शीतल बिना हाथ के कैसे बनीं तीरंदाज, निशाना अब गोल्ड के लिए

    • Author, आयुष मजूमदार
    • पदनाम, बीबीसी न्यूज के लिए

क्या आप कल्पना कर सकते हैं किसी ऐसे तीरंदाज के बारे में जो बिना बांह के भी तीरंदाजी में स्वर्ण पदक जीतने के लिए निशाने लगाने की प्रैक्टिस कर रही हो.

शीतल देवी एक ऐसी ही तीरंदाज हैं.

एक ट्रेनिंग अकादमी में अन्य तीरंदाजों से अलग शीतल देवी अपनी कुर्सी पर बैठकर धनुष पर तीर चढ़ाती हैं और लगभग 50 मीटर (164 फीट) दूर ध्यान से अपने लक्ष्य पर निशाना लगाती हैं.

देवी एक कुर्सी पर बैठकर अपने दाहिने पैर से धनुष उठाती हैं और अपने दाहिने कंधे का उपयोग करते हुए स्ट्रिंग को वापस खींचती हैं. इसका बाद जबड़े की ताक़त का इस्तेमाल करते हुए तीर छोड़ती हैं.

इस पूरी प्रक्रिया में जो एक चीज़ कभी नहीं बदलती है, वो तीरंदाज शीतल देवी का शांत आचरण.

क्या है वो रेयर बीमारी

जम्मू की 17 वर्षीय शीतल एक बहुत ही रेयर बीमारी फोकोमेलिया के साथ पैदा हुई थीं.

इसी के कारण वह बिना बांह वाली प्रतिस्पर्धा करने वाली दुनिया की पहली- और एकमात्र सक्रिय महिला तीरंदाज बन गईं.

एशियाई पैरा खेलों में स्वर्ण पदक जीतने वाली शीतल अब पैरालंपिक की तैयारी कर रही हैं जो 28 अगस्त से पेरिस में शुरू होने वाला है.

शीतल कहती हैं, “सोना जीतने के लिए मैं संकल्पित हूँ. अपने जीते हुए मेडल देखकर मैं और ज़्यादा मेडल जीतने के लिए प्रेरित होती हूँ. अभी तो मैंने बस शुरुआत की है.”

दुनिया भर के क़रीब 4000 एथलीट्स इस साल के पैरालंपिक खेलों में से 22 प्रतियोगिताओं में हिस्सा लेंगे.

तीरंदाजी पैरालंपिक खेलों का हिस्सा शुरुआती दौर 1960 से है, जब इन खेलों की शुरुआत हुई थी.

पैरालंपिक खेलों में ग्रेट ब्रिटेन, अमेरिका और दक्षिण कोरिया जैसे देशों ने पदक तालिका में अपना दबदबा शुरुआत से बनाए रखा है जबकि भारत ने 17 संस्करणों में एकमात्र कांस्य पदक जीता है.

पैरा-तीरंदाज़ों को उनकी विकलांगता की गंभीरता के आधार पर श्रेणियों में बाँटा गया है.

इसी आधार पर इन खिलाड़ियों के लिए शूट करने के लिए खिलाड़ी और टारगेट की बीच की दूरी भी उसी हिसाब से तय की हुई हैं.

क्या हैं क्राइटेरिया

इसके आधार पर ही यह भी तय किया जाता है कि तीरंदाज को व्हीलचेयर और अन्य सहायक उपकरणों का उपयोग कर सकते हैं या नहीं.

डब्लू वन कैटिगरी में हिस्सा ले रहे तीरंदाज़ व्हीलचेयर इस्तेमाल करने वाले वैसे प्रतियोगी होते हैं, जिनकी मांसपेशियों की स्ट्रेंथ के साथ कम से कम चार में से तीन अंग कमज़ोर होते हैं.

इसका अलावा ओपन कैटिगरी में हिस्सा लेने वाले प्रतियोगियों के ऊपरी, निचले या किसी एक तरफ़ किसी तरह की कोई समस्या के साथ-साथ व्हीलचेयर का इस्तेमाल करते हों.

या फिर संतुलन के अभाव में वो खड़े होकर या स्टूल का सहारा लेते हों. ऐसे में प्रतियोगी प्रतियोगिता के आधार पर या तो रिकर्व या फिर कंपाउंड तीर का इस्तेमाल करते हैं.

फ़िलहाल शीतल देवी कंपाउंड ओपन महिला कैटिगरी में पूरी दुनिया में तीरंदाज़ी में पहले स्थान पर हैं.

2023 के पैरा आर्चरी वर्ल्ड चैम्पियनशिप में उन्होंने रजत पदक जीता था, जिसके सहारे वो पेरिस के लिए क्वॉलिफाई कर गईं.

पेरिस में उन्हें दुनिया की तीसरे नंबर की खिलाड़ी जेन कार्ला गोगेल और मौजूदा विश्व चैंपियनशिप विजेता ओजनुर क्योर से कड़ी टक्कर मिलेगी.

लेकिन उन्हें जाननेवाले कहते हैं कि उन्हें खेलना और जीतना दोनों आता है.

शीतल देवी के दो राष्ट्रीय कोचों में से एक अभिलाषा चौधरी कहती हैं, "शीतल ने तीरंदाजी को नहीं चुना है बल्कि तीरंदाजी ने शीतल को चुना है."

एक छोटे से गांव में किसान परिवार में जन्मी शीतल ने 15 साल की उम्र तक तीर और धनुष नहीं देखा था.

उनकी ज़िंदगी में एक महत्वपूर्ण मोड़ 2022 में आया, जब उनकी मुलाक़ात दूसरे कोच कुलदीप वेदवान से हुई, जिन्होंने शीतल का परिचय तीरंदाज़ी की दुनिया से कराया.

कोच कुलदीप वेदवान से उनकी मुलाक़ात एक परिचित की सिफ़ारिश पर जम्मू के कटरा में श्री माता वैष्णो देवी श्राइन बोर्ड खेल परिसर के दौरे के दौरान हुई.

और इसके बाद ही वो जल्द कटरा शहर में एक प्रशिक्षण शिविर में शिफ्ट हो गईं, जहां शीतल के कोच उनकी धैर्य क्षमता से काफ़ी प्रभावित थे.

शीतल की कोचिंग

चुनौती तो काफ़ी बड़ी थी लेकिन शीतल के कोच का लक्ष्य उनके पैरों और ऊपरी शरीर में ताक़त का अधिकतम लाभ उठाने के लिए कोशिश करना था, जिसमें वो अंततः सफल हुए.

शीतल कहती हैं कि वो अपने दोस्तों के साथ लिखने और पेड़ों पर चढ़ने जैसे अधिकांश गतिविधियों के लिए अपने पैरों का उपयोग करने के कारण ही उन्हे ताक़त मिली.

ऐसे में तीरंदाजी में करियर बनाने के लिए सोचना संदेहों से परे नहीं था लेकिन वो कहती हैं, "पैरों में बहुत दर्द होने के कारण मुझे भी लगता था कि यह असंभव है लेकिन मैंने किसी तरह ये भी कर लिया.''

शीतल जब भी डाउन फील करती थीं तब वो अमेरिकी तीरंदाज़ मैट स्टुट्ज़मैन से प्रेरणा लेतीं थी, जो ख़ुद एक अनुकूलित डिवाइस का उपयोग करके अपने पैरों से शूटिंग करते हैं.

लेकिन शीतल का परिवार इस तरह की मशीन का खर्च नहीं उठा सकता था. इसलिए उनके कोच वेदवान ने उनके लिए धनुष बनाने का बीड़ा उठाया.

उन्होंने स्थानीय स्तर पर मिलने वाले सामग्रियों का इस्तेमाल किया और इसे स्थानीय दुकानों में अपनी ज़रूरत के हिसाब से मोडीफाय करके इस्तेमाल किया.

उस किट में बैग बेल्ट में उपयोग की जाने वाली चीज़ से बनी एक ऊपरी शरीर का पट्टा और एक छोटा उपकरण शामिल है, जिसे शीतल तीर छोड़ने में मदद के लिए अपने मुंह में रखती हैं.

कोच चौधरी बताती हैं, "हमें यह प्लान करना था कि शीतल के पैरों में स्ट्रेंथ को कैसे संतुलित करते हुए तकनीकी रूप से इसका उपयोग किया जाए. शीतल के पैर मज़बूत हैं लेकिन हमें यह पता लगाना था कि वह शूटिंग के लिए अपनी पीठ का उपयोग कैसे कर पाएंगी.“

आत्मविश्वास बढ़ता गया और .......

इसके लिए तीनों ने एक कस्टमाइज ट्रेनिंग रुटिन तैयार किया, जिसके तहत शीतल को धनुष के बजाय रबर बैंड या थेराबैंड का उपयोग करते हुए केवल पाँच मीटर की दूरी पर रखे गए लक्ष्यों को निशाना बना सके.”

उनका आत्मविश्वास बढ़ता गया और नतीजे में शुरू के सिर्फ़ चार महीनों में ही उन्होंने 50 मीटर की दूरी पर लक्ष्य भेदने के लिए एक प्रॉपर धनुष का इस्तेमाल करना शुरू कर दिया.

यह कंपाउंड ओपन श्रेणी के लिए प्रतियोगिता के मानक होने के कारण महत्वपूर्ण है

दो साल के भीतर ही 2023 में एशियाई पैरा खेलों में शीतल ने महिलाओं की व्यक्तिगत कंपाउंड प्रतियोगिता के फाइनल में लगातार छह और 10 हिट करने के लिए छोटी दूरी के लिए तीर चलाना सीखा और स्वर्ण पदक जीत लिया.

यहाँ यह जानना जरूरी है कि 10 एक अधिकतम अंक हैं जो एक खिलाड़ी जीत सकता है, लक्ष्य बोर्ड पर बुल्सआई हिट कर के.

शीतल कहती हैं, "यहां तक कि जब मैं नौवां शूट कर रही होती हूँ तो मैं केवल इस बारे में सोचती हूं कि मैं अगले शॉट पर इसे 10 में कैसे बदल सकती हूं.”

यहाँ बात सिर्फ कड़ी मेहनत की नहीं है. उन्हे भी कई त्याग करने पड़े हैं.

शीतल कहती हैं कि वह दो साल पहले प्रशिक्षण के लिए कटरा आने के बाद से एक बार भी घर नहीं गई हैं.

अब उनकी इच्छा यही है कि पैरालंपिक ख़त्म होने के बाद तुरंत वो देश मेडल के साथ लौटे.

मतलब वो हर तरह से अपना बेस्ट परफॉरमेंस देने के लिए दृढ़ संकल्पित है.

वो कहती हैं "मेरा मानना है कि किसी की कोई सीमा नहीं है, यह सिर्फ कुछ पर्याप्त चाहने और जितना हो सके उतना कठिन काम करने के बारे में है. अगर मैं इसए कर सकता हूँ तो इसए कोई और भी कर सकता है.

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित

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