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महिलाओं में अक्सर हो जाती है कैल्शियम की कमी, इससे बचने के भी हैं उपाय
- Author, चंदन कुमार जजवाड़े
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, दिल्ली
हमारी सेहत और हड्डियों को मज़बूत रखने के लिए शरीर में कैल्शियम की संतुलित मात्रा का होना बहुत ही ज़रूरी है. इसकी कमी से हड्डियों में दर्द से लेकर हृदय से जुड़ी समस्या भी हो सकती है.
लेकिन अक्सर देखा गया है कि महिलाओं में कैल्शियम की कमी पाई जाती है. इसके पीछे उनकी दिनचर्या के साथ ही खान-पान भी ज़िम्मेदार होता है.
बढ़ती उम्र और बदलती ज़िंदगी के साथ महिलाओं में कैल्शियम की कमी होने का ख़तरा ज़्यादा होता है.
इस कहानी में हम कुछ विशेषज्ञों से बातचीत के आधार पर जानने की कोशिश करेंगे कि कैल्शियम की कमी से शरीर पर क्या असर पड़ सकता है.
इसे संतुलित रखने के क्या उपाय हैं और क्या कैल्शियम की कमी को पूरा करने के लिए दवाओं का सहारा लेना सुरक्षित है?
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बचपन से ही क्यों शुरू हो जाती है कमी
मौजूदा समय में शहरों में रहने वाली आबादी का एक बड़ा हिस्सा, चाहे वह महिला हो या पुरुष उनमें कैल्शियम की कमी देखी जाती है.
ऐसे मामलों में आमतौर पर यह समस्या बचपन से ही शुरू हो जाती है. बच्चों के हाथ, पांव या हड्डियों में दर्द की शिकायत इसका एक लक्षण है.
बेंगलुरु की डॉक्टर आत्रेय निहारचंद्रा न्यूट्रिशन के क्षेत्र में क़रीब दो दशक से काम कर रही हैं. उनका कहना है कि आजकल बच्चों और बाक़ी लोगों को भी पर्याप्त मात्रा में धूप नहीं मिल पाती है और उनमें कैल्शियम की कमी देखी जाती है.
धूप के ज़रिए हमारे शरीर को विटामिन-डी मिलता है जो शरीर को कैल्शियम अवशोषित करने में मदद करता है. इसके अलावा यह हड्डियों को मज़बूत बनाए रखता है.
उनका कहना है, "अब खेलने या फ़िज़िकल एक्टिविटी के लिए खुले मैदान नहीं हैं, या उनकी कमी है. बच्चे भी आमतौर पर इन्डोर गेम्स खेलते हैं. इससे शारीरिक गतिविधियां कम हो पाती हैं और हड्डियों की सेहत ठीक नहीं रह पाती है."
अगर गांवों में लोग शारीरिक तौर पर ज़्यादा मेहनत करते हैं, उनके शरीर को धूप भी पर्याप्त मात्रा में मिल जाती है तो कई बार उनका खान-पान ऐसा होता है जिसमें पर्याप्त मात्रा में कैल्शियम मौजूद नहीं होता है.
शरीर में कैल्शियम की कमी को पूरा करने का एक तरीक़ा बेहतर खान-पान हो सकता है. लेकिन जिन लोगों में कैल्शियम की कमी होती है, उनका खान-पान भी ऐसा होता है, जो इसे पूरा नहीं कर पाता है.
डॉक्टर आत्रेय निहारचंद्रा कहती हैं, "आज के समय में जिस जेनेटिकली मॉडिफ़ाइड खाने का बड़े पैमाने पर इस्तेमाल हो रहा है, वह है गेहूं. इसके अलावा जो लोग गाय के दूध पर ज़्यादा निर्भर हैं, उनमें भी कैल्शियम की कमी देखी जाती है, क्योंकि इसमें भी मिलावट का ख़तरा होता है."
"ये ध्यान रखना ज़रूरी है कि जब तक शरीर में कैल्शियम अवशोषित नहीं होगा तब तक आपके व्यायाम करने या धूप में चले जाने से भी कोई फ़ायदा नहीं होता है."
महिलाओं में ज़्यादा ख़तरा
आमतौर पर हम अपने घरों में या आसपास कई ऐसे मामले देखते हैं, जिनमें महिलाओं में कैल्शियम की कमी की वजह से उन्हें डॉक्टर से सलाह लेने की ज़रूरत तक पड़ जाती है.
महिलाओं में कमर दर्द, घुटनों का दर्द, हड्डियों का कमज़ोर होना अब काफ़ी आम बीमारी दिखती है.
ऑनलाइन वेलनेस प्लेटफ़ॉर्म 'मेटामॉरफोसिस' की संस्थापक और न्यूट्रिशन एक्सपर्ट दिब्या प्रकाश ने दिल्ली और इसके आसपास के इलाक़े में महिलाओं में कैल्शियम की कमी पर ख़ास अध्ययन किया है.
उनका कहना है कि बचपन में लड़कियों का शारीरिक विकास लड़कों की तुलना में ज़्यादा तेज़ होता है ऐसे में उन्हें ज़्यादा कैल्शियम की ज़रूरत होती है और 19 साल के बाद लड़कों का ग्रोथ ज़्यादा तेज़ होता है, लेकिन लड़कियों को पीरियड्स और अन्य वजहों से भी ज़्यादा कैल्शियम की ज़रूरत होती है.
दिब्या प्रकाश कहती हैं, "लड़कियां या महिलाएं पुरुषों के मुक़ाबले कम खाना खाती हैं. पीरियड्स के दौरान यह और कम हो जाता है. फिर आमतौर पर समाज में महिलाओं और पुरुषों के भोजन में भी अंतर होता है. तो आप जितना कम खाते हैं, उतना कम कैल्शियम आपके शरीर को मिलता है."
उनका कहना है कि भारत में आमतौर पर घरों में देखा जाता है कि महिलाएं पनीर, दाल, सोयाबीन और नॉन वेज भोजन को भी पुरुषों को बेहतर तरीक़े से परोसती हैं और ख़ुद ग्रेवी से खाना खाती हैं.
कई मां-बाप विज्ञापन देखकर बच्चों को दूध में मिलाकर कोई हेल्थ सप्लीमेंट देते हैं, लेकिन एक्सपर्ट्स के मुताबिक़, इससे कैल्शियम से ज़्यादा बच्चों के शरीर में चीनी पहुंचती है और बच्चे शुगर एडिक्ट हो जाते हैं. इससे उन्हें सामान्य दूध या बिना शुगर कंटेंट के कुछ भी अच्छा नहीं लगता है.
शरीर में कैल्शियम की कमी न हो इसके लिए अंजीर, ब्रोकली, सहजन, रागी, ड्राय फ़्रूट्स, नट्स जैसी चीज़ें काफ़ी फ़ायदेमंद मानी जाती हैं.
प्रेगनेंसी से लेकर ओल्ड एज तक ऐसे रखें ख़याल
प्रेगनेंसी के दौरान भ्रूण को तेज़ी से कैल्शियम और आयरन की ज़रूरत होती है, जो वह अपनी मां से पूरी करता है. इसलिए इस दौरान महिलाओं को कैल्शियम की काफ़ी ज़रूरत होती है.
गर्भावस्था के दौरान छठे महीने से यह ज़रूरत और ज़्यादा बढ़ जाती है. ऐसे समय में अगर महिलाएं अपनी सेहत का ख़याल न रखें तो उनके शरीर में कैल्शियम की कमी की समस्या स्थायी हो सकती है.
इसलिए आमतौर पर डॉक्टर गर्भवती महिलाओं को कैल्शियम और आयरन की गोली खाने को देते हैं, ताकि शरीर में इनकी कमी न हो.
आमतौर पर एक वयस्क को अगर शरीर के एक किलोग्राम वज़न के लिए 800 मिलीग्राम कैल्शियम की ज़रूरत होती है तो प्रेगनेंसी के दौरान एक महिला को 1200 मिलीग्राम कैल्शियम की ज़रूरत होती है.
हालांकि कैल्शियम और आयरन की गोलियां लेने में भी सावधानी बरतना बेहद ज़रूरी है.
दिब्या प्रकाश कहती हैं, "हमारे शरीर में कैल्शियम और आयरन छोटी आंत के एक विशेष हिस्से में अब्ज़ॉर्ब होता है. इसलिए दोनों दवाओं को अलग-अलग समय में लेना चाहिए. बेहतर यही होता है कि आप अगर सुबह कैल्शियम लें तो आयरन रात में लें. और हां कैल्शियम की गोली ख़ाली पेट न लें बल्कि खाने के बीच में लें."
शरीर में कैल्शियम की कमी न हो इसके लिए ज़रूरी है कि आप शुरू से ही इसकी सही मात्रा शरीर में बनाकर रखें, क्योंकि उम्र बढ़ने के साथ-साथ शरीर में कैल्शियम को अब्ज़ॉर्ब करने की क्षमता भी कम होती जाती है.
महिलाओं में तो मेनोपॉज़ के बाद कैल्शियम अब्ज़ॉर्ब करने की क्षमता 30% तक ही रह जाती है. इस तरह से बढ़ती उम्र के साथ-साथ शरीर की हड्डियों का डिजेनेरेशन (पतन) शुरू हो जाता है.
दिब्या प्रकाश कहती हैं, "महिलाएं शुरू से घर के बाक़ी लोगों का ख़याल रखती हैं, लेकिन अपना ख़याल नहीं रखने की वजह से दूसरों का ख़याल रखते रखते वे दूसरों पर निर्भर हो जाती हैं."
दवा कितनी सुरक्षित
कैल्शियम की कमी से न केवल हड्डियां कमज़ोर हो सकती हैं, बल्कि इसकी वजह से दिल से जुड़ी समस्या भी हो सकती है.
कैल्शियम फ़ैट सॉल्युबल यानी वसा में घुलकर हज़म होने वाला पदार्थ है और महिलाओं की शारीरिक बनावट की वजह से एक महिला के शरीर में औसतन एक पुरुष के शरीर से ज़्यादा फ़ैट होता है.
दिब्या प्रकाश के मुताबिक़ इसलिए भी महिलाओं को ज़्यादा कैल्शियम की ज़रूरत होती है. लेकिन कम ख़ुराक और अन्य वजहों से वे पुरुषों से कम कैल्शियम लेती हैं."
हमारे शरीर में कैल्शियम सही तरीके़ से अब्ज़ॉर्ब हो इसके लिए ज़रूरी है कि हमारा मेटाबॉलिज़्म सही हो.
तेज़ चलने (एक्सरसाइज़), समय पर सोने (कम से कम 7-8 घंटे) और उठने से मेटाबॉलिज़्म को ठीक रखा जा सकता है.
भले ही कैल्शियम की दवा आसानी से उपलब्ध हो, लेकिन बिना डॉक्टर की सलाह के कैल्शियम की गोली या दवा लेना सुरक्षित नहीं है.
डॉक्टर आत्रेय निहारचंद्रा कहती हैं, "शरीर को कैल्शियम की कितनी ज़रूरत है, यह डॉक्टर अपनी जांच के बाद तय करते हैं और उसी के मुताबिक़ दवा या गोली लेने की सलाह देते हैं. ज़रूरत से ज़्यादा कोई भी चीज़ लेना जोखिम भरा हो सकता है और यह कैल्शियम के साथ भी लागू है."
ज़रूरत से ज़्यादा कैल्शियम किडनी में स्टोन से लेकर कई गंभीर परेशानियों को जन्म दे सकता है.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित