राजस्थान: मुस्लिम परिवार के घर में पुलिस की छापेमारी और एक महीने की बच्ची की मौत का क्या है मामला

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- Author, मोहर सिंह मीणा
- पदनाम, अलवर के रघुनाथगढ़ से लौटकर, बीबीसी हिंदी के लिए
राजस्थान में अलवर ज़िले के नौगावां पुलिस थाने इलाके का रघुनाथगढ़ गांव सुर्खियों में है.
यहां दो मार्च को एक घर में तलाशी लेने गई पुलिस की टीम पर आरोप है कि उनके पैरों तले कुचलकर एक महीने की बच्ची की मौत हो गई. वहीं अभियुक्त पुलिसकर्मियों ने इन आरोपों को बेबुनियाद बताया है.
बच्ची के पिता की शिकायत पर इस मामले में पुलिस ने दो नामजद समेत तीन पुलिसकर्मियों पर एफ़आईआर दर्ज की है. वहीं नौगावां थाना प्रभारी समेत छह पुलिसकर्मियों पर कार्रवाई करते हुए उन्हें थाने से हटाकर लाइन हाज़िर कर दिया गया है.
हालांकि, बच्ची के परिजन पूरे थाने को सस्पेंड करने की मांग को लेकर दो हफ़्ते से धरने पर बैठे हैं.

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मृतक बच्ची के परिवार ने क्या कहा?

दो मार्च की सुबह क़रीब छह बजे नौगावां पुलिस थाने के पुलिसकर्मी साइबर अपराधियों की धरपकड़ के लिए छापेमारी कर रहे थे. इस दौरान वो इमरान मेव के घर गए और तलाशी शुरू की.
इमरान का कहना है कि घर में तब चारपाई पर इमरान और रजीदा की एक महीने की बच्ची अल्सिबा सो रही थी.
एक महीने की मृतक अल्सिबा के पिता इमरान मेव पांच भाइयों में सबसे छोटे हैं. 27 साल के इमरान अपने घर का वह कमरा दिखाते हुए बीबीसी से कहते हैं कि ये घटना दो मार्च सुबह साढ़े छह बजे की है.
उन्होंने कहा, "पुलिसकर्मी आए और मेरे भाई को जगाया, भाई का फ़ोन चेक किया. फिर मेरे कमरे के दरवाज़े को खटखटाया, जैसे ही मेरी पत्नी ने दरवाज़ा खोला तो पत्नी को धक्का देते हुए उसे बाहर कर दिया और सभी अंदर घुस गए."
इमरान का आरोप है कि पुलिसकर्मियों ने उन्हें चारपाई पर चढ़कर पलंग से खींचा और कहा कि लोकेशन ट्रेस हो रही है.
इमरान पुलिसकर्मियों पर आरोप लगाते हुए कहते हैं, "उन्होंने मेरी और कमरे की तलाशी ली, लेकिन उन्हें कुछ नहीं मिला. मैंने उन्हें बताया कि मेरे पास तो फ़ोन तक भी नहीं है."
इमरान का कहना है, "मैं मज़दूरी कर परिवार पालता हूं. लेकिन, वह मुझे अपने साथ ले गए और गांव की मुख्य सड़क तक ले जाकर छोड़ दिया. दो गाड़ियों में क़रीब पंद्रह पुलिसकर्मी थे."
'बच्ची के चेहरे पर जूते के निशान थे'

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इमरान का कहना है कि पुलिस के जाने के बाद उनकी पत्नी ने देखा कि चारपाई पर सो रही अलिस्बा के मुंह और नाक से ख़ून बह रहा था, चेहरे पर जूते के निशान थे.
उनका कहना है कि जब तक उन्होंने बच्ची को देखा था तब तक उसकी मौत हो चुकी थी.
अलिस्बा की मां रजीदा से भी बीबीसी ने बात करने की कोशिश की, लेकिन परिवार वालों ने बताया कि वो अभी बात करने की स्थिति में नहीं हैं.
इमरान के बड़े भाई शौक़ीन मेव आरोप लगाते हैं, "मेरी भतीजी को पुलिस वालों ने पैरों से दबा कर मार दिया."
पुलिस इन आरोपों पर क्या कह रही है?

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पुलिस का पक्ष जानने के लिए हम रघुनाथगढ़ गांव से क़रीब बारह किलोमीटर दूर नौगावां थाना पहुंचे. थाना प्रभारी भूपेंद्र सिंह थाने में मौजूद नहीं थे.
उन्होंने फ़ोन पर बीबीसी से कहा, "मैंने हाल ही में थाने का चार्ज संभाला है, इस मामले में अभी जांच जारी है."
इस मामले में जांच अधिकारी और भिवाड़ी के एडिशनल एसपी अतुल साहू ने जांच के जारी रहने का हवाला देते हुए इस मामले पर कुछ भी कहने से इनकार कर दिया.
दरअसल इस मामले में एफ़आईआर दर्ज होने के बाद अलवर के उद्योग नगर थाना प्रभारी को जांच अधिकारी नियुक्त किया गया था. लेकिन, पीड़ित परिवार ने अन्य ज़िले की पुलिस से जांच की मांग की थी, इसके बाद जांच भिवाड़ी एडिशनल एसपी को दी गई है.
जांच अधिकारी एडिशनल एसपी अतुल साहू बीबीसी से कहते हैं, "हमने जांच शुरू कर दी है. हमने पीड़ित पक्ष के बयान दर्ज कर लिए हैं."
बच्ची की पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट और एफएसएल रिपोर्ट अभी तक नहीं आई है.
बच्ची को अस्पताल नहीं ले जाने के सवाल पर इमरान के बड़े भाई कहते हैं, "अल्सिबा की मौत हो चुकी थी. हम मृत बच्ची को सीधा पुलिस थाने ले गए. हमने पुलिसवालों से कहा कि आपने हमारी बच्ची को मार दिया, हमें हमारी बच्ची के लिए न्याय चाहिए."
शौक़ीन मेव का कहना है कि 'थाना स्तर पर सुनवाई नहीं हुई, तो वो बच्ची के शव को लेकर सीधा पुलिस अधीक्षक कार्यालय पहुंचे. वहां प्रदर्शन किया, उसके बाद पुलिसकर्मियों के ख़िलाफ़ एफआईआर दर्ज की गई.'
दो हफ्ते से धरने पर बैठे हैं ग्रामीण

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रघुनाथगढ़ की मुख्य सड़क के किनारे बीते दो हफ्ते से ग्रामीण धरने पर बैठे हैं. ग्रामीणों में पुलिस के खिलाफ आक्रोश है और वह पूरे नौगावां थाने को सस्पेंड करने और दोषी पुलिसकर्मियों के ख़िलाफ़ कार्रवाई की मांग कर रहे हैं.
धरने में मौजूद अधिकतर लोगों ने रोज़े रखे हुए हैं, वह धरनास्थल पर ही इफ़्तार (रोज़ा पूरा करना) करते हैं.
धरने के एक ओर गांव के खेतों में अल्सिबा को दफ़नाया गया था. उसकी कब्र दिखाते हुए एक बुज़ुर्ग कहते हैं, अभी तो बेचारी का जीवन शुरू ही नहीं हुआ था और खत्म भी हो गया.
साल 1993 में तत्कालीन भैरों सिंह शेखावत सरकार में नसरू खान उद्योग मंत्री रहे थे. वे भी धरनास्थल पर मौजूद हैं. वह पुलिसवालों पर कार्रवाई नहीं होने तक धरना जारी रखने की बात कह रहे हैं.
वो कहते हैं, "हमारी मांग है कि दोषी पुलिसकर्मियों को सज़ा हो, अभी तक उन्हें गिरफ्तार तक नहीं किया गया है. साइबर फ्रॉड मामले में पुलिस भी शामिल है, हम चाहते हैं पूरे थाने को सस्पेंड किया जाए."
उनका कहना है, "हमने ज़िला पुलिस की जगह अन्य पुलिस से जांच की मांग की थी. अब भिवाड़ी के एडिशनल एसपी जांच कर रहे हैं और वह हाल ही में गांव आए थे. मौक़े का नक्शा बना कर ले गए हैं. हमें उम्मीद है, अब न्याय मिलेगा."
वह पुलिस पर आरोप लगाते हुए कहते हैं, "पुलिस स्थानीय लोगों को जबरन परेशान करती है. मज़दूरी करने वालों को झूठे आरोप में उठाकर पैसे लेकर छोड़ देती है."
क्या बच्ची के पिता पर कोई मामला दर्ज है?

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नौगावां पुलिस थाना अलवर ज़िले के रामगढ़ डिप्टी एसपी कार्यालय के क्षेत्राधिकार में आता है. रामगढ़ के डिप्टी एसपी सुनील शर्मा ने मामले पर जानकारी दी.
उन्होंने बीबीसी को बताया कि इमरान पर कोई भी मुकदमा दर्ज नहीं है.
मुकदमा दर्ज नहीं होने के बाद भी इमरान के घर क्यों रेड मारी गई? इस सवाल पर डिप्टी एसपी सुनील शर्मा कहते हैं, "हमारे पास फ़ोन की लोकेशन आ रही थी, उसी लोकेशन के आधार पर पुलिस ने उस इलाके में और आसपास रेड मारी थी."
अब तक की पुलिस कार्रवाई की जानकारी देते हुए वह आगे कहते हैं, "दो नामजद पुलिसकर्मियों और एक अज्ञात के ख़िलाफ़ भारतीय न्याय संहिता की धारा के तहत एफ़आईआर दर्ज की गई है."
तत्कालीन नौगावां थाना प्रभारी समेत छह पुलिसकर्मियों को लाइन हाज़िर कर दिया गया है.
रेड में शामिल पुलिसकर्मी ने क्या कहा?

एफ़आईआर दर्ज होने के बाद पुलिसकर्मियों पर कार्रवाई की गई है. एफ़आईआर में नामजद पुलिसकर्मी हेड कॉन्स्टेबल जगवीर गुर्जर पर भी कार्रवाई करते हुए उन्हें नौगावां थाने से हटाकर लाइन हाज़िर किया गया है.
जगवीर गुर्जर बीबीसी से रेड को लेकर कहते हैं, "हमारे सिपाही के पास साइबर फ्रॉड करने वालों की लोकेशन आ रही थी. हमने दो मार्च की सुबह छह से सात बजे के करीब उस गांव के दो घरों में सर्च किया था, वहां कुछ नहीं मिला तो वापस आ गए."
"मस्जिद के पास की गली की एक लोकेशन आ रही थी, सिपाही के पास आ रही लोकेशन के आधार पर वहां सर्च किया तो वहां कुछ नहीं मिला. मुझे तो मालूम भी नहीं कि इमरान का घर कौन सा है."
जगवीर आगे कहते हैं कि सिपाही ने री लोकेशन निकलवाई, तो फिर मस्जिद के पीछे गली की लोकेशन आ रही थी.
वो दावा करते हैं, "मौक़े पर ऐसा कुछ भी नहीं हुआ है. हमारे वापस आने के बाद में हमें नहीं पता कि क्या हुआ और क्यों उन्होंने आरोप लगाए हैं."
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़ रूम की ओर से प्रकाशित















