आसिफ़ अली ज़रदारी ने अपने लिए दोबारा राष्ट्रपति पद को क्यों चुना?

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- Author, आज़म ख़ान
- पदनाम, बीबीसी उर्दू डॉट कॉम, इस्लामाबाद
आसिफ़ अली ज़रदारी को कई बार ज़मानत के लिए तारीख़ देने वाले जज ने शनिवार शाम को राष्ट्रपति पद के लिए हुए चुनाव में उन्हें विजयी घोषित किया.
यह राष्ट्रपति चुनाव में प्रेसाइडिंग ऑफ़िसर और इस्लामाबाद हाई कोर्ट के चीफ़ जस्टिस आमिर फ़ारूक़ थे. उनकी अदालत में आसिफ़ ज़रदारी भी बतौर मुलज़िम पेश होते रहे.
तहरीक-ए-इंसाफ़ के शासनकाल में एक मौक़े पर जब आसिफ़ ज़रदारी के वकील फ़ारूक़ एच नायक ने इस्लामाबाद हाई कोर्ट में ज़मानत के लिए अर्ज़ी दी तो आसिफ़ ज़रदारी ने यह कहकर वह अर्ज़ी वापस ले ली कि उनका झगड़ा 'कहीं और' चल रहा है.
उनका कहना था कि जब वहां मामला हल हो जाएगा तो फिर इधर से भी ज़मानत मिल जाएगी.
अब न केवल आसिफ़ ज़रदारी को ज़मानत मिल चुकी है बल्कि वह एक बार फिर देश के राष्ट्रपति बन चुके हैं. वह सैनिक राष्ट्रपति परवेज़ मुशर्रफ़ को विदा करके पहली बार सन 2008 में इस पद पर आसीन हुए थे.

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अपने राष्ट्रपति काल में उन्होंने जो उल्लेखनीय फ़ैसले किए उनमें असेंबली को भंग करने का अधिकार संसद को वापस करना, अठारहवें संवैधानिक संशोधन के ज़रिए राज्यों की स्वायत्तता बहाल करना और फ़ाटा (फ़ेडरली एडमिनिस्टर्ड ट्राइबल एरियाज़) के सुधार प्रमुख थे.
इसके अलावा उनके फ़ैसलों में सूबा-ए-सरहद को ख़ैबर पख़्तूनख़्वा नाम देना, नेशनल फ़ाइनेंस कमीशन अवार्ड के फ़ॉर्मूले का नए सिरे से निर्धारण, गिलगित बल्तिस्तान को स्वायत्तता देना और बलूचिस्तान को अधिकार देने का पैकेज भी शामिल है.
अब सवाल यह पैदा होता है कि इस बार आसिफ़ ज़रदारी के सामने लक्ष्य क्या हैं और उन्होंने दोबारा इस 'प्रतीकात्मक' समझे जाने वाले संवैधानिक पद को अपने लिए क्यों चुना?
आसिफ़ ज़रदारी का एजेंडा क्या है?

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सलमान फ़ारूक़ी आसिफ़ ज़रदारी के पहले राष्ट्रपति काल में साढ़े चार साल तक उनके सेक्रेटरी जनरल रहे. उन्होंने बीबीसी को बताया कि यह एक नई बात है कि आसिफ़ ज़रदारी इतने बहुमत से दोबारा राष्ट्रपति बन रहे हैं.
उनके मुताबिक आसिफ़ ज़रदारी में जो ख़ास बात है वह यह है कि उनसे हर कोई मिल सकता है और हर एक उनसे कोई भी बात कर सकता है.
सलमान फ़ारूक़ी के मुताबिक आसिफ़ ज़रदारी न केवल देश में बल्कि विदेश में भी राजनयिकों और शासकों को अपना प्रशंसक बनाने का गुर जानते हैं.
उनके मुताबिक चीन के राष्ट्रपति से उनके उस समय से संपर्क हैं जब वह राष्ट्रपति नहीं बने थे. उन संबंधों को उन्होंने पाकिस्तान में पूंजी निवेश के लिए इस्तेमाल किया.
सलमान फ़ारूक़ी के मुताबिक आसिफ़ अली ज़रदारी का यह दौर पहले दौर से कई मामलों में अलग है. पहले दौर में वह ख़ुद प्रधानमंत्री और मंत्रियों का चुनाव करते थे जबकि तीन राज्यों में उनकी अपनी सरकार थी. उन्होंने सभी महत्वपूर्ण अधिकार भी प्रधानमंत्री, न्यायपालिका और राज्यों को प्रदान कर दिए थे. इस बार जब वह राष्ट्रपति पद पर बैठेंगे तो बिलावल भुट्टो के ये शब्द सटीक बैठेंगे कि उनके पास 'ब्रिटेन के सम्राट जैसे अधिकार होंगे.'

सलमान फ़ारूक़ी के मुताबिक समझौते की अपनी क्षमता और नीतियों से शायद वे फूट के शिकार, अपने देश को किसी हद तक एकताबद्ध कर सकें और राजनीतिक दलों को एक प्लेटफ़ॉर्म पर ला दें.
उनके मुताबिक आसिफ़ ज़रदारी राज्यों के हितों का ध्यान रखते हैं. इसी बात पर पीटीआई (पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ़) उनके क़रीब आएगी. वह इस पार्टी को भी साथ लेकर देश में राजनीतिक स्थिरता के ज़रिए आर्थिक स्थिरता की राह बना सकेंगे.
वरिष्ठ पत्रकार नुसरत जावेद ने बीबीसी को बताया कि आसिफ़ ज़रदारी के सामने लक्ष्य तो आर्थिक सुदृढ़ता ही है.
उनके मुताबिक जब वह पहली बार राष्ट्रपति बने तो उनका दूसरे देशों से संपर्क बढ़ा और उन्होंने पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी के दौर में महत्वपूर्ण परियोजनाओं की राह भी बनाई.
नुसरत जावेद का कहना है कि यह आसिफ़ अली ज़रदारी ही थे जिन्होंने सी-पेक जैसे प्रोजेक्ट की बुनियाद रखी और चीन के कई दौरों में इस प्रोजेक्ट की रूपरेखा पर काम किया.
उनके मुताबिक इस बार भी आसिफ़ ज़रदारी का यह लक्ष्य होगा कि सी-पेक प्रोजेक्ट को दोबारा पटरी पर लाया जाए और अधिक से अधिक विदेशी पूंजी निवेश कराया जाए.
क्या पीटीआई से करेंगे समझौता?

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नुसरत जावेद के मुताबिक आसिफ़ ज़रदारी ने ईरान के साथ गैस पाइपलाइन के प्रोजेक्ट का उद्घाटन किया था और अब वह इसकी पूरी कोशिश करेंगे कि यह प्रोजेक्ट पूरा हो जाए.
ध्यान रहे कि हाल के दिनों में ईरान गैस पाइपलाइन पर पाकिस्तान ने लंबे समय के बाद दोबारा काम शुरू किया है. इससे पहले पाकिस्तान के अधिकारी इस प्रोजेक्ट की राह में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर खड़ी की जाने वाली रुकावटों और पाबंदियों को इसमें देरी की वजह बताते थे.
संसदीय मामलों के माहिर आसिफ़ अली ज़रदारी की राजनीति पर गहरी नज़र रखने वाले ज़फ़रुल्लाह ख़ान का कहना है कि आसिफ़ ज़रदारी इस बार समझौते और अर्थव्यवस्था के लिए 'चार्टर' लेकर आए हैं.
उनके मुताबिक आसिफ़ ज़रदारी का यह विज़न है कि इस देश में सही रियायत पाने का हक़दार यहां का किसान है क्योंकि पाकिस्तान एक कृषि प्रधान देश है. 'वह अब कृषि क्षेत्र को राहत देना चाहते हैं क्योंकि यहां से ही मिलों को गिना जाता है.' सी-पेक आसिफ़ ज़रदारी की नज़र में रहेगा.
ज़फ़रुल्लाह ख़ान के मुताबिक आसिफ़ ज़रदारी ने पहले ही सिंध की शैक्षणिक संस्थाओं में युवाओं को चीनी भाषा सीखने पर लगा रखा है.
उनके मुताबिक आसिफ़ ज़रदारी यह कहते हैं कि जिन देशों में लोग बूढ़े हो जाएं वहां अपने युवाओं को ट्रेनिंग देकर नौकरी के लिए भेजें.
उनकी राय में आसिफ़ ज़रदारी सरकार के ख़िलाफ़ कोई साज़िश नहीं करेंगे और उनसे किसी को ख़तरा नहीं होगा.
ज़फ़रुल्लाह ख़ान के मुताबिक, ''राजनीतिक तौर पर राष्ट्रपति भवन का रोल एक निगहबान और मददगार का होगा.''
पीटीआई के साथ समझौते के सवाल पर उनका कहना था कि राजनीति संभावनाओं का नाम है. इससे पहले सीनेट के अध्यक्ष सादिक़ संजरानी को पीपुल्स पार्टी और पीटीआई ने मिलकर चुना था और आगे भी दोनों दलों में समझौते की संभावना है.
क्या आसिफ़ अली ज़रदारी 'सिविल सुप्रीमेसी' के समर्थक हैं

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विश्लेषक और वरिष्ठ पत्रकार सोहैल वड़ैच ने बीबीसी को बताया कि जब से पीपुल्स पार्टी का नेतृत्व आसिफ़ ज़रदारी के पास आया है तो उन्होंने कोशिश की है कि पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी की इस्टैब्लिशमेंट विरोधी राजनीति की छवि को बदला जाए. यही वजह है कि उन्होंने आज तक कोई आंदोलन नहीं किया और अगर इस्टैब्लिशमेंट से कोई मनमुटाव हुआ भी तो उसको तुरंत दूर कर लिया.
सोहैल वड़ैच के मुताबिक, ''उनके नेतृत्व में अब शायद यही रणनीति है कि अब हमें न जेल जाना है और न कोड़े खाने हैं. शायद यही सोच है कि जब मुश्किल वक़्त आता भी है तो वह उससे निपट कर आगे बढ़ जाते हैं.''
उनके मुताबिक जब वह राष्ट्रपति भवन में थे, तो मेमोगेट स्कैंडल आया, लेकिन इस विवाद को भी उन्होंने सैनिक नेतृत्व के साथ मिलकर हल कर लिया.
याद रहे कि पाकिस्तान के इस समय के चीफ़ जस्टिस क़ाज़ी फ़ाइज़ ईसा के नेतृत्व में यह मेमो कमीशन बनाया गया था. जस्टिस क़ाज़ी फ़ाइज़ ईसा उस समय बलूचिस्तान हाई कोर्ट के चीफ़ जस्टिस थे जबकि पाकिस्तान के चीफ़ जस्टिस उस वक़्त इफ़्तिख़ार मोहम्मद चौधरी थे.
जस्टिस क़ाज़ी फ़ाइज़ ईसा ने मेमोगेट घोटाले के अपने फ़ैसले में आसिफ़ अली ज़रदारी को क्लीन चिट दी थी. उन्होंने यह लिखा कि उनका अमेरिकी अधिकारियों को मेमो लिखने के मामले में कोई भूमिका साबित नहीं होती.
इरफ़ान क़ादिर आसिफ़ अली ज़रदारी के पहले राष्ट्रपति कार्यकाल में अटॉर्नी जनरल रहे. उन्होंने बीबीसी को बताया कि आसिफ़ ज़रदारी सुधार के एजेंडे ने में विश्वास रखते हैं. ''वह 'सिविल सुप्रीमेसी' को सुनिश्चित करेंगे.''
उनके मुताबिक भुट्टो रेफ़्रेंस भी आसिफ़ ज़रदारी ने सुप्रीम कोर्ट को भेजा था ताकि ग़लत फ़ैसलों को ख़त्म किया जा सके.
उनकी राय में आने वाले दिनों में अतीत में किए गए सुप्रीम कोर्ट के कई फ़ैसलों पर बतौर राष्ट्रपति आसिफ़़ ज़रदारी पुनर्विचार करेंगे. वह या तो क़ानून में संशोधन का रास्ता चुनेंगे या उन फ़ैसलों को भी रेफ़्रेंस बनाकर अदालतों को ही सुधार के लिए भेज देंगे.
क्या आसिफ़ अली ज़रदारी समझौतावादी हैं?

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इरफ़ान क़ादिर के मुताबिक, ''पिछले कुछ समय में अदालतों ने प्रशासन के काम में बहुत अधिक हस्तक्षेप किया है और ऐसे भी फ़ैसले दिए हैं जिनसे संस्थाएं पंगु होकर रह गई हैं.
उनके मुताबिक ट्रांसफ़र और पोस्टिंग का मुक़दमा भी उन मुक़दमों में से एक है जिनमें जजों ने कार्यपालिका के अधिकारों को छेड़ा है. उनके मुताबिक, ''इस समय न्यायपालिका की यह स्थिति है कि एक जज पूरी सरकार को कटघरे में खड़ा कर देता है. ऐसे में न्यायिक सुधार आसिफ़ ज़रदारी की प्राथमिकता होंगे.''
इरफ़ान क़ादिर के मुताबिक आसिफ़ ज़रदारी देश से राजनीतिक विरोधियों की जवाबदेही और हिसाब-किताब के कल्चर को ख़त्म करेंगे और क़ानूनों के ग़लत इस्तेमाल को रोकेंगे.
उनके मुताबिक आसिफ़ ज़रदारी में बड़ी ख़ूबी यह है कि उनमें राजनीतिक प्रतिद्वंद्वियों के लिए किसी तरह की प्रतिशोध की भावना नहीं है. ''वह ख़ुद ऐसे कल्चर के शिकार रहे हैं और उन्होंने ज़िंदगी के कई क़ीमती साल जेल में गुज़ारे हैं.''
इरफ़ान क़ादिर के मुताबिक आसिफ़ अली ज़रदारी समझौतावादी हैं. ''वह न गठबंधन सरकार के लिए चुनौती बनेंगे और न कोई मुश्किल खड़े करेंगे.''
नुसरत जावेद भी इस राय से सहमत हैं. उनके मुताबिक आसिफ़ ज़रदारी को मालूम है कि वह नवाज़ लीग के वोटों के बिना राष्ट्रपति नहीं बन सकते थे, इस वजह से वह उनके इस एहसान को भूलेंगे नहीं.
नवाज़ लीग से संबंध रखने वाले सीनेटर इरफ़ान सिद्दीक़ी ने तो उम्मीद ज़ाहिर की कि राष्ट्रपति ज़रदारी लोकतांत्रिक परंपराओं को मज़बूत करेंगे और देश को राजनीतिक उथल-पुथल से बचाने के लिए बहुत ही सकारात्मक भूमिका निभाएंगे.
आसिफ़ अली ज़रदारी का रिटायरमेंट मोड

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नुसरत जावेद का कहना है कि आसिफ़ ज़रदारी राष्ट्रपति भवन में जाकर अब रिटायरमेंट मोड पर चले गए हैं. उनकी राय में उनका राष्ट्रपति बनना यह संकेत है कि अब पीपुल्स पार्टी के मामले बिलावल भुट्टो के हाथों में ही रहेंगे.
नुसरत जावेद के मुताबिक यह बात सही है कि आसिफ़ ज़रदारी केवल प्रतीकात्मक राष्ट्रपति नहीं होंगे क्योंकि उनका व्यक्तित्व ऐसा है कि वह अपनी भूमिका अदा करते नज़र आएंगे.
इरफ़ान क़ादिर की राय में राष्ट्रपति पद इतना प्रतीकात्मक नहीं है जितना उसे बताया जा रहा है. उनके मुताबिक इस समय राष्ट्रपति न फ़ज़ल-ए-इलाही की तरह बेबस हैं और न ही सरकारों को घर भेजने वाले इसहाक़ ख़ान की तरह सर्व अधिकार संपन्न. उनके मुताबिक यह पद मध्यमार्ग और एकता का प्रतीक है.
इरफ़ान क़ादिर के मुताबिक राष्ट्रपति को आर्टिकल 48-2 के तहत अभी यह अधिकार है कि वह प्रधानमंत्री की राय मानने को विवश नहीं हैं. उनके मुताबिक अगर किसी समय प्रधानमंत्री बहुमत को देते हैं तो फिर ऐसी स्थिति में राष्ट्रपति की भूमिका बढ़ जाती है.
इरफ़ान क़ादिर के मुताबिक नसीम हसन शाह के एक ग़लत फैसले से यह ग़लत राय बन गई है कि राष्ट्रपति राजनीति नहीं कर सकते हैं.
उनके मुताबिक एक राष्ट्रपति तो बनता ही राजनीतिक प्रक्रिया से है तो वह कैसे अराजनीतिक हो सकता है?

उनकी राय में राष्ट्रपति को सभी जनप्रतिनिधि अपने वोट से चुनते हैं. उनके मुताबिक अब यह राय ग़लत है कि इस राजनीतिक प्रक्रिया के नतीजे में बनने वाला राष्ट्रपति अराजनीतिक मोड पर चला जाएगा.
ज़फ़रुल्लाह ख़ान कहते हैं कि इरफ़ान क़ादिर की हमेशा से यह राय है कि राष्ट्रपति को राजनीतिक तौर पर भी सक्रिय रहना चाहिए. लेकिन उनकी राय में राष्ट्रपति को किसी एक दल की बजाय संघीय शासन का प्रतीक बनकर रहना चाहिए. ज़फ़रुल्लाह ख़ान के मुताबिक पूर्व राष्ट्रपति आरिफ़ अलवी की इसी बात के लिए आलोचना हो रही है कि वह पार्टी की राजनीति से बाहर नहीं निकल सके.
उनके मुताबिक आसिफ़ ज़रदारी समझौता और एकता का एजेंडा तभी सुनिश्चित कर सकेंगे जब वह संघीय भूमिका निभाएंगे. वह इस बात से सहमत हैं कि अब बिलावल भुट्टो को खुलकर खेलने का मौक़ा मिलेगा और अब वह सही अर्थों में पीपुल्स पार्टी का नेतृत्व करेंगे.
पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी ने एक्स (ट्विटर) पर आसिफ़ ज़रदारी के राष्ट्रपति पद संभालने की वजह कुछ इन शब्दों में बताई है, ''ऐसे समय में जब संघ कमज़ोर हो रहा है और हर तरफ़ नफ़रत और फूट की राजनीति को हवा दी जा रही है, इन हालात में राष्ट्रपति आसिफ़ अली ज़रदारी वह अकेले व्यक्तित्व हैं जिनका प्राथमिक उद्देश्य पाकिस्तान की तरक़्क़ी और जनता की ख़ुशहाली है. बतौर राष्ट्रपति वह सभी संघीय इकाइयों को एक करके देश को तरक़्क़ी की नई राहों पर ले जाएंगे.''
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