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बीजेपी ने हिमाचल और कर्नाटक की मिली हार के बाद जीत की रणनीति कैसे बनाई?
- Author, ज़ुबैर अहमद
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, जयपुर से
दृश्य 1: रविवार को सुबह नौ बजे जयपुर के मतदान केंद्र में पहले राउंड की गिनती ख़त्म होने वाली थी.
दृश्य 2: विधानसभा चुनाव लड़ने के लिए सत्तारूढ़ कांग्रेस पार्टी ने अपने दफ़्तर में जो वॉर रूम बनाया था वो ख़ाली था, बल्कि पूरे कार्यालय में कोई नहीं था. गेट के बाहर एक दरबान ने कहा कि अंदर कोई नहीं है.
दृश्य 3: उस इमारत से कुछ ही दूर राजस्थान बीजेपी के दफ्तर में जश्न का माहौल था.
दोनों पार्टियों के कार्यालयों के माहौल में ये फ़र्क़ इतना आश्चर्यजनक नहीं था जितना आश्चर्य इस बात पर था कि पहले राउंड में जब नतीजों के रुझान भी साफ़ नहीं समझ में आते हैं, तब भी बीजेपी के सैकड़ों कार्यकर्ताओं ने जश्न मानना क्यों शुरू कर दिया?
उनमें उत्साह था, एनर्जी थी और जीत को वो एक पर्व की तरह मना रहे थे जबकि जीत से उस समय वो बहुत दूर थे.
ज़ाहिर है, पहले राउंड में एक भी सीट पर कोई विजयी घोषित नहीं किया गया था. लेकिन उस समय बीजेपी के दफ़्तर में मौजूद नेताओं और कार्यकर्ताओं ने कहा कि उन्होंने होमवर्क कर रखा है और उनकी पार्टी को 120 सीटें मिलने की उम्मीद है.
वोटों की गिनती के दूसरे राउंड के बाद बीबीसी हिंदी ने बीजेपी के राज्यसभा सांसद घनश्याम तिवारी से बात की और पूछा कि वो और पार्टी कार्यकर्ता पहले-दूसरे राउंड में ही जीत का जश्न क्यों मना रहे हैं तो उनका कहना था, "रुझान ये बता रहे हैं कि भारतीय जनता पार्टी पूर्ण बहुमत के साथ सरकार बनाएगी और कांग्रेस पार्टी 60-65 तक सिमट कर रह जाएगी, मैंने दिल्ली के नेताओं को अपना विश्लेषण लिखकर भी दिया था कि पार्टी को कम-से-कम 118 सीटें मिलेंगी."
बीजेपी दफ्तर में लोगों का आत्मविश्वास और जोश ये दिखा रहा था कि और लोग कुछ भी कहें वो जानते हैं कि जीत उनकी ही होगी.
चुनावी अभियान के दौरान मीडिया और विश्लेषकों ने हमेशा इस बात पर ज़ोर दिया था कि सत्तारूढ़ कांग्रेस और बीजेपी के बीच मुक़ाबला कांटे का है. कुछ लोगों ने तो यहाँ तक कह दिया था कि राजस्थान में 1990 के दशक से चले आ रहे 'रिवाज़' को अशोक गहलोत को ग़लत साबित कर सकते हैं.
कहा जाता है कि राजस्थान में यह एक तरह का रिवाज़ है कि कोई भी पार्टी पिछले तीन दशकों में लगातार दो बार चुनाव नहीं जीती है.
हार के बाद रणनीति में बदलाव?
इसी तरह मध्य प्रदेश में भी कड़े मुक़ाबले की बातें होती रहीं और छत्तीसगढ़ के बारे में तो ये सभी ने मान लिया कि वहां कांग्रेस पार्टी आसानी से जीतने जा रही है.
वोटों की गिनती शुरू होने के एक दिन पहले दिल्ली में बीजेपी के नेता ने कहा कि छत्तीसगढ़ में नतीजा सबको चौंका देने वाला होगा और हुआ भी ऐसा ही.
दरअसल, हाल में हिमाचल प्रदेश और कर्नाटक में चुनाव हारने के बाद से ऐसे संकेत मिले कि आने वाले सभी चुनाव मोदी के नाम पर लड़े जाएँगे और मुख्यमंत्री के उम्मीदवार के नामों की घोषणा चुनाव के दौरान नहीं करेंगे.
बीजेपी सांसद और चुनावी रणनीति के माहिर घनश्याम तिवारी कहते हैं, "नरेंद्र मोदी जी के चेहरे पर हम चुनाव लड़े थे. ऐसा इसलिए किया गया था कि जो दूसरे चेहरे हैं उनकी कमियों का पार्टी के चुनावी अभियान पर असर नहीं पड़े, और ये बात सत्य साबित हुई. हम किसी और का चेहरा आगे करते तो उसकी कमियां बाहर आतीं तो पार्टी को नुक़सान होता."
घनश्याम तिवारी ने कहा कि ये रणनीति राजस्थान के अलावा दूसरे राज्यों में भी अपनाई गई. वो कहते हैं, "ये केवल राजस्थान में नहीं किया बल्कि छत्तीसगढ़ और मध्य प्रदेश में किया और मोदी जी का चेहरा आगे किया. उसी का फ़ायदा हमें मिला."
विश्लेषकों का कहना है कि बीजेपी सिर्फ हार से नहीं सीखती है बल्कि जीत से भी कुछ सीखने की ललक रखती है.
इसका एक उदाहरण देते हुए वरिष्ठ पत्रकार और विश्लेषक त्रिभुवन कहते हैं, "मुझे ऐसा लगता है कि बीजेपी हार-जीत दोनों से सीखती है. राजस्थान में बीजेपी का काम मैंने देखा है. राजस्थान में बीजेपी 1990 में जब पहली बार सत्ता में आई थी 120 सीटों के साथ, बहुत प्रभावी तरीके से सत्ता में आई तो बीजेपी ने इसके बाद अपना एक दल बंगाल भेजा था ये पता लगाने कि आख़िर पश्चिम बंगाल में ऐसी क्या चीज़ है कि वहां कम्युनिस्टी पार्टी लगातार जीत हासिल करती आ रही है. बीजेपी में शुरू से ललक रही है कि नई घटनाओं से कैसे सीखा जाए."
क्या कांग्रेस पार्टी में हार या जीत से सीखने की कोशिश नहीं की जाती, इस पर वरिष्ठ पत्रकार त्रिभुवन कहते हैं, "कांग्रेस ऐसा कोई काम नहीं करती बल्कि कांग्रेस को कई बार पता लगता है कि वो चुनाव हार जाएगी इसके बावजूद कोई बड़ा दांव खेल लेते हैं. कुछ लोग कहते हैं कि जीत के मुंह से हार निकाल लाती है ये पार्टी."
वो कहते हैं कि हिमाचल और कर्नाटक में बीजेपी की जो हार हुई थी उससे उन्होंने इस चुनाव में काफ़ी सीखा है. "उन्होंने अपने संगठन को, अपनी सरकार की योजनाओं को और अपने नेताओं के तौर-तरीके को बदला, उन्होंने किसी मुख्यमंत्री का चेहरा आगे नहीं किया और कहा कि कहा कि फूल ही हमारा चेहरा होगा. राजस्थान में बीजेपी ने समझा कि अशोक गहलोत एक बड़ा नाम है और इनकी कुछ योजनाएँ चल रही हैं तो यहाँ उन्होंने गहलोत बनाम मोदी कर दिया."
संगठन और संघ परिवार की भूमिका
यह समझना महत्वपूर्ण है कि चुनावी नतीजे कई फैक्टरों पर निर्भर करते हैं. बीजेपी की जीत अलग-अलग चुनावों और क्षेत्रों में अलग-अलग कारणों से हो सकती है. विश्लेषक कहते हैं कि इसके अतिरिक्त, उभरती आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक गतिशीलता से प्रभावित होकर, समय के साथ जनभावनाएँ बदल सकती हैं.
दक्षिणपंथी विचारक सुव्रोकमल दत्ता के मुताबिक़, तीन राज्यों में जीत की वजह बेशक मोदी रहे हैं लेकिन उनके अनुसार बीजेपी ने एक मज़बूत संगठनात्मक संरचना और ज़मीनी स्तर पर अपनी मौजूदगी और मज़बूत की है.
चुनाव के दौरान मतदाताओं को एकजुट करने में पार्टी मशीनरी और आरएसएस पूरी तरह से एकजुट हुई. वो कहते हैं, "पांच राज्यों में हुए चुनाव को 2024 के आम चुनाव के सेमीफाइनल की तरह से पेश किया जा रहा था इसीलिए बीजेपी ने ज़मीनी सतह पर संगठन को और भी मज़बूत किया. ख़ास तौर से संघ परिवार की सारी इकाइयां लामबंद थीं और सारे कार्यकर्ता जनता को दरवाज़े से बाहर वोट देने के लिए निकालने में जुटे थे. ज़मीनी स्तर पर संघ और बीजेपी का जो बूथ मैनेजमेंट रहा है उसका मुक़ाबला कांग्रेस तीनों राज्यों में नहीं कर सकी."
रविवार को पार्टी कार्यालय में तीन महिला कार्यकर्ताओं ने इस बात की पुष्टि की कि ज़मीनी सतह पर वो इस बार और भी संगठित थे. इन महिलाओं में से एक ने कहा, "हम बीजेपी कार्यकर्ताओं की ज़मीनी रिपोर्ट को पार्टी सीरियसली लेती है. इसके अलावा आरएसएस और संघ परिवार की अन्य इकाइयां सब मिलकर घर-घर दस्तक देते हैं. हमें तब पता लगता है कि मोदी जी का आम लोगों में कितना क्रेज़ है".
दूसरी महिला ने "हर-हर मोदी घर-घर मोदी" के नारे के साथ अपनी बात शुरू की और कहा कि महिलाओं ने 25 नवंबर को घर-घर जाकर मतदाताओं को मतदान केंद्रों तक ले जाने पूरी कोशिश की थी, जिसका परिणाम हमें मिला."
दत्ता का कहना था कि पार्टी की तरफ़ से "डबल इंजन सरकार" (केंद्र और राज्यों में एक ही पार्टी की सरकार) पर ज़ोर दिया जाता है जिसे अब जनता ने स्वीकार किया है. कांग्रेस की गारंटी झूठी गारंटी होती है जिसे इन राज्यों में जनता समझ गई.
महिला वोटरों पर फ़ोकस
बीजेपी के कई नेताओं ने इस बार के चुनावों में पार्टी की महिला वोटर की तरफ़ अधिक ज़ोर देने की बदलती नीति की बात की.
संघ परिवार के क़रीबी सुव्रोकमल दत्ता भी इसकी पुष्टि करते हैं, वो कहते हैं, "तीनों राज्यों में महिला वोटरों पर ध्यान महत्वपूर्ण वजह रही है जीत का. राजस्थान और छत्तीसगढ़ में औरतों के ख़िलाफ़ बलात्कार समेत इतनी सारी घटनाएँ हुई हैं उसकी वजह से महिलाएँ बहुत बड़ी संख्या में वोट देने आईं. इनके अंदर एक आक्रोश था कांग्रेस की सरकारों को लेकर और वो किसी भी हाल में इन सरकारों को उखाड़ कर फेकना चाहती थीं."
इसके अलावा, दत्ता के अनुसार, मध्य प्रदेश में लाड़ली बहना का नारा दिया और महिलाओं के लिए शिवराज सिंह चौहान की सरकार में जो योजनाएँ चल रही थीं तो इस राज्य की महिलाओं को लगा कि अपने भाई को जिताना है.
जयपुर के बीजेपी कार्यालय में हज़ारों लोग चुनावी जीत का जश्न मनाने आए थे जिनमें महिलाओं की संख्या मर्दों से कम नहीं थी.
कुछ ढोल बाजों पर नाच रही थीं, कुछ हर-हर मोदी और जय श्री राम के नारे लगा रही थीं और कुछ और महिलाएं मीडिया वालों से आज़ादी के साथ बिना झिझक दो टूक बातें कर रही थीं और अपनी-अपनी राय प्रकट कर रही थीं.
बीबीसी हिंदी से कुछ महिलाओं ने कहा कि वो पहले से अधिक "शक्तिशाली" महसूस करती हैं. एक ने कहा, "इस बार हमने महिला वोटरों पर खास तौर से ध्यान दिया. यहाँ राजस्थान में पर्दा सिस्टम है, ग्रामीण इलाक़ों में महिला सर्वे करने वाले लोग या आप जैसे पत्रकारों के सामने नहीं आती हैं. उनकी राय आप जान नहीं पाते उनके पास हम गए और उन्हें मोदी की उपलब्धियाँ बताईं. कांग्रेस वहां तक पहुंची भी नहीं. उनका वोट हमें पड़ा".
'राहुल के बयानों से बीजेपी को फ़ायदा'
बिहार के बाद दूसरे राज्यों में जाति जनगणना कराने के वादे ने बीजेपी को फायदा कराया और कांग्रेस को नुकसान?
सुव्रोकमल दत्ता का दावा करते हैं कि "राहुल गाँधी ने कास्ट (जाति) की राजनीति करके एक बड़ी मूर्खता की है जिसका ख़ामियाज़ा उनकी पार्टी को भुगतना पड़ा. लोगों ने इसे जातियों में बटवारे की राजनीति कहकर इसे अस्वीकार किया".
लेकिन इस बात से बीजेपी और कांग्रेस दोनों इनकार नहीं कर सकतीं कि वो टिकटों का बँटवारा उम्मीदवारों की जाति देखकर करती हैं. यहाँ कई पत्रकारों ने कहा कि टिकट दिए गए कैंडिडेट की जाति को देख कर लेकिन बीजेपी ने 'कास्ट सेन्सस' पर कांग्रेस का कोई जवाब नहीं दिया जो इसकी रणनीति का एक हिस्सा था.
कांग्रेस पार्टी के दफ़्तर में शाम तक भी कोई नहीं आया जबकि सूरज ढलते बीजेपी के कार्ययालय में लोग इतने जमा हो गए थे कि तिल धरने को जगह नहीं थी. सामने की सड़क काफी चौड़ी है जहाँ धीरे-धीरे न केवल ट्रैफिक बढ़ने लगा बल्कि पुलिस बंदोबस्त भी बढ़ता चला गया.
ये पावर शिफ्ट आप महसूस कर सकते थे जो हिमाचल और कर्नाटक में हार के बावजूद बीजेपी ने रणनीति में बदलाव करके हासिल की है.
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