मोरबी पुल हादसे के एक साल बाद पीड़ित परिवारों का कैसा हाल: ग्राउंड रिपोर्ट

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- Author, रॉक्सी गागडेकर छारा
- पदनाम, बीबीसी गुजराती संवाददाता, मोरबी से लौटकर
38 साल की शबाना ने न्याय नहीं मिलने तक चप्पल नहीं पहनने की कसम खाई है.
पिछले साल 30 अक्टूबर को मोरबी में सस्पेंशन ब्रिज ढह गया था. इस हादसे में 135 लोगों की मौत हुई थी और मरने वालों में शबाना का बेटा भी शामिल था.
शबाना की तरह ही मोरबी विक्टिम ट्रेजिडी एसोसिएशन के संस्थापक सदस्यों में से एक नरेंद्र परमार ने इस त्रासदी में अपनी बेटी को खो दिया था.
इस एसोसिएशन के सभी 113 सदस्य हर पखवाड़े बैठक करते हैं. ये सभी लोग अपने परिजनों की मौत के लिए न्याय चाहते हैं.
चाहे शबाना हों या नरेंद्र परमार, इनके दुखों से मोरबी के सस्पेंशन ब्रिज हादसे के पीड़ित परिवारो का अंदाज़ा होता है. मोरबी हादसा इतनी भयावह थी कि घटना के 72 घंटे बाद तक राहत अभियान चला था. हादसे के बाद मोरबी टाउन पुलिस स्टेशन में प्राथमिकी दर्ज की गई थी.
इस हादसे के एक साल बाद बीबीसी गुजराती ने इस घटना के पीड़ित परिवारों से बातचीत की.
परिवार वाले आज भी घटना को लेकर रोष जताते हैं.
कई पीड़ित परिवारों को सरकार द्वारा घोषित मुआवजा भी मिल चुका है. पीड़ित परिवार के लोग अब भी इस घटना के लिए जिम्मेदार लोगों को कड़ी से कड़ी सजा मिलने का इंतज़ार कर रहे हैं.
बेटे के लिए इंसाफ़ मांगती माँ

शबाना पठान ने 20 साल की उम्र में अपने पति को खो दिया था. उस समय उनके तीन बेटों में सबसे छोटा छह महीने का था.
इस हादसे में उनके 19 वर्षीय बेटे अल्फ़ाज़ की मौत हो गई थी. वह अपने दोस्तों के साथ पुल पर गया था. इस घटना में उसके दोस्तों की मौत हो गई. अल्फ़ाज़ अपने परिवार के लिए कमाने वाला बेटा था. वह प्रति माह 15 हज़ार कमाते थे.
पति की मौत के बाद शबाना ने लोगों के घरों में काम करके तीन बच्चों का पालन-पोषण किया. उनका कहना है कि उन्होंने अपने बच्चों को माता-पिता दोनों का प्यार दिया.
अपने बेटे को याद करते हुए शबाना कहती हैं, ''वह आज्ञाकारी था. हम उसकी कमाई से किराया और बिजली का बिल भरते थे. उसे ज़िंदा नदी से बाहर निकाला गया लेकिन इलाज के दौरान उसकी मौत हो गई. इसके बिना जीना बहुत मुश्किल है.''
आंखों में आंसू लिए शबाना बताती हैं, ''मेरे बाक़ी दो बेटों ने घर की ज़िम्मेदारी संभाल ली है. मेरे छोटे बेटे ने पढ़ाई छोड़ दी है और अल्फ़ाज़ की जगह कमाई करने लगा है.''
शबाना को हाल ही में दौरा पड़ा था और अब वह काम पर नहीं जा सकतीं. उन्होंने अपने बेटे को न्याय मिलने तक जूते-चप्पल नहीं पहनने की कसम खाई है.
उन्होंने बताया, ''भले ही मुझे सालों तक इंतज़ार करना पड़े, लेकिन जब तक दोषियों को कड़ी सजा नहीं मिल जाती, मैं जूते-चप्पल नहीं पहनूंगी. मुझे अल्लाह पर भरोसा है.''
इतनी मुश्किल कसम खाने के पीछे की वजह के बारे में पूछने पर शबाना ने कहा कि इससे सरकार और न्यायपालिका को पता चल जाएगा कि हम जैसे लोग उनके फ़ैसलों का इंतज़ार कर रहे हैं.
शबाना ने कहा, ''मुझे उनसे बहुत उम्मीदें हैं. मुझे भरोसा है कि इस हादसे में मारे गए निर्दोष लोगों की मौत के लिए ज़िम्मेदार अपराधियों को ये लोग न्याय के कटघरे में लाएंगे."
अपनी इस प्रतिज्ञा के चलते कारण शबाना अक्सर अदालत परिसरों और पुलिस स्टेशनों में नंगे पैर देखी जाती हैं.
बेटी की याद में रोता पिता

इस घटना में हाजी शामदार ने अपने परिवार के सात सदस्यों को खो दिया था. हादसे में मारी गई अपनी 22 साल की बेटी मुस्कान के बारे में बात करते हुए इस पिता की आंखों से आंसू नहीं थमते.
शमदार अब अपनी पत्नी जमीला और बेटे के साथ अपने दो मंजिला घर में रहते हैं. इस घटना में उनकी पत्नी बाल-बाल बच गईं. घटना से पहले उनके घर में बच्चों की किलकारियां गूंज रही थीं. इस परिवार के सात मृतकों में चार बच्चे भी शामिल थे. अब उनका घर किसी भुतहा घर जैसा मालूम होता है.
उनकी बेटी मुस्कान बीकॉम करने के बाद यूपीएससी की तैयारी कर रही थी. हाजी कहते हैं, ''वह आईपीएस अधिकारी बनना चाहती थी, लेकिन आंखों में यही सपना लेकर वह दुनिया छोड़ गई.''
उन्होंने बताया, ''हमें ऐसा लग रहा है जैसे हमारी ज़िंदगी ख़त्म हो गई है. एक साथ छह शवों का अंतिम संस्कार किए जाने के दृश्य आज भी मेरी यादों में ताज़ा हैं. सब भूलना बहुत मुश्किल है.''
इस हादसे के छह महीने बाद हाजी की 77 साल की मां का निधन हो गया. परिवार पर आई विपत्ति से वह सदमे में थीं और अवसाद की चपेट में आ गईं थीं. हाजी कहते हैं, ''मुझे लगता है कि जल्द ही हमारा भी वही अंत होगा.''
जमीला हमारी बातचीत के दौरान लगातार रोती रहीं और हमारे सवालों का जवाब नहीं दे पाईं. इस परिवार दूसरे सदस्य हाजी परिवार की मदद करते हैं और उनसे मिलने आते रहते हैं.
ऐसी ही एक सदस्या हमीदा शामदार ने बीबीसी गुजराती को बताया, ''जब भी हम उनसे मिलने आते हैं तो हमें उनके लिए बुरा लगता है. वो हमें देखकर रोने लगते हैं. परिवार के किसी सदस्य की कोई ग़लती नहीं थी लेकिन पूरा परिवार ख़त्म हो गया.''
कुछ अन्य परिवारों की भी यही स्थिति. शारदा भीका ने इस हादसे में अपने 22 साल के बेटे को खो दिया था. शारदा बताती हैं, ''हमें न्याय के अलावा कुछ नहीं चाहिए. हममें से कई लोगों ने अपने युवा बेटों को खोया है जो हमारे बुढापे में संबल होते. अब हमें नहीं पता कि कहां जाना है.''
मोरबी हादसे मामले में दर्ज केस में क्या हुआ

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हादसे के 12 घंटे के भीतर एफ़आईआर दर्ज की गई. इस शिकायत के आधार पर दस लोगों को गिरफ़्तार भी किया गया, जिनमें से पांच ज़मानत पर बाहर हैं. मामले की सुनवाई मोरबी के सेशन कोर्ट में हो रही है.
मोरबी की ज़िला अदालत में सरकारी वकील विजय जानी ने बीबीसी गुजराती से कहा, ''सरकारी वकील इस मामले में पहले तीन महीनों तक मौजूद नहीं थे. अब जब मुझे यह ज़िम्मेदारी सौंपी गई है तो हम इस प्रक्रिया में तेजी लाने का प्रयास करेंगे.''
वर्तमान में अभियोजन पक्ष द्वारा दायर तीन अलग-अलग आवेदनों पर अदालत में सुनवाई हो रही है.
विजय जानी ने बताया कि इस मामले में 350 गवाह हैं, इसके अलावा एफ़एसएल और पंचनामा रिपोर्ट भी कोर्ट में पेश की जा चुकी है. हालांकि, दूसरी तरफ़ इस मामले में आरोपी जयसुख पटेल की ज़मानत अर्जी गुजरात हाई कोर्ट में सुनवाई के चरण में है.
घटना के 112 पीड़ित परिवारों का प्रतिनिधित्व कर रहे वकील उत्कर्ष दवे ने कहा, ''हमने अभियुक्तों के ख़िलाफ़ आईपीसी की धारा 302 संलग्न करने के लिए अदालत में आवेदन किया है. हमें लगता है कि इस मामले में शिकायत जल्दबाजी में दर्ज की गई है और उचित प्रावधानों के तहत मामला दर्ज नहीं किया गया है.''
उपहार सिनेमा कांड का मोरबी हादसे से कनेक्शन

उल्लेखनीय है कि उपहार सिनेमा कांड के पीड़ितों ने भी एक एसोसिएशन बनाकर अपनी क़ानूनी लड़ाई लड़ी थी. कुछ इसी तरह की रणनीति मोरबी सस्पेंशन ब्रिज हादसे के पीड़ितों ने अपनाई है.
यह शिक्षक नरेंद्र परमार के प्रयासों से संभव हो सका है. इस घटना में उन्होंने अपनी दस साल की बेटी को खो दिया था. परमार ने बीबीसी गुजराती को बताया, ''हमारे वकील ने हमें एक मंच बनाने के लिए गाइड किया. हमने इसके लिए कोर्ट में मामला उठाया. अब हमने एक पक्ष के रूप में शामिल होने के लिए अदालत में आवेदन किया है.''
उन्होंने अपनी संस्था का नाम मोरबी ट्रेजेडी विक्टिम्स एसोसिएशन रखा है. पीड़ित परिवारों के जीवन में यह जुड़ाव एक बड़े परिवार की जगह ले चुका है. एसोसिएशन के सदस्य दूसरों को अदालती प्रक्रिया और मामले के निर्देश के बारे में जागरूक करने के लिए हर 15 दिनों में बैठक करते हैं.
इस मामले में परमार खुद भी गवाह हैं, हादसे के वक्त वह अपनी बेटी और बेटे के साथ पुल पर मौजूद थे. हादसे में वह और उनका बेटा तो बच गए लेकिन बेटी की मौत हो गई.
पीड़ित परिवारों का यह संगठन अब तक पुलिस जांच से खुश नहीं है. परमार कहते हैं, ''शिकायत दर्ज करने से लेकर आरोपपत्र दाख़िल करने तक पुलिस ने जानबूझकर मामले में कई खामियां छोड़ रखी थीं, जिससे अभियुक्तों को फ़ायदा हुआ. उन्हें अदालत में ज़मानत मिलने में मदद मिली.''
क्या कहना है पुलिस का

वहीं इसके उलट भावनगर रेंज के पुलिस महानिरीक्षक अशोक कुमार यादव ने बीबीसी से बातचीत में इन सभी आरोपों को बेबुनियाद बताया. उन्होंने कहा, ''ओरेवा कंपनी में जयसुख पटेल की भूमिका की पुष्टि होते ही लोगों को गिरफ़्तार कर लिया गया. हमने न केवल जांच में तेजी लाई बल्कि घटना के बाद बचाव कार्यों में भी उतनी ही तेजी से काम किया. हमने सभी आरोपों को मजबूत करने के लिए एफएसएल रिपोर्ट सहित दस्तावेजी साक्ष्य संलग्न किए हैं.''
मोरबी सस्पेंशन ब्रिज हादसे के तुरंत बाद हुए विधानसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी के कांति अमृत्या ने शानदार जीत हासिल की थी. ब्रिज हादसे के बाद लोगों को बचाने के लिए नदी में कूदने का उनका वीडियो वायरल हुआ था. कहा जाता है कि इससे उन्हें चुनाव जीतने में उन्हें मदद मिली.
उन्होंने बीबीसी गुजराती को बताया, ''सरकार ने मोरबी में 525 करोड़ रुपये की लागत से एक मेडिकल कॉलेज बनाने का फ़ैसला किया है. इससे दो हज़ार छात्रों को लाभ होगा और क्षेत्र में चिकित्सा सुविधाओं की उपलब्धता भी बढ़ेगी.''
इसके अलावा उन्होंने वादा किया कि हादसे के सभी पीड़ितों के परिवारों को समय पर और सम्मानज़नक ढंग से मुआवजा दिया जाएगा. उन्होंने बताया, ''इस तरह की घटना दोबारा न हो इसके लिए कई योजनाओं पर काम किया जा रहा है, जिसकी हम जल्द ही घोषणा करेंगे.''
मूल रूप से मोरबी के रहने वाले वरिष्ठ भाजपा नेता मोहन कुंडरिया ने कहा, ''पार्टी और सरकार इस त्रासदी में मारे गए लोगों के परिवारों के साथ खड़ी है. सरकार मोरबी में अहमदाबाद रिवरफ्रंट की तरह योजना विकसित कर रही है.''
हालांकि, पिछले विधानसभा चुनाव में बीजेपी के चुनौती देने वाले कांग्रेस नेता जेजे पटेल ने इन सभी परियोजनाओं को झूठा और भ्रामक बताते हुए इसकी निंदा की है. उन्होंने कहा, ''इतनी भयावह घटना के बाद भी सरकार लोगों की सुरक्षा के प्रति सचेत नहीं है और कोई क़दम नहीं उठाया गया है. यह दुर्भाग्यपूर्ण है.''
एसआईटी की रिपोर्ट में क्या-क्या

सरकार ने इस दुर्घटना की जांच के लिए एक विशेष जांच दल (एसआईटी) का गठन किया. जिसका नेतृत्व एक आईएएस अधिकारी करते थे. समूह ने 10 अक्टूबर, 2023 को गुजरात उच्च न्यायालय को अपनी रिपोर्ट सौंपी.
इस रिपोर्ट के मुताबिक पुल दरबारगढ़ छोर से ढह गया. रिपोर्ट में कहा गया है कि पुल पर लोगों की पहुंच पर कोई नियंत्रण नहीं होने के कारण अत्यधिक भार की वजह से पुल ढह गया. इसके अलावा रिपोर्ट में कहा गया है कि पुल की मरम्मत से पहले किसी तकनीकी विशेषज्ञ से सलाह नहीं ली गई.
रिपोर्ट की दस अहम बातें-
- रिपोर्ट के मुताबिक, पुल की क्षमता 75-80 लोगों का भार उठाने के लिए पर्याप्त थी. हालांकि, पुल के 49 में से 22 केबल जंग के कारण टूट गए थे और उनकी मरम्मत नहीं की गई थी. ऐसी स्थिति में पुल पर भार क्षमता को कम करने की आवश्यकता थी. लेकिन ऐसा करने के बजाय पुल तक लोगों के जाने पर कोई रोक नहीं लगाई गई.
- मुख्य केबलों और जिन तारों पर पुल लटका हुआ था, उसका तकनीकी मूल्यांकन नहीं किया गया.
- तार और पुल को जोड़ने वाले चरखी की स्थिति और उसके लुढ़कने का मूल्यांकन नहीं किया गया.
- पुल की स्थिति और उसके पुनर्वास व मरम्मत का आकलन नहीं किया गया.
- मरम्मत कार्य के लिए कोई कार्यप्रणाली नहीं अपनाई गई.
- पुल संरचना के संशोधन से पहले कोई मूल्यांकन नहीं किया गया था.
- पुल के तल पर लकड़ी के स्थान पर एल्युमीनियम शीट जोड़ने के कारण पुल का कुल वजन बढ़ गया था, पुल के सपोर्ट और सस्पेंडर्स वायर को नहीं बदला गया था.
- सस्पेंडर्स को वजन को डेक से केबलों तक ले जाना था, जो अलग-अलग काम करते थे. यदि इसे जोड़ने की आवश्यकता हो तो इसे लचीला रखा जाना चाहिए. लेकिन इस घटना में, उन्हें एक दूसरे पर चढ़ाकर वेल्ड किया गया था, जिससे पुल की भार सहने की क्षमता प्रभावित हुई.
- पुल खोलने से पहले कोई लोड टेस्ट या स्ट्रक्चरल टेस्ट नहीं किया गया.
- मरम्मत का काम एक अनउपयुक्त कंपनी को आउटसोर्स किया गया था.
मोरबी के ऐतिहासिक सस्पेंशन पुल का इतिहास

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- 1887: सस्पेंशन ब्रिज का निर्माण मोरबी के शाही परिवार द्वारा किया गया था
- 1949-2008: इस अवधि तक पुल के रखरखाव के लिए मोरबी नगर पालिका ज़िम्मेदार थी.
- 29 मई 2007: पुल के रखरखाव और संचालन की सभी शक्तियाँ राजकोट के कलेक्टर को हस्तांतरित कर दी गईं.
- 16 अगस्त 2008: राजकोट कलेक्टरेट ने पुल के संचालन और रखरखाव के लिए ऑरेवा कंपनी के साथ नौ साल के समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर किए.
- 2008-17: इस अवधि तक रख रखाव, सुरक्षा, प्रबंधन, किराया संग्रह की ज़िम्मेदारी एमओयू के अनुसार ऑरेवा कंपनी को सौंपी गई.
- 2017-2019: एमओयू 15 जून 2017 को समाप्त हो गया. हालांकि, ऑरेवा समूह ने इसका प्रबंधन जारी रखा.
- 29 दिसंबर 2021: ओरेवा ने मोरबी नगर पालिका के मुख्य अधिकारी से कहा कि पुल की हालत ख़राब होने के कारण उसकी मरम्मत का निर्णय लिया जाना चाहिए.
- 8 मार्च 2022 से 25 अक्टूबर 2022: इस अवधि के दौरान पुल मरम्मत के लिए बंद रहा
- 26 अक्टूबर 2022: नगरपालिका की अनुमति के बिना पुल खोला गया
- 30 अक्टूबर 2022: पुल ढहने से 135 की मौत
मोरबी नगर पालिका की स्थिति क्या है?

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अप्रैल 2023 में मोरबी नगर पालिका को राज्य सरकार ने भंग कर दिया था. पहले इसमें 52 सदस्य थे. इसके बाद हाईकोर्ट ने दखल देते हुए स्थानीय अपर कलेक्टर एनके मुच्छर को प्रशासक नियुक्त किया गया.
परिसीमन और ओबीसी आरक्षण पर लंबित निर्णयों को अंतिम रूप दिए जाने पर मोरबी नगर पालिका में नए सिरे से चुनाव कराए जा सकते हैं. एक सरकारी अधिकारी के मुताबिक, ''जल्द ही इस पर फ़ैसला लिया जाएगा.''
एसआईटी रिपोर्ट के मुताबिक इस घटना के लिए ओरेवा ग्रुप के साथ-साथ नगर पालिका अध्यक्ष, उपाध्यक्ष, सामान्य बोर्ड अध्यक्ष और मुख्य अधिकारी भी जिम्मेदार हैं. उन्होंने जनरल बोर्ड की अनुमति के बिना ही मरम्मत कार्य की अनुमति दे दी थी.
नगर पालिका का अंतिम स्वीकृत बजट 120 करोड़ रुपये था, जो अगले वर्ष 20 प्रतिशत बढ़ सकता है.
एसआईटी रिपोर्ट के मुताबिक, ऑरेवा ग्रुप सरकारी नियमों और दिशा-निर्देशों का पालन करने में विफल रहा है. इसके अलावा समूह पुल पर पहुंचने वाले लोगों की संख्या को नियंत्रित करने में भी विफल रहा है.
इसके अलावा टिकटों की बिक्री के लिए कोई रजिस्टर भी नहीं रखा गया था.
पीड़ितों के वकील उत्कर्ष दवे ने बीबीसी से कहा, ''हम चाहते हैं कि सभी आरोपियों पर आईपीसी की धारा 302 के तहत आरोप लगाए जाएं. क्योंकि इन लोगों को मालूम था कि पुल इतने लोगों का बोझ उठाने के लिए उपयुक्त नहीं है.''
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