लिव-इन रिलेशनशिप पर राजस्थान हाईकोर्ट के निर्देश के क्या हैं मायने, विशेषज्ञ क्या बोले?

एकदूसरे का हाथ पकड़े एक प्रेमी जोड़ा

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    • Author, कीर्ति रावत
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

राजस्थान हाई कोर्ट ने राज्य सरकार को लिव-इन रिलेशनशिप को रजिस्टर करने के लिए एक पोर्टल शुरू करने के निर्देश दिए हैं.

कोर्ट ने ये फै़सला कई लिव-इन जोड़े की तरफ़ से दायर की गई याचिकाओं के बाद सुनाया है. इन याचिकाओं में लिव-इन जोड़ों ने सुरक्षा की मांग की थी.

राजस्थान हाई कोर्ट की एकल पीठ ने इस फ़ैसले में कहा कि कई जोड़े लिव-इन रिलेशनशिप में रह रहे हैं, लेकिन उनके परिवार और समाज इसे स्वीकार नहीं कर रहे, इससे उन्हें ख़तरा महसूस हो रहा है.

इसी वजह से वे अदालत में याचिका दायर कर अपने जीवन और स्वतंत्रता की सुरक्षा की मांग कर रहे हैं.

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इस मामले में सुनवाई करते हुए जस्टिस अनूप कुमार ढंड ने कहा, "जब तक केंद्र और राज्य सरकार इसे लेकर कोई क़ानून नहीं बनाती, तब तक एक क़ानूनी रूपरेखा तैयार करना ज़रूरी है. इसके लिए एक आधिकारिक फ़ॉर्म बनाया जाए, जिसे उन जोड़ों को भरना होगा जो लिव-इन रिलेशनशिप में रहना चाहते हैं."

उन्होंने कहा कि लिव-इन जोड़ों को उस फ़ॉर्म में अपने बच्चों की शिक्षा, स्वास्थ्य और परवरिश की ज़िम्मेदारी भी तय करनी होगी. अगर महिला साथी काम नहीं करती है, तो पुरुष साथी को उसका और बच्चों का भरण-पोषण करना होगा.

उन्होंने आगे कहा, "ऐसे रिश्तों से जन्मे बच्चों को समस्या का सामना करना पड़ सकता है, इसलिए उनकी देखभाल पर ध्यान देना ज़रूरी है."

"इन बच्चों का पालन-पोषण उनके माता-पिता, खासकर पिता को करना चाहिए, क्योंकि ऐसे रिश्तों में महिलाएं भी अक्सर परेशानी में होती हैं. इस बारे में कोर्ट आदेश दे सकती है लेकिन यह भी ज़रूरी है कि पुरुष साथी अपनी नैतिक ज़िम्मेदारी निभाए और बच्चों की देखभाल करे."

'क़ानून की नज़र में अवैध नहीं'

जस्टिस अनूप कुमार ढंड ने लिव-इन रिलेशनशिप में महिलाओं की स्थिति पर भी बात की.

उन्होंने कहा, "लिव-इन रिलेशनशिप का विचार अनोखा और आकर्षक लग सकता है, लेकिन वास्तव में इससे जुड़ी कई समस्याएं और चुनौतियां सामने आ सकती हैं. इस रिश्ते में महिला की स्थिति पत्नी जैसी नहीं होती और इस रिश्ते से महिला को समाज में ना तो स्वीकृति मिलती और ना ही मान्यता."

राजस्थान हाई कोर्ट ने कहा है, "सुप्रीम कोर्ट के कई फै़सलों में भारत में लिव-इन रिलेशनशिप की क़ानूनी स्थिति को निर्धारित किया गया है. हालांकि लिव-इन रिलेशनशिप को लेकर कोई अलग क़ानून नहीं बनाया गया है जो इसे पूरी तरह से मान्यता देता हो."

"भले ही समाज में लिव-इन रिलेशनशिप को अपवित्र माना जाता हो और इसे अपनाया नहीं जाता हो, लेकिन क़ानून की नज़र में यह अवैध नहीं है."

"माननीय सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि साथ रहना जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का हिस्सा है, इसलिए इसे अवैध और किसी भी क़ानून के ख़िलाफ़ नहीं माना जा सकता."

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रश्मी जैन, राजस्थान विश्वविद्यालय में समाज शास्त्र विभाग की प्रोफ़ेसर है. बीबीसी ने राजस्थान हाईकोर्ट के इस फ़ैसले पर उनसे बात की.

उन्होंने कहा, "लिव-इन में रह रहे जोड़ों का पंजीकरण कराना एक अच्छा और प्रोग्रेसिव क़दम है. लिव-इन रिलेशनशिप में अस्थिरताएं हमेशा महिला के ज़िम्मे आती हैं. रजिस्ट्रेशन होगा तो कम से कम अकाउंटेबिलीटी तो बढ़ेगी."

"समाज हमेशा परिवर्तनशील होता है, माना जाता था कि यह सब बड़े शहरों में होता है लेकिन आंकड़ें बताते हैं कि अब छोटे कस्बों में भी लोग लिव-इन में रह रहे हैं. पंजीकरण कराने से आप पब्लिक में आएंगे तो आपकी जवाबदेही भी बढ़ेगी."

"लिव-इन रिलेशनशिप के रजिस्ट्रेशन होने से दोनों ही लोगों के अधिकार भी कवर होंगे."

वहीं समाजशास्त्री एवं सेवानिवृत्त प्रोफ़ेसर राजीव गुप्ता ने इस तरह की रजिस्ट्रेशन की प्रक्रिया को नागरिक के मौलिक अधिकारों पर हमला बताया है.

उन्होंने कहा, "क़ानूनन बालिग़ व्यक्ति यदि अपनी इच्छा से साथ रह रहे हैं तो यह उनका निजी रूप से लिया गया फै़सला है. जब अठारह साल की उम्र में वोट डालने का अधिकार मिल जाता है तो किसके साथ उनको रहना है यह फै़सला भी वो कर सकते हैं."

"लिव- इन रिलेशनशिप का पंजीकरण करना एक तरह से निजी संबंधों पर राज्य का दखल है. यह एक तरह से सर्विलांस है जिससे परिवार राज्यों के नियंत्रण में आ जाती है. इस तरह के रजिस्ट्रेशन को रोका जाना चाहिए."

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प्रोफ़ेसर राजीव गुप्ता ने कहते हैं, "लिव-इन का रजिस्ट्रेशन किसी की निजता को सार्वजनिक करना है. इस वजह से लड़की या लड़का किसी न किसी तरह की हिंसा का शिकार हो सकते हैं. ये किसी भी रूप में हो सकता है, चाहे वो शारीरिक हो, मौखिक हो या फिर मानसिक हो. उनके परिवार पर भी हमले हो सकते हैं."

"लिव-इन रिलेशनशिप के रजिस्ट्रेशन की कोशिश असल में नागरिक की स्वतंत्रता के हनन की कोशिश है और हर एक स्तर पर इसका विरोध किए जाने की आवश्यकता है."

समाजशास्त्री राजीव गुप्ता यह भी मानते हैं कि समाज में एलजीबीटीक्यू समुदाय को लेकर सोच बहुत दकियानूसी है और सरकार उस सोच को तोड़ने की बजाय, उसे और मज़बूती से बढ़ावा दे रही है.

यदि उनका रजिस्ट्रेशन कराते हैं तो एलजीबीटीक्यू समुदाय के लोगों की पहचान सार्वजनिक हो जाएगी और इससे उनके लिए समस्या ही पैदा होगी.

जयपुर से मोहर सिंह मीणा की अतिरिक्त रिपोर्टिंग के साथ

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित

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