You’re viewing a text-only version of this website that uses less data. View the main version of the website including all images and videos.
मध्य प्रदेश: क्या अब कांग्रेस में कमलनाथ और दिग्विजय सिंह की नहीं चलेगी?
- Author, सलमान रावी
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, भोपाल से
मध्य प्रदेश कांग्रेस कमिटी की 'जंबो कार्यकारिणी' को भंग कर दिया गया है. इसे 'जंबो कार्यकारिणी' इसलिए भी कहा जाने लगा था कि कांग्रेस ने किसी भी प्रदेश में ऐसा अनूठा प्रयोग नहीं किया था जहां प्रदेश उपाध्यक्षों और महासचिवों की संख्या 150 के आस-पास पहुँच गई थी.
इतना ही नहीं, प्रदेश कांग्रेस कमेटी ने कार्यकारिणी के अतिरिक्त 40 से 45 प्रकोष्ठों का भी गठन किया था जिनमें पुजारी प्रकोष्ठ के अलावा मठ-मंदिर प्रकोष्ठ और धार्मिक उत्सव प्रकोष्ठ शामिल हैं.
कार्यकारिणी भंग करने की घोषणा अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी द्वारा मध्य प्रदेश के लिए नियुक्त किये गए प्रभारी और संगठन के महासचिव जितेन्द्र सिंह ने मंगलवार को अचानक कर सबको चौंका दिया.
क्योंकि प्रदेश की कार्यकारिणी में ज़्यादातर वो नेता शामिल हैं जिनका चयन ख़ुद तत्कालीन प्रदेश अध्यक्ष कमलनाथ ने किया था या फिर जो पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह के करीबी माने जाते रहे हैं.
इसी महीने पार्टी ने पूर्व मुख्यमंत्री कमलनाथ की जगह जीतू पटवारी को प्रदेश अध्यक्ष नियुक्त कर दिया था. मंगलवार को जीतेन्द्र सिंह और नवनियुक्त प्रदेश अध्यक्ष जीतू पटवारी संगठन के नेताओं के साथ प्रदेश कार्यालय में बैठक कर रहे थे. उसी दौरान उन्होंने ये घोषणा कर डाली.
कांग्रेस का एमपी में 'पीढ़ी परिवर्तन'
संगठन के वरिष्ठ नेताओं के बीच बोलते हुए जीतू पटवारी ने कहा, "अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी ने मध्य प्रदेश कांग्रेस कमेटी की कार्यकारिणी को भंग करने का फैसला लिया है."
मगर साथ ही उन्होंने ये भी कहा कि अगले आदेश तक ज़िलों के मौजूदा प्रभारी यानी अध्यक्ष अपना काम करते रहेंगे.
कमलनाथ जैसे वरिष्ठ नेता को दरकिनार कर युवा चेहरे के रूप में जीतू पटवारी को आगे करने को लेकर राजनीतिक विश्लेषक मान रहे हैं कि भारतीय जनता पार्टी की तरह ही कांग्रेस भी मध्य प्रदेश में ‘पीढ़ी परिवर्तन’ की राह पर निकल पड़ी है.
इसलिए भी क्योंकि एक दूसरे युवा चेहरे उमंग सिंघार को पार्टी ने सदन में विधायक दल का नेता नियुक्त किया जो विपक्ष के नेता बन गए.
मंगलवार की बैठक में मध्य प्रदेश में पार्टी के ज़िला अध्यक्ष और वरिष्ठ नेता मौजूद थे.
पार्टी के प्रदेश प्रभारी और नए प्रदेश अध्यक्ष के सामने मौजूद नेताओं ने विधानसभा में चुनाव के कारणों पर भी चर्चा की.
इसी बैठक में छत्तरपुर के ज़िला अध्यक्ष महा प्रसाद पटेल के बयान ने मौजूद नेताओं को चौंका दिया.
बैठक में मौजूद नेता ने बीबीसी से बात करते हुए कहा कि पटेल की बारी जब आई तो उन्होंने कहा कि ‘कांग्रेस को भारतीय जनता पार्टी ने नहीं बल्कि कांग्रेस ने हराया है.’
उनके इस बयान से संगठन में चल रही गुटबाज़ी खुलकर सामने आ गई.
बैठक में मौजूद पूर्व प्रदेश अध्यक्ष कांतिलाल भूरिया ने भी पार्टी में चल रही ‘गुटबाज़ी’ को हार का ज़िम्मेदार ठहराया.
कुछ नेता दबी जुबां से ही सही चर्चा कर रहे थे कि "कमलनाथ अपनी तरह से संगठन को चला रहे थे और किसी की सुन नहीं रहे थे."
कमलनाथ का रवैया
कांग्रेस पर दशकों से नज़र रखने वाले वरिष्ठ पत्रकार और लेखक रशीद किदवई ने बीबीसी से बात करते हुए कहा कि पिछले पांच सालों से कमलनाथ पार्टी के तय मानकों के इतर अपनी ही तरह चल रहे थे.
उन्होंने कहा, "चाहे दिल्ली में केंद्रीय चुनाव समिति की बैठक से अचानक उठकर चले जाना हो या फिर ख़ुद से ये तय कर देना कि विपक्षी दलों के गठबंधन की रैली भोपाल में नहीं होगी – कमलनाथ ये संदेश दे रहे थे कि उनका कथन ही पार्टी का स्टैंड है."
इस साल सितम्बर माह की ही बात है जब विपक्षी दलों ने एक साझा गठबंधन बनाया गया था. इसका नाम 'इंडियन नेशनल डिवेलपमेंटल इंक्लूसिव अलायंस' या इंडिया रखा गया.
इंडिया गठबंधन में कांग्रेस सहित कुल 28 विपक्षी दल शामिल हैं. बैठक के बाद तय हुआ था कि नए गठबंधन की ‘पहली रैली’ भोपाल में होगी और वो भी अक्टूबर के पहले हफ़्ते में.
रैली की तैयारियां चल ही रहीं थीं कि मध्य प्रदेश कांग्रेस कमेटी के तत्कालीन अध्यक्ष और पूर्व मुख्यमंत्री कमलनाथ और संगठन के प्रदेश के चुनाव प्रभारी रणदीप सुरजेवाला ने अचानक एक संवाददाता सम्मेलन बुलाया. इसी सम्मलेन में कमलनाथ ने साफ़ तौर पर कह दिया, ''रैली नहीं हो रही है, स्थगित हो गई है.''
‘आपत्तिजनक बयानबाज़ी’
समाजवादी पार्टी के सुप्रीमो अखिलेश यादव मध्य प्रदेश के चुनावी दौरे पर आये थे. उन्होंने अपने प्रचार के दौरान बताया था कि मध्य प्रदेश में कांग्रेस पार्टी गठबंधन के दलों के साथ सीटों पर समझौता करने को तैयार नहीं हो रही है.
यही सवाल जब 20 अक्टूबर को पत्रकारों ने कमलनाथ से पूछा तो उनके जवाब ने नए विवाद को जन्म दे दिया और लोग उनकी ‘तुनक मिज़ाजी’ को लेकर चर्चा करने लगे.
उन्होंने जवाब दिया, “अरे भाई, छोड़ो अखिलेश वखिलेश को.” उनके इस बयान की इंडिया गठबंधन के दूसरे दलों के बीच काफ़ी आलोचना हुई.
विश्लेषक कहते हैं कि मुख्य मुद्दों से हटकर कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष और पार्टी के बड़े नेताओं ने ‘आपत्तिजनक बयानबाज़ी का सहारा लिया.’
रशीद किदवई कहते हैं कि कांग्रेस जब जातियों के प्रकोष्ठ बना रही थी ये सोचकर कि उसे इसका चुनावी लाभ मिलेगा तब भारतीय जनता पार्टी हर बूथ पर एक एक वोटर तक अपनी पहुँच बढ़ा रही थी.
वो कहते हैं, “यहीं पर सांगठनिक परिपक्वता की परख होती है. कांग्रेस प्रकोष्ठ की राजनीति कर रही थी मगर प्रकोष्ठ ना बनाते हुए भी भाजपा ने बाज़ी मार ली."
"वैसे भी कांग्रेस के विभागों के बीच सामंजस्य भी नहीं दिखा. कांग्रेस में जवाबदेही तय नहीं करने की भी परंपरा है. जबकि अमित शाह ने जब राष्ट्रीय अध्यक्ष की ज़िम्मेदारी संभाली थी, तभी से उन्होंने पार्टी के नेताओं की जवाबदेही तय कर दी थी."
"किसी को छुट्टी भी लेनी होती है तो उसे पार्टी की अनुमति लेनी पड़ती है. कांग्रेस में सब मनचाहा ही चलता रहा है.”
कमलनाथ और दिग्विजय का नेतृत्व
कुछ जानकार मानते हैं कि कांग्रेस लगातार 2018 की जीत के बाद से ही ग़लतियाँ करती आ रही है. और, दो नेताओं यानी कमलनाथ और दिग्विजय सिंह के हाथों में ही संगठन चलता रहा. उनके हिसाब से ही चलता रहा.
वरिष्ठ पत्रकार राकेश दीक्षित के अनुसार, "2018 का चुनाव कांग्रेस ने मजबूती से लड़ा था और जीत भी हासिल की थी."
मगर वो मानते हैं कि उस जीत की खुमारी में दोनों बड़े नेता ग़लतियां करते चले गए.
वैसे राजनीतिक हलकों में कांग्रेस की 2018 की जीत का सारा श्रेय ज्योतिरादित्य को भी दिया जा रहा था.
मगर फिर कांग्रेस ने जो फैसले लिए उसकी वजह से सिंधिया ने पार्टी को अलविदा कहकर अपने समर्थकों के साथ भाजपा का दामन थामा और 2020 में कमलनाथ की सरकार गिर गई.
लखन सिंह मीणा भोपाल ज़िला परिषद के अध्यक्ष रह चुके हैं और सिंधिया की वजह से उन्होंने भी भाजपा का दामन थाम लिया था.
बीबीसी से बात करते हुए वो कहते हैं, “2018 का चुनाव महाराज बनाम शिवराज के नारे पर लड़ा गया था. सिंधिया ने बड़ी मेहनत की थी."
मीणा कहते हैं, "कांग्रेस ने जीत के बाद सरकार बना ली मगर ज्योतिरादित्य सिंधिया जैसे क़द्दावर नेता को किनारे लगा दिया. न उन्हें प्रदेश अध्यक्ष बनने दिया ना राज्यसभा जाने दिया. दिग्विजय सिंह ख़ुद राज्य सभा चले गए. ये सब कमलनाथ और दिग्विजय सिंह ने मिलकर किया.”
उनका कहना था कि अगर ज्योतिरादित्य सिंधिया कांग्रेस छोड़कर नहीं जाते तो कांग्रेस की सरकार 2018 से लगातार चलती रहती और इस बार भी उसे फ़ायदा होता.
प्रदेश कांग्रेस के प्रवक्ता केके मिश्रा इन बातों से सहमत नहीं हैं.
वो कहते हैं, "नया अध्यक्ष जब भी बनता है तो वो अपने हिसाब से अपनी कार्यकारिणी बनाता है."
हालांकि वो ये ज़रूर मानते हैं कि जीतू पटवारी को अध्यक्ष बनाकर संगठन नयी पीढ़ी के नेताओं को अब सामने ला रहा है.
उनका ये भी कहना था कि ये कहना सही नहीं है कि कमलनाथ और दिग्विजय सिंह ही मध्य प्रदेश में तय करते थे कि कांग्रेस का संगठन कैसे चलेगा.
जेपी धनोपिया प्रदेश कांग्रेस के उपाध्यक्ष हैं और जो 45 प्रकोष्ठ कमलनाथ ने बनाए थे वो उनके ही नेतृत्व में काम कर रहे थे.
धनोपिया का दावा है कि इन प्रकोष्ठों की आलोचना अब हो रही है जबकि इसका लाभ कांग्रेस को मिला है. वो कहते हैं कि पिछली बार की तुलना में कांग्रेस का अगर मत प्रतिशत देखा जाए तो उसमे सिर्फ़ मामूली अंतर आया है 0.7 प्रतिशत का.
उन्होंने बीबीसी से बात करते हुए कहा, “इन प्रकोष्ठों ने कई समाजों को कांग्रेस के साथ जोड़ा है जिन तक पार्टी पहले नहीं पहुंचा करती थी. इस लिए मत प्रतिशत में ज़्यादा अंतर देखने को नहीं मिला.”
लेकिन जानकार कहते हैं कि भाजपा को जो मतदान में 6 प्रतिशत से ज़्यादा का लाभ हुआ है वो उन दलों के वोटरों का मत है जो कमलनाथ के रवैये की वजह से भाजपा के साथ चले गए.
राकेश दीक्षित कहते हैं कि कांग्रेस ने अपने ही इंडिया गठबंधन के घटक दलों से भी संपर्क नहीं किया और ना ही प्रदेश के छोटे दलों से. जबकि पिछली बार जय आदिवासी युवा संगठन यानी जयेस से कांग्रेस का गठबंधन था और उसका लाभ भी उसे मिला था.
कई ऐसी सीटें हैं जहां जयेस या समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी ने कांग्रेस के उम्मीदवारों की जीत को सीधे तौर पर प्रभावित किया है.
(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)