डॉक्टर की सलाह के बिना विटामिन लेने से कितना फ़ायदा, कितना नुकसान?

    • Author, सुशीला सिंह
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

शरीर में पोषक तत्वों की कमी पूरी करने के लिए न्यूट्रिशनल सप्लिमेंट लेना कोई नई बात नहीं है.

ये सप्लिमेंट बाज़ार में अनगिनत ब्रैंड के अलग-अलग रूपों- सिरप, गोलियां, एनर्जी बार, पेय पदार्थों या पाउडर की शक्ल में भी मिल जाएंगे, जो आपके शरीर में विटामिन, खनिज, कैल्शियम, आयरन और प्रोटीन जैसे पोषक तत्वों की कमी को पूरा करने का दावा करते हैं.

हालांकि डॉक्टरों का कहना है कि ये सप्लिमेंट संतुलित आहार की कमी को पूरा नहीं कर सकते हैं. उनका कहना है कि 30 साल से ज़्यादा उम्र की महिलाओं में ऐसे सप्लिमेंट लेने का चलन बढ़ा है.

डॉ सुनीला गर्ग बीबीसी से कहती है, "शाकाहारी लोगों के लिए मल्टीविटामिन ज़रूरी भी होते हैं, लेकिन 'वन साइज़ डज़ नॉट फिट ऑल' तो ऐसे में मरीज़ों को सप्लिमेंट स्वयं की बजाए डॉक्टर की सलाह पर ही लेनी चाहिए."

डॉ राज एरॉन ने बीबीसी को बताया कि उनके पास भी 30 से 40 वर्ष की ऐसी महिलाएं या बीमार आती हैं, जो मल्टीविटामिन का स्वयं सेवन शुरू कर देती हैं. हालांकि ऐसा नहीं करना चाहिए क्योंकि इसके दुष्प्रभाव भी होते हैं.

इसी बात को आगे बढ़ाते हुए नेशनल डायबिटीज़, ओबेसिटी एंड कोलेस्ट्रॉल फाउंडेशन (एनडीओसी) की डॉ सीमा गुलाटी कहती हैं, "शहरों में ये आमतौर पर देखा जा रहा है कि लोग सेल्फ मेडिकेशन या अपने मर्ज़ को समझ कर ख़ुद ही दवा की दुकान पर जाकर दवा ले लेते हैं. चाहे वो दर्द की दवा हो या विटामिन. जो कई बार ठीक नहीं होता."

उनके अनुसार, "गूगल से जानकारी हासिल करके, सोशल मीडिया से जानकारी लेकर दवा लेने का चलन बढ़ रहा .भारत में डॉक्टर के पर्चे के बिना भी दवा या विटामिन उपलब्ध हो जाते हैं, जिसका दुष्प्रभाव भी होता है."

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सप्लिमेंट का शरीर पर प्रभाव

इन सभी डॉक्टरों का कहना है कि डॉक्टर जिस सप्लिमेंट की सलाह दें और जितनी मात्रा में लेने की सलाह देते हैं उतना ही लेना चाहिए क्योंकि ओवरडोज़ का कोई फ़ायदा नहीं होता है.

वहीं डॉक्टरों का कहना है कि इन सप्लिमेंट का ज़रूरत से ज़्यादा इस्तेमाल शरीर पर प्रभाव भी छोड़ सकता है.

विटामिन- डॉ सीमा गुलाटी बताती हैं कि कई विटामिन ऐसे होते हैं, जो फैट सोल्यूबल होते हैं, जैसे कि विटामिन ई और ओमेगा थ्री. इन विटामिन को डॉक्टर की सलाह के बिना लेने पर वो शरीर में डिपाज़िट या जमा हो जाते हैं और निकलते नहीं हैं. इससे शरीर पर बुरा प्रभाव पड़ सकता है.

विटामिन ए और विटामिन ई- विटामिन ए के ओवडोज़ से उल्टियां, धुंधला दिखना आदि समस्याएँ हो सकती है. वहीं विटामिन ई से बीपी कम हो जाता है. ये फेफेड़ों पर भी असर डाल सकता है. डॉ सीमा गुलाटी सलाह देती हैं कि जितने समय के लिए और जितनी मात्रा में लेने के लिए डॉक्टर सलाह देते हैं, उतना ही इनका सेवन करना चाहिए.

डॉ सीमा गुप्ता, सी-नेट की प्रमुख हैं. ये सेंटर न्यूट्रिशन और मेटाबॉलिक रिसर्च पर काम करता है.

उनके अनुसार, कई विटामिन शरीर में घुल जाते हैं और अगर अधिक मात्रा में शरीर में चले जाते हैं तो मल के ज़रिए निकल भी जाते हैं.

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विटामिन बी- ये विटामिन शरीर में लाल रक्त कोशिकाओं को बनाने में मदद करता है. वही मस्तिष्क और तंत्रिका कोशिकाओं को मज़बूत बनाने का काम भी करता है.

  • इसकी कमी से त्वचा पीली होने लगती है.
  • कमज़ोरी महसूस होती है.
  • गैस, कब्ज़ और भूख लगने में कमी होती है.
  • दिल घबराने की दिक्कत और सांस लेने में तकलीफ़ होती है.

ये दो रूप में उपलब्ध होते हैं, जिनकी डोज़ कम होती है. वहीं डायबिटीज़ के मरीज़ को भी ऐसे विटामिन दिए जाते हैं, लेकिन लंबे समय तक बिना कारण के ऐसे सप्लिमेंट्स लेता है, तो वो हानिकारक हो सकता है.

विटामिन डी- डॉ राज एरॉन बताते हैं कि इसकी कमी बच्चों से लेकर युवाओं में देखी जा रही है. इसका मुख्य कारण अधिक इंडोर एक्टिविटी करना है.

सूरज को विटामिन डी का प्राकृतिक स्रोत माना जाता है, लेकिन अब लोग बाहर नहीं निकल पाते हैं. फिज़िकल एक्टिविटी के दौरान अगर सूरज की किरणें शरीर पर पहुंचती हैं तो वो विटामिन डी शरीर में कैल्शियम को अब्सॉर्ब करने में भी मदद करता है.

वे सलाह देते हैं कि हम लोगों को विटामिन डी, तीन महीने तक ही लेनी चाहिए, लेकिन लोग इस अवधि को बढ़ा लेते हैं. ऐसे में आपको सांस लेने में तकलीफ़, पाचन की शिकायत, थकान, चक्कर आना, असमंजस की स्थिति उत्पन्न होना, पेशाब ज़्यादा आना, उच्च रक्त चाप होना आदि शिकायतें हो सकती हैं.

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आयरन- डॉ सुनीला गर्ग बताती हैं कि नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे (NFHS) के आंकड़ों के मुताबिक़, भारत में 50 फ़ीसद से ज़्यादा महिलाएं आयरन की समस्याओं से जूझ रही हैं, ऐसे में आयरन लेने में कोई नुकसान नहीं है.

डॉ सुनीला गर्ग, एनआईएचएफडब्ल्यू की प्रोग्राम एडवायज़री कमेटी की प्रमुख हैं और मौलाना आज़ाद मेडिकल कॉलेज में प्रोफ़ेसर रह चुकी हैं.

कैल्शियम- कैल्शियम एक ऐसा मिनरल है, जिसकी ज़रूरत शरीर में दांतों और हड्डियों के साथ-साथ दिल और मांसपेशियों को मज़बूत बनाने के लिए होती है. डॉक्टर आमतौर पर महिलाओं को 40 की उम्र के बाद कैल्शियम लेने की सलाह देते हैं.

कैल्शियम मेटाबॉलिज़्म के लिए किडनी की अहम भूमिका है. ऐसे में कैल्शियम का यदि लंबे समय तक सेवन किया जाता है, तो इससे पथरी होने का ख़तरा बढ़ जाता है. इससे दिल की धमनियां सख़्त हो सकती हैं और उनमें फैट और कोलेस्ट्रोल बनने लगता है, जो स्वास्थ्य के लिए अच्छा नहीं होता है.

कैल्शियम की कमी से हड्डियां कमज़ोर हो जाती है, उनकी सघनता में कमी आ जाती है. उससे ऑस्टिपोरॉसिस और ऑस्टिपीनिया जैसी बीमारी होने का ख़तरा बढ़ जाता है.

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द इंटरनेशनल मार्केट एनालिसिस रिसर्च एंड कन्सलटिंग (IMARC) ग्रुप में छपी जानकारी के मुताबिक़, साल 2022 में आहार से संबंधित सप्लीमेंट का बाज़ार 43,650 करोड़ रुपए तक पहुंच गया था. आईएमएआरसी के विशेषज्ञों का ये आकलन है कि साल 2028 में इसका बाज़ार 95,810 करोड़ रुपए तक पहुंच जाएगा.

डॉ सीमा गुलाटी कहती हैं कि हालांकि लोग अपनी सेहत के लिए सक्रिय हो रहे हैं और डाइटिंग भी कर रहे हैं. इससे संतुलन बिगड़ता है और विटामिन भी खाने से गायब हो जाते हैं.

डॉक्टरों का कहना है कि संतुलित आहार की तुलना सप्लिमेंट से नहीं की जानी चाहिए, क्योंकि पोषक आहार सारी कमियों को पूरा करने में मदद करता है.

हालांकि जब महिला की उम्र 30 से ऊपर बढ़ने लगती है तो ये सप्लिमेंट मदद ज़रूर करते हैं, लेकिन ये डॉक्टर की सलाह पर ही लेने चाहिए. इसके अलावा वे योग और कसरत की सलाह भी देती हैं.

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