं.

अस्पताल के डीन डॉ. एस आर वाकोडे ने बीबीसी को बताया, जिनकी भी मौत हुई है उसमें डॉक्टरों या दवाओं की कमी बड़ा मुद्दा नहीं था. यहां लाए गए मरीज़ों की मौत या तो उसकी प्राकृतिक वजहों से या उनकी बीमारियों के कारण हुई है.

वे बोले, "इस अस्पताल में 508 बिस्तर हैं. हमें इसकी फंडिंग मिलती है. पर वास्तव में यहां 1,080 बिस्तरों की सुविधाएं दी जा रही हैं."

नवजातों की मौतों का कारण पूछने पर वाकोडे ने बताया, बाल चिकित्सा विभाग में जिन 12 बच्चों की मौत हुई है वो कम वजन वाले थे और उनकी उम्र शून्य से चार दिन के बीच थी. वे प्रीमैच्योर बच्चे भी थे. उन्हें उससे संबंधित वार्ड में रखा गया था."

उन्होंने बताया, "जब बच्चे का वजन कम होता है तो उसके फ़ेफ़ड़े पूरी तरह से विकसित नहीं होते हैं. इसकी वजहा से ऐसे बच्चे की सांस लेने की प्रक्रिया सामान्य नहीं होती है."

डॉ. वाकोडे ने कहा, "शिशुओं के लिए हमारे पास 24 वॉर्मर मौजूद हैं. जिसमें हम 70 बच्चों की देखरेख करते हैं. ये प्रक्रिया में अगर बच्चों को कुछ इन्फ़ेक्शन या सांस से जुड़ी कोई समस्या होती है तो इसकी वजह से उनकी मौत हो सकती है. ऐसे मौत की संभावना 50 फ़ीसद तक हो सकती है."

रामचंद्र घुले
इमेज कैप्शन, रामचंद्र घुले

दवाओं और सफ़ाइकर्मियों की कमी

4 अक्टूबर की दोपहर तीन बजे हमारी मुलाक़ात नांदेड़ के लोहा तालुका के रहने वाले रामचंद्र धुले से हुई.

अस्पताल ने उन्हें एक सादे काग़ज़ पर दवाएं लिख कर दी थीं. वे बाहर के दवाखाने से दवाएं लेकर अस्पताल लौट रहे थे. दवाइयां उन्होंने 500 रुपये में ख़रीदी थीं.

उन्होंने हमें बताया, "सरकारी अस्पताल में दवाएं मिलनी चाहिए या नहीं ये हमें पता नहीं है. मरीज़ की हालत को देखकर हमलोग भयभीत होते हैं, हमें डर लगता है कि उसे कुछ हो न जाए इसलिए हम जल्द से जल्द मेडिसिन ले आते हैं."

अस्पताल में सफ़ाई का हाल
इमेज कैप्शन, अस्पताल में सफ़ाई का हाल

नांदेड़ के इस सरकारी अस्पताल में सफ़ाई का हाल हमें इससे जुड़े कर्मचारियों की कमी की ओर इशारा कर रहा था.

इसके मुख्य परिसर में हमें कुछ सूअर भी घूमते हुए दिखे.

अस्पताल प्रशासन की तरफ़ से हमें कहा गया कि कर्मचारी की कमी के वजह से इतने बड़े अस्पताल की सफ़ाई करना नामुमकिन है.

कुछ दिन पहले ही ठाणे नगर निगम के एक अस्पताल में एक ही रात में 18 मरीज़ों की मौत हो गई थी तो अब नांदेड़ में 24 घंटे में इतने ही मरीज़ों की मौत हुई है.

जिन लोगों की मौत हुई उनमें से कुछ के परिजनों ने हमसे बातचीत के दौरान कहा, "नेता आते-जाते हैं, दावे प्रतिदावे करते हैं, आरोप प्रत्यारोप करते हैं. ग़रीब की मौत पर सिर्फ़ राजनीति की जाती है. उसे राजनीतिक मुद्दा बनाया जाता है."

टोम्पे परिवार
इमेज कैप्शन, टोम्पे परिवार

परिजन का क्या है कहना?

राजेश टोम्पे कहते हैं, "हम स्वास्थ्य मंत्री से मिलने जा रहे थे. पर हमें मुलाक़ात नहीं करने दी गई. वो सिर्फ़ चक्कर लगा कर चले गए. वो लोग सिर्फ़ वोट लेने के लिए आते हैं. ये दवाख़ाना नहीं है, ये पैसे कमाने की फ़ैक्ट्री है. इस अस्पताल में कुछ नहीं है."

लक्ष्मीबाई टोम्पे बताती हैं, "सभी दवाएं हम बाहर से लेकर आए थे. हाथ में जो मोजे पहनते हैं वो भी हम बाहर से लेकर आए."

टोम्पे परिवार मज़दूरी करके अपनी जीविका चलाता है और कभी गन्ना काटते हैं तो कभी ईंट भट्ठों में काम करते हैं.

उनका कहना है कि अस्पताल के इलाज में उन्हें 45 हज़ार रुपये खर्च करने पड़े. इसके लिए जहां वो गन्ना काटते हैं वहां से 50 हज़ार रुपये उधार लिए हैं.

मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे

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टोम्पे परिवार का सीएम शिंदे को संदेश

टोम्पे परिवार ने मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे को एक संदेश दिया है.

वो कहते हैं, "मुख्यमंत्री को हम यही कहना चाहते हैं कि जो भी मरीज़ सरकारी अस्पताल में आए उसे अच्छा इलाज दें. उसको समय पर मेडिसिन मिलनी चाहिए. अगर सरकारी अस्पताल है तो अंदर ही सभी सुविधाएं मिलनी चाहिए. पर यहां कुछ भी नहीं है."

इस बीच मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे ने कहा है कि नांदेड़ की घटना की जांच होगी. वहीं टोम्पे परिवार का कहना है कि "इसमें दोषी पाए जाने वाले को कड़ी से कड़ी सज़ा होनी चाहिए."

नांदेड़ से निकलते वक़्त जब हम एक जगह खाना खाने रुके तो वहां के सिक्योरिटी गार्ड ने हमें बताया कि उन्हें अपनी मां को आंखों का ऑपरेशन कराने के लिए अस्पताल में लेकर जाना था, पर इस घटना के कारण अब इसमें देरी होगी.

उन्होंने यह भी कहा, "अगर सरकार की तरफ़ से पैसे ही नहीं आए तो डॉक्टर बेचारे क्या करेंगे. अगर नेता डॉक्टरों को टॉयलेट साफ़ करने को कहेंगे तो ये ग़लत बात है."

इस दौरान एक पुलिसकर्मी ने कहा, "राजनेता वही करते हैं जो उनके मतदाताओं को पसंद है. उन्हें इससे फ़र्क नहीं पड़ता कि हम क्या कहते हैं."

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