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गुमनाम अरब हीरो जो होलोकॉस्ट के दौरान बने थे यहूदियों की ढाल
- Author, स्वामिनाथन नटराजन
- पदनाम, बीबीसी वर्ल्ड सर्विस
इसराइल के होलोकॉस्ट स्मृति केंद्र ने उन 28,000 से अधिक गैर यहूदी लोगों को सम्मानित किया है जिन्होंने होलोकॉस्ट के दौरान यहूदी लोगों की जान बचाने के लिए अपनी जान की बाज़ी लगा दी.
हालांकि नाज़ी कब्ज़े के दौरान उत्तरी अफ़्रीका के हज़ारों लोग मारे गए लेकिन किसी अरब देश में एक यहूदी व्यक्ति को बचाने के लिए किसी एक अरब को भी इस 'लायक' नहीं समझा गया.
"ट्यूनीशिया में एक अरब बेकर ने उन यहूदियों के लिए अपनी बेकरी के पीछे हर दिन अतिरिक्त खाना छोड़ देने का नियम बनाया था जिनके पास राशन कार्ड नहीं थे."
"अरब महिलाएं यहूदी शिशुओं को अपने घर ले गईं और मां की तरह उनकी देखभाल की क्योंकि न तो उनके लिए खाना उपलब्ध था न दूध."
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"अल्जीयर्स में मौलवियों ने एक फ़तवा जारी किया जिसमें स्थानीय मुस्लिमों को, ज़ब्त यहूदी संपत्तियों को रखने की मनाही की गई थी और मुझे एक भी अरब ऐसा नहीं मिला जिसने इस फ़तवे का उल्लंघन किया हो."
ये कुछ कहानियां हैं जिन्हें अमेरिका में स्थित वॉशिंगटन इंस्टीट्यूट के एग्ज़ीक्युटिव डायरेक्टर डॉ. रॉब सैटलॉफ़ ने द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान यहूदी लोगों की जान बचाने वाले उत्तर अफ़्रीकियों के बारे में इकट्ठा की हैं.
नाज़ियों ने यूरोप में 60 लाख से अधिक यहूदियों की हत्या की और उत्तर अफ़्रीका में यहूदी समुदाय के हज़ारों लोगों का उत्पीड़न किया, जिन्हें फ़्रांसीसी सहयोगी विची सरकार का समर्थन प्राप्त था. इसके परिणामस्वरूप बहुत से लोगों की मौतें हुईं, पलायन पर मजबूर होना पड़ा और अपनी संपत्तियां खोनी पड़ीं, हालांकि ये छोटे पैमाने पर ही हुआ.
सैटलॉफ़ बीबीसी वर्ल्ड सर्विस को बताते हैं, "पूरी तरह सफ़ाए (टोटल एक्टर्मिनेशन) को छोड़ दिया जाए तो अरब देशों में यहूदियों के साथ वही कुछ हुआ जो यूरोप के यहूदियों के साथ घटित हुआ."
यूएस होलोकॉस्ट म्यूज़ियम के अनुसार, मोरोक्को, अल्जीरिया, ट्यूनीशिया और लीबिया में क़रीब पांच लाख यहूदी रहते थे. और सैटलॉफ़ का अनुमान है कि इनमें से 4,000 से 5,000 यहूदियों की जान चली गई.
सबकुछ दांव पर लगा दिया
सैटलॉफ़ कहते हैं कि खास तौर पर तीन अरब ऐसे हैं, जिन्हें इसराइल के होलोकॉस्ट स्मृति केंद्र 'याद वाशेम' में जगह मिलनी चाहिए.
ट्यूनीशिया उत्तर अफ्रीका का एकमात्र देश था जिस पर पूरी तरह नाज़ियों का कब्ज़ा रहा. यहां नवंबर 1942 से मई 1943 के बीच यहूदियों को पीले सितारे पहनने के लिए मजबूर किया गया. जब नाज़ियों ने सभी यहूदी मर्दों को जबरन मज़दूरी के लिए रिपोर्ट करने का आदेश दिया, तो ट्यूनिस में रहने वाले जोसेफ़ नाकाश उनमें से एक थे, जो भागने में सफल रहे.
कई दशक बाद पेरिस में उन्होंने सैटलॉफ़ को बताया कि किस तरह एक अरब व्यक्ति ने अपनी जान को ख़तरे में डालकर उन्हें शरण दी थी.
सैटलॉफ़ कहते हैं, "दिसंबर 1942 में एसएस (नाज़ियों की ख़ुफ़िया पुलिस) ने युवा यहूदी पुरुषों को पकड़ने के लिए बड़े पैमाने पर घेराबंदी और छापेमारी की. अगर आप किसी ऐसे व्यक्ति को छिपाते हुए पकड़े जाते, जिसका नाम एसएस की सूची में होता, तो यह बहुत गंभीर अपराध माना जाता."
"नाकाश इस छापेमारी से बच निकले. वह जर्मनों के हाथ लगने से बचना चाहते थे और भागते हुए अपने इलाक़े के हम्माम यानी सार्वजनिक स्नानागार में पहुंच गए."
हम्माम के मालिक हम्ज़ा अब्दुल जलील ने नाकाश से कहा कि वह उनकी रक्षा करेंगे और उन्हें तहखाने में छिपा देंगे.
सैटलॉफ़ बीबीसी वर्ल्ड सर्विस से कहते हैं, "मैं सिर्फ़ उस व्यक्ति से नहीं मिला जिसे बचाया गया था, बल्कि मैं ट्यूनिस भी गया, हम्माम को देखा और उस व्यक्ति के बेटे से भी मिला जिसने उसे बचाया था. उसे पूरी कहानी पता थी. यह एक शानदार कहानी है और मुझे इसके दोनों पहलुओं से जानकारी मिली."
ट्यूनिस के पूर्व मेयर साई अली सक्कत ने भी सब कुछ दांव पर लगाते हुए यहूदी लेबर कैंप से भागे लोगों के एक समूह को अपने घर में खाना और शरण दी. यह घर राजधानी से करीब 55 किलोमीटर दूर ज़घुआन घाटी में स्थित था.
'बुराई का सामना'
लेकिन सैटलॉफ़ की सबसे पसंदीदा कहानी ख़ालिद अब्दुल-वहाब की है. उन्होंने एक नाज़ी अधिकारी को यह कहते हुए सुना था कि उसकी नज़र एक यहूदी महिला पर है, जिसे ट्यूनीशियाई समाज में वह जानते थे.
रात के बीचों-बीच अब्दुल-वहाब ने उस महिला और उसके परिवार को, जो छिपे हुए थे, बचाया. वह उन्हें ट्यूनिस से क़रीब 30 किलोमीटर दूर अपने खेत पर ले गए और खलिहानों और अस्तबलों में छिपा दिया.
लेकिन यह सिर्फ शुरुआत थी. नाज़ी कब्ज़ा खत्म होने से पहले उन्होंने ऐसी 20 महिलाओं और बच्चों को छिपाया, जिनके परिवारों के पुरुषों को जबरन मज़दूरी के लिए भेज दिया गया था.
बाद में इनमें से तीन लोगों ने याद वाशेम से अब्दुल-वहाब को मान्यता देने की अपील की, लेकिन यह अनुरोध दो बार ख़ारिज़ कर दिया गया.
केंद्र ने कहा कि वह एक 'भले इंसान' थे और गवाहियों में उनकी इंसानियत का ज़िक्र है, लेकिन यहूदियों को अपने यहां ठहराना क़ानूनी था और वे नाज़ी अधिकारियों की पूरी जानकारी में अब्दुल-वहाब के खेत पर रहे.
इसलिए वह गैर-यहूदियों को दिया जाने वाला 'राइटियस अमंग द नेशंस' का ख़िताब पाने के योग्य नहीं माने गए, जिसे कि होलोकॉस्ट के दौरान यहूदियों को नाज़ी विनाश से बचाने के लिए निस्वार्थ रूप से अपनी जान जोखिम में डालने वालों को दिया जाता है.
दिसंबर 2011 में, ईवा वाइज़ेल ने, जिन्हें 13 साल की उम्र में अब्दुल-वहाब ने छिपाया था, न्यूयॉर्क टाइम्स में एक लेख लिखा और इस फैसले पर निराशा जताई.
उन्होंने लिखा, "मुझे पता है कि मैं एक लंबी और पूरी ज़िंदगी जी पाई, क्योंकि अब्दुल-वहाब ने बुराई का सामना किया और मुझे बचाया, जैसे उन्होंने मेरे परिवार के दूसरे खुशकिस्मत लोगों को बचाया. मुझे उम्मीद है कि याद वाशेम उनके मामले पर दोबारा विचार करेगा, इससे पहले कि उनकी कहानी सुनाने वाला कोई न बचे."
'सुविधाजनक' नैरेटिव
अब तक 'राइटियस अमंग द नेशंस' का ख़िताब पाने वाले 28,000 से ज़्यादा लोगों में करीब 70 मुस्लिम हैं, लेकिन उनमें सिर्फ़ एक अरब है.
और वो हैं मिस्र के डॉक्टर मोहम्मद हेल्मी, जिन्होंने बर्लिन में एक युवा यहूदी महिला को छिपाया और उसके परिवार की मदद की.
हालांकि सैटलॉफ़ की कहानियां बेहद प्रभावशाली हैं, लेकिन अमेरिका में मैनहट्टन यूनिवर्सिटी होलोकॉस्ट, जेनोसाइड एंड इंटरफ़ेथ एजुकेशन सेंटर की निदेशक डॉ. मेहनाज़ अफ़रीदी कहती हैं कि ये एक "सुविधाजनक" नैरेटिव के ख़िलाफ़ जाती हैं.
अफ़रीदी बीबीसी वर्ल्ड सर्विस से कहती हैं, "इसराइल में कुछ लोगों के लिए, बचाने वाले अरब लोगों को मान्यता देना, मौजूदा राजनीतिक परिदृष्य को जटिल करने वाला है. अरब जगत में कुछ लोगों के लिए ये स्वीकार करना कि अरब धरती पर यहूदियों को नाज़ियों से बचाए जाने की ज़रूरत पड़ी थी, 'होलोकॉस्ट को नकारने' वाले सिद्धांत को कमज़ोर करता है जो राजनितिक रूप से उपयोगी बन चुका है."
'होलोकॉस्ट'
अफ़रीदी खुद मोरक्को के किंग के योगदान को मान्यता दिए जाने की मांग कर रही हैं.
वह कहती हैं, "नाज़ी समर्थक विची सरकार के दौर में मोरक्को और टैन्जियर को यहूदियों को श्रम शिविरों में रखने के निर्देश दिए गए थे. मोरक्को के किंग मोहम्मद पंचम ने यहूदी विरोधी नस्लीय क़ानून लागू करने या मोरक्को के यहूदियों को फ्रांस भेजने से इनकार कर दिया."
याद वाशेम की वेबसाइट पर उसके इंटरनेशनल स्कूल फ़ॉर होलोकॉस्ट स्टडीज़ से कभी जुड़ी रहीं डॉ. जैकी मेट्ज़गर लिखती हैं, "अगर होलोकॉस्ट का मतलब सामूहिक हत्या है, तो उत्तर अफ़्रीका में होलोकॉस्ट नहीं हुआ. इस दौर में यहूदियों का इतिहास सही तौर पर एक ऐसे आसन्न होलोकॉस्ट के ख़तरे के रूप में देखा जाना चाहिए, जो सफल नहीं हुआ."
लेकिन बीबीसी वर्ल्ड सर्विस को लिखित जवाब में केंद्र ने माना कि "उत्तर अफ़्रीका होलोकॉस्ट का हिस्सा है."
उसने कहा, "नाज़ियों का वहां के यहूदियों के लिए भी वही इरादा था, जैसा यूरोप के यहूदियों के लिए था, और यह अनिवार्य रूप से फ़लस्तीन और मध्य पूर्व के यहूदियों पर भी लागू होता था. अगर उत्तर अफ्रीका को उसी समय आज़ाद कराया गया होता, जब पोलैंड को कराया गया, यानी 1943 की जगह 1945 में, तो वहां के ज़्यादातर यहूदी शायद जीवित नहीं बचते."
केंद्र ने यह भी कहा कि मान्यता के लिए आने वाले हर नामांकन की जांच बिना किसी पक्षपात के एक ही स्तर पर होती है, लेकिन उसकी मूल्यांकन समिति फिलहाल "किसी अरब बचावकर्ता के मामलों पर चर्चा नहीं कर रही", क्योंकि उसे कोई नया आवेदन नहीं मिला है.
फिर भी, अफ़रीदी कहती हैं कि अब्दुल-वहाब जैसी कहानियों को पहचान मिल रही है.
वो कहती हैं, "2009 में वॉशिंगटन के एडास इसराइल गार्डन ऑफ़ द राइटियस और इटली के मिलान में गार्डन ऑफ़ द राइटियस वर्ल्डवाइड में उनके नाम पर एक पेड़ लगाया गया. इस समारोह में उनकी बेटी फ़ाइज़ा भी मौजूद थीं."
सैटलॉफ़ भी सहमत हैं. वो कहते हैं, "मुझे गर्व है कि उत्तरी अमेरिका और यूरोप की कई संस्थाओं और संगठनों ने उन अरबों के साहस और बहादुरी को मान्यता दी है, जिन्होंने उस दौर में यहूदियों की रक्षा के लिए आवाज़ उठाई."
और सैटलॉफ़ को उम्मीद है कि जैसे-जैसे और सबूत सामने आएंगे, भविष्य में आधिकारिक मान्यता के और मौके बन सकते हैं.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.