एमपी, राजस्थान, छत्तीसगढ़ और तेलंगाना के चुनावी नतीजे का असर 2024 के आम चुनाव पर क्या होगा?

देश के पाँच राज्यों में हुए विधानसभा चुनावों में से चार राज्यों के नतीजे रविवार को आने शुरू हो गए हैं.

अगले साल होने वाले लोकसभा चुनावों के लिए इन राज्यों के परिणामों को एक तरह से सेमीफ़ाइनल के तौर पर देखा जा रहा है.

रविवार को मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, राजस्थान जैसे हिंदी भाषी राज्यों और दक्षिण भारत के तेलंगाना राज्य के चुनावी नतीजे आ रहे हैं. वहीं मिज़ोरम के चुनाव परिणामों को एक दिन के लिए आगे बढ़ा दिया गया है. मिज़ोरम विधानसभा चुनाव के नतीजे 4 नवंबर को आएंगे.

मध्य प्रदेश में 230 सीटों, राजस्थान में 199 सीटों, छत्तीसगढ़ की 90 सीटों पर कांग्रेस और बीजेपी के बीच सीधा मुक़ाबला है.

वहीं तेलंगाना की 119 सीटों पर बीआरएस और कांग्रेस के बीच सीधी टक्कर है.

अगर एग्ज़िट पोल की बात करें तो राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ को लेकर अलग-अलग एग्ज़िट पोल का अलग-अलग दावा है.

वहीं तेलंगाना को लेकर किए गए एग्ज़िट पोल में बीआरएस को कांग्रेस कड़ी टक्कर देती दिख रही है.

सेमीफ़ाइनल क्यों है ये चुनाव?

इन पाँच राज्यों के परिणामों को सेमीफ़ाइनल इस वजह से भी कहा जा रहा है क्योंकि अगले ही साल लोकसभा चुनाव हैं और इन राज्यों में अच्छी ख़ासी लोकसभा सीटें हैं.

मध्य प्रदेश में लोकसभा की 29 सीटें, राजस्थान में 25 सीटें, छत्तीसगढ़ में 11 सीटें, तेलंगाना में 17 सीटें और मिज़ोरम में सिर्फ़ एक सीट है. इन सीटों को जोड़ दिया जाए तो इनका योग 83 हो जाता है.

इन राज्यों में जिस भी पार्टी की सरकार बनती है तो वो लोकसभा चुनाव की सीटों पर जीत को लेकर भी आश्वस्त रहेगी.

हालांकि, इन राज्यों के विधानसभा और लोकसभा चुनावों के पैटर्न देखें तो वो भी हमेशा बदले-बदले रहे हैं. साल 2003 से लोकसभा और अधिकतम पांच विधानसभा चुनाव आगे पीछे होते रहे हैं.

इनमें छह महीने से भी कम समय का वक़्त रहता है. वही स्थिति इस समय भी है.

मध्य प्रदेश का क्या रहा हाल

साल 1998 में कांग्रेस ने जहां राज्य में जीत हासिल की थी वहीं अगले साल लोकसभा चुनाव में बीजेपी ने अधिकतर सीटें जीती थीं.

मध्य प्रदेश में 2003-04 में बीजेपी ने विधानसभा और लोकसभा चुनाव दोनों में जीत हासिल की थी.

2008 में बीजेपी ने विधानसभा चुनाव जीता था और 2009 के लोकसभा चुनाव में भी उसने 16 सीटें जीती थीं.

साल 2013 में बीजेपी ने विधानसभा चुनाव जीता तो वहीं 2014 में भी बीजेपी ने और भी बड़े अंतर से लोकसभा की सीटें जीती थीं. तब 29 में से 27 सीटें बीजेपी ने जीती थीं जबकि कांग्रेस ने सिर्फ़ 2 सीटें जीती थीं.

2018 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस और बीजेपी के बीच कड़ी टक्कर रही. हालांकि, कमलनाथ सरकार बनाने में कामयाब रहे लेकिन लोकसभा चुनाव में कांग्रेस सिर्फ़ एक सीट पर सिमट गई.

2019 में कांग्रेस और बीजेपी के बीच वोट शेयर का अंतर तक़रीबन 25 फ़ीसदी तक था.

पिछले विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने 114 सीटें तो बीजेपी ने 109 सीटें जीती थीं. कांग्रेस की सरकार सिर्फ़ 20 महीने ही चल सकी और ज्योतिरादित्य सिंधिया के समर्थक विधायकों ने बीजेपी का दामन थाम लिया था.

राजस्थान के अलग रहे परिणाम

अगर राजस्थान की बात करें तो साल 1998 में राजस्थान विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने भारी जीत दर्ज की और अशोक गहलोत मुख्यमंत्री बने.

लेकिन एक साल से कम समय के अंदर ही लोकसभा चुनावों में अधिकतर सीटें बीजेपी ने जीतीं.

2003 से लेकर 2014 तक यह परिणाम बदल गए. जो पार्टी विधानसभा चुनाव जीतती थी वो लोकसभा चुनावों में और भी बड़े अंतर से चुनाव जीतती.

हालांकि, साल 2018 में ये पैटर्न बदला क्योंकि उस साल कांग्रेस ने विधानसभा चुनाव जीता लेकिन 2019 में बीजेपी ने 25 में से 24 सीटें जीती थीं जबकि एक सीट आरएलपी ने जीती थी.

राजस्थान में कांग्रेस ने पिछला विधानसभा चुनाव जीता ज़रूर लेकिन दोनों पार्टियों के बीच वोट शेयर का अंतर सिर्फ़ 0.5 फ़ीसदी ही था. कांग्रेस ने 2018 में 200 में से 100 सीटें जबकि बीजेपी ने 73 सीटें जीती थीं.

छत्तीसगढ़ और तेलंगाना का हाल

साल 2000 में छत्तीसगढ़ का गठन हुआ था. 2003 के बाद से विधानसभा और लोकसभा में हमेशा बीजेपी का दबदबा रहा है.

राज्य के गठन के बाद से कांग्रेस ने यहां की 11 में से सिर्फ़ एक या दो सीटें ही जीती हैं.

छत्तीसगढ़ में कांग्रेस ने पिछले चुनावों में 90 में से 68 सीटें जीती थीं.

2019 के लोकसभा चुनाव में छत्तीसगढ़ में कांग्रेस और बीजेपी के बीच वोटों का अंतर 10 फ़ीसदी से भी कम था. हालांकि विधानसभा चुनावों में बीजेपी का वोट शेयर साल 2013 से लगातार कम हो रहा है.

2013 में बीजेपी का वोट शेयर जहां 41 फ़ीसदी था वो 2018 में 32 फ़ीसदी रह गया.

साल 2013 में गठन के बाद से तेलंगाना में अब तक दो विधानसभा और दो लोकसभा चुनाव हुए हैं.

विधानसभा चुनावों में जहां बीआरएस (पहले टीआरएस) ने भारी जीत दर्ज की. वहीं लोकसभा चुनावों में मिले-जुले परिणाम रहे.

वहीं मिज़ोरम में बीजेपी की सहयोगी पार्टी मिज़ो नेशनल फ़्रंट (एमएनएफ़) और कांग्रेस के बीच सीधी टक्कर है. वहीं ज़ोराम पीपल्स मूवमेंट मुख्य विपक्षी दल है.

साल 1998 से 2008 तक मिज़ोरम में एमएनएफ़ की सरकार रही है और 1999 से लेकर 2004 तक एनएनएफ़ समर्थित उम्मीदवार ही लोकसभा चुनाव जीतता रहा है.

2008 से 2018 तक कांग्रेस की सरकार मिज़ोरम में रही तो हर बार लोकसभा में मिज़ोरम सीट से कांग्रेस उम्मीदवार ही चुनाव जीतता रहा. साल 2018 में एमएनएफ़ सत्ता में लौटी तो 2019 के लोकसभा चुनाव में उसी के उम्मीदवार ने जीत दर्ज की.

भारी चुनाव प्रचार और वादे

पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव से पहले इसका प्रचार काफ़ी ज़ोर-शोर से हुआ जिसमें पीएम नरेंद्र मोदी से लेकर कांग्रेस नेता राहुल गांधी आगे रहे.

चुनाव प्रचार के दौरान जहां पीएम मोदी अपनी योजनाओं की तारीफ़ करते नज़र आए तो वहीं विपक्षी राज्यों में उसके मुख्यमंत्रियों पर हमलावर रहे.

कांग्रेस नेता राहुल गांधी पांचों राज्यों में उसके स्टार प्रचारक रहे जबकि प्रियंका गांधी वाड्रा भी मध्य प्रदेश से लेकर छत्तीसगढ़ और राजस्थान की चुनावी रैलियों में नज़र आईं.

तेलंगाना में बीआरएस प्रमुख के. चंद्रशेखर राव से लेकर पीएम मोदी, राहुल गांधी और असदुद्दीन ओवैसी चुनाव प्रचार करते नज़र आए.

इस चुनाव प्रचार के दौरान कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने जातिगत जनगणना का मुद्दा ख़ूब जोर-शोर से उठाया. 23 सितंबर को जयपुर में पार्टी कार्यकर्ताओं को संबोधित करते हुए राहुल गांधी ने पीएम मोदी से कहा कि वो जातिगत जनगणना के आंकड़े जारी करें.

वहीं, पीएम मोदी ने 6 नवंबर को एक बड़ा फ़ैसला लेते हुए मुफ़्त अनाज की योजना को अगले पांच साल तक बढ़ाने का फ़ैसला किया.

छत्तीसगढ़ के दुर्ग में एक चुनावी रैली के दौरान उन्होंने इसकी पुष्टि की थी.

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