ग्लेन मैक्सवेल की वो एक चीज़ जो समय के साथ भी नहीं बदली

    • Author, प्रदीप कुमार
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

चमत्कार कम ही होते हैं. दमखम और सलाहियत के साथ काबिलियत दिखाने वाले खेल के मैदान में तो और भी कम. लेकिन जिन लोगों का चमत्कार पर विश्वास हो, उन लोगों ने मुंबई के वानखेड़े स्टेडियम में ग्लैन मैक्सवेल के रूप में चमत्कार को ही देखा.

एक खिलाड़ी अपनी जीवटता से क्या कुछ कर सकता है, यह ग्लैन मैक्सवेल की पारी ने दिखाया.

मैक्सवेल ने आख़िरी की जिन चार गेंदों के साथ मैच को ख़त्म किया, उसमें उन्होंने दो छक्के जमाए, फिर चौका और उसके बाद फिर से छक्का.

ये शॉट्स वे तब लगा रहे थे, जब महज अपने पांव पर खड़े हो पा रहे थे. वो ना तो दौड़ने की स्थिति में थे और ना ही गेंदों को खेलते वक्त पांवों में कोई मूवमेंट हो सकता था.

क्रीज़ पर खड़े-खड़े ही मैक्सवेल ने इतिहास बनाया. उन्होंने दोहरा शतक बनाया. जिसमें आख़िरी के 100 रन उन्होंने लगभग दर्द से जूझते हुए और बिना दौड़े पूरे किए.

मैक्सवेल ने इस पारी में ऑस्ट्रेलिया को ना केवल हार से बचाया बल्कि महज 128 गेंदों पर नाबाद 201 रन की पारी खेल कर इतिहास में अपना नाम दर्ज कराया.

इस पारी में पहले सौ रन में मैक्सवेल ने 10 चौक्के और तीन छक्के जमाए थे. इसके बाद के 101 रन के लिए मैक्सवेल ने सात छक्के और 11 चौक्के लगाए.

स्पिन गेंदबाज़ों की गेंदों पर जमकर प्रहार

इस दौरान उन्होंने अफ़ग़ानिस्तान के तेज़ गेंदबाज़ों के साथ-साथ स्पिन गेंदबाज़ों की गेंदों पर जमकर प्रहार तो किया ही लेकिन दर्द और तकलीफ़ के पलों को उन्होंने अपने पर हावी नहीं होने दिया.

जिन गेंदबाज़ों के सामने ऑस्ट्रेलिया का शीर्ष क्रम बुरी तरह लड़खड़ा गया था, उसे अपनी तकलीफ़ों के बीच शाट्स लगाने की सीमित विकल्पों के बीच में मैक्सवेल ने धुन डाला.

उनकी इस पारी को दूसरे छोर पर खड़े उनके कप्तान पैट कमिंस ने केवल देखते रहे बल्कि अपने साथी खिलाड़ी का हौसला बढ़ाते रहे. जब तकलीफ़ से मैक्सवेल चीख रहे थे, तब भी कमिंस मुस्कुराते दिख रहे थे, मानो उन्हें अपने साथी खिलाड़ी की क़ाबिलियत पर पूरा भरोसा हो.

लेकिन उनके मन में जो तूफ़ान चल रहा था, उसका ज़िक्र उन्होंने मैच के बाद आधिकारिक ब्रॉडकॉस्टर के प्रेजेंटेशन कार्यक्रम में किया. जब इंग्लैंड के पूर्व कप्तान माइकल अर्थरटन ने उनसे पूछा कि क्या मैक्सवेल की ये पारी ऑस्ट्रेलियाई लोक कथाओं में शामिल होगी. तो पैट कमिंस ने कहा, "इसमें कहीं कोई संदेह नहीं है. ये पारी सहनशक्ति, साहस, बुद्धिमता और अपनी क्षमता का वो नायाब प्रदर्शन है, जिसकी दूसरी मिसाल मिलनी मुश्किल है."

दरअसल मैक्सवेल की पहचान जिस तरह की बल्लेबाज़ी के लिए रही है, सही मायने में उन्होंने उसका अब तक सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन वानखेड़े के मैदान में किया.

क्रिकेट की दुनिया में मैड मैक्सी के नाम से जाने-जाने वाले ग्लैन मैक्सवेल ने दिखाया कि वे ना केवल जीनियस हैं, बल्कि उनके साथ मैड स्किल्स वाली ख़ासियत भी जुड़ी है.

दरअसल ऑस्ट्रेलियाई क्रिकेट में बेहद कम उम्र में अपने टैलेंट के दम पर धमाल मचाने वाले ग्लैन मैक्सवेल को इंटरनेशनल क्रिकेट में वैसी कामयाबी नहीं मिली. लेकिन समय-समय पर वे अपना स्पार्क दिखाते रहे, जिसके चलते वे दस सालों से ऑस्ट्रेलिया की वनडे टीम में बने हुए हैं.

लेकिन यह कहा जा सकता है कि क्रिकेट की दुनिया को उनसे जिस तरह की बल्लेबाज़ी की उम्मीद थी, उसके सारे रंग उन्होंने वानखेड़े स्टेडियम में किसी ख़ूबसूरत कलाकृति की मानिंद रंग दिए.

चाहे वो पुल या फ्लिक हो या फिर रिवर्स फ्लिक हो, मैक्सवेल अपने रंग में हों तो क्या कर सकते हैं, ये अब दुनिया लंबे समय तक याद रखेगी.

नाबाद 201 रन की पारी, विश्व क्रिकेट में छठे नंबर या उसके नीचे आने वाले बल्लेबाज़ के लिए अब तक का सबसे बड़ा स्कोर है.

मैक्सवेल की पारी से बनते गए रिकॉर्ड

वनडे क्रिकेट में ग्लैन मैक्सवेल पहले ऐसे बल्लेबाज़ हैं, जिन्होंने ओपनिंग नहीं करते हुए, दोहरा शतक जमाया है.

अब तक वनडे क्रिकेट के सारे दोहरे शतक ओपनरों के नाम रहे थे. इतना ही नहीं ये पहला मौका है जब किसी ऑस्ट्रेलियाई बल्लेबाज़ ने वनडे क्रिकेट में दोहरा शतक जमाया है.

सबसे तेज़ दोहरा शतक का रिकॉर्ड वे महज दो गेंदों से चूक गए, ईशान किशन ने 126 गेंदों पर ये कारनामा दिखाया है, मैक्सवेल ने 128 गेंदों का सामना किया. लेकिन मैक्सवेल का दोहरा शतक कहीं ज़्यादा विषम परिस्थितियों में खेलते हुए बना.

इतना ही नहीं वनडे क्रिकेट में रनों का पीछा करते हुए ये पहला दोहरा शतक है.

बहरहाल अफ़ग़ानिस्तान के ख़िलाफ़ मैच में ग्लैन मैक्सवेल जब बल्लेबाज़ी करने उतरे तब नौवें ओवर की पहली दो गेंद पर अजमतुल्लाह दो विकेट झटक चुके थे.

ऐसी स्थिति में मैक्सवेल पर हैट्रिक बचाने का दबाव था और वे बाल-बाल बचे. गेंद उनके बल्ले का बाहरी किनारा लेकर विकेट के पीछे तो गई लेकिन कीपर के दस्तानों तक नहीं पहुंची.

जहां से मैक्सवेल ने संभाली पारी

ऑस्ट्रेलिया के चार विकेट पर 49 रन थे और यहां से मैक्सवेल ने अपनी पारी शुरू की.

वे विकेट पर टिकते तब तक अफ़ग़ानिस्तान के 292 रनों के जवाब में ऑस्ट्रेलिया का स्कोर सात विकेट पर 92 रन हो गया.

पूरे स्टेडियम में अफ़ग़ानिस्तान की टीम को लेकर ज़ोरदार समर्थन दिख रहा था और ऐसा लगने लगा था कि अफ़ग़ानी टीम इस वर्ल्ड कप का सबसे बड़ा उलटफेर कर देगी.

मैक्सवेल तब 26 रनों पर खेल रहे थे. यहां से मैक्सवेल के साथ टीम के कप्तान पैट कमिंस आए. कमिंस एक छोर पर बस खड़े होकर देखते रहे और मैक्सवेल ने खेल को बदलना शुरू किया.

इस दौरान एक बार स्कॉवयर लेग और एक बार मिड ऑफ़ पर उनका कैच भी छूटा. लेकिन उनका भरोसा नहीं डगमगाया.

देखते देखते 76 गेंद पर उन्होंने अपना शतक पूरा कर लिया. कमिंस दूसरे छोर पर दहाई अंकों तक नहीं पहुंच पाए थे.

शतक के बाद दिखा असली रंग

लेकिन मैक्सवेल का असली रंग इस शतक के बाद नज़र आया.

उनकी पहचान तूफ़ानी बल्लेबाज़ की भले रही हो लेकिन दबाव के पलों पर वे बिखरते रहे हैं. लेकिन वे यहां दर्द और तकलीफ़ में भी डटे रहे.

शतक के ठीक बाद उनके बाएं पैर में क्रैंप जैसा हुआ और टीम फिजियो को मैदान में आना पड़ा. तब ऑस्ट्रेलियाई टीम जीत से क़रीब सौ रन दूर थी.

बाएं पैर की तकलीफ़ पीठ की तकलीफ़ में बदली और मैक्सवेल मैदान पर कई लेटते दिखे.

एक वक्त ऐसा भी आया कि एक रन लेते वक्त वे मैदान में ना केवल गिर गए बल्कि क्रीज पर पहुंचने के बाद ऐसा लगा कि वे दर्द से तड़प रहे हैं. यहां से उनका अपने पांव पर खड़ा होना भी मुश्किल लग रहा था.

उनके बाद बल्लेबाज़ी करने के लिए उतरने वाले एडम जंपा दो बार मैदान तक आए.

41वें ओवर के समय ऐसा लगा कि मैक्सवेल को स्ट्रेचर के साथ बाहर जाना पड़ेगा लेकिन मैक्सवेल अपने पांव पर दोबारा खड़े हो गए और जंपा को पवेलियन में ही इंतज़ार करना पड़ा.

2010-11 में ऑस्ट्रेलिया की घरेलू क्रिकेट में सबसे तेज़ अर्धशतक, 19 गेंद पर बनाकर उन्होंने लोगों को आकर्षित किया था और देखते देखते वे वनडे टीम में जगह भी बनाने में कामयाब रहे.

2015 में घरेलू मैदानों पर खेले गए वर्ल्ड कप में उन्होंने श्रीलंका के ख़िलाफ़ महज 51 गेंद पर शतक जमाया, यह उस वक्त ऑस्ट्रेलिया की ओर से किसी भी बल्लेबाज़ का सबसे तेज़ शतक था.

किसी भी गेंद पर खेल सकते हैं शॉट्स

क्रिकेट के शुरुआती सालों में उनकी एक ही पहचान थी, 'ये बल्लेबाज़ किसी भी गेंद पर कोई भी शॉट्स खेल सकता है.'

लेकिन यही अपरंपरागत शॉट्स खेलना उनकी सबसे बड़ी खामी बन गई और माना जाना लगा कि वे लापरवाही में शॉट्स खेल कर कभी भी आउट हो सकते हैं.

कई मैच में उनके बेतुके शॉट्स खेलने को लेकर मजाक़ भी उड़ाया जाता रहा.

2015 के वर्ल्ड कप के बाद लगातार वनडे मैचों में दस से भी कम औसत के चलते उन्हें टीम से बाहर कर दिया गया.

क्रिकेट करियर ख़त्म होने की कगार तक पहुंच चुका था लेकिन ऑस्ट्रेलियाई क्रिकेट अपनी प्रतिभाओं को ऐसे ही खपने नहीं देता है.

मैक्सवेल को अपने साथी खिलाड़ियों का सपोर्ट भी मिला और उन्होंने मानसिक चिकित्सकों के सेशन भी लिए. इन सबका फ़ायदा हुआ और उन्होंने छह महीने बाद क्रिकेट के मैदान में अपनी वापसी की.

लेकिन अंदर बाहर का सिलसिला चलता रहा. उनकी बल्लेबाज़ी की स्ट्राइक रेट भले 127 से ज़्यादा की है लेकिन 136 मैचों में उनकी बल्लेबाज़ी का औसत 36 का भी नहीं है.

वनडे क्रिकेट में वो अभी तक चार शतकों की मदद से चार हज़ार रन भी पूरे नहीं किए हैं.

वर्ल्ड कप को यादगार बनाने का इरादा

लेकिन ट्वेंटी-20 लीग क्रिकेट में उनकी मांग दुनिया भर की टीमों में हैं.

आईपीएल में भी उनकी नीलामी करोड़ों रुपये में होती है, किंग्स इलेवन पंजाब, मुंबई इंडिया और रॉयल चैलेंजर्स बेंगलुरु की टीम का वे हिस्सा रहे हैं.

लेकिन आईपीएल में उनकी कोई पारी, याद रहने वाली पारी के तौर पर याद नहीं आती है.

द क्रिकेट मंथली ने 2017 में ग्लैन मैक्सवेल पर मैड मैक्सी के आलेख में उनके जानने वालों से बातचीत के आधार पर बताया है कि सालों बाद और उतार चढ़ाव भरे करियर के बाद जो एक चीज़ नहीं बदली है वो है मैक्सवेल के खेलने का अपना स्टाइल.

इस लेख को लिखने वाले एसबी टेंग ने याद किया जब मैक्सवेल क्रिकेट की बारीकियों को सीख रहे थे, तब क्रिकेट की दुनिया में रिवर्स स्वीप और रिवर्स फ्लिक को आत्मघाती शाट्स माना जाता था, 2005 में डेरेन लेहमन ने मेलबर्न टेस्ट में शाहिद आफ़रीदी की गेंद पर रिवर्स स्वीप करने की कोशिश की, वे बोल्ड तो हुए ही थे, इस पारी के बाद उनका क्रिकेट करियर ही थम गया था.

क्रिकेट कोच ही नहीं तमाम दिग्गज ऐसे शाट्स से बचने की सलाह देते थे लेकिन उस दौर में मैक्सवेल ने अपने स्पांसर से कहकर बाएं पैर के थाई पैड मंगवाया और बाएं हाथ से बल्लेबाज़ी की प्रैक्टिस की ताकि वे मनमाफ़िक अंदाज़ में रिवर्स स्वीप और फ़्लिक खेल सकें.

इतनी ही नहीं उन्होंने गॉल्फ़ खेलने के अपने अंदाज़ को भी बल्लेबाज़ी करने की शैली में शामिल कर लिया. हालांकि इसके चलते अब तक मैक्सवेल के करियर को फ़ायदा कम हुआ है और नुकसान ज़्यादा. लेकिन उनकी पहचान मैड मैक्सी की ज़रूर बनी रही.

लेकिन मैक्सवेल 2023 वर्ल्ड कप को यादगार बनाने के इरादे से खेलते दिख रहे हैं, वे अब तक दो शतक बना चुके हैं और सेमीफ़ाइनल या बाद में फ़ाइनल में पहुंचने पर अगर वे चल निकले तो ऑस्ट्रेलिया को वर्ल्ड चैंपियन बनने से कोई नहीं रोक सकता.

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