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हकीम अजमल ख़ान की कहानी, जो हिंदू महासभा के अध्यक्ष भी रहे
- Author, विवेक शुक्ला
- पदनाम, वरिष्ठ पत्रकार, बीबीसी हिंदी के लिए
आज जब राजधानी में कनॉट प्लेस से पंचकुइया रोड की तरफ आगे बढ़ते हैं, तो आरके आश्रम मेट्रो से कुछ ही दूरी पर जर्जर होता एक सफेद रंग का गेट नजर आता है. उसके बाहर काफी हलचल रहती है.
आप गेट को पार करके बस्ती हसन रसूल में दाखिल होते हैं. यहां पर छोटे-छोटे घरों के बाहर कई कब्रें दिखाई देती हैं. समझ नहीं आता कि यह कब्रिस्तान है या बस्ती. कब्रों के आसपास गप-शप करते हुए लोग मिल जाते हैं. घरों से ढोलक बजने और कुछ लोगों के संगीत का रियाज करने की भी आवाजें सुनाई देती हैं.
आप एक बुजुर्ग सज्जन से हकीम अजमल खान की कब्र के बारे में पूछते हैं. रमजान नाम के सज्जन इशारा करके बता देते हैं.
अब आप उस बुलंद शख्सियत की बेहद मामूली सी दिखाई दे रही कब्र के पास खड़े हैं, जो कांग्रेस, मुस्लिम लीग और हिंदू महासभा का अध्यक्ष रहा हो. वे चोटी के यूनानी चिकित्सक तो थे ही. वे रोज सैकड़ों रोगियों का इलाज करते थे.
कुछ लोग उन्हें 'मसीहा ए हिन्द' भी कहते थे. हकीम अजमल खान की कब्र के आगे एक अधेड़ उम्र की महिला बैठीं हैं. उनका नाम फौजिया है. वह बताती हैं, "हम ही हकीम साहब की कब्र की देखभाल करते हैं. यहां पर कुऱआन खानी और फातिया पढ़ लेते हैं."
हकीम साहब की कब्र के ऊपर गुलाब के कुछ सूख चुके फूल पड़े हैं.
फौजिया बताती हैं, "कब्र पर कोई मशहूर शख़्स या हकीम साहब के परिवार का कोई सदस्य श्रद्धांजलि देने के लिए नहीं आता."
हालांकि इस आरोप को हकीम साहब पड़पोते और सुप्रीम कोर्ट के वकील मुनीब अहमद ख़ान खारिज करते हैं.
वे कहते हैं, "मैं हकीम साहब की जयंती (11 फरवरी) पर अपने भाई और परिवार के सदस्यों के साथ कब्र पर जरूर आता हूं. यह अहाता हमारे परिवार का था. यहां हमारे बुजुर्ग दफ़न थे. पर इधर कब्जे कर लिए गए.''
उनका इशारा उस महिला की तरफ था जो अपने को हकीम साहब की कब्र की रखवाली करने का दावा कर रही थीं.
जब मिले हकीम साहब से गांधी जी
मुनीब अहमद ख़ान दिल्ली-6 के मशहूर लाल कुआं की उसी शरीफ़ मंजिल नाम की हवेली में रहते हैं, जो हकीम साहब का घर हुआ करती थी.
इस शरीफ़ मंजिल में हकीम साहब से गांधी जी और कस्तूरबा गांधी 13 अप्रैल,1915 को मिलने पहुंचे थे. गांधी जी 12 अप्रैल, 1915 को पहली बार दिल्ली आए थे और तब कश्मीरी गेट पर स्थित सेंट स्टीफंस कॉलेज में ठहरे थे.
हकीम साहब 14 अप्रैल को गांधी जी और कस्तूरबा गांधी को दिल्ली दर्शन के लिए लाल किला और कुतुब मीनार लेकर गए थे. ये सब तब तांगे पर ही गए होंगे. हकीम साहब ने ही यहां गांधी जी के लिए वैष्णव भोजन की व्यवस्था की थी.
दिल्ली के इतिहासकार आरवी स्मिथ जिक्र किया करते थे, "दिल्ली में गांधी जी की अपने से छह साल बड़े हकीम अजमल खान से मुलाकात दीनबंधु सीएफ एन्ड्रूज की मार्फत हुई थी. उन्हीं के आग्रह पर गांधी जी सेंट स्टीफंस कॉलेज में रुके थे. एन्ड्रूज सेंट स्टीफंस कॉलेज में पढ़ाया करते थे और वे दिल्ली ब्रदरहुड सोसायटी से जुड़े हुए थे."
चेहरा देखकर रोग जान लेते थे
हमदर्द दवाखाना और जामिया हमदर्द यूनिवर्सिटी को स्थापित करने वाले हकीम अब्दुल हमीद ने इस लेखक को 1995 में अपने कौटिल्य मार्ग के घर में बताया था कि हकीम अजमल खान साहब के पास औरतों के मासिक धर्म और मिरगी रोग की अचूक दवाएं होती थीं. उनकी दवाओं को लेने से रामपुर के नवाब की बेगम मृत्यु शैय्या से उठ खड़ी हुई थीं. वो नौ सालों तक रामपुर के नवाब के हकीम रहे.
उनका निधन भी रामपुर में हुआ था. दिल्ली के पुराने लोग दावा किया करते थे कि उनकी बुद्धि इतनी कुशाग्र थी कि वह केवल रोगी का चेहरा देखकर उसकी किसी भी बीमारी का पता लगा लेते थे.
किसकी सलाह पर खोला तिब्बिया कॉलेज
पहली मुलाकात के बाद ही गांधी जी और हकीम अजमल खान में प्रगाढ़ता हो गई. गांधी जी ने ही हकीम अजमल खान को सलाह दी कि वे दिल्ली में एक बड़ा अस्पताल खोलें ताकि यहां की आबादी को लाभ हो. तब तक हकीम साहब लाल कुआं से ही प्रैक्टिस करते थे.
उन्होंने कभी सोचा ही नहीं था कि वे लाल कुआं छोड़कर बाहर मरीजों को देखेंगे. उन्हें गांधी जी की सलाह पसंद आई. उसके बाद करोल बाग में नए अस्पताल और कॉलेज के लिए ज़मीन देखी गई. जब ज़मीन को खोज ली गई तो हकीम साहब ने गांधी जी से तिब्बिया कॉलेज और अस्पताल का 13 फरवरी 1921 का उद्घाटन करवाया.
कितनी पुरानी शरीफ़ मंजिल
हकीम साहब की पुश्तैनी हवेली शरीफ़ मंजिल ने अपना 300 सालों का सफ़र 2020 में पूर कर लिया था. यह सन 1720 में तामीर हुई थी. शरीफ़ मंजिल को दिल्ली के सबसे पुराने आबाद घरों में से एक माना जा सकता है. इसमें अब हकीम अजमल खान के पड़पौत्र हकीम मसरूर अहमद खान साहब सपरिवार रहते हैं.
हकीम साहब ने गांधी का असहयोग आन्दोलन में साथ दिया था. वे भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अध्यक्ष भी निर्वाचित हुए थे, तथा 1921 में अहमदाबाद में आयोजित कांग्रेस के सत्र की अध्यक्षता भी की थी. हकीम साहब कांग्रेस के अध्यक्ष बनने वाले पांचवें मुस्लिम थे. इससे पहले वे 1919 में मुस्लिम लीग के अध्यक्ष बने. वे मुस्लिम लीग के 1906 में ढाका में हुए पहले सम्मेलन में भी शामिल हुए थे.
वे 1920 में अखिल भारतीय खिलाफत कमेटी के भी अध्यक्ष थे. दिल्ली सरकार की वेबसाइट में बताया गया है कि वे हिन्दू महासभा के भी अध्यक्ष रहे.
किसके किराएदार थे चचा गालिब
शरीफ़ मंजिल से दो मिनट के फासले पर मिर्ज़ा ग़ालिब का स्मारक है. मिर्ज़ा ग़ालिब का तो कभी कोई अपना घर हुआ ही नहीं. वे किराए के घरों में ही रहते रहे. पर अपनी ज़िंदगी के अंतिम छह साल उस घर में रहे जिसे हकीम अजमल ख़ान के वालिद हकीम गुलाम महमूद ख़ान ने उन्हें किराए पर रहने के लिए दिया था.
ग़ालिब साहब से सांकेतिक किराया लिया जाता था. जिस जगह गालिब का स्मारक बना हुआ है, वो हकीम साहब के वालिद का ही था.
आरवी स्मिथ बताते थे कि हकीम साहब की पहल पर ही उद्योग भवन से सटी सुनहरी मस्जिद को 1920 में री-डवलप किया गया था. बीते दिनों सुनहरी मस्जिद चर्चा में थी क्योंकि नई दिल्ली नगर परिषद (एनडीएमसी) इसे यहां से हटाना चाह रही थी. उसका दावा है कि यह सड़क के बीचों-बीच गोल चक्कर में स्थित है. कभी इस गोल चक्कर को 'हकीम जी का बाग़' कहा जाता था. इस छोटे से बाग़ में सुनहरी मस्जिद खड़ी है.
खड़ा किया जामिया मिल्लिया इस्लामिया
हकीम अजमल ख़ान जामिया मिल्लिया इस्लामिया के संस्थापकों में से एक थे. उन्हें 22 नवंबर 1920 को इसका पहला कुलाधिपति चुना गया और 1927 में अपनी मृत्यु तक उन्होंने इस पद को संभाला.
इस अवधि के दौरान उन्होंने विश्वविद्यालय को अलीगढ़ से दिल्ली शिफ्ट करवाया और आर्थिक तथा अन्य संकटों के दौरान व्यापक रूप से कोष इकट्ठा करके और प्रायः खुद के धन का उपयोग करके उन्होंने इसकी सहायता भी की.
जामिया मिल्लिया इस्लामिया के हिंदी विभाग में प्रोफेसर आसिफ़ उमर कहते हैं कि जामिया की स्थापना गांधी जी के आशीर्वाद से हुई थी.
गाँधीजी के आह्वान पर औपनिवेशिक शासन द्वारा समर्थित या चलाए जा रहे सभी शैक्षणिक संस्थाओं का बहिष्कार करने के लिए, राष्ट्रवादी शिक्षकों और छात्रों के एक समूह ने ब्रिटिश समर्थक इच्छा के ख़िलाफ़ विरोध कर अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय छोड़ दिया था.
इस आंदोलन के सदस्यों में हकीम अजमल खान, डॉ. मुख्तार अहमद अंसारी और अब्दुल मजीद ख़्वाजा प्रमुख थे.
जामिया अलीगढ़ से करोलबाग और प्रेमचंद
हकीम अजमल ख़ान ने जामिया को 1925 में अलीगढ़ से करोल बाग, दिल्ली में शिफ्ट किया.
इसी कैंपस में मुंशी प्रेमचंद ने आगे चलकर अपनी मृत्यु से कुछ पहले अपनी अंतिम कहानी ‘कफन’लिखी थी.
हकीम साहब ने शुरूआती दौर में अपनी जेब से जामिया के ज्यादातर खर्च उठाए थे.
हकीम साहब की कब्र की बुरी स्थिति को देखकर यह ख्याल अवश्य आता है कि जिस इंसान ने दिल्ली में तिब्बिया कॉलेज और जामिया को खड़ा किया उसे यह दिल्ली भूल गई.
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