क़तर में हमास का कार्यालय बंद होने को लेकर अटकलें तेज़, क्या ईरान देगा पनाह

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हमास और इसराइल के बीच संघर्ष विराम की लड़खड़ाती बातचीत के बीच पश्चिमी और अरब मीडिया में ये अटकलें तेज हो गई हैं कि क्या हमास अपने राजनीतिक कार्यालय को क़तर से बाहर ले जाने पर विचार कर रहा है?
क्या क़तर हमास का ऑफिस अपने देश में बंद करने और हमास के नेताओं को बाहर करने की सोच रहा है? हालांकि क़तर और हमास, दोनों ने ऐसी किसी भी बात से इनकार किया है, लेकिन यह हकीकत है कि कतर कुछ पक्षों को लेकर नाराज है और दबाव महसूस कर रहा है.
यही वजह है कि कतर ने यह घोषणा की है कि वह हमास और इसराइल के बीच मध्यस्थ की भूमिका को लेकर विचार-विमर्श कर रहा है.
लेकिन सवाल है कि क़तर ऐसा क्यों कर रहा है? उसकी नाराज़गी का क्या कारण है? क्या संभावना है कि क़तर, हमास और इसराइल के बीच अब मध्यस्थ की भूमिका से अपने कदम वापस खींच लेगा? और हमास का राजनीतिक कार्यालय अपने देश में बंद कर देगा?

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क़तर में हमास की मौजदूगी के पीछे अमेरिका का हाथ?
क़तर में साल 2012 से हमास का राजनीतिक कार्यालय है. उस समय सीरिया के राष्ट्रपति बशर अल असद के ख़िलाफ़ ख़ूनी जंग छेड़ने वाले सीरियाई विपक्ष के समर्थन में राजनीतिक ब्यूरो के प्रमुख ख़ालिद मेशाल क़तर आ गए थे.
साल 2017 में ख़ालिद मेशाल की जगह राजनीतिक ब्यूरो के प्रमुख बनने वाले इस्माइल हानिया इस वक्त क़तर में रह रहे हैं.
कई अमेरिकी और क़तरी अधिकारियों के बयानों के अनुसार, अमेरिका के अनुरोध पर क़तर अपने देश में हमास के राजनीतिक कार्यालय की मेजबानी कर रहा है.
ऐसा कर अमेरिका, फ़लस्तीनियों और इसराइल के बीच बढ़ते संघर्ष को कम करने के लिए बातचीत की एक अप्रत्यक्ष लाइन खोलकर रखना चाहता था.
इस्लामिक समूहों पर शोध करने वाले और अम्मान में इंस्टीट्यूट ऑफ पॉलिटिक्स एंड सोसाइटी से जुड़े एक्सपर्ट हसन अबू हानिया कहते हैं कि अमेरिका के अनुरोध पर क़तर में हमास का कार्यालय खोला गया था.
वे कहते हैं कि यह वैसा ही है जैसा अमेरिका के कहने पर क़तर अफ़ग़ान सरकार और तालिबान के बीच मध्यस्थता कर रहा था.

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क़तर पर दबाव
सात अक्टूबर को हमास ने इसराइल पर हमला किया था, जिसके बाद से इसराइल, गज़ा पर हमले कर रहा है. इस युद्ध में क़तर ने दोनों पक्षों के बीच बातचीत में अहम भूमिका निभाई है.
पिछले साल नवंबर महीने में क़तर की मदद से ही इसराइल और हमास के बीच एक हफ्ते का संघर्ष विराम लागू हुआ था और इस दौरान हमास ने 81 इसराइली बंधकों को रिहा किया था. वहीं, इसके बदले में इसराइली जेलों में बंद 280 फ़लस्तीनी क़ैदियों की रिहाई हुई थी.
लेकिन इसके कोई भी बातचीत इस मुकाम पर नहीं पहुंच पाई कि दोनों के बीच कोई संघर्ष विराम लागू हो पाए. इसके उलट क़तरी मध्यस्थता को इसराइली और अमेरिकी आलोचना का सामना करना पड़ा है.
इसराइल के प्रधानमंत्री बिन्यामिन नेतन्याहू तो यहां तक कह चुके हैं कि क़तर, हमास को फंड कर रहा है. इसके अलावा जनवरी के आख़िर में उन्होंने क़तर से कहा था कि वह इसराइली बंधकों को रिहा करने के लिए हमास पर दबाव बनाए.
क़तर के विदेश मंत्री ने नेतन्याहू के बयानों को अपमानजनक बताया था और कहा था कि वे युद्ध को लंबा खींचने की कोशिश कर रहे हैं.
उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि क़तर, युद्ध को खत्म करने और मध्यस्थता को लेकर किए जा रहे प्रयासों के लिए प्रतिबद्ध है.
पिछले हफ्ते अमेरिका में क़तरी दूतावास ने डेमोक्रेटिक सांसद स्टेनी होयर के बयानों को लेकर नाराज़गी जाहिर की थी.
अपने बयान में अमेरिकी सांसद ने मांग की थी कि अगर क़तर, हमास पर दबाव नहीं डालता है और उसे फंडिंग में कटौती और मेजबानी बंद करने की चेतावनी नहीं देता है तो अमेरिका को क़तर के साथ अपने रिश्तों के लेकर फिर से सोचना चाहिए.
मीडिया रिपोर्ट्स में एक वरिष्ठ अमेरिकी अधिकारी के हवाले से बताया गया था कि अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडन ने क़तर और मिस्र के नेताओं से अनुरोध किया था कि वे हमास पर इसराइली बंधकों को रिहा करने के लिए किसी समझौते पर पहुंचने का दबाव बनाएं.
इसराइल और हमास के बीच मध्यस्थता की अपनी भूमिका को लेकर हो रही आलोचना पर क़तर ने दुख जाहिर किया है.
17 अप्रैल को क़तर के विदेश मंत्री और प्रधानमंत्री शेख़ मोहम्मद बिन अब्दुलरहमान अल थानी ने यह घोषणा की थी कि उनका देश ग़ज़ा संकट में अपनी मध्यस्थता का मूल्यांकन कर रहा है.
23 अप्रैल को हुई एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में क़तरी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता माजिद अल-अंसारी ने भी दोहराया कि क़तर अपनी मध्यस्थता की भूमिका पर विचार विमर्श कर रहा है.
उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि मध्यस्थ की भूमिका सभी पक्षों के साथ मिलकर काम करने की है, बजाए इसके कि वह किसी पक्ष पर दबाव डाले.

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क्या क़तर हमास का कार्यालय बंद कर देगा?
शनिवार को अमेरिकी वॉल स्ट्रीट जर्नल ने अरब अधिकारियों के हवाले से रिपोर्ट किया था कि हमास का राजनीतिक नेतृत्व अपने दफ्तर को कतर से बाहर ले जाने की संभावना पर विचार कर रहा है.
रिपोर्ट में कहा गया था कि इसी क्रम में हमास ने दो देशों से संपर्क किया है, जिसमें से एक नाम ओमान का है, लेकिन देखना यह होगा कि क्या ओमान, हमास नेताओं और उसके राजनीतिक ऑफिस की मेजबानी के लिए तैयार है?
इससे पहले की हमास के अधिकारी इस रिपोर्ट पर अपनी प्रतिक्रिया देते, उससे पहले ही क़तरी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ने कहा कि मध्यस्थता के लिए हमास नेताओं की मौजूदगी का जब तक फायदा होगा तब तक वे क़तर में ही रहेंगे.
हालांकि प्रवक्ता ने उन बयानों को पूरी तरह से नहीं नकारा है कि हमास अपना राजनीतिक ऑफिस उनके देश से कहीं और शिफ्ट कर सकता है .
ओमान के अलावा तुर्की एक ऐसा देश है जिसकी मीडिया में चर्चा है. हाल ही में हमास की राजनीतिक विंग के प्रमुख इस्माइल हानिया ने तुर्की के राष्ट्रपति रेचेप तैय्यप अर्दोआन से इस्तांबुल में मुलाकात की थी. दोनों के बीच करीब तीन घंटे बात हुई थी.
क़तर के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता इसराइल-हमास के बीच मध्यस्थता के लिए तुर्की की भूमिका को लेकर भी सवाल किया गया.
उन्होंने जवाब में कहा कि ग़ज़ा में युद्ध को रोकने में क़तर जो प्रयास कर रहा है, उसका समर्थन करने वालों में तुर्की सबसे महत्वपूर्ण देशों में से एक है.
कुछ मीडिया रिपोर्ट्स में अल्जीरिया का नाम भी लिया जा रहा है. फ्रांसीसी अखबार ले मोंडे ने एक दस्तावेज का जिक्र किया है जिसमें ग़ज़ा संकट को खत्म करने का प्लान और हमास नेताओं को अल्जीरिया में निर्वासन के साथ ग़ज़ा पट्टी में अरब शांति सेनाएं भेजने की बात कही गई है.
इसके अलावा ईरान, लेबनान, सीरिया और यमन का नाम भी लिया जा रहा है.

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क्या हमास का नया ठिकाना होगा ईरान?
रिसर्चर हसन अबू हानिया मानते हैं कि हमास के पास अब कम ही विकल्प बचे हैं.
वे कहते हैं, "तुर्की एक ऐसा देश है जहां हालात तेज़ी से बदलते हैं. हमास के लिए ये बहुत मुश्किल है कि वो अपने नेतृत्व की स्थाई मौजूदगी वहां पर सुनिश्चित कर सके. वे वहां आंशिक उपस्थिति बनाकर रख सकते हैं. ऐसा ही कुछ अल्जीरिया के साथ भी है. फ्रांस ने अल्जीरिया को लेकर जो प्रस्ताव दिया है, वो अव्यावहारिक है. हमास ने उसके प्रस्ताव के लिए कोई उत्साह नहीं दिखाया है. इस मामले में अल्जीरिया का रुख भी स्पष्ट नहीं है. इन हालात में जो विकल्प बचा है- वो ईरान है."
ईरान इकलौता ऐसा देश है जो हमास के नेतृत्व को पनाह देने के लिए तैयार हो सकता है.
इसके अलावा कोई और विकल्प अव्यावहारिक होगा, क्योंकि हमास को इसराइल, अमेरिका और यूरोपीय संघ ने 'आतंकवादी संगठन' करार दे रखा है.
हमास को ईरान में पनाह मिल भी जाती है तो इससे दूसरे किस्म की पेचीदगियां पैदा हो सकती हैं.
इंटरनेशनल क्राइसिस ग्रुप में मिडिल ईस्ट और नॉर्थ अफ्रीका प्रोग्राम के निदेशक जोस्ट हिल्टरमैन हसन अबू हानिया से सहमति जताते हैं.
वे कहते हैं, "अगर हमास को क़तर छोड़ने के लिए मजबूर किया जाता है तो उसे एक नया मेजबान देश खोजने में परेशानी होगी, क्योंकि जैसे ही कोई देश उसे पनाह देने पर विचार करेगा, उसे भविष्य में लगने वाले प्रतिबंधों के बारे में भी सोचना होगा. हालांकि ईरान के साथ ये स्थिति नहीं लागू होती है."
लेकिन हसन अबू हानिया इस बात से इनकार करते हैं कि फिलहाल हमास के नेताओं को क़तर से बाहर करने पर कोई गंभीर चर्चा चल रही है.
वे कहते हैं, "जो कुछ हो रहा है, वो सिर्फ़ समझौते तक पहुंचने के लिए उस पर दबाव बनाने की कोशिशों के तहत हो रहा है. इससे ज़्यादा कोई बात नहीं है और इससे कम कुछ नहीं है."
"मेरा मानना है कि क़तर भी इस मुद्दे पर ज़्यादा तूल नहीं दे रहा है. क़तर हर किसी को ये संदेश देने की कोशिश कर रहा है कि हमास के राजनीतिक ब्यूरो के नेताओं को उसकी ज़मीन छोड़ने के लिए मजबूर किया जाता है तो यूरोप और अमेरिका के पास उससे बातचीत के लिए विकल्प सीमित हो जाएंगे."
हालांकि हसन अबू हानिया ये भी कहते हैं कि अमेरिका की गुज़ारिश पर क़तर हमास के नेताओं को देश छोड़ने के लिए कह सकता है लेकिन साथ ही वो ये भी कहते हैं कि अमेरिका ऐसा कोई कदम उठाएगा, इसकी संभावना कम ही है क्योंकि ऐसा हुआ तो वो संवाद का माध्यम ख़त्म हो जाएगा और हालात और जटिल हो जाएंगे.
वे कहते हैं, "ऐसा हो सकता है कि हमास अपनी मौजूदगी का दायरा बढ़ा ले. ईरान, यमन और लेबनान में उसकी पहले से मौजूदगी है और क़तर में उसके राजनीतिक कार्यालय की मौजूदगी बनी रहे ताकि बातचीत का दरवाज़ा बंद न हो."
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