पाकिस्तान चुनाव: महिला उम्मीदवारों पर पार्टियों का भरोसा कम, बड़े घरानों का दबदबा

पाकिस्तानी कार्यकर्ता
    • Author, उमरदराज़ नंगियाना
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

पाकिस्तान में अगले कुछ दिनों में आम चुनाव होने जा रहे हैं जिसमें इस साल लगभग छह करोड़ महिलाएं वोट डाल सकती हैं.

पाकिस्तान की राजनीतिक पार्टियों ने इस बार पांच हज़ार से ज़्यादा उम्मीदवारों को चुनावी मैदान में उतारा है.

पार्टियों द्वारा टिकट पाने वाली महिला उम्मीदवारों की संख्या तीन सौ के क़रीब है. इसके अलावा 55 महिलाएं आज़ाद उम्मीदवार हैं.

राज्य की असेंबलियों के लिए 672 महिलाओं के नामांकन पत्र मंज़ूर किए गए हैं.

यानी महिलाओं ने आवेदन भी कम दिए और उनमें से भी राजनीतिक दलों ने पुरुषों के मुक़ाबले काफ़ी कम महिलाओं को जनरल सीटों पर चुनाव लड़ने के लिए टिकट दिए.

यहां सवाल यह है कि क्या राजनीतिक दल मतदाताओं की इतनी बड़ी संख्या को नज़रअंदाज़ कर रहे हैं?

अगर अधिक महिला उम्मीदवार मैदान में हों तो क्या ऐसा हो सकता है कि अधिक महिलाएं वोट डालने के लिए घरों से बाहर निकलें?

कितनी महिलाएं डालती हैं वोट

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पिछले चुनावों के आंकड़ों पर नज़र डालें तो पता चलता है कि आधी से भी कम महिला मतदाता अपने मताधिकार का इस्तेमाल करती हैं.

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सन 2018 में यह अनुपात 46 फीसदी तक गिर गया था.

चुनाव की प्रक्रिया पर नज़र रखने वाली संस्था फ़्री एंड फ़ेयर इलेक्शन नेटवर्क (फ़ाफ़न) के मुताबिक़, इस कम अनुपात की एक बड़ी वजह तमाम महिलाओं के पास राष्ट्रीय पहचान पत्र नहीं होना है जो वोट डालने के लिए ज़रूरी होता है.

‘फ़ाफ़न’ की हालिया रिपोर्ट के मुताबिक, पहचान पत्र बनवाने के लिए भी अधिकतर महिलाओं को घर के मर्दों पर निर्भर रहना पड़ता है.

चुनाव से पहले मर्द उम्मीदवार अपने क्षेत्रों में वोट लेने के लिए जो काम करते हैं, उनमें से एक ख़ास काम पहचान पत्र बनवाने का होता है.

अगर महिला उम्मीदवार मैदान में आएं तो ऐसा मुमकिन है कि वह ख़ुद कोशिश करके उन महिलाओं को पहचान पत्र दिलवाने में मदद कर सकती हैं जो इस महत्वपूर्ण दस्तावेज़ से वंचित रहती हैं और इसके कारण वोट नहीं डाल पातीं.

विशेषज्ञों के अनुसार चुनावी राजनीति में महिलाओं की भागीदारी बढ़ाने में यह एक अहम क़दम हो सकता है.

ऐसे में सवाल यह है कि राजनीतिक दल महिलाओं को जनरल सीटों पर उम्मीदवार के तौर पर सामने क्यों नहीं लाते?

पाकिस्तान के चुनावी क़ानून के मुताबिक़, हर राजनीतिक दल के लिए कम से कम पांच फीसद महिलाओं को टिकट देना अनिवार्य है.

इस पर पाकिस्तान के बड़े राजनीतिक दलों का कहना है कि उन्होंने ये शर्त पूरी कर ली है. अगर आंकड़ों पर नज़र डालें तो यह बात सही भी लगती है.

राजनीतिक परिवारों की कुलीन महिलाएं

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समीना ख़ावर हयात मूल रूप से पाकिस्तान मुस्लिम लीग (क़ायद-ए-आज़म) में पंजाब के पूर्व मुख्यमंत्री परवेज़ इलाही के ग्रुप से जुड़ी हुई हैं.

इसका पिछले साल पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ़ (पीटीआई) में औपचारिक तौर पर विलय हुआ है.

समीना ख़ावर हयात ने पंजाब की राज्य असेंबली की सीट के लिए पीटीआई में आवेदन दिया था. लेकिन उनको टिकट नहीं दिया गया.

इसके बाद समीना ख़ावर ने निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में चुनाव लड़ने का फ़ैसला किया.

समीना ख़ावर हयात ने बीबीसी से कहा कि चुनाव आयोग की ओर से जो कोटा महिला उम्मीदवारों के लिए रखा गया है, वह कम है.

वह कहती हैं, “पांच फीसद में तो उनके (नेताओं के) परिवार की महिलाएं ही आ जाती हैं. हम जैसी महिला कार्यकर्ता कहां जाएं?”

उनकी राय है कि राजनीतिक दलों के शीर्ष नेता पांच फीसदी की शर्त पूरी करने के लिए परिवार और रिश्तेदारों की महिलाओं को टिकट दे देते हैं.

वह कहती हैं, “कुलीन वर्ग से ऐसी महिलाएं आ जाती हैं, जिनको पार्टी भी नहीं जानती.”

बलूचिस्तान के शहर क्वेटा से सना दुर्रानी भी पंजाब की प्रांतीय एसेंबली के लिए पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी का टिकट चाहती थीं.

लेकिन टिकट न मिलने पर अब निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर चुनाव में हिस्सा ले रही हैं.

उन्होंने बीबीसी से कहा, “राजनीतिक दलों में भागदौड़ और काम महिला कार्यकर्ता करती हैं और जब टिकट या सुविधा देने की बात आती है तो राजनीतिक दल किसी नेता की मां, बहन - बेटी या फिर एलीट क्लास की ऐसी महिलाओं को टिकट दे देते हैं जिनको पार्टी भी नहीं जानती.”

वह निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर चुनाव से अलग नहीं हुईं हैं. लेकिन अपनी पार्टी के पुरुष उम्मीदवार को समर्थन देते हुए चुनाव से बाहर निकली हैं.

वह कहती हैं, “मुझे पार्टी के सिद्धांतों का उल्लंघन नहीं करना था. फिर मेरे दल से समर्थन पाए उम्मीदवार के परिवार की महिलाएं मेरे घर आ गईं. और उन्होंने मेरे समर्थन का अनुरोध किया तो मैं उनके पक्ष में बैठने को तैयार हो गई.”

समीना ख़ावर हयात कहती हैं कि अगर उनके दल में टिकट बंटवारा करने वाले लोगों ने यह समझा कि वह महिला हैं और सीट नहीं जीत पाएंगी तो उन्होंने ग़लती की और “मैं इसके बारे में पार्टी नेतृत्व से जवाब मांगूंगी.”

इन महिलाओं ने पार्टी से टिकट नहीं मिलने के बाद निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर चुनाव लड़ने की घोषणा की थी. लेकिन इनमें से अधिकतर ने अपना फ़ैसला बदल लिया है.

क्योंकि उनके दलों ने नोटिफ़िकेशन जारी कर ऐसी सभी उम्मीदवारों को पार्टी के उम्मीदवारों का समर्थन करने को मजबूर कर दिया.

क्या सही में राजनीतिक दलों ने रिश्तेदारों को टिकट दिए?

नवाज शरीफ की बेची मरियम नवाज.

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राजनीतिक दलों की ओर से मैदान में मौजूद उम्मीदवारों की लिस्ट पर नज़र डाली जाए तो पता चलता है कि अधिकतर दलों ने एक बार फिर उन्हीं महिलाओं को टिकट दिए हैं जो पिछले कई चुनावों से उनकी उम्मीदवार रही हैं.

उनमें अधिकतर वैसी महिलाएं हैं जो पारिवारिक प्रभाव की वजह से वोट बैंक रखती हैं. या फिर वह महिलाएं हैं जिन्होंने पार्टी की ओर से लगातार समर्थन मिलने की वजह से एक ख़ास पहचान हासिल कर ली है.

हालांकि, पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी ने एक-दो ऐसी महिला उम्मीदवारों को मैदान में उतारा है जो अल्पसंख्यक समुदाय से संबंध रखती हैं या फिर बड़े परिवार से नहीं हैं.

बड़े दलों में जनरल सीटों पर सबसे कम महिलाओं को टिकट पाकिस्तान मुस्लिम लीग (नवाज़) ने दिए हैं.

दूसरी ओर पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ़ ने सबसे अधिक महिलाओं को टिकट दिए हैं. राष्ट्रीय असेंबली के लिए उनकी ओर से सिर्फ बीस से अधिक महिला उम्मीदवार मैदान में हैं.

लेकिन विशेषज्ञों के अनुसार उसकी एक बड़ी वजह यह भी है कि पीटीआई के बहुत से उम्मीदवारों के नामांकन पत्र रद्द कर दिए गए थे.

इस आशंका के मद्देनज़र उन्होंने अपने कवरिंग उम्मीदवार के तौर पर अपने ही परिवार की महिलाओं से नामांकन पत्र दाख़िल करवाया था जो मंज़ूर कर लिया गया. उनमें भी अधिकतर का संबंध उन परिवारों से है जो राजनीतिक प्रभाव रखते हैं.

तो सवाल यह है कि राजनीतिक दल महिलाओं को टिकट देने में क्यों हिचकिचाते हैं?

“हर पार्टी देखती है कि क्या यहां से यह उम्मीदवार जीत सकता या सकती है”

पाकिस्तान में संसदीय और चुनावी प्रक्रिया पर नज़र रखने वाली पाकिस्तान लेजिस्लेटिव डेवलपमेंट ऐंड ट्रांसपेरेंसी के प्रमुख अहमद बिलाल महबूब कहते हैं कि जनरल सीटों के मामले में अधिकतर राजनीतिक दल पुरुष और महिला दोनों को एक ही नज़र से देखते हैं.

वह कहते हैं, “टिकट देते समय पार्टी यह देखती है कि क्या यह उम्मीदवार सीट जीत सकता या सकती है.”

अहमद बिलाल महबूब की राय में बहुत से ऐसे पुरुषों को भी पार्टियां टिकट नहीं देतीं जो लंबे समय से उनके कार्यकर्ता रह चुके हों.

ऐसे लोगों के पार्टी के प्रति समर्पण के बारे में कोई शक नहीं होता लेकिन पार्टी नेतृत्व मानता है कि वह जनरल सीट जीतने की स्थिति में नहीं होते हैं.

अहमद बिलाल महबूब समझते हैं कि हाल के चुनाव में विशेष तौर पर पीटीआई ने बहुत सी ऐसी महिलाओं को टिकट दिए हैं जो पहली बार जनरल सीट पर इलेक्शन लड़ेंगी.

वह समझते हैं कि अगर वह इस बार कामयाब नहीं भी हो पातीं हैं तो पार्टी के समर्थन की वजह से उनकी एक पहचान बन जाएगी जो आगे चलकर उनकी मदद करेगी.

सवाल यह है कि महिलाएं अब तक उस स्तर पर क्यों नहीं पहुंच पाईं, जहां उन्हें राजनीतिक दल एक मज़बूत उम्मीदवार के तौर पर देखना शुरू कर दें.

क्या महिलाएं खुद फैसला लेती हैं?

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पाकिस्तान लेजिस्लेटिव डेवलपमेंट ऐंड ट्रांसपेरेंसी के प्रमुख अहमद बिलाल महबूब समझते हैं कि महिलाओं को चुनाव लड़ने के लिए सामने न लाने का रुझान अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी ऐसा ही है.

वह कहते हैं कि बहुत कम ऐसे देश हैं जहां पुरुषों के मुक़ाबले में महिलाओं के प्रतिनिधित्व को राजनीति या संसद में बढ़ाया जा सका है.

वह कहते हैं, “दूसरी ओर हमारी अपनी सांस्कृतिक परेशानियां हैं. उदाहरण के लिए महिलाओं की एक बड़ी संख्या ऐसी है जिसके लिए स्वतंत्र रूप से अपने फ़ैसले करना मुमकिन नहीं है. और राजनीति में सक्रिय होने के लिए यह सबसे बुनियादी पहलू है.”

वह कहते हैं, “अगर मैं एक महिला हूं तो मुझे देखना पड़ेगा कि क्या मुझे ख़ुद फ़ैसला लेने की इजाज़त है. क्या मैं अपनी मर्ज़ी से कहीं भी आ जा सकती हूं? क्या मैं अपनी मर्ज़ी से अपने करियर का चुनाव कर सकती हूं? अधिकतर महिलाओं के लिए यह मुमकिन नहीं होता.”

वह कहते हैं कि यही वजह है कि संसद में महिलाओं के प्रतिनिधित्व के लिए विशेष सीटें रखी गई हैं.

“हमने इलेक्शन इतना महंगा कर दिया है”

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क्वेटा से स्वतंत्र उम्मीदवार सना दुर्रानी कहती हैं कि एक महिला के लिए पाकिस्तान में किसी राजनीतिक दल के समर्थन के बिना चुनाव लड़ना बहुत मुश्किल बना दिया गया है.

वह कहती हैं, “हमने चुनाव को इतना महंगा कर दिया है. हमने वोटर बेचने और ख़रीदने शुरू कर दिए हैं. हमने उम्मीदवार ख़रीदने और बेचने शुरू कर दिए हैं, और महिलाओं के लिए तो आर्थिक मुश्किलें और भी अधिक हैं.”

वह समझती हैं कि महिलाओं के लिए आर्थिक तौर पर मज़बूत होना भी मुश्किल हो जाता है और जब वह वोट मांगने के लिए बाहर जाती हैं तो जनता भी महिलाओं की बजाय पुरुषों को अधिक योग्य उम्मीदवार के तौर पर देखती है “क्योंकि हमारा कल्चर ऐसा है.”

लाहौर की समीना ख़ावर हयात समझती हैं कि महिलाओं के बारे में यह आम राय सही नहीं है कि मर्दों के मुक़ाबले में वह अधिक राजनीतिक प्रभाव नहीं बना सकतीं क्योंकि वह ‘थाने कचहरी’ के काम नहीं कर सकतीं.

“एक महिला भी उतना ही प्रभाव रख सकती है, अगर वह चाहे तो. मैं ख़ुद यह ‘थाना कचहरी’ करती रही हूं और अपने लोगों के साथ जाकर थानों में खड़ी होती रही हूं. बस राजनीतिक दलों को चाहिए कि वह महिलाओं पर भरोसा करें.”

अहमद बिलाल महबूब कहते हैं कि चुनाव लड़ने के लिए आर्थिक तौर पर मज़बूत होना जरूरी है और यह भी एक कारक होता है जिसे राजनीतिक दल टिकट बांटते समय ध्यान में रखते हैं.

हालांकि, उनकी राय में इससे भी अधिक ज़रूरी यह है कि महिलाओं के पास स्वतंत्र रूप से फ़ैसला लेने का अधिकार हो.

क्या महिलाओं के लिए पांच फीसद कोटा काफ़ी है?

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अहमद बिलाल महबूब समझते हैं कि पांच फीसद कोटा को बढ़ाया जाना चाहिए.

लेकिन वह कहते हैं कि पाकिस्तान में राजनीतिक दल यह पांच फीसद भी पूरा नहीं करते. और इसकी वजह क़ानून में मौजूद कमी है.

अहमद बिलाल महबूब कहते हैं कि कोई भी दल सौ फीसद सीटों पर उम्मीदवार खड़े नहीं करते. कुछ सीटें ऐसी होती हैं जहां उन्हें मालूम होता है कि वह नहीं जीत सकते क्योंकि उनका वहां कोई समर्थन नहीं होता.

वह कहते हैं, “ऐसी सीटें वह केवल पांच फीसद का कोटा पूरा करने के लिए महिलाओं को दे देते हैं. यहां से महिलाएं हार जाती हैं.”

उनके अनुसार चुनावी क़ानून में यह कमी भी है कि अगर कोई राजनीतिक दल पांच फीसद कोटा महिलाओं को नहीं भी देता है तो उसके ख़िलाफ़ क्या कार्रवाई की जा सकती है, यह क़ानून में नहीं दिया गया है.

वह कहते हैं, “क़ानून में यह है कि अगर कोई राजनीतिक दल आंतरिक चुनाव नहीं करवाता तो उसका चुनाव चिन्ह ले लिया जाएगा तो मेरी राय में पांच फीसद कोटा न देने पर भी कोई सज़ा होनी चाहिए, जैसे कि चुनावी चिन्ह वापस लेना आदि.”

पाकिस्तान लेजिस्लेटिव डेवलपमेंट एंड ट्रांसपेरेंसी के प्रमुख अहमद बिलाल महबूब मानते हैं कि महिला वोटरों को यह देखना चाहिए कि वह उस दल को अधिक वोट दें जो महिलाओं को जनरल सीटों पर अधिक टिकट दे रहा है.

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