चीन के पड़ोस में अमेरिका का कूटनीतिक दांव क्या होगा कामयाब
- दक्षिण पूर्व एशिया के ट्रेडिंग ब्लॉक 'आसियान' पर चीनी प्रभाव.
- आर्थिक और सैन्य ताक़त बढ़ने के साथ चीन ने छोटे देशों को अपने साथ मिलाया.
- अतीत में आसियान देश अमेरिकी नीतियों से नाख़ुश रहे हैं.
- अब जो बाइडन दोबारा इस क्षेत्र में अमेरिका की धाक जमाना चाहते हैं.
- कितनी मुश्किल या आसान होगी अमेरिका की ये कोशिश, पढ़िए इस लेख में -
- Author, जोनाथन हेड
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता

इमेज स्रोत, Getty Images
शी जिनपिंग की आक्रामक विदेश नीति का सबसे अधिक प्रभाव दक्षिण पूर्व एशिया में साफ़ देखा जा सकता है.
लेकिन जैसे-जैसे बीजिंग की ताक़त बढ़ रही है, अमेरिका की बेचैनी भी साफ़ झलक रही है. कई वर्षों की टालमटोल के बाद अब अमेरिका इस क्षेत्र की ओर तवज्जो दे रहा है.
जो बाइडन साल 2017 के बाद दक्षिण पूर्वी एशियाई राष्ट्रों का संगठन यानी आसियान की किसी भी वार्षिक बैठक में हिस्सा लेने वाले पहले अमेरिकी राष्ट्रपति बन रहे हैं.
हालांकि, पिछले साल भी वो आसियान का हिस्सा थे लेकिन वीडियो लिंक के ज़रिए.
आसियान की बैठक में हिस्सा लेने के बाद बाइडन इस क्षेत्र के एक अहम देश, इंडोनेशिया जा रहे हैं. यहां वो चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग से मिलेंगे. इसके बाद दोनों नेता जी-20 के शिखर सम्मेलन में हिस्सा लेंगे.
लेकिन अमेरिका अब पहले से कहीं अधिक विश्वासघाती कूटनीतिक वातावरण में ऑपरेट कर रहा है.
एक ज़माने में आसियान समूह को एशिया-प्रशांत क्षेत्र में कूटनीति के लिए एक अहम स्थान माना जाता था. लेकिन अब दो धड़ों में बंटती जा रही दुनिया में उसका प्रभाव कम हुआ है.
आसियान समूह अपनी छवि शांति और निष्पक्षता वाले गुट की बनाना चाहता है. समूह अपने दस सदस्य देशों में एकराय पर ज़ोर देता है ताकि एक-दूसरे की आलोचना न की जाए और सभी सदस्य समूह से बाहर किसी भी देश से अपनी कूटनीति जारी रख पाएं.
चीन की चाल और आसियान का ढुलमुल रवैया

इमेज स्रोत, Getty Images
आसियान में अपने फ़ैसले को लागू करने की किसी विशेष प्रक्रिया का अभाव इस सोच की ओर इशारा करता है.
ये रवैया तब तक तो सही था जब तक दुनिया में अमेरिका का बोलबाला था. लेकिन साल 2000 के बाद वैश्विक बाज़ार में चीन की बढ़ती धाक से इस क्षेत्र में अमेरिकी प्रभाव घटा है क्योंकि उसका अधिक ध्यान मध्य-पूर्व एशिया की तरफ़ रहा है.
इस दौरान चीन इस क्षेत्र में अपने पूर्व नेता डेंग शियाओपिंग के मंत्र ‘अपनी ताक़त छिपाओ, वक़्त काटते रहो’ पर काम करता रहा है. लेकिन शी के कार्यकाल के दस वर्षों में चीन की ताक़त और प्रभाव किसी से छिपा नहीं है.
बीते एक दशक में दक्षिण-पूर्वी एशिया में कृत्रिम द्वीपों पर चीन का कब्ज़ा और वहां सैन्य अड्डे बनाने की कवायद ने इसे विएतनाम और फिलीपींस के सामने ला खड़ा किया है.
आसियान ने चीन से इस क्षेत्र में नियम-क़ायदों का पालन करने की गुज़ारिश की थी लेकिन उसकी तमाम कोशिशें विफल होती नज़र आ रही हैं. बीते बीस वर्षों से चीन ने इस बारे में कोई वार्ताएं नहीं की हैं. चीन तो साल 2016 में दिए इंटरनेशनल कोर्ट के फ़ैसले को भी कोई अहमियत नहीं देता. चीन उस फ़ैसले को अवैध करार देता रहा है.
इसके अलावा इस क्षेत्र की सबसे बड़ी मेकोंग नदी पर चीन के भीतर बड़े-बड़े बांध बनाने पर भी जवाब देने से बचता रहा है.
लेकिन आसियान के सदस्य देशों को दोनों ताक़तों के बीच संतुलन बनाना पड़ रहा है. इसके क्या कारण हैं?
चीन की आर्थिक और सैन्य ताक़त

इमेज स्रोत, Ezra Acayan/Getty Images
चीन आर्थिक रूप से उनके लिए काफ़ी अहम है और सैन्य रूप से भी इतना ताक़तवर है कि कोई इसे खुलेआम चुनौती नहीं दे सकता.
43 साल पहले चीन और विएतनाम में युद्ध हुआ था. वहाँ चीन विरोधी भावनाएं बड़ी प्रबल रही हैं. लेकिन विएतनाम की सत्तारूढ़ कम्युनिस्ट पार्टी भी अपने ताक़तवर पड़ोसी से रिश्तों में सावधानी बरतती है.
दोनों देशों के बीच एक लंबी सरहद है. चीन विएतनाम का सबसे बड़ा ट्रेडिंग पार्टनर है.
साथ ही वो चीन की सप्लाई चेन का एक अहम हिस्सा है.
आसियान की एकता पर चोट

इमेज स्रोत, NICHOLAS KAMM/AFP via Getty Images
चीन ने आसियान समूह की एकता की धज्जियां उड़ा दी हैं. उसकी कूटनीति की चालों की वजह से कंबोडिया और लाओस जैसे छोटे आसियान सदस्य अब पूरी तरह से चीन पर निर्भर हैं. ये दोनों देश चीन पर इतने आश्रित हैं कि कुछ विश्लेषक इन्हें चीन की ‘क्लाइंट स्टेट्स’ तक कह देते हैं.
ये साल 2012 में भी साफ़ दिखा था जब आसियान की अध्यक्षता कंबोडिया के पास आई थी. उस सम्मेलन में दक्षिण-पूर्व एशिया में चीन के व्यवहार की आलोचना करने वाले प्रस्ताव को कंबोडिया ने ब्लॉक कर दिया था.
ऐसा लगता है कि ये क्षेत्र अब अमेरिका के साथ रिश्तों को लेकर उदासीन होता जा रहा है.
अब ये देश अमेरिका को भरोसे का पार्टनर नहीं मानते. उन्हें लगता है कि अमेरिका मानवाधिकारों और लोकतंत्र के मुद्दों में उलझा रहता है.
साल 1997 में एशिया में आए वित्तीय संकट के दौरान अमेरिका ने इस क्षेत्र को सख़्त आर्थिक क़दम उठाने के लिए मजबूर किया था. उसके बाद जॉर्ज बुश की ‘आतंक के ख़िलाफ़ जंग’ ने तो दक्षिण-पूर्व एशिया की अमेरिका में रुचि लगभग ख़त्म कर दी थी.
चीन और अमेरिका के बीच किसे चुनें?

इमेज स्रोत, STR/AFP via Getty Images
बराक ओबामा के राष्ट्रपति बनने के बाद इसमें कुछ परिवर्तन दिखा था. ओबामा इस क्षेत्र को एशिया में अमेरिकी की विदेश नीति का केंद्र बनाना चाहते थे. पर उसके बाद राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने एशियाई देशों की व्यापार नीतियों को अनुचित बताया था.
अब अमेरिका का फ़ोकस क्वाड पर है जिसमें जापान, ऑस्ट्रेलिया और भारत भी शामिल हैं. इसकी वजह से अमेरिका की आसियान में दिलचस्पी घटी है.
साथ ही आसियान देशों को भविष्य में चीन और अमेरिका के बीच संघर्ष का भी डर रहता है क्योंकि इसका बड़ा नुक़सान इन देशों को ही होगा.
आसियान के साथ रिश्ते गहरे करने के कई प्रयासों के बाद भी किसी भी अमेरिकी राष्ट्रपति ने कभी भी इस ट्रेडिंग समूह के साथ फ़्री-ट्रेड के समझौते के लिए हामी नहीं भरी है. इस वजह से भी संबंधों में खटास रहती है. दूसरी ओर चीन के साथ संबंधों ने आसियान को जापान, चीन, दक्षिण कोरिया, ऑस्ट्रेलिया और न्यूज़ीलैंड से जोड़ दिया है.
यहां तक कि चीन के साथ रिश्तों में हमेशा सावधानी बरतने वाले इंडोनेशिया ने भी राष्ट्रपति जोको विडोडो के कार्यकाल में चीन के साथ निवेश, ऋण और टेक्नोलॉजी क्षेत्र में सहयोग के लिए हाथ बढ़ाया है.
अब अमेरिका को इस बात से संतुष्ट होना पड़ेगा कि आसियान के सदस्य दूसरी ताक़तों के साथ ही संबंध मज़बूत करेंगे.
लेकिन ये भी साफ़ है कि चीन को कभी भी इस क्षेत्र में भरोसे के सैन्य सहयोगी नहीं मिलेंगे, ख़ासकर जैसे कि अमेरिका को जापान और ऑस्ट्रेलिया के रूप में मिले हैं.
अब लगभग सभी आसियान देश ये मानते हैं कि चीन इस क्षेत्र की प्रभावशाली ताक़त है और जहां भी चीन का हित होगा वो एक क़दम भी पीछे नहीं हटेगा.
जो बाइडन के लिए बस एक ही प्रश्न है - क्या चीन के पड़ोस में गठबंधन के लिए अब देर हो गई है?
(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)















