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अजित पवार के बाद कौन संभालेगा उनकी पार्टी, क्या नाज़ुक वक़्त में एक हो जाएगी पवार फ़ैमिली?
- Author, रौनक भैड़ा
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
महाराष्ट्र के उप मुख्यमंत्री और नेशनलिस्ट कांग्रेस पार्टी (एनसीपी) के नेता अजित पवार की विमान हादसे में मौत हो गई है. 66 वर्षीय अजित पवार के जाने से राज्य की राजनीति में एक बड़ी जगह खाली हो गई है.
उनकी पार्टी राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (एनसीपी) के भविष्य को लेकर भी अटकलें लगाई जा रही हैं. साल 2024 के विधानसभा चुनाव में एनसीपी ने 41 सीटों पर जीत हासिल की थी.
साल 2023 में दो गुटों में बंटी एनसीपी के एक धड़े का नेतृत्व अजित पवार कर रहे थे, जबकि दूसरे धड़े (एनसीपी- शरदचंद्र पवार) की कमान शरद पवार और उनकी बेटी सुप्रिया सुले के हाथ में है.
अजित पवार रिश्ते में शरद पवार के भतीजे लगते हैं, लेकिन राजनीतिक दूरियां इतनी बढ़ गई थीं कि पार्टी में टूट हो गई. पार्टी और उसका सिंबल अजित पवार के हिस्से गया, जबकि शरद पवार ने नया राजनीतिक दल बनाया.
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अब सवाल यह उठता है कि अजित पवार के बाद सूबे के तीसरे सबसे बड़े दल की कमान किसके पास होगी, डिप्टी सीएम कौन होगा?
अजित पवार के परिवार से कई लोग राजनीति में हैं, ऐसे में उनका नाम दावेदारों में शामिल होना स्वाभाविक है. परिवार से बाहर भी कुछ नाम हैं, जो पार्टी को आगे बढ़ा सकते हैं. इसके अलावा, क्या यह संभावना भी बन सकती है कि एनसीपी के दोनों गुट 'एकजुट' हो जाएं?
परिवार में कौन-कौन दावेदार?
यूं तो पवार परिवार के कई लोग राजनीति में सक्रिय हैं, लेकिन अजित के सबसे क़रीबियों में उनकी पत्नी और दो बेटे हैं.
लोकमत (नागपुर संस्करण) के संपादक श्रीमंत माने कहते हैं, "परिवार के बाहर से एनसीपी का चलना मुश्किल है. दल का प्रमुख चेहरा अजित पवार थे और इस दल को पवार फ़ैमिली से जुड़ा कोई सदस्य ही चला सकता है."
यदि अजित पवार का गुट शरद पवार के साथ नहीं जाता, एनडीए के साथ ही रहता था और परिवार में किसी को कमान सौंपी जाए तो ये तीन दावेदार हैं:
सुनेत्रा पवार
अजित पवार की पत्नी सुनेत्रा फ़िलहाल राज्यसभा सांसद हैं. वह अजित पवार की सियासी विरासत को बढ़ाने के लिए सबसे प्रमुख चेहरा मानी जा रही हैं. साल 2024 के लोकसभा चुनाव में सुनेत्रा ने अपनी ननद और अजित की बहन सुप्रिया सुले के खिलाफ़ चुनाव लड़ा था. इस मुक़ाबले में सुनेत्रा पवार 1.58 लाख वोटों से हार गईं.
बीबीसी मराठी के मुताबिक़, सुनेत्रा पवार धाराशिव ज़िले की रहने वाली हैं. वह एनसीपी के वरिष्ठ नेता पद्मसिंह पाटिल की बहन हैं. सुनेत्रा पवार ने बताया था कि उनके पिता एक स्वतंत्रता सेनानी और गांव के पाटिल थे. यहीं से उनका राजनीति और सामाजिक कार्य के प्रति रुझान हुआ.
रिपोर्ट के अनुसार, पाटिल और शरद पवार की मित्रता की वजह से ही सुनेत्रा और अजित का विवाह हुआ.
1980 में सुनेत्रा शादी करके बारामती आ गईं. इसके बाद ही उन्होंने सामाजिक काम शुरू किए. एक बार महाबलेश्वर की यात्रा के दौरान उन्होंने संत गाडगे बाबा को 'ग्राम स्वच्छता अभियान' चलाते देखा.
यहीं से प्रेरणा लेकर काटेवाडी परियोजना की शुरुआत हुई. उन्होंने राज्य के 86 गांवों में निर्मल ग्राम अभियान का नेतृत्व किया.
बारामती में महिलाओं को रोजगार देने के लिए एक टेक्सटाइल पार्क शुरू किया गया. इस पार्क में लगभग 15 हजार महिलाएं काम करती हैं. सुनेत्रा पवार साल 2006 से इस पार्क की अध्यक्ष हैं.
पार्थ पवार
अजित पवार के बड़े बेटे पार्थ को भी उनकी विरासत के उत्तराधिकारी के तौर पर देखा जा रहा है. पार्थ एचआर कॉलेज ऑफ कॉमर्स से बी.कॉम में ग्रेजुएट हैं.
पार्थ ने साल 2019 में मावल सीट से लोकसभा का चुनाव लड़ा, लेकिन वे हार गए थे. तब यह चर्चा बड़ी आम थी कि पार्थ को चुनाव लड़ाने के मुद्दे पर पवार परिवार में मतभेद था.
अंग्रेज़ी पत्रिका 'द वीक' की रिपोर्ट बताती है, "चुनाव हारने के बाद पार्थ सार्वजनिक मंचों पर कम ही दिखाई दिए, उन्होंने ख़ुद को लो प्रोफाइल बनाए रखा है. हाल ही में उनका नाम पुणे भूमि घोटाला मामले में सामने आया था."
"यदि अजित पवार का गुट शरद पवार से अलग रहता है तो सुनेत्रा या पार्थ में से कोई एक कमान संभाल सकता है. हालांकि, एनसीपी के लिए यह चुनौतीपूर्ण समय है क्योंकि अजित पवार जैसी राजनीतिक सूझबूझ का पार्टी में अभाव है."
वरिष्ठ पत्रकार राही भिड़े मानती हैं कि यदि परिवार में से किसी को चुनना हो तो पार्थ सबसे मज़बूत दावेदार हैं.
उन्होंने कहा, "सुनेत्रा पवार भी पार्थ को ही आगे करेंगी. वे इससे पहले भी इस बात के पक्ष में रहीं हैं कि पार्थ को राजनीति में आगे बढ़ना चाहिए."
जय पवार
अजित पवार के छोटे बेटे जय सियासत से दूर हैं. जब सुनेत्रा पवार चुनावी मैदान में थीं, तब जय अपनी मां का प्रचार करते ज़रूर नज़र आए थे.
'द प्रिंट' की एक रिपोर्ट में बताया गया है कि 2023 में एनसीपी के टूटने तक वे दुबई में परिवार का कारोबार देखते थे. उसके बाद से वे पिता के नेतृत्व में पार्टी के कामों में सक्रिय हो गए हैं.
इसमें कहा गया, "अजित पवार के क़रीबी विद्याधर काटे ने बताया कि वे दादा (अजित) जैसे ही हैं. दादा पर अब ज्यादा जिम्मेदारियां हैं, इसलिए उनका लोगों से मिलना कम हुआ है, लेकिन यह लड़का (जय) ज़मीनी स्तर पर बहुत सक्रिय है. उन्होंने कभी टिकट नहीं मांगा. लेकिन अगर ज़िम्मेदारी उनके कंधों पर आई, तो वे निभा लेंगे."
वरिष्ठ पत्रकार और महाराष्ट्र दिनमान अख़बार के संपादक विजय चोरमारे ने बीबीसी को बताया, "यह बात तो पहले भी उठी थी कि अजित पवार बारामती विधानसभा सीट से चुनाव नहीं लड़ते हैं तो उनके छोटे बेटे जय यहां से दावेदार हो सकते हैं."
"जय भले उपचुनाव होने पर बारामती से एनसीपी के उम्मीदवार हो सकते हैं, लेकिन पार्टी की कमान उनके हाथों में शायद ही जाए. जय के पास राजनीतिक अनुभव नहीं है, उनकी पहचान केवल अजित पवार के बेटे के तौर पर ही है.
परिवार के बाहर किसकी दावेदारी?
मौजूदा हालात में पवार परिवार के बाहर से किसी को कमान मिलने की संभावना भी है. इसमें तीन नाम प्रमुखता से सामने आ रहे हैं. छगन भुजबल, प्रफुल्ल पटेल और सुनील तटकरे.
तीनों ही नेताओं के पास क़ाफी अनुभव है.
वरिष्ठ पत्रकार विजय चोरमारे कहते हैं, "भले सुनील तटकरे राज्य स्तर पर पार्टी को संभालते हों और प्रफुल्ल पटेल राष्ट्रीय स्तर पर, मगर इन दोनों नेताओं का प्रभाव क्षेत्रीय स्तर तक ही सीमित है."
छगन भुजबल के नाम पर उन्होंने कहा, "वे पार्टी में अजित पवार के बाद इकलौते ऐसे नेता हैं, जो पूरे सूबे में जाने जाते हैं. लेकिन मराठा आरक्षण आंदोलन के बाद पार्टी शायद ही उन्हें आगे करे. भुजबल की छवि ओबीसी नेता की है, इस पर संशय है कि बाक़ी जातियों के नेता उन्हें स्वीकार करेंगे."
वरिष्ठ पत्रकार राही भिड़े कहती हैं कि फ़िलहाल पार्टी में ऐसा कोई नेता नहीं है, जो अजित पवार के क़द की बराबरी कर सके. लेकिन सुनील तटकरे राज्य स्तर पर पार्टी को संभाल रहे हैं, वे पर्दे के पीछे से रणनीति बनाने में भी माहिर माने जाते हैं. मुमकिन है कि उन्हें ही मौक़ा दिया जाए.
श्रीमंत माने ने बीबीसी से कहा, "छगन भुजबल को भले पार्टी की कमान न मिले, लेकिन वे एनसीपी की ओर से डिप्टी सीएम के तौर पर सबसे मज़बूत चेहरा हैं. उनके अनुभव के अलावा मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस से उनकी नज़दीकी भी काम आ सकती है."
उन्होंने आगे बताया, "चुनाव जीतने के बाद भुजबल को अजित पवार मंत्रिमंडल में नहीं लेना चाहते थे. लेकिन देवेंद्र फडणवीस के कहने पर ही उन्हें मंत्री पद मिला. फडणवीस का भुजबल के साथ अच्छा तालमेल है."
क्या साथ आ सकते हैं एनसीपी के दोनों गुट?
अजित पवार ने भले अपने चाचा शरद पवार से अलग राजनीतिक राह पकड़ ली. लेकिन गाहे-बगाहे दोनों गुटों की ओर से ऐसे बयान आते रहे हैं, जो साथ आने की संभावना को प्रबल बनाते हैं.
हाल ही में हुए नगर निगम के चुनाव में एनसीपी के दोनों गुटों का प्रदर्शन ख़राब रहा. इसके बाद क़यास और तेज हो गए थे कि राजनीतिक वज़ूद बचाने के लिए दोनों धड़े एक हो सकते हैं.
नतीजों के बाद एनसीपी (अजित पवार गुट) के प्रदेश अध्यक्ष सुनील तटकरे ने अंग्रेज़ी अख़बार इंडियन एक्सप्रेस को दिए इंटरव्यू में कहा था, "एनसीपी विलय को लेकर इतनी उत्सुक नहीं है, लेकिन अगर हालात ऐसे बने तो दोनों पार्टियाँ इस पर बात करेंगी और उसके बाद ही फैसला होगा. लेकिन मैं साफ़ कहना चाहता हूँ कि हम एनडीए का हिस्सा हैं और मुंबई में भी और दिल्ली में भी."
विजय चोरमारे का कहना है कि अजित पवार हमेशा यही चाहते थे कि शरद पवार उनके साथ आ जाएं.
वो कहते हैं, "लेकिन शरद पवार के खेमे में इसको लेकर राय बंटी हुई थी. हालाँकि अब परिस्थिति बदल गई है, यह पवार परिवार के लिए नाज़ुक समय है. मुमकिन है कि सारे गिले-शिकवे भुलाकर दोनों खेमे एक हो जाएं. कुछ दिन का इंतज़ार करने पर तस्वीर साफ़ हो जाएगी."
ऐसी ही राय पत्रकार श्रीमंत माने की है और वो कहते हैं कि नगर निगम के चुनाव में भी दोनों गुटों के कुछ नेताओं का मानना था कि उन्हें साथ आना चाहिए.
श्रीमंत माने के मुताबिक़, "शरद पवार और अजित पवार ने क़रीबियों की सलाह पर ही कुछ इलाक़ों में मिलकर चुनाव लड़ा. इस हादसे के बाद दोनों गुट के नेता आपसी सहमति से एक साथ आ सकते हैं. लेकिन इससे राज्य की राजनीति में डायनिमिक्स बदल जाएंगे. यह देखना होगा कि साथ आने पर एनसीपी एनडीए के साथ रहती है या इंडिया गठबंधन के साथ."
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.