वाराणसी के सर्व सेवा संघ परिसर से पुलिस ने गांधीवादियों को निकाला, अब रेलवे का कब्ज़ा

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    • Author, विक्रांत दुबे
    • पदनाम, बीबीसी हिंदी के लिए

महात्‍मा गांधी के विचारों के प्रचार प्रसार के लिए शुरू किए गए राजघाट स्थित सर्व सेवा संघ व गांधी विद्या संस्‍थान परिसर पर क़ब्‍जा करने के लिए वाराणसी प्रशासन भारी पुलिस बल के सा‍थ शनिवार की सुबह पहुंच गया.

भारतीय रेलवे का दावा है कि यह ज़मीन उनकी है और संस्‍था ने ग़लत तरीक़े से उस पर क़ब्‍जा जमाया हुआ है.

परिसर में रह रहे लोगों को परिसर में बने भवन को खाली करने के लिए शनिवार दोपहर दो बजे तक समय दिया गया.

परिसर के लोगों ने इसका विरोध किया लेकिन पुलिस के आगे उनकी एक न चली. नतीजन सालों से रह रहे लोग घर छोड़ कर जाने पर मजबूर हुए.

पुलिस ने गांधीवादी तरीक़े से विरोध कर रहे नौ लोगों को हिरासत में भी लिया है.

इस मामले पर ज़िला पुलिस और प्रशासन के अधिकारियों ने लगातार संपर्क किए जाने के बाद भी कुछ भी कहने से इनकार कर दिया है.

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रेलवे का दावा- ज़मीन हमारी

सर्व सेवा संघ और उत्‍तर रेलवे के बीच इस ज़मीन के मालिकाना हक को लेकर एक विवाद चल रहा था.

विवाद की सुनवाई करते हुए डीएम एस. राजलिंगम ने रेलवे के हक में फ़ैसला सुनाया और सर्व सेवा संघ का निर्माण अवैध क़रार दे दिया.

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इसके बाद प्रशासन ने 30 जून 2023 की डेट रेलवे को कब्‍जा दिलाने और यहां बने भवन को ध्वस्त करा देने की निर्धारित की. संघ के पदाधिकारियों का कहना है, 'हमने यह ज़मीन बकायदे रेलवे से ख़रीदी है.'

रेलवे इससे इंकार कर रहा है. उसका कहना है कि जिस अधिकारी के सेल डीड पर हस्‍ताक्षर हैं वह पोस्‍ट ही उनके यहां नहीं है.

सर्व सेवा संघ से जुड़े गांधीवादी और समाजवादी अफ़लातून देसाई बताते हैं विनोबा भावे के कहने पर पिता नारायण देसाई के साथ वे एक साल की उम्र में आए और 1980 तक यहीं रहे.

यहां की ज़मीन पर रेलवे के दावे के बारे में उन्होंने कहा, “मेरे पास 1966-67 के एक नक्‍शे की कापी है जो कि डीएम द्वारा सर्टिफाइड है और रेलवे के डीविजनल इंजीनियरके उसमें हस्‍ताक्षर हैं. उस नक्शे में सर्व सेवा संघ को पूरे प्रमाण के साथ दिखाया गया है. सुप्रीम कोर्ट में रेलवे ने कहा कि हमारे पास ऐसा कुछ नहीं है.”

उन्होंने कहा कि रेलवे का इरादा धोखा देकर यहां की ज़मीन हड़पने की है.

उन्होंने कहा, “जबकि बैनामा रजिस्‍ट्रेशन करने वाला अधिकारी बैनामे के पीछे लिख रहा है कि रेलवे के फलाना अधिकारी ने मेरे सामने यह सिग्‍नेचर किया. उसके बाद अगर आप कह रहे कि मेरे पास नहीं है तो रेलवे को बनारस के रजिस्‍ट्री आफ़िस आना चाहिए और उनसे पूछना चाहिए कि इस नंबर का जो काग़ज़ है वो आपके पास है कि नहीं. पर रेलवे ने ऐसा कुछ नहीं किया है.”

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अफ़लातून देसाई

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सर्व सेवा संघ के पदाधिकारी प्रशासन के फ़ैसले के खिलाफ हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट गये जहां उन्‍हें निराशा हाथ लगी. इस मामले में सर्व सेवा संघ से क़ानूनी चूक भी हुई है.

इसके बारे में अफ़लातून ने बताया, “27 जून को इसे ध्वस्त करने का आदेश दिया गया था, इसे हमने सुप्रीम कोर्ट में चैलेंज किया था, लेकिन हाईकोर्ट ने डीएम को आदेश दिया था कि आप गांधी विद्या संस्था की मिल्कियत किसकी है, ये बताइए. हमने इसको चैलेंज नहीं किया था. सुप्रीम कोर्ट में हमारे अधिवक्ता प्रशांत भूषण ने कहा ये चैलेंज कर देते हैं लेकिन ये सोमवार को ही होगा.”

निचली अदालत में पहले से ही मामला चल रहा था. शुक्रवार को इस मामले की सुनवाई तय थी लेकिन किसी कारणवश यह नहीं हो सकी और इसके बाद शनिवार की सुबह प्रशासनिक अमला अपने पूरे लाव-लश्‍कर के साथ संघ परिसर पहुंचा और वहां रह रहे लोगों को परिसर को खाली करा दिया.

अफ़लातून कहते हैं, “सिविल कोर्ट में हम लोग अभी तक मुक़दमा हारे नहीं हैं, ऊपर के किसी अदालत ने कोई फ़ैसला नहीं दिया है, लेकिन प्रशासन क़ब्जा ले रहा है और किस तरह से ले रहा है, ये लोग देख रहे हैं, बड़ी नाइंसाफ़ी हो रही है.”

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गांधी और जेपी की विरासत पर हमला

गांधी विचार के राष्ट्रीय संगठन सर्व सेवा संघ की स्थापना मार्च 1948 में भारत के पहले राष्ट्रपति डॉ. राजेन्द्र प्रसाद की अध्यक्षता में हुई थी.

आचार्य विनोबा भावे के मार्गदर्शन में क़रीब 62 साल पहले सर्व सेवा संघ भवन की नींव रखी गई. इसका मक़सद महात्मा गांधी के विचारों का प्रचार-प्रसार करना था.

जानेमाने समाजशास्‍त्री प्रोफ़ेसर आनंद कुमार ने इस घटना को 'भारत के इतिहास में शर्मनाक घटना के रूप में याद रखा जाने वाला दिन' बताया.

उन्होंने कहां, “गांधी औरे जेपी की विरासत से जुड़ी वाराणसी के सर्व सेवा संघ और गांधी विदया संस्‍थान पर पुलिस अपनी दबंगई से क़ब्‍जा करने पहुंची है. पुलिस बल से इस महत्‍वपूर्ण विरासत को सरकार के क़ब्‍जे में करा रही है. ये गांधी और जेपी की विरासत पर सीधा हमला है.”

सर्व सेवा संघ को अपनी राजनीतिक पाठशाला मानने वाले कांग्रेस प्रवक्‍ता संजीव सिंह कहते हैं कि ये ज़मीन का मामला नहीं है गांधी विचारों को ज़मींदोज़ करने का मामला है.

उन्होंने कहा, “रेलवे प्रशासन ने 1960, 1961, और 1970 में रजिस्‍टर्ड बैनामा किया. लेकिन कुछ दिन पहले जो लोग यहां 63 साल से रह है उनको कहा जाता कि यह ज़मीन अवैध है और यह ज़मीन रेलवे की है. न्‍यायालय में अभी मामला विचाराधीन है. न्‍यायालय ने हमें निकाला ही नहीं है. अधिकारी पूरी तरह से अन्‍यायपूर्ण कार्य कर रहे है. पचासों साल से रह रहे लोगों को बाहर निकाल रहे हैं. यह निर्दयी और क्रूरतापूर्ण काम है.”

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मकान भी गया और रोज़गार भी

सर्व सेवा संघ परिसर में 50 से अधिक परिवार बरसों से रह रहे हैं. बहुत से लोग संघ और गांधी विद्या संस्‍थान में कार्य भी करते हैं.

अब उनके सामने न केवल छत का संकट पैदा हो गया है बल्कि उनकी रोज़ी भी चली गई है.

संस्‍था की शुरुआत यानी कि 1961 से परिसर में रह रही संध्‍या मिश्रा कहती हैं, “सरकार के कुछ लोग तीस जून को यहां आए और एक नोटिस चिपका के चले गए. नोटिस में लिखा था कि ये आपकी ज़मीन नहीं है. उसके बाद आज सारा सामान निकाल दिया गया. हमारे पास घर नहीं है अब कहां शरण लेंगे.”

कुछ ऐसी ही परेशानी झेल रहे पिछले 27 सालों से यहां सर्व सेवा संघ प्रकाशन में कार्यरत अनूप नारायण आचार्य कहते हैं, “पुलिस ने बर्बरता के साथ हमरे घर से सामान निकाल कर बाहर फेंका है. बहुत सा सामान नष्‍ट हो गया है. हमारा क्‍या होगा ये समझ में नहीं आ रहा है. हमारी नौकरी भी चली गई और जहां रहते थे वह जगह भी गई.”

उन्होंने कहा कि गांधी जी से जुड़ी बहुत सारी क़िताबों को यहां से हटाया जा रहा है.

सर्व सेवा संघ की दीवार पर लगा नोटिस

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पांच ट्रक क़िताबों की चिंता

सर्व सेवा संघ गांधीवादी और समाजवादी विचारों के प्रचार-प्रसार का एक जीवंत केंद्र रहा है. यहां से गांधी के विचारों से जुड़ी क़िताबों का प्रकाशन हो रहा था.

देश के दर्जनों रेलवे स्‍टेशन पर संघ की दुकानें हैं जो पिछले पचास सालों से संचालित है. यहां पर पुस्‍ताकलय भी है.

गांधीवादी विचारधारा से प्रभावित सामाजिक संस्‍था साझा संस्‍कृति मंच के कार्यकर्ता वल्‍लभाचार्य पाण्‍डेय कहते हैं, “पिछले कुछ दिनों में काशी स्‍टेशन के विस्‍तार की योजना आयी और रेलवे की नजर इस ज़मीन पर पड़ी और रेलवे ने सर्व सेवा संघ को अवैध क़रार दे दिया गया.”

उन्होंने कहा, “यहां तकरीबन ढाई करोड़ रूपये मूल्य की पांच ट्रक क़िताबें हैं. जिसमें से क़रीब दस हज़ार क़िताबें दुर्लभ हैं. ये क़िताबें खुले में रखी हैं अगर बारिश हो गई तो इन क़िताबों का क्‍या होगा समझ नहीं आ रहा है.”

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