कैसी है लाहौर की चुनावी फ़िज़ा, कैसा है पीएमएल-एन,पीपीपी और पीटीआई का चुनाव प्रचार

लाहौर में लगे पीएमएन-एल के पोस्टर
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    • Author, शुमाइला जाफरी
    • पदनाम, बीबीसी न्यूज़, लाहौर

लाहौर के दाता दरबार के पीछे मोहीनी रोड नवाज शरीफ और उनकी बेटी मरियम शरीफ के आदमकद पोस्टरों से पटा हुआ है.

तेज आवाज में पाकिस्तान मुस्लिम लीग-एन (पीएमएल-एन) का गाना बज रहा है. पार्टी समर्थक खुशी में नाच रहे हैं.

यह लाहौर में नवाज़ शरीफ की परंपरागत संसदीय सीट है. उनका गढ़ है, जहां से वो एक बार फिर चुनाव मैदान में हैं. वो तीन महीने पहले ही चार साल के स्वनिर्वासन के बाद पाकिस्तान लौटे हैं. आज वो अपने संसदीय क्षेत्र में चुनाव प्रचार करने निकलने वाले हैं. इससे उनके समर्थक बहुत खुश हैं.

पीएमएल-एन नेता राणा मुबाशिर कहते हैं,'' शेर (पीएमएल-एन का चुनाव चिन्ह) आठ फरवरी को पूरे पाकिस्तान में दहाड़ेगा.''

वो दावा करते हैं, ''हमने लोगों की सेवा की है, हमने हमेशा अपने वादों को पूरा किया है. लाहौर के लोग इसे जानते हैं. हमारे पहले के प्रदर्शन के आधार पर लोग हमें वोट देंगे.''

दीदार को बेकररार समर्थक

नवाज़ शरीफ की गाड़ी
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नवाज शरीफ गाड़ियों और पुलिस वैन के एक छोटे से काफिले के साथ आते हैं. वो अपनी बुलेटप्रूफ गाड़ी के अंदर से ही हाथ हिलाकर अपने समर्थकों का अभिवादन करते हैं. वो बाहर नहीं आते हैं. वो किसी से हाथ भी नहीं मिलाते हैं और न ही एक शब्द बोलते हैं.

एक स्थानीय निवासी और पत्रकार उमर असलम ने बीबीसी से कहा कि पीएमएल-एन समर्थक अपने नेता के इतने करीब होने के बाद उनकी एक झलक पाने के हकदार हैं.

वो कहते हैं, ''इस जगह का अच्छा चयन था, संकरी गलियां, जहां भीड़ अधिक दिखाई देगी...लेकिन आज जितनी भीड़ आई, वो बहुत प्रभावशाली नहीं थी. यह नवाज शरीफ का अपना इलाका है. वे यहां काफी समय बाद लौटे हैं. हो सकता है कि लोग उन्हें वोट दें, लेकिन यहां पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ के साथ उनकी लड़ाई कांटे की हैं.''

पीटीआई सरकार की पूर्व स्वास्थ्य मंत्री डॉक्टर यासीम राशिद यहां नवाज शरीफ के सामने कड़ी चुनौती पेश कर रही हैं.

कैंसर को मात देने वाली 73 साल की डॉक्टर राशिद 9 मई 2023 की बाद से जेल में हैं. वो जेल से ही चुनाव लड़ रही हैं. वो लोगों के बीच आकर चुनाव प्रचार नहीं कर पा रही हैं.

एक दुकानदार ने बीबीसी से कहा, ''हम उनसे तंग आ चुके हैं.

हर चुनाव में जब उन्हें हमारे वोट की जरूरत होती है, वो हमारे पास आते हैं. मैं पीएमएल-एन का पुराना समर्थक हूं,लेकिन अब हम उनसे तंग आ चुके हैं. इस बार हम डॉक्टर साहिबा को वोट देंगे.''

कौन चला रहा है पीटीआई का चुनाव प्रचार अभियान

पीटीआई की महिला समर्थक
इमेज कैप्शन, पीटीआई के चुनाव अभियान में उसके महिला समर्थकों को प्रमुख भूमिका है
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वहीं लाहौर के दारोगावाला इलाके में मौहाल जुदा है. एक छोटे से पार्टी दफ्तर में पीटीआई की महिला समर्थक पार्टी की प्रचार सामग्री लेने के लिए आई हुई हैं, जिसे वो घर-घर जाकर बांटेंगी.

तकनीकी आधार पर पीटीआई ने अपना चुनाव निशान खो दिया है. इसके बाद उसके उम्मीदवार अलग-अलग चुनाव निशान पर निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में चुनाव मैदान में हैं. इसके बाद भी उन्हें पार्टी का समर्थन हासिल है.

पीटीआई समर्थित उम्मीदवार वसीम कादीर महिला समर्थकों से छोटी सी बातचीत करते हैं.

वो महिला समर्थकों से कहते हैं, ''हमारे नेता जेल में बंद हैं. हमे परेशान किया जा रहा है, लेकिन जब आप प्रचार करने जाएं और परिवारों से मिलें तो उन्हें बताएं कि उत्पीड़न हमें झुका नहीं पाएगा. उन्हें बताएं कि उनके प्रिय नेता इमरान खान चाहते हैं कि आठ फरवरी को लोग घरों से बाहर आएं और उनके विरोधियों को मतपत्र के जरिए करारा जवाब दें.''

इसके बाद महिला समर्थक उन्हें पिछले दिनों मिले अपने अनुभव और लोगों की प्रतिक्रियाएं उनसे साझा करती हैं और पर्चे, स्टीकर और बिल्ले लेकर वापस लौट जाती हैं.

वसीम कादिर ने बीबीसी से कहा, ''पीटीआई समर्थक उम्मीदवारों को प्रशासन परेशान कर रहा है, इसलिए वो सोशल मीडिया पर और घर-घर जाकर चुनाव प्रचार कर रहे हैं. इसे उनके स्थानीय समर्थक चला रहे हैं.''

वो कहते हैं, ''अगर वो हमें केवल एक दिन ही प्रचार करने की आजादी दे दें, अगर वो केवल एक दिन के लिए ही इमरान खान को बाहर निकाल दें और उन्हें केवल एक रैली को संबोधित करने की इजाजत दे दें, आप देखेंगे कि हर एक सड़क उनके समर्थकों से जाम हो जाएगी, जो हजारों की संख्या में उनका स्वागत करने आएंगे.''

पीटीआई की अधिकांश समर्थक महिलाएं हैं, जो घरों में आसानी से जा सकती हैं. आमतौर पर उनका स्वागत-सत्कार भी अधिक होता है. वो अलग-अलग चुनाव क्षेत्रों में लोगों को यह बता रही हैं कि इमरान खान का उम्मीदवार कौन है.

वसीम कादिर कहते हैं, ''वे हमसे डरते हैं. इसलिए वो धारा-144 और अन्य तरकीबों का इस्तेमाल करते हैं. वे हम पर पाबंदियां लगा सकते हैं, लेकिन वो मतदाताओं के दिलों, दिमाग और हाथों पर पाबंदियां नहीं लगा सकते हैं.''

लेकिन असली बात यह है कि पीटीआई समर्थकों में अपने उम्मीदवार को लेकर अभी भी भ्रम है. चुनाव चिन्ह छीने जाने का असर पीटीआई के चुनाव प्रचार पर पड़ा है.

चुनाव लड़ने लाहौर क्यों पहुंचे हैं बिलावल भुट्टो जरदारी

पीपीपी प्रमुख बिलावल भुट्टो जरदारी लाहौर से चुनाव मैदान में हैं
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लाहौर इमरान खान और नवाज शरीफ का घरेलू मैदान है. लेकिन पंजाब प्रांत की राजधानी लाहौर में एक सीट जीतकर सूबे की राजनीति में जगह बनाने की फिराक में एक और खिलाड़ी भी है.

ये हैं पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी (पीपीपी) के प्रमुख बिलावल भुट्टो जरदारी.

पीपीपी की स्थापना 1967 में लाहौर में ही हुई थी. लेकिन समय बीतने के साथ यहां उसने अपना आधार खो दिया. पीपीपी अभी भी नेशनल पार्टी होने की दावा तो करती है, लेकिन आमतौर पर वो सिंध प्रांत में ही सीमित है.

बिलावल भुट्टो जरदारी ने नेशनल असेंबली के लिए लाहौर से चुनाव लड़ना तय किया है. वो और उनकी बहन आसिफा भुट्टो शहर में प्रचार अभियान चला रहे हैं. बिलावल खुद को एक युवा चेहरे के तौर पर पेश करने की कोशिश कर रहे हैं.

पीपीपी की प्रवक्ता शेहला राजा ने बीबीसी से कहा, ''यह हमारा युवा नेतृत्व ही है जो युवाओं को समझती है और उनका प्रतिनिधित्व करती है. हमारे अध्यक्ष बिलावल भुट्टो जरदारी ही लोगों को एक साथ ला सकते हैं और इमरान खान की वजह से देश को हुए नुकसान की भरपाई कर सकते हैं.''

वो कहती हैं, ''अगर लोग बदलाव चाहते हैं तो निश्चित तौर पर वो पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी को वोट देंगे. बिलावल भुट्टो ही एक ऐसे नेता हैं, जिनके परिवार ने लोकतंत्र के लिए कुर्बानी दी है और वे अभी भी देश के लोगों के लिए खड़े हैं.''

वो कहती हैं, ''आमतौर पर माना जाता है कि हमारी पार्टी का आधार सिंध तक ही सीमित है. लेकिन आज हमारे अध्यक्ष पंजाब से चुनाव लड़ रहे हैं, हमने बलूचिस्तान और खैबर पख्तूनख्वा में भी जोरदार चुनाव प्रचार अभियान चलाया है.''

बिलावल भुट्टो ने सच में सबसे लंबा चुनाव अभियान चलाया है. उनका और पीएमएल-एन का चुनाव अभियान प्रचार के लिए समान अवसर पर चल रही बहस के केंद्र में रहा है. वहीं कई लोगों को लगता है कि पीटीआई को प्रचार की इजाजत नहीं दी गई और यह चुनाव की निगरानी करने वाली संस्था की नाक के नीचे हुआ है.

पीटीआई के लिए क्या सोच रहे हैं वोटर

पीटीआई के नेता और समर्थक
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राजनीतिक विश्वेषक रसूल बख्श रईस का मानना है कि पाटीआई को सिग्नल दे दिया गया है.

वो कहते हैं कि बाकी की पार्टियां जोरदार और रंगारंग चुनाव प्रचार अभियान चला रही है और पीटीआई का पीछा किया जा रहा है, उसका शिकार किया जा रहा है और उसे सताया जा रहा है.

वो कहते हैं, '' वहां अराजकता और भ्रम की स्थिति है. लोग बेपरवाह और उदासीन हैं. जो लोग पीटीआई को वोट देना चाहते हैं, उन्हें भय सता रहा है कि अगर वो वोट डालने के लिए बाहर निकले तो क्या होगा. लोगों को लग रहा है कि उनके वोट की कोई कीमत नहीं है. उनको लग रहा है कि केवल शासकों (सैन्य प्रतिष्ठान) का फैसला ही मायने रखता है.''

रसूल बख्श रईस के मुताबिक इमरान खान के बिना चुनाव की कोई विश्वसनीयता नहीं है. अगर पीटीआई को चुनाव ले हटा दिया जाता है या उसे छोटा कर दिया जाता है तो अगली बनने वाली सरकार की वैधता और पारदर्शिता पर सवाल खड़े होंगे.

वो कहते हैं कि वैसे में अधिक अनिश्चितता और अस्थिरता होगी.

अब जब इमरान खान को कई मामलों में सजा सुनाई जा चुकी है, ऐसे में चुनाव प्रचार से उनके दूर रहने से उनके समर्थकों के मनोबल पर क्या असर पड़ेगा.

इस सवाल पर वो कहते हैं कि अभी यह देखा जाना बाकी है कि पीटीआई को मिटा देने वाले अभियान का क्या नतीजा निकला है, क्या इमरान खान के समर्थकों का उनसे मोहभंग हुआ है या वे इससे एकजुट हुए हैं.

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