'सीने पर गोली मारो' कहने वाले यूपी के मंत्री अपनी ही योगी सरकार पर हमलावर क्यों हैं?

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- Author, अभिनव गोयल
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
उत्तर प्रदेश के कैबिनेट मंत्री और भारतीय जनता पार्टी की सहयोगी अपना दल (सोनेलाल) के कार्यकारी अध्यक्ष आशीष पटेल ने अपनी ही सरकार के ख़िलाफ़ मोर्चा खोल दिया है.
तकनीकी शिक्षा विभाग संभाल रहे आशीष पटेल ने राज्य पुलिस की स्पेशल टास्क फोर्स (एसटीएफ) पर उनके ख़िलाफ़ षड्यंत्र रचने का आरोप लगाया है.
उन्होंने राज्य के सूचना विभाग पर भी आरोप लगाया है कि वह उनके ख़िलाफ़ ख़बरें छपवा रहा है और उनकी छवि को ख़राब किया जा रहा है.
वहीं उत्तर प्रदेश में सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी के प्रवक्ता राकेश त्रिपाठी ने बीबीसी से बातचीत में इन आरोपों को बेबुनियाद बताया है.
उनका कहना है, "सरकार की खामियां और उपलब्धियां सामूहिक होती हैं. आशीष पटेल खुद एक कैबिनेट मंत्री हैं. अगर उन्हें किसी चीज से परेशानी थी तो उन्हें सोशल मीडिया की बजाय कैबिनेट की बैठक में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के सामने अपनी बात रखनी चाहिए थी."
त्रिपाठी का कहना है, "वे (आशीष पटेल) एक पार्टी के कार्यकारी अध्यक्ष हैं. उनके अपने राजनीतिक एजेंडे हैं, जिसके तहत वे इस तरह की बातें कर रहे हैं."

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आशीष पटेल ने यह आरोप अपनी पत्नी और केंद्रीय मंत्री अनुप्रिया पटेल की छोटी बहन पल्लवी पटेल के आरोपों के बाद लगाए हैं.
उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2022 में पल्लवी पटेल की अपना दल (कमेरावादी) पार्टी ने समाजवादी पार्टी से गठबंधन किया था और वे सपा के सिंबल पर ही चुनाव जीतकर आई थीं.
तब उन्होंने सिराथू विधानसभा सीट से बीजेपी के केशव प्रसाद मौर्य को हराया था. हालांकि अब उनकी पार्टी का सपा से गठबंधन टूट गया है.
विधायक पल्लवी पटेल ने आशीष पटेल के तकनीकी शिक्षा विभाग में एचओडी की नियुक्तियों में भ्रष्टाचार का आरोप लगाया है.
सवाल है कि पल्लवी पटेल को 'धरना मास्टर' बताने वाले आशीष पटेल अपनी ही सरकार के ख़िलाफ़ हमलावर क्यों हैं? क्या अपना दल (सोनेलाल) का मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के साथ सबकुछ ठीक नहीं चल रहा है? या फिर आशीष पटेल और पल्लवी पटेल जैसे नाम एक बड़े गेम में सिर्फ़ मोहरे बने हुए हैं?
आशीष पटेल की चुनौती

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पल्लवी पटेल ने शीतकालीन सत्र के दौरान आशीष पटेल पर लगे कथित भ्रष्टाचार के मामले को विधानसभा में भी उठाने की कोशिश की, लेकिन इजाज़त नहीं मिलने पर वे धरने पर बैठ गई थीं.
एक जनवरी को पल्लवी पटेल ने इस मामले को लेकर राज्यपाल आनंदीबेन पटेल से मुलाक़ात की. उन्होंने पूरे मामले में जांच कराकर दोषियों के ख़िलाफ़ कार्रवाई की मांग की.
जब मामले ने सुर्खियां बटोरी तो मंत्री आशीष पटेल ने अपनी चुप्पी तोड़ी और उन्होंने सार्वजनिक मंच से इन आरोपों का जवाब दिया.
लखनऊ में गुरुवार, 2 जनवरी को कार्यकर्ताओं को संबोधित करते हुए आशीष पटेल ने आरोप लगाया कि पल्लवी पटेल में 'खिलौने की तरह चाबी भरी जा रही है.'
उन्होंने आरोप लगाया, "एक धरना मास्टर हैं. उनको प्रायोजित किया जाता है. उनको जब भी मौक़ा मिलता है, उन्हें धरने पर बिठा दिया जाता है. विधानसभा बंद होने के बाद एसटीएफ़ के अधिकारी ने दो लोगों को उनके साथ बैठने के लिए भेजा."
इन आरोपों पर बीबीसी से बात करते हुए पल्लवी पटेल ने कहा, "मुझे जनता ने चुनकर भेजा है और विपक्ष में रहते हुए मेरी एक भूमिका है, जिसके तहत मैं आशीष पटेल के विभाग में हुए घोटाले को उजागर कर रही हूं."
उनका कहना है, "वो कह रहे हैं कि मैं कहां से संचालित हूं, तो मैं उन्हें बता देना चाहती हूं कि मैं जनता की तरफ से संचालित हूं."
'धरना मास्टर' के आरोप पर उन्होंने कहा, "मेरी फेसबुक आंदोलनों से भरी हुई है. मैंने 69000 शिक्षक भर्ती के लिए आंदोलन किया. भूमि अधिग्रहण के लिए लखनऊ की धरती से लेकर बनारस तक धरना दिया. इलाहाबाद यूनिवर्सिटी में छात्रों की फीस में 400 प्रतिशत की वृद्धि के खिलाफ सड़कों पर मार्च किया. इसलिए जहां भी अन्याय हो रहा है, मैं वहां-वहां खड़ी हूं."
पटेल ने उत्तर प्रदेश पुलिस की स्पेशल टॉस्क फोर्स (एसटीएफ) पर भी गंभीर आरोप लगाए हैं. उन्होंने कहा, "मैं एसटीएफ़ को बता देना चाहता हूं, तुम्हारा नाम स्पेशल टास्क फोर्स है तो मेरा नाम आशीष पटेल है. तुम पैर पर गोली मारते हो ना. औकात हो तो मेरे सीने पर गोली मारकर दिखाओ."
इन आरोपों पर बीबीसी ने एसटीएफ चीफ अमिताभ यश से बात करने की कोशिश की, लेकिन उनकी तरफ से कोई जवाब नहीं मिला.
पटेल ने सूचना विभाग पर भी गंभीर आरोप लगाते हुए कहा कि 1700 करोड़ रुपये का दुरुपयोग कर राजनीतिक आदमी का मान मर्दन किया जा रहा है.
इस पूरे मामले पर अनुप्रिया पटेल ने भी प्रेस कॉन्फ्रेंस कर जवाब दिया. उन्होंने कहा, "हमारी पार्टी के किसी भी कार्यकर्ता, पदाधिकारी या नेता की प्रतिष्ठा पर बात आएगी तो अपना दल चुप नहीं बैठेगा. प्रतिष्ठा के साथ कोई समझौता मेरी पार्टी नहीं करेगी."
पर्दे के पीछे की राजनीति?

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साल 2014 के लोकसभा चुनाव में अपना दल ने बीजेपी के साथ मिलकर चुनाव लड़ा था और अनुप्रिया पटेल ने मिर्ज़ापुर से जीत दर्ज की थी.
दो सांसदों के बावजूद उन्हें साल 2016 में स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण राज्य मंत्री का पद दिया गया. 2024 में भी उन्हें मोदी मंत्रिमंडल में जगह दी गई.
उत्तर प्रदेश के वरिष्ठ पत्रकार बृजेश शुक्ला बताते हैं कि राज्य में अगर पिछड़ी जातियों की बात की जाए तो यादवों के बाद सबसे ज़्यादा कुर्मी हैं, जिनकी संख्या करीब सात से आठ प्रतिशत है और इनका कई दर्जन सीटों पर प्रभाव है.
वो कहते हैं, "अनुप्रिया पटेल कुर्मियों की राजनीति करती हैं और बीजेपी की चुनावी रणनीति में एकदम फिट बैठती हैं."
उनका मानना है कि वो और उनके पति आशीष पटेल दोनों योगी आदित्यनाथ से नाराज़ चल रहे हैं वो अप्रत्यक्ष रूप से योगी आदित्यनाथ को टारगेट कर रहे हैं.
अनुप्रिया पटेल पहले भी सार्वजनिक तौर पर योगी आदित्यनाथ की आलोचना कर चुकी हैं. उनका आरोप था कि योगी आदित्यनाथ की सरकार अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और पिछड़े लोगों को रोज़गार देने के मामले में भेदभाव कर रही है.
बृजेश बताते हैं, "सोनेलाल पटेल की सारी राजनीतिक विरासत अनुप्रिया पटेल के पास है. उन्हें लगता है कि योगी आदित्यनाथ उनकी बहन पल्लवी पटेल को प्रश्रय दे रहे हैं. अगर पल्लवी को लाइमलाइट मिलेगी तो राजनीतिक विरासत खिसक सकती है."
वो कहते हैं, "अगर आशीष पटेल पर भ्रष्टाचार के आरोप पल्लवी की जगह किसी दूसरे व्यक्ति ने लगाए होते तो इतना बवाल नहीं होता. अपना दल जानबूझकर योगी आदित्यनाथ और राज्य सरकार पर प्रेशर बनाना चाहता है कि वे पल्लवी से दूर रहें."
वहीं दूसरी तरफ वरिष्ठ पत्रकार शरत प्रधान इस बात से असहमत नज़र आते हैं. वो कहते हैं, "पल्लवी पटेल की इतनी राजनीतिक हैसियत नहीं है कि वो उनकी वजह से आशीष पटेल, योगी आदित्यनाथ पर हमलावर हो जाएं."
'दिल्ली बनाम लखनऊ की लड़ाई'

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योगी आदित्यनाथ का बीजेपी में रहते हुए पार्टी के वरिष्ठ नेताओं से टकराव रहा है. कई बार उन्होंने बीजेपी के ख़िलाफ़ ही उम्मीदवारों को ना सिर्फ़ खड़ा किया बल्कि उनके लिए प्रचार भी किया.
मगर समय के साथ योगी का रुख़ नरम हुआ, लेकिन 2024 आम चुनाव के नतीजों के बाद एक बार फिर योगी आदित्यनाथ की नाराज़गी का ज़िक्र होने लगा.
दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल भी सार्वजनिक तौर पर यह दावा बार-बार करते हैं कि दिल्ली वाले योगी आदित्यनाथ की राजनीति को ख़त्म करना चाहते हैं.
ऐसी ही बात वरिष्ठ पत्रकार शरत प्रधान भी करते हैं. वो कहते हैं, "मुख्य झगड़ा दिल्ली और लखनऊ के बीच चल रहा है और आशीष पटेल को इस्तेमाल किया जा रहा है. नहीं तो मंत्रिमंडल का कोई सदस्य ऐसी बात नहीं कर सकता."

शरत कहते हैं, "इतना ही नहीं ये अधिकारी ठाकुर जाति के हैं और योगी आदित्यनाथ पर ये आरोप लगते रहे हैं कि वे ब्राह्मण विरोधी हैं और ठाकुरों के लिए काम करते हैं. अफ़सरों के ज़रिए योगी को टारगेट किया जा रहा है."
शरत कहते हैं, "आशीष पटेल के ज़रिए दिल्ली वाले योगी आदित्यनाथ को एंटी ओबीसी दिखाना चाहते हैं, ताकि उनका काम आसान हो जाए. आशीष सिर्फ मोहरे हैं, क्योंकि लड़ाई अमित शाह नहीं चाहते कि नरेंद्र मोदी के बाद योगी उनकी जगह लें."
अपनी किताब 'योगी आदित्यनाथ रिलीजन, पॉलिटिक्स एंड पावर द अनटोल्ड स्टोरी' में शरत प्रधान लिखते हैं कि नरेंद्र मोदी और अमित शाह की मदद से वो उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री बने थे.
दूसरी तरफ प्रधान यह भी कहते हैं, "पीएम मोदी के बढ़ते कद से स्वयंसेवक संघ भी चिंतित है, ऐसे में योगी को आरएसएस का साथ मिल सकता है और वे इस चुनौती से पार पा सकते हैं."
"हालांकि हाल के दिनों में आरएसएस के बयान और योगी का काम मेल खाता हुआ नहीं दिखता है. ऐसे में ये एक बहुत ही मुश्किल स्थिति बन गई है."
अनुप्रिया पटेल की राजनीति

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अनुप्रिया पटेल के पिता सोनेलाल पटेल ने 1995 में 'अपना दल' का गठन किया था.
वरिष्ठ पत्रकार बृजेश शुक्ला बताते हैं, "सोनेलाल, बहुजन समाज पार्टी के बड़े और प्रभावशाली नेता थे, लेकिन मायावती से मतभेद के कारण उन्होंने खुद को पार्टी से अलग कर लिया और अपना एक दल बना लिया."
वो कहते हैं, "इसके बाद उन्होंने कई ज़िले के कुर्मियों को इकट्ठा किया और अपना दल नाम से एक पार्टी बना ली."
पिता के रहते अनुप्रिया पटेल पार्टी में सक्रिय नहीं थीं, लेकिन साल 2009 में एक हादसे में मौत के बाद उन्होंने पार्टी में कदम रखा और राष्ट्रीय महासचिव बन गईं. हालांकि उस वक्त तक पार्टी की कमान उनकी मां कृष्णा पटेल के हाथों में थी.

साल 2012 में अनुप्रिया ने वाराणसी के पास रोहनिया से विधानसभा का चुनाव जीता और दो साल बाद ही वे मिर्ज़ापुर से सांसद चुनी गईं.
राजनीतिक जानकारों का कहना है कि जब रोहनिया विधानसभा सीट पर उपचुनाव हुए तो अनुप्रिया पटेल अपने पति आशीष पटेल को लड़वाना चाहती थीं, लेकिन ऐसा नहीं हुआ. इस चुनाव में उनकी मां कृष्णा पटेल ने अपनी किस्मत आज़माई लेकिन वे हार गईं.
इस हार का ठीकरा अनुप्रिया पटेल के सिर फोड़ा गया और उन पर आरोप लगे कि उन्होंने चुनाव में अपनी मां का साथ नहीं दिया है. कुछ ही महीनों के बाद उन्हें पार्टी से निकाल दिया गया.
साल 2016 में अनुप्रिया ने अपना दल (सोनेलाल) नाम से अलग पार्टी बनाई.
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