पाकिस्तान में आईएसआई क्या अदालत के काम में दखल दे रही है? सुप्रीम कोर्ट करेगा सुनवाई

पाकिस्तान के राष्ट्रपति आसिफ़ अली ज़रदारी और चीफ़ जस्टिस क़ाज़ी फ़ैज़ ईसा

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    • Author, शुमाइला जाफरी
    • पदनाम, बीबीसी न्यूज़, इस्लामाबाद

क्या पाकिस्तान में न्यायिक मामलों में ख़ुफ़िया एजेंसी आईएसआई दखल देती है? ये सवाल जजों की लिखी एक चिट्ठी के बाद पाकिस्तान में पूछा जा रहा था.

अब इस केस की सुनवाई करने का फ़ैसला सोमवार को पाकिस्तान की सुप्रीम कोर्ट ने किया है.

बीते दिनों पाकिस्तान में न्यायपालिका में आईएसआई के दखल का आरोप लगाकर काफ़ी आलोचना और विरोधी स्वर सुनने को मिले.

इसी बाबत हाईकोर्ट के छह जजों ने एक चिट्ठी लिखी थी.

कोर्ट का ये फ़ैसला सरकार के उस कदम के बाद आया है, जब सरकार ने शनिवार को सुप्रीम कोर्ट के पूर्व चीफ़ जस्टिस तस्सदुक़ हुसैन जिलानी की अध्यक्षता में एक सदस्यीय कमेटी बनाई थी.

इस कमेटी का काम है कि 60 दिनों के भीतर जजों के लगाए आरोपों की जांच कर अपनी रिपोर्ट पेश करे.

हालांकि जिलानी ने इस कमेटी की अध्यक्षता करने से अब इनकार किया है.

इमरान ख़ान

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पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ़ ने की सरकार की आलोचना

पूर्व पीएम इमरान ख़ान की पार्टी पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ़ यानी पीटीआई ने सरकार की इस मामले पर आलोचना की थी.

इसी मामले को लेकर कुछ वरिष्ठ वकीलों ने भी अदालत से कहा था कि वो इन आरोपों की जांच करे.

ये विरोध बढ़ने के बाद सुप्रीम कोर्ट ने सात सदस्यों की बेंच बनाकर केस को सुनने का फ़ैसला किया है.

बेंच इस केस की सुनवाई बुधवार से शुरू करेगी.

पाकिस्तान में ख़ुफ़िया एजेंसियों पर राजनीति में दखल देने के आरोप लगते रहे हैं लेकिन बीते दिनों हाई कोर्ट के छह जजों की चिट्ठी ने नई बहस पैदा कर दी है.

जजों ने सुप्रीम ज्यूडिशियल काउंसिल को लिखे खत में आईएसआई पर धमकी देने, टॉर्चर करने, लोगों की जासूसी करने और अहम राजनीतिक मामलों में दबाव बनाने के लिए रिश्तेदारों के अपहरण किए जाने जैसे आरोप लगाए थे.

पाकिस्तान पहले से ही सुरक्षा, आर्थिक, राजनीतिक चुनौतियों से जूझ रहा है. ऐसे में जजों की चिट्ठी ने आईएसआई की भूमिका पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं.

जजों ने सुप्रीम कोर्ट से इस मामले की जांच करने के लिए कहा था.

पाकिस्तान का सुप्रीम कोर्ट

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क्या न्यायपालिका आईएसआई को कठघरे में खड़ा कर पाएगी?

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जजों ने सात पन्ने की चिट्ठी 25 मार्च को लिखी थी. हाईकोर्ट के इन जजों ने चिट्ठी में ऐसे कई उदाहरण दिए थे, जिसमें आईएसआई अधिकारियों ने केस के फ़ैसले पर असर डालने की कोशिश की थी. इसमें एक मामला इमरान ख़ान से भी जुड़ा हुआ है.

चिट्ठी में कहा गया है कि एक जज के रिश्तेदार का किसी ने अपहरण किया, जिसका दावा था कि वो आईएसआई के लिए काम करता है. इस व्यक्ति को कैमरे पर जज के ख़िलाफ़ झूठे आरोप लगाने के लिए टॉर्चर किया गया.

एक दूसरे जज ने कहा कि उन्हें अपने लिविंग रूम और बेडरूम में ख़ुफ़िया कैमरे मिले.

चिट्ठी में ये भी कहा गया कि पूर्व पीएम इमरान ख़ान के ख़िलाफ़ बीते साल जिस तरह से सरकार एक के बाद एक मामलों को लेकर आक्रामक थी, उसके कारण हुए तनाव और हाई ब्लड प्रेशर के कारण जज को अस्पताल में भर्ती होना पड़ा.

चिट्ठी में कहा गया, ''हमारा मानना है कि ये जांच ज़रूरी है कि क्या कोई ऐसी सरकारी नीति या यूनिट है जिसके तहत ख़ुफ़िया एजेंसी के अधिकारी जजों को धमकाते हैं और राजनीतिक मामलों के फ़ैसलों को बदलने की कोशिश करते हैं.''

इस चिट्ठी के बाद पाकिस्तान में हंगामा शुरू हो गया है और कुछ मानवाधिकार और क़ानूनी संस्थाओं समेत इमरान ख़ान की पार्टी पीटीआई ने स्वतंत्र जांच और दोषियों को सज़ा देने की मांग की है.

पाकिस्तान मानवाधिकार आयोग की ओर से बयान में कहा गया, ''अगर हाईकोर्ट के जजों को इस तरह के दखल का सामना करना पड़ रहा है तो हो सकता है कि निचली अदालतों की हालत और ख़राब होगी.''

आयोग ने नया क़ानून बनाकर आईएसआई को ज़्यादा पारदर्शी बनाने की मांग की और कहा कि इससे लोकतांत्रिक प्रक्रिया मज़बूत होगी.

पाकिस्तान का सुप्रीम कोर्ट

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चिट्ठी के जवाब की प्रतिक्रिया

इस चिट्ठी के जवाब में पाकिस्तान के चीफ़ जस्टिस क़ाज़ी फ़ैज़ ईसा ने तत्काल रूप से सभी जजों की एक बैठक बुलाई और इस मामले पर चर्चा की. इस बैठक में मुख्य न्यायाधीश से प्रधानमंत्री के साथ मुलाकात करने के लिए कहा गया.

पीएम और मुख्य न्यायाधीश की मुलाक़ात अगले दिन हुई. इस मुलाक़ात के बारे में सुप्रीम कोर्ट की ओर से प्रेस रिलीज़ जारी हुई. इस रिलीज में बताया गया कि मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि न्यायपालिका और जजों के काम में किसी तरह का दखल किसी हाल में बर्दाश्त नहीं किया जाएगा और न्यायपालिका की स्वतंत्रता से समझौता नहीं किया जा सकता.

इसके बाद एक प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान क़ानून मंत्री आज़म नज़ीर तरार ने एलान किया कि पीएम इस मामले में एक जांच आयोग बनाएंगे, जो आरोपों की जांच करेगा.

इसी के मद्देनज़र पूर्व मुख्य न्यायाधीश की अध्यक्षता में कमेटी बनाने का पाकिस्तान सरकार ने एलान किया. ये भी कहा गया कि जांच में अगर कोई अधिकारी न्यायपालिका में दखल देने के मामले में शामिल पाया गया तो उसके ख़िलाफ़ सख़्त कार्रवाई होगी.

सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन, पाकिस्तान बार काउंसिल और अन्य दूसरे बार एसोसिएशन ने इस फ़ैसले का स्वागत किया. हालांकि पीटीआई ने इस कमेटी को ख़ारिज किया और कहा कि मुख्य न्यायाधीश इस्तीफ़ा दें क्योंकि वो जिस संस्थान का प्रतिनिधित्व करते हैं, उसकी रक्षा करने में वो नाकाम रहे हैं.

इमरान ख़ान की पार्टी पीटीआई ने मांग की है कि मुख्य न्यायाधीश कोर्ट के जजों का एक पैनल बनाएं और चिट्ठी में किए दावों की जांच करवाएं. ये भी मांग की गई कि देश के दूसरे बार काउंसिल के साथ एक सम्मेलन किया जाए ताकि अगर वहां भी ऐसे कोई मामले हुए हों तो वो सामने आएं.

पीटीआई के प्रवक्ता रउफ हसन ने मीडिया से कहा, "भविष्य में ऐसा कुछ ना हो, इसे रोकने के लिए मुख्य न्यायाधीश अहम और सक्रिय भूमिका अदा कर सकते थे मगर उन्होंने ऐसा नहीं किया."

रउफ़ बोले, ''न्यायपालिका पक्षपाती बन गई है. वो एक तरफ़ा हो गए हैं. हम इंसानी तौर पर जस्टिस तस्सदुक़ हुसैन जिलानी के ख़िलाफ़ नहीं हैं, मगर वो रिटायर हो चुके हैं. जो काम उन्हें दिया गया है, वो उसे कर नहीं पाएंगे क्योंकि उनके पास कोई अधिकार नहीं है.''

रउफ़ कहते हैं, ''सरकार पहले ही अपना रुख़ बता चुकी है. जजों की चिट्ठी में इन्हीं लोगों का ज़िक्र था. ये लोग कैसे कमेटी बना सकते हैं और अपने ही ख़िलाफ़ लगे आरोपों की जांच करवा सकते हैं.''

पीटीआई ने कहा कि इस सरकार के तहत हुई किसी भी जांच को हम स्वीकार नहीं करेंगे.

साल 2017 में नवाज़ शरीफ़

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वकील भी जांच के पक्ष में आए

पीटीआई के बयान के बाद 300 से ज़्यादा वकीलों ने सार्वजनिक तौर पर एक बयान जारी किया. इस बयान में सुप्रीम कोर्ट से मामले की जांच करने के लिए कहा गया.

बयान में कहा गया, ''सरकार के अंतर्गत बनी कमेटी का जांच करना नियमों का उल्लंघन है. ऐसे किसी कमीशन और उसकी कार्यवाही की विश्वसनीयता पर भरोसा नहीं किया जा सकता.''

इस चिट्ठी पर हस्ताक्षर करने वालों में तस्सदुक़ हुसैन जिलानी के बेटे भी शामिल हैं.

ये पहली बार नहीं है जब न्यापालिका पर दबाव बनाने के आरोप लगे हैं. एक लंबा इतिहास है, जिसके धागे पाकिस्तान के पूर्व पीएम ज़ुल्फ़िकार अली भुट्टी के ट्रायल तक भी आते हैं.

पाकिस्तान के पूर्व मुख्य न्यायाधीश नसीम हसन शाह ने जियो न्यूज़ को दिए इंटरव्यू में कहा कि ज़ुल्फ़िकार अली भुट्टो मामले में एक ख़ास तरह का फ़ैसला सुनाने को लेकर दबाव था. उन्होंने आर्मी और आईएसआई का सीधे तौर पर नाम नहीं लिया.

साल 2017 में तत्कालीन पीएम नवाज़ शरीफ़ ने भी सेना पर पनामा मामले में सेना पर जजों को प्रभावित करने और दबाव बनाने का आरोप लगाया था.

तब अदालत के सुनाए फ़ैसलों के बाद नवाज शरीफ़ सत्ता से बाहर हो गए थे.

एक साल बाद इस्लामाबाद हाईकोर्ट के जज शौकत अज़ीज़ सिद्दिक़ी ने सार्वजनिक भाषण में ना सिर्फ़ आरोप लगाया बल्कि तत्कालीन आईएसआई चीफ जनरल फ़ैज़ हमीद और दूसरे सैन्य अधिकारियों का नाम भी लिया, जो राजनीतिक मामलों में दखल देते रहे.

तब सुप्रीम ज्यूडिशियल काउंसिल ने आरोपों की जांच करने की बजाय जज के ख़िलाफ़ ही एक्शन लिया गया और वो पद से हटा दिए गए.

हाल ही में साल 2018 में सिद्दिक़ी को हटाए जाने को सुप्रीम कोर्ट ने ग़ैर-क़ानूनी कहा. सिद्दीक़ी के लगाए आरोपों की कभी जांच नहीं हुई.

अब जजों की लिखी चिट्ठी में भी सिद्दिक़ी के आरोपों की जांच करने की भी मांग की गई है.

नजम सेठी

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जानकारों ने क्या कहा

वॉशिंगटन के विल्सन सेंटर में साउथ एशिया इंस्टीट्यूट के डायरेक्टर मिशेल कुगेलमन ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर लिखा, ''पाकिस्तान के हाईकोर्ट के जजों की हैरान करने वाली चिट्ठी न सिर्फ़ वहां की क़ानूनी प्रक्रियाओं के बारे में बताती है बल्कि ये उस चाहत के बारे में भी बताती है जहां लोग जोखिम लेते हुए जनता के बीच जाकर अपनी बात कह रहे हैं. कुछ लोगों का मानना है कि अतीत में ऐसा कभी नहीं हुआ.''

कई जानकारों ने रिटायर्ड जज की अध्यक्षता में बनी कमेटी ती आलोचना की है और कहा है कि इसका कोई नतीजा नहीं आएगा.

वकील ऐतज़ाज़ अहसान ने एक टीवी शो के दौरान कहा था कि संविधान के तहत सभी स्तंभों को अलग-अलग काम करना चाहिए.

वो कहते हैं, ''पद पर बैठे किसी जज को किसी अथॉरिटी की ओर से समन नहीं भेजा जा सकता. अगर किसी कमेटी के सामने शिकायत करने वाले हाईकोर्ट के जजों को पेश होना पड़ा तो ये गलत होगा. वो अपने आप को सरकार की कमेटी के सामने पेश कर रहे होंगे.''

वरिष्ठ कोर्ट रिपोर्टर मतिउल्लाह जान ने कहा कि जजों की चिट्ठी में जिन मामलों का ज़िक्र है, वो 2023 में तब के हैं जब शहबाज़ शरीफ़ सत्ता में थे. चीफ़ जस्टिस इस मामले में जजों के साथ खड़े होने की बजाय सरकार को जांच करने के लिए कह रहे हैं, जिस पर इस मामले में आरोप हैं.

वो कहते हैं, ''ये कुछ ऐसा है कि परिवार के मसले सुलझाने के लिए किसी बाहरी को बुलाया जाए. कमीशन इस मामले में जजों की जांच करेगा न कि सरकार और उसकी एजेंसियों की. सुप्रीम कोर्ट न्यायपालिका को सरंक्षण देने में नाकाम साबित हुआ है.

वकीलों और जाने-माने लीगल एक्सपर्ट्स की ओर से विरोध किए जाने के बाद जस्टिस जिलानी ने इस कमेटी की अध्यक्षता करने से इनकार किया और इसके बाद चीफ जस्टिस ने इस मामले में सात जजों की बेंच बनाई. पीटीआई ने भी यही मांग की थी.

वरिष्ठ राजनीतिक एक्सपर्ट और पत्रकार नजम सेठी कहते हैं कि इन आरोपों को साबित करने और सबूत देना आसान नहीं होगा.

अपने कार्यक्रम 'सेठी से सवाल' में नज़म कहते हैं- चिट्ठी लिखने वाले जज ख़ुफ़िया एजेंसियों के निशाने पर आ सकते हैं.

वो कहते हैं कि इस चिट्ठी से भविष्य में एजेंसियां सतर्क रहेंगी और वो शायद ऐसे कामों से दूर रहें.

सेना ने इस पूरे मामले पर अब तक टिप्पणी नहीं की है. हालांकि अतीत में वो राजनीति से जुड़े मामलों में शामिल रहने के आरोपों को ख़ारिज करती रही है.

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