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शरद पवार चुनाव आयोग के फ़ैसले से आई 'आपदा' को अवसर में बदल पाएँगे?
- Author, बीबीसी मराठी
- पदनाम, .
‘शिवसेना किसकी है’ के सवाल के बाद अब ‘एनसीपी किसकी है’ के सवाल का जवाब मिल गया है.
चुनाव आयोग ने मंगलवार को अजित पवार गुट को एनसीपी पार्टी का चुनाव चिह्न घड़ी दे दिया.
छह महीने से अधिक समय तक चली 10 से अधिक सुनवाई के बाद आयोग ने फ़ैसला सुनाया.
इसका असर दोनों ही धड़ों पर क्या होगा इसे समझने से पहले घटनाक्रम पर एक नज़र दौड़ाते हैं, क्योंकि चुनाव आयोग के फ़ैसले में ये घटनाक्रम भी अहम हो गया है.
2 जुलाई 2023 को अजित पवार ने बीजेपी में शामिल होकर उपमुख्यमंत्री पद की शपथ ली. उनके साथ नौ नेताओं ने भी मंत्री पद की शपथ ली.
हालाँकि पिछले साल 30 जून को ही अजित पवार ने चुनाव आयोग को एक पत्र सौंपकर दावा किया था कि उन्हें राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी का अध्यक्ष चुना गया है. एक जुलाई को चुनाव आयोग ने बताया कि उसे यह दावा मिला है.
चुनाव आयोग ने 25 जुलाई 2023 को आधिकारिक तौर पर इस दावे के बारे में शरद पवार गुट को सूचित किया.
इन सबके बीच अजित पवार गुट ने 5 जुलाई को बैठक की. इसमें उन्होंने अजित पवार को पार्टी का राष्ट्रीय अध्यक्ष चुने जाने की घोषणा की.
प्रफ़ुल्ल पटेल को कार्यकारी अध्यक्ष और सुनील तटकरेन को क्षेत्रीय अध्यक्ष चुना गया.
शरद पवार गुट ने इन सभी दावों और चुनाव प्रक्रिया पर ही आपत्ति जताई.
दोनों गुटों ने चुनाव आयोग के सामने अपनी दलीलें दें और आयोग ने मंगलवार को अपना फैसला सुनाया.
आयोग ने किन मुद्दों पर विचार किया?
चुनाव आयोग ने अपना फ़ैसला देते समय तीन मानदंडों को ध्यान में रखा- पार्टी संविधान के लक्ष्य और उद्देश्य, पार्टी संविधान और तीसरा है बहुमत परीक्षण.
दोनों गुटों ने कहा कि पार्टी संविधान के लक्ष्यों और उद्देश्यों का वे पालन कर रहे हैं और उनमें से किसी ने भी दावा नहीं किया है कि दूसरे गुट ने उल्लंघन किया है.
इसलिए, चुनाव आयोग ने कहा कि इस मामले में यह टेस्ट लागू नहीं किया गया था.
दूसरा टेस्ट था, पार्टी का संविधान. इसमें आयोग ने शरद पवार गुट ने नौ मंत्रियों के ख़िलाफ़ की गई निष्कासन की कार्रवाई का ज़िक्र किया है. लेकिन जब किसी पार्टी में टूट होती है, तो दोनों पक्षों की ओर से ऐसे क़दम उठाए जाते हैं जो अक्सर संविधान के अनुरूप नहीं होते.
शरद पवार गुट ने दावा किया था कि अजित पवार को विधायकों ने पार्टी अध्यक्ष चुना है, जो पार्टी संविधान के ख़िलाफ़ है.
अगर इन दो बिंदुओं पर विचार किया जाए तो संविधान की कसौटी इस मामले में लागू नहीं की जा सकती.
चुनाव आयोग ने कहा है कि ऐसा लगता है कि दोनों पक्षों की ओर से संविधान का उल्लंघन किया गया है.
इन दोनों मामलों को अमान्य करने के बाद आयोग ने संख्या बल के परीक्षण के आधार पर अजित पवार के गुट को पार्टी और चुनाव चिह्न दे दिया.
अब ये सब तकनीकी बातें हैं, जिनके आधार पर अजित पवार को पार्टी मिली. अब पार्टी और चिह्न की लड़ाई इन्हीं मुद्दों पर सुप्रीम कोर्ट में लड़ी जाएगी.
विधायकों की अयोग्यता की सुनवाई का मामला विधानसभा अध्यक्ष के सामने है. वहाँ भी इन्हीं क़ानूनी मसलों पर चर्चा होगी.
लेकिन अब अहम बात ये है कि चुनाव के वक़्त जब ये दोनों गुट जनता के सामने जाएँगे, तो क्या होगा?
क्या पार्टी और चुनाव चिह्न मिलने से अजित पवार को फ़ायदा होगा? नए नाम और चिह्न के साथ जनता में जाना शरद पवार के लिए कितना चुनौतीपूर्ण होगा?
क्या यह फ़ैसला शरद पवार के प्रति लोगों में सहानुभूति पैदा करेगा?
आइए जानें कि राजनीतिक विश्लेषक इस पहलू को कैसे देखते हैं.
'दोनों के लिए मौक़ा'
वरिष्ठ राजनीतिक विश्लेषक विजय चोरमारे की राय है कि चुनाव आयोग का यह फ़ैसला अजित पवार और शरद पवार दोनों के लिए एक मौक़ा है.
उन्होंने बीबीसी मराठी से बातचीत में कहा कि अजित पवार के पास अब यह साबित करने का मौक़ा है कि वे महाराष्ट्र के नेता हैं.
उन्होंने कहा, “अजित पवार कार्यकर्ताओं के बीच कितने भी लोकप्रिय थे, उन्हें अब तक एक दल के नेता के रूप में देखा जाता था. अब उनके पास ख़ुद को 'जननेता' साबित करने का मौक़ा है. इसके लिए अब उन्हें अपनी ख़ुद की नींव बनानी होगी और वह भी बीजेपी के साथ रहते हुए.”
विजय चोरमारे ने कहा कि अजित पवार को इसके लिए विधानसभा चुनाव तक इंतज़ार करना होगा.
वे कहते हैं, “विधानसभा चुनाव उनके नेतृत्व का परीक्षण होगा कि वह मौजूदा स्थापित नेताओं के अलावा पार्टी के चिह्न और नाम पर कितने उम्मीदवारों को मैदान में उतार सकते हैं. क्योंकि लोकसभा चुनाव का माहौल अलग होता है, मुद्दे अलग होते हैं.”
वहीं शरद पवार को इस फ़ैसले का अंदाज़ा शुरू से ही था.
चोरमारे याद करते हैं कि पार्टी में विभाजन के बाद उनकी पहली प्रतिक्रिया नए लोगों के पास जाने की थी.
विजय चोरमारे ने कहा, “लेकिन अब उन्हें नए चिह्न और नई पार्टी के साथ लोगों के बीच नए सिरे से जाना होगा. उम्र उनके लिए चुनौती होगी. लेकिन अगर पवार की राजनीति पर नज़र डालें तो अब तक का अनुभव यही है कि जब भी चुनौतियाँ आती हैं, तो वे मज़बूती से खड़े होते हैं. इसलिए, यह देखना महत्वपूर्ण है कि वे आगामी विधानसभा चुनाव तक इस चुनौती का सामना कैसे करते हैं.”
चुनाव आयोग के फ़ैसले को अलग रखें, तो जनता के बीच अभी भी धारणा है कि शिवसेना ठाकरे की है और एनसीपी शरद पवार की.
इसलिए जब विधानसभा चुनाव होंगे, तो दोनों पार्टियों की परीक्षा होगी. इससे स्पष्ट हो जाएगा कि असली शिव सेना कौन है और असली एनसीपी कौन है.
'अजीत पवार के लिए बड़ी राहत'
वरिष्ठ पत्रकार संजय जोग कहते हैं कि चुनाव आयोग का यह फ़ैसला अजित पवार गुट के लिए बड़ी राहत है.
संजय जोग ने कहा, “एक तो यह कि अजित पवार फ़िलहाल बीजेपी के साथ हैं. इसलिए बीजेपी के पास जो नेटवर्क है, उसका फ़ायदा उन्हें आने वाले चुनाव में मिल सकता है. यह एक महागठबंधन है इसलिए दादा ‘वोट ट्रांसफ़र’ का उपयोग कैसे करते हैं यह अहम है.”
संजय जोग का कहना है कि बीजेपी के साथ जाते हुए अजित पवार ने अपना अलग अस्तित्व बनाए रखने की भी कोशिश की है, जिसका उन्हें फ़ायदा मिल सकता है.
उन्होंने कहा, "अजित पवार हमेशा कहते हैं कि हम बीजेपी में नहीं जा रहे हैं. हमने फुले-शाहू-आंबेडकर को नहीं छोड़ा है. पुसेगाँव दंगों के बाद उन्होंने मुस्लिम परिवार से मुलाक़ात की थी और आर्थिक रूप से मदद करने की प्रक्रिया शुरू की. उन्होंने मुस्लिम आरक्षण के लिए बैठकें कीं."
एक तरफ़ बीजेपी और एकनाथ शिंदे का हिंदुत्व है, लेकिन ये स्पष्ट है कि वो अपना अस्तित्व ख़त्म करने नहीं जा रहे.
वे कहते हैं, “अब अजित पवार की बड़ी चुनौती शरद पवार की छत्रछाया से बाहर निकलकर अपना नेतृत्व बढ़ाना है. अब उन्हें अपने नेतृत्व को पश्चिमी महाराष्ट्र तक सीमित न रखते हुए अपना और पार्टी का दायरा बढ़ाना होगा.”
संजय जोग कहते हैं, "शरद पवार की अब तक की राजनीति पर नज़र डालें, तो उन्होंने अपने राजनीतिक जीवन में कई उतार-चढ़ाव देखे हैं. उन्होंने संकट को अवसर में बदलने को साकार किया है. अक्सर वे शून्य से शुरू करते हैं."
शरद पवार को लेकर जोग का मानना है, “इस संघर्ष में भी वे कहते रहे कि ‘मैं नए सिरे से तैयारी करूँगा, मेरी उम्र ज़्यादा नहीं है.’ यह तय है कि वे सौ फ़ीसदी तैयारी के साथ मैदान में उतरेंगे. हालाँकि, चुनौती यह होगी कि लोकसभा चुनाव के लिए कम से कम समय में नई पार्टी का नाम और चुनाव चिह्न लोगों तक कैसे पहुँचाया जाए. अब उन्हें सहानुभूति मिलेगी या नहीं, यह चुनाव के समय पता चलेगा.”
बीजेपी को फ़ायदा
लोकसभा और विधानसभा चुनाव अभी दूर हैं.
वरिष्ठ राजनीतिक पत्रकार विनया देशपांडे कहती हैं, “अब सबसे क़रीबी चुनाव राज्यसभा चुनाव है और अगर इस संदर्भ में देखें, तो इस फ़ैसले का फ़ायदा अब भाजपा को अधिक है.”
उन्होंने कहा कि राष्ट्रवादी पार्टी के बारे में यह कहना उतना आसान नहीं है जितना कि शिव सेना के बारे में कहना कि चुनाव आयोग के इस फ़ैसले से एक ख़ास समूह को सहानुभूति मिलेगी.
उनके मुताबिक़, “शरद पवार को कितना और कैसे फ़ायदा होगा यह इस बात पर निर्भर करता है कि शरद पवार क्या रणनीति अपनाते हैं और उसे कैसे लागू करते हैं.”
विनया देशपांडे कहती हैं कि इस दौरान कई चीजें तय होंगी कि शरद पवार क्या भूमिका निभाते हैं और अजित पवार क्या काउंटर नैरेटिव बनाते हैं.
वे कहती हैं, "तो अब निकटतम चुनाव राज्यसभा का है और यह फ़ैसला इसके गणित पर बहुत असर नहीं रखता है. क्योंकि अगर आप राज्यसभा सीटों पर नज़र डालें, तो उन्हें ज़्यादा फ़ायदा नहीं हुआ. अंकगणित पर ही गौर करें तो दोनों तरफ़ विधायकों की संख्या को देखते हुए चुनाव आयोग के इस फ़ैसले का तात्कालिक फ़ायदा बीजेपी को मिलता दिख सकता है."
कुल मिलाकर अब एनसीपी पार्टी के भीतर सत्ता संघर्ष दो मोर्चों पर लड़ा जाएगा. एक क़ानूनी और दूसरा चुनावी.
भले ही पहला दौर अजित पवार के पक्ष में गया हो, लेकिन अभी लड़ाई बाक़ी है.
महाराष्ट्र की राजनीति में अहम मुद्दा ये होगा कि इन दोनों की लड़ाई से किसे फ़ायदा होगा या तीसरी पार्टी बाज़ी मारेगी.
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