इमरान ख़ान पर जानलेवा हमला: एफ़आईआर में देरी का पेच क्या है

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- Author, शुमाइला जाफ़री
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
पाकिस्तान के पूर्व प्रधानमंत्री इमरान ख़ान पर जानलेवा हमले के बाद पाकिस्तान में राजनीतिक तापमान बढ़ता ही जा रहा है.
इमरान ख़ान लगातार अपनी एफ़आईआर में प्रधानमंत्री शहबाज़ शरीफ़, गृहमंत्री राणा सनाउल्लाह और पाकिस्तानी सेना के एक मौजूदा जनरल का नाम शामिल करने का दबाव बना रहे हैं.
इस हमले के चार दिन बाद आख़िरकार सुप्रीम कोर्ट के दखल के बाद एफ़आईआर दर्ज हुई है.
लेकिन इस एफ़आईआर में वो नाम नहीं हैं जिन्हें इमरान ख़ान शामिल कराना चाहते हैं.
ऐसे में सवाल उठता है कि आख़िर पाकिस्तान के पूर्व प्रधानमंत्री पर जानलेवा हमले के मामले में एफ़आईआर दर्ज होने में इतनी लेटलतीफ़ी क्यों हो रही है.
और इमरान ख़ान इस एफ़आईआर में पाकिस्तानी सत्ता के तीन शीर्ष किरदारों का नाम क्यों शामिल कराना चाहते हैं.
हमले के ठीक बाद क्या हुआ?

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हमले के ठीक बाद जब लाहौर के शौकत ख़ानम अस्पताल में इमरान ख़ान का इलाज़ चल रहा था तभी उनकी पार्टी पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ़ के महासचिव असद उमर का वीडियो मीडिया में वायरल हुआ.
उमर ने इस वीडियो में दावा किया था कि इमरान ख़ान ने उन्हें बताया है कि उनके पास इस हमले से जुड़ी पुख़्ता जानकारी है और उन्होंने (इमरान ख़ान) प्रधानमंत्री शहबाज़ शरीफ़, गृह मंत्री राणा सनाउल्लाह और आईएसआई काउंटर इंटेलिजेंस चीफ़ मेजर जनरल फ़ैसल नसीर को ज़िम्मेदार ठहराया था.
कुछ समय बाद पाकिस्तान की मीडिया नियमन संस्था ने इस वीडियो को प्रतिबंधित कर दिया. इसके कुछ समय बाद ही इमरान ख़ान के समर्थक वज़ीराबाद के उस पुलिस स्टेशन पहुंचे. इमरान ख़ान पर इसी इलाके में हमला हुआ था.
इन समर्थकों ने अपनी एफ़आईआर में उन तीनों शीर्ष नेताओं के नाम शामिल करने पर दबाव डाला जो इमरान ख़ान ने दिए थे. लेकिन उनकी एफ़आईआर दर्ज नहीं की गई.
इसी बीच सोशल मीडिया पर लीक हुए एक वीडियो में गोली चलाने वाला शख़्स अपना गुनाह स्वीकार करता दिख रहा है. नावेद नामक ये शख़्स जब इमरान ख़ान के कंटेनर पर गोली चला रहा था तभी पीटीआई समर्थक ने उसे पकड़ लिया था.
इस वीडियो में अभियुक्त कहता दिख रहा है कि वह पूर्व प्रधानमंत्री इमरान ख़ान को मारना चाहता था क्योंकि उसे लगता है कि इमरान ख़ान ने धार्मिक हदें पार कर दी हैं. इसके साथ ही इमरान ख़ान का इसराइल के प्रति नरम रुख़ है.
इमरान ख़ान ने अगले ही दिन पलटवार करते हुए कहा कि जिस शख़्स को गिरफ़्तार किया गया है, वो सिर्फ़ फ्रंटमैन है.
इमरान ख़ान ने अपने बयान में यहां तक कहा कि पंजाब में उनकी ही गठबंधन सरकार है, लेकिन इसके बावजूद उनकी एफ़आईआर दर्ज नहीं हो रही है क्योंकि उसमें एक सेना के मौजूदा जनरल का नाम है. इमरान ख़ान ने पाकिस्तान की राजनीति में सेना के प्रभाव और असीम ताक़त पर भी सवाल उठाया.
क्या बोली शरीफ़ सरकार

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इसके बाद पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज़ शरीफ़ और गृह मंत्री राना सनाउल्लाह ने कहा है कि इमरान ख़ान निराधार आरोप लगा रहे हैं.
उन्होंने इन आऱोपों को ‘झूठ और सस्ती साज़िश’ क़रार देते हुए इमरान ख़ान से सबूत पेश करने के लिए कहा है. लेकिन सबसे सख़्त प्रतिक्रिया पाकिस्तानी सेना की ओर से देखने को मिली जब सेना ने कहा कि वह अपने अधिकारियों और सैनिकों का हर स्तर पर बचाव करेगी.
गृह मंत्रालय ने ये भी रेखांकित किया कि इमरान ख़ान पर जहां हमला हुआ, वहां उन्हें सुरक्षा देने की ज़िम्मेदारी पंजाब सरकार की थी जिसे इस समय इमरान ख़ान की गठबंधन सरकार ही चला रही थी.
इस सरकार के पास इमरान ख़ान की सुरक्षा के लिए सभी संसाधन मौजूद थे. इमरान ख़ान को ख़तरे के बारे में सूचना दी गई थी.
उन्हें ये भी सलाह दी गई थी कि वे अपने भाषणों के दौरान बुलेटप्रूफ़ पोडियम के पीछे खड़े हो सकते हैं. लेकिन उन्होंने इन सावधानियों को नहीं बरता. इसके साथ ही इमरान ख़ान से इस मामले में सबूत पेश करने को कहा गया है.
टीवी इंटरव्यू में क्या बोले इमरान

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इमरान ख़ान ने इस मुद्दे पर अमेरिकी टीवी चैनल सीएनएन को दिए इंटरव्यू में बताया है कि उन्हें ये जानकारी पाकिस्तान की ख़ुफिया एजेंसी आईएसआई के सूत्रों से मिली है.
उन्होंने ये भी बताया कि आईएसआई के सूत्रों से उन्हें ये जानकारी इसलिए मिली क्योंकि संस्थानों में काम करने वाले मुल्क में जो कुछ चल रहा है, उससे काफ़ी परेशान हैं.
पंजाब सरकार क्यों नहीं दर्ज कर रही एफ़आईआर
पाकिस्तान के पंजाब में जब इमरान ख़ान की ही सरकार है तो वह एफ़आईआर क्यों दर्ज नहीं करा पा रहे हैं. जबकि कानूनन एफ़आईआर कराना उनका अधिकार है.
ये एक ऐसा सवाल है जो पंजाब की गठबंधन सरकार में तनातनी के संकेत देता है. पीटीआई ने इस एफ़आईआर को कागज का टुकड़ा करार दिया है. इसमें नावीद को मुख्य अभियुक्त के रूप में दर्ज किया गया है.
ज़ाहिर तौर पर, इमरान ख़ान की एफ़आईआर दर्ज होने में एक रुकावट उनके गठबंधन सहयोगी और पंजाब के मुख्यमंत्री परवेज़ इलाही भी थे जो नहीं चाहते थे कि एफ़आईआर में पाकिस्तान के मौजूदा सैन्य जनरल का नाम शामिल किया जाए.
हालांकि, क़ानून के तहत सेना में तैनात किसी अधिकारी के ख़िलाफ़ एफ़आईआर पर रोक का कोई प्रावधान नहीं है.
अख़बार डॉन ने अपने एक संपादकीय ‘देरी से एफ़आईआर’ में इस क़दम पर सवाल उठाए हैं.
अख़बार ने लिखा है, “इस असामान्य देरी से हुए गतिरोध से संस्थागत अपवाद को लेकर कई सवाल उठे हैं कि एक सैन्य अधिकारी के पास ऐसा क्या अधिकार है कि उसके साथ विशेष व्यवहार हो जबकि प्रधानमंत्री और गृह मंत्री का नाम शामिल करने के लिए कोई विरोध नहीं हुआ.”
हालांकि, राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इस घटनाक्रम से ये संकट और गहराएगा, इससे इमरान ख़ान के गठबंधन सहयोगी पीएमएल-क्यू (जिसके नेता परवेज़ इलाही हैं) के साथ रिश्तों में भी तनाव आ सकता है. इसके बिना पीटीआई पाकिस्तान के सबसे बड़े प्रांत में सरकार नहीं चला पाएगी. पंजाब पाकिस्तान की सत्ता का अहम केंद्र भी है.
इमरान ख़ान पर इस हमले पर राजनीति करने और सही से मेडिको-लीगल ना कराने के कारण सबूत को नुक़सान पहुंचाने के भी आरोप हैं. हमले के बाद क़ानूनी कार्रवाई के लिए मेडिको-लीगल (मेडिकल) कराना ज़रूरी होता है.
इमरान ख़ान ने अपने आप को जितनी गोलियां लगने का दावा किया है, उस पर भी विवाद है.
विश्लेषक मलीहा लोधी मानती हैं कि जब तक राजनीतिक रूप से शांति नहीं होगी तब तक निष्पक्ष जांच नहीं हो पाएगी. अब तक जो आरोप लगे हैं उन्होंने पहले ही जांच के लिए चीज़ों को धुंधला कर दिया है.
मलीहा लोधी कहती हैं, “सरकार और विपक्ष दोनों को ही राजनीतिक तापमान कम करना होगा ताकि विश्वस्नीय और निष्पक्ष जांच की जा सके.”
हक़ीक़ी मार्च का शुरू होना

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लेकिन इस समय, राजनीतिक शांति कम से कम इमरान ख़ान के हित में नहीं है. वो हर दिन सेना और सरकार पर दबाव बढ़ा रहे हैं.
कुछ विश्लेषकों का मानना है कि इस हमले के बाद इमरान ख़ान को एक बार फिर अपने आप को पीड़ित के रूप में पेश करने और अपनी राजनीति को आगे बढ़ाने का मौका मिला है.
मौजूदा राजनीतिक हालात पर नज़र रख रहे कुछ लोगों का ये भी मानना है कि इमरान ख़ान अगले सेना प्रमुख के नाम की घोषणा से पहले अपने दबाव को और भी अधिक बढ़ा रहे हैं.
पाकिस्तान के संविधान के तहत सेना प्रमुख की नियुक्ति करना प्रधानमंत्री का अधिकार है. सेना प्रमुख की नियुक्ति को लेकर इमरान ख़ान के हालिया बयान इस विश्लेषण को मज़बूत करते हैं.
वो सार्वजनिक सभाओं में खुले तौर पर कहते रहे हैं कि मौजूदा शरीफ़ सरकार भ्रष्ट है और उसके पास सेना प्रमुख को चुनने का अधिकार नहीं होना चाहिए.
प्रधानमंत्री शहबाज़ शरीफ़ भी मीडिया के सामने ये कह चुके हैं कि पूर्व प्रधानंत्री इमरान ख़ान सेना प्रमुख को आपसी सहमति से चुनने का सुझाव लेकर उनके पास आए थे. शहबाज़ शरीफ़ ने इस प्रस्ताव को ठुकरा दिया है.
इमरान ख़ान का कहना है कि जहां उन पर हमला हुआ था, उनका मार्च वहीं से दस नवंबर को फिर से शुरू होगा और तब तक प्रदर्शन जारी रहेंगे जब तक मौजूदा सरकार इस्तीफ़ा देकर नए चुनावों की घोषणा नहीं करती है.
इसी बीच, इमरान खान के समर्थकों के छोटे-छोटे समूह देश के कई हिस्सों में मुख्य हाइवे और शहरों की तरफ़ जाने वाले रास्तों को रोक रहे हैं, वहीं पीटीआई के शीर्ष नेता पीछे से अपने उत्तेजक भाषणों और ट्वीट से तापमान और दबाव को बढ़ाए रखा है.
इमरान ख़ान ने वादा किया है कि वो अगले कुछ सप्ताह में रावलपिंडी में मार्च में शामिल होंगे. उनका कहना है कि वहां से वो अपनी अंतिम मंज़िल इस्लामाबाद की तरफ़ बढ़ेंगे.
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