यूपी के दुधवा बफ़र ज़ोन में गांव वालों ने बाघिन को पीट-पीट कर मारा

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- Author, सैयद मोज़िज़ इमाम
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
उत्तर प्रदेश के दुधवा टाइगर रिज़र्व में एक बाघिन को गांव वालों ने पीट-पीट कर मार डाला है.
बाघिन के हमले से दो ग्रामीण घायल हो गए थे. अब वन विभाग इस मामले की जांच कर रहा है.
इस बीच एक अलग घटना में दुधवा में ही मैलानी में एक्सीडेंट में एक बाघ की मौत हो गई है.
दुधवा टाइगर रिज़र्व के उप निदेशक टी रंगाराजू का कहना है कि दोनों ही वारदात में केस दर्ज करके कार्यवाई शुरू कर दी गई है.
इस घटना से पहले कर्तर्निया घाट वन्य जीव रेंज में एक हाथी का शव मिला था, जिसके बारे में वन विभाग का कहना था कि आपसी संघर्ष की वजह से मौत हुई थी.

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क्या था मामला?

लखीमपुर खीरी के दुधवा टाइगर रिज़र्व के बफर ज़ोन में 26 फ़रवरी को फुलवरिया में गांव वालों ने एक बाघिन को घेर कर मार दिया.
टी रंगाराजू का कहना है ''बाघिन 2 साल की सब एडल्ट थी. ये जल्दी ही अपने समूह से अलग हुई थी. जिस गांव में ये वारदात हुई है वो टाइगर ट्रैक पर पड़ता है. तो इससे पहले ये बाघिन अपना इलाका बना पाती इसने इंसान पर हमला कर दिया. बाघिन उम्र में और साइज़ में कम थी. इसलिए ग्रामीणों ने इसे घेर लिया.''
हालांकि ये हादसा एकदम सुबह के वक्त हुआ है. इसलिए वन विभाग की टीम मौके पर पहुंच गई. इस घटना को लेकर वाइल्ड लाइफ़ अधिनियम के तहत मुकदमा अज्ञात लोगों के ख़िलाफ़ दर्ज किया गया है.
वहीं दूसरी घटना में एक वयस्क बाघ को एक गाड़ी ने टक्कर मार दी है. इस कारण उसकी मौत हो गई है. इस मामले में गाड़ी के चालक को गिरफ़्तार किया गया है.
दोनों घटना पर वन विभाग ने शव का पोस्टमार्टम कराया है.
दुधवा के पास कई टाइगर रिज़र्व हैं. आसापास आबादी बढ़ने से बाघ और इंसान के बीच संघर्ष देखा जा रहा है.
टी रंगराजन ने कहा, ''इस वक्त बाघों की आबादी बढ़ रही है. कई बार हमने कई बाघिन को उनके बच्चों के साथ देखा है. जंगल का इलाका उतना ही है."
"बाघ के नए बच्चे बफ़र ज़ोन में या फिर आसपास चले जाते हैं. कई बार इंसान पर हमला भी कर देते हैं. हालांकि बाघ इंसान पर हमला कम ही करता है.''
मानव और वन्यजीव संघर्ष के मामले

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सेंटर फ़ॉर वाइल्ड लाइफ स्टडीज़ के मुताबिक़, भारत में हर साल मानव और वन्यजीव संघर्ष से जुड़ी 80 हज़ार घटनाएं होती हैं.
भारत में जहां 3,500 से ज़्यादा बाघ हैं वहीं हाथियों की संख्या तकरीबन 30 हज़ार है. भारत में तेदुओं की संख्या तकरीबन 13,874 है.
भारत सरकार के मुताबिक़, बाघ के हमले में तकरीबन 349 लोगों की मौत पिछले पांच सालों में हुई है.
हालांकि इस बारे में वन्यजीव विशेषज्ञ यादवेन्द्र सिंह कहते हैं, ''मानव वन्यजीव संघर्ष पहले ज़्यादा था अब कम हो रहा है. वन्यजीव अब उन इलाकों मे बढ़ रहे हैं जहां पहले खत्म हो गए थे.''
झाला का कहना है, "हर साल बाघों के हमले में 35 लोग, तेंदुए के हमले में 150 लोग और जंगली सुअरों के हमले में 150 लोग मारे जाते हैं. वहीं 50 हज़ार लोग सांप के काटने से मारे जाते हैं. दूसरी तरफ़ कार दुर्घटना में हर साल डेढ़ लाख लोगों की जान जाती है."
वो कहते हैं, "बात मौतों की संख्या की नहीं है. 200 साल पहले परभक्षियों से होने वाली इंसानी मौत मृत्यु दर का एक सामान्य हिस्सा हुआ करती थी. आज ये असामान्य बात है, इसीलिए ऐसी घटनाएं सुर्खियां बनाती हैं. असल में टाइगर रिज़र्वों में बाघ के हमले की तुलना में कार से मौत होने की आशंका अधिक होती है."
भारत में बाघ की संख्या

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भारत सरकार के मुताबिक 2022 में किए गए अखिल भारतीय बाघ आकलन के अनुसार बाघों की आबादी में वृद्धि हुई है. इनकी अनुमानित संख्या 3,682 है.
जबकि 2018 में यह 2,967 और 2014 में 2,226 थी.
सरकार के मुताबिक़, बाघ वाले इलाकों की तुलना से पता चलता है कि इनकी आबादी 6% प्रतिवर्ष की दर से बढ़ रही है.
ये बाघ 1,38,200 वर्ग किलोमीटर के क्षेत्र में पाए जाते हैं और इसके आसपास छह करोड़ लोग रहते हैं.
साल 2006 से ही भारत अपने 20 राज्यों में हर चार साल पर बाघों की गिनती करता आया है. इसके अलावा इनकी संख्या के वितरण, इनके शिकार, इनके प्रतिद्वंद्वी जानवर और इनके निवास स्थान की गुणवत्ता का भी सर्वेक्षण किया जाता है.
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