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कोटा में छात्रों की आत्महत्याएँ: कौन ज़िम्मेदार, माँ-बाप, कोचिंग सेंटर या कुछ और?- ग्राउंड रिपोर्ट
- Author, विनीत खरे
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, कोटा से
जनवरी का महीना था और 21 साल के विजय राज (बदला हुआ नाम) बहुत परेशान थे.
वो दो बार नीट की परीक्षा में नाकाम हो चुके थे और मई में होने वाली परीक्षा में उन्हें एक और असफलता का डर था.
लंबे समय से उनकी परेशानी का विषय था फ़िजिक्स. इसके अलावा कोचिंग इंस्टीट्यूट के इंटरनल टेस्ट में खराब प्रदर्शन ने भी उनके आत्मविश्वास पर असर डाला था.
एक किसान परिवार से आने वाले विजय तनाव, चिंता, छाती में दर्द से परेशान थे. कई बार मुश्किलों से ध्यान हटाने के लिए वो मोबाइल पर रील्स और शॉर्ट्स देखते, जिससे उनका और ज़्यादा वक्त बर्बाद होता. माता-पिता निराश न हो जाएं, इसके लिए कई बार उन्होंने घर में टेस्ट में खराब प्रदर्शन को लेकर झूठ बोला.
कोटा में सालों पढ़ाई कर चुके विजय ने कहा, "मानसिक दबाव की स्थिति में पहली बार मुझे आत्महत्या का विचार आया. मैंने इस बारे में अपने माता-पिता को नहीं बताया. मैं नहीं चाहता था कि वो परेशान हों."
हालात इतने खराब हुए कि एक बार तो आत्महत्या के बेहद करीब आ गए.
उन्होंने कहा, "ऐसा लगा कि मेरे पास कोई विकल्प नहीं हैं. लगा कि मैंने अपने घरवालों का पैसा बर्बाद कर दिया, उनकी इज़्ज़त गिरा दी." नीट में वो तीसरी बार भी नाकाम रहे.
बच्चों का किसी बड़े इंजीनियरिंग या मेडिकल कॉलेज में एडमिशन भारतीय परिवारों के लिए गर्व की बात होती है और नाकामी को नीची नज़र से देखा जाता है.
मदद माँगना भी ज़रूरी है
विजय ने अभिनेत्री दीपिका पादुकोण के डिप्रेशन पर खुलकर बात करने से प्रेरणा ली और सामाजिक सोच को नज़रंदाज़ करते हुए उन्होंने मनोचिकित्सक से संपर्क करने की सोची. आज वो बहुत बेहतर स्थिति में हैं.
लेकिन 18 वर्ष के आदर्श राज इतने भाग्यशाली नहीं थे. वो डॉक्टर बनना चाहते थे. किसानी से जुड़ा उनका परिवार करीब 900 किलोमीटर दूर बिहार में रहता है. आदर्श की मौत के बाद परिवार सदमें में है.
उनके चाचा हरिशंकर प्रसाद सिंह ने बताया कि पिछले कुछ वक्त से कोचिंग टेस्ट में आदर्श के कम नंबर आ रहे थे.
वो कहते हैं, "हमको लगता है कि रिजल्ट में कम नंबर आने के चलते डिप्रेशन में इस तरह का कदम उठाया. उसका ऐसा नेचर नहीं था. लेकिन अच्छे इंसान भी समय पड़ने पर अपने पथ से विचलित हो जाते हैं, लेकिन समस्या का समाधान आत्महत्या नहीं है. क्या जो लोग नीट परीक्षा में बैठते हैं, सभी डॉक्टर बन जाते हैं?"
पुलिस के मुताबिक, कोटा में पिछले 10 सालों में 100 से ज़्यादा छात्र अपनी जान ले चुके हैं. इस साल अभी तक 25 छात्रों की मौत हो चुकी है, जो कि अब तक सबसे ज़्यादा संख्या है. पिछले साल ये आंकड़ा 15 का था.
दबाव कितना बड़ा कारण?
एक विश्लेषण के मुताबिक मरने वालों में ज़्यादातर पुरुष छात्र थे जो नीट की तैयारी कर रहे थे. कई छात्र गरीब और लोअर मिडिल क्लास परिवारों से थे.
एक आंकड़े के मुताबिक कोटा में ज़्यादातर छात्रों की उम्र 15 और 17 के बीच में है. उनके लिए शहर में अकेले रहना, परिवारों की उम्मीदें, हर दिन 13-14 घंटों की पढ़ाई, टॉपर्स के साथ कड़ी प्रतिस्पर्धा के दबाव के साथ रहना आसान नहीं.
आदर्श के चाचा के मुताबिक़, इससे पहले उन्होंने कोटा में आत्महत्या के बारे में कभी नहीं सुना था और उन्होंने कभी भी आदर्श पर कोई दबाव नहीं डाला.
सरकारी आंकड़ों के मुताबिक़, भारत में साल 2021 में लगभग 13 हज़ार छात्रों ने आत्महत्या की थी. ये आंकड़े साल 2020 के आंकड़े से 4.5 प्रतिशत ज़्यादा है.
विश्व स्वास्थ्य संगठन के मुताबिक़, हर साल करीब सात लाख लोग आत्महत्या करते हैं और 15-29 साल के उम्र में आत्महत्या मौत का चौथा सबसे बड़ा कारण है.
कोविड भी एक वजह?
कोटा के साढ़े तीन हज़ार हॉस्टलों और हज़ारों मकानों में करीब दो लाख छात्र रहते हैं.
कोटा में कई जिंदगियां थम गईं, लोग दुखी हैं और इस साल आत्महत्या की बढ़ी संख्या के लिए कोविड को भी ज़िम्मेदार बता रहे हैं.
एक सोच है कि कोविड के दौरान छात्रों की पढ़ाई को काफ़ी नुकसान पहुंचा और जब वो कोटा पहुंचे तो बेहद कड़े मुकाबले के बीच कई छात्र निराशा का शिकार हो गए.
ताज़ा छपे एक विश्लेषण के मुताबिक़, कोविड के दौरान स्कूल जाने वाले बच्चों की सीखने की प्रक्रिया "काफ़ी धीमी" हो गई.
शिक्षाविद् उर्मिल बख्शी याद करती हैं, ''बच्चे जब कोविड के बाद स्कूल वापस आए तो बच्चों के लिखने की क्षमता खत्म हो गई थी. बच्चों की संवाद करने की क्षमता खत्म हो गई थी. हमें शुरुआत से शुरू करना पड़ा कि बच्चों को एक दूसरे के साथ संवाद कैसे करना है, टीचर्स के साथ संवाद कैसे करना है."
कोटा के एक प्रमुख कोचिंग इंस्टीट्यूट मोशन एजुकेशन के मैनेजिंग डायरेक्टर नितिन विजय बताते हैं, "जो बच्चे कोविड के बाद आए हैं, उनकी स्ट्रेस झेलने की क्षमता थोड़ी कम है लेकिन वक्त के साथ उनमें सुधार हो जाएगा.''
कोविड में सारी पढ़ाई ऑनलाइन हो गई, बच्चे आइसोलेट हो गए और मां-बाप को बच्चों के हाथ में स्मार्टफ़ोन देने पड़े.
क्या कहते हैं मनोचिकित्सक?
मनोचिकित्सक डॉक्टर एमएल अग्रवाल कहते हैं, "सभी के हाथ में स्मार्ट फोन आ गया. कुछ बच्चों ने उसका दुरुपयोग किया. उसकी वजह से बच्चों को इंटरनेट एडिक्शन हो गया. उसकी वजह से बच्चे बंक मारने लगे, वो पिछड़ने लगे. जब बच्चे पिछड़ जाते हैं, फिर डिप्रेशन में चले जाते हैं, फिर सुसाइड की ओर जाते हैं. यहां कोचिंग बड़ी तेज़ चलती है. एक दो चार दिन आपने बंक मार दिया तो फिर आप पढ़ाई को पकड़ नहीं पाते हैं."
अगर एक बार आप 200-300 छात्रों से भरी कक्षा में पीछे छूट गए तो सिलेबस को वापस पकड़ना आसान नहीं और फिर स्ट्रेस बढ़ता जाता है. उसका असर टेस्ट में दिखता है जो और तनाव बढ़ाता है.
एक जानकार के मुताबिक़, कोटा में ज़्यादातर छात्रों की उम्र 15-17 साल की होती है. ये उनके जीवन का महत्वपूर्ण वक्त होता है लेकिन दरअसल वे हैं तो बच्चे ही.
डॉक्टर एमएल अग्रवाल कहते हैं, "जब बच्चे यहां आते हैं, उनकी उम्र होती है शारीरिक विकास की, उनकी मनोवैज्ञानिक विकास की, उनके हार्मोनल बदलाव की."
हेल्पलाइन और काउंसिलिंग
एक व्यापार संगठन के मुताबिक शहर की अर्थव्यवस्था पांच हज़ार करोड़ से ज़्यादा की है और ये अर्थव्यवस्था यहां आने वाले छात्रों पर निर्भर है.
कोटा हॉस्टल एसोसिएशन प्रमुख नवीन मित्तल की मानें तो तो शहर में आत्महत्या के बढ़े मामलों के बावजूद व्यापार पर असर नहीं पड़ा है और छात्रों का कोटा आना जारी है.
मुकाबला कड़ा है और परिवारों का दर्द गहरा. आत्महत्याओं को रोकने के लिए शहर में कार्यक्रम हो रहे हैं, लोगों को मानसिक स्वास्थ्य को लेकर जागरूक करने की बातें की जा रही हैं, लेकिन आत्महत्याएं जारी हैं. कई परेशान छात्र शहर की एक होप हेल्पाइन पर कॉल करते हैं.
हेल्पलाइन काउंसिलर प्रमिला सखाला के मुताबिक, ''फ़ोन पर परेशान बच्चे बात करते-करते रोने लग जाते हैं. बहुत दुख होता है उनको देखकर. फिर उनके पेरेंट्स से बात की जाती है. हम उनको समझाते हैं वो बच्चों पर इतना दबाव क्यों डाल रहे हैं. क्या वो चाहते हैं कि उनका बच्चा डॉक्टर बने? अगर आपका बच्चा दुनिया में ही नहीं रहा तो वो क्या करेंगे?"
बाज़ारीकरण की कितनी भूमिका?
शिक्षाविद् उर्मिल बख्शी बच्चों की परेशानियों के पीछे कोटा के बढ़ते "बाज़ारीकरण" को ज़िम्मेदार मानती हैं.
वो कहती हैं, "कोचिंग क्लासों में बच्चों की संख्या बहुत ज़्यादा होती है. टीचर्स बच्चों के नाम भी नहीं जानते. किसी क्लास में 300 और ज़्यादा बच्चे बैठते हैं. क्या वो उनका नाम जानते हैं? कोई किसी का नाम नहीं जानता. बच्चा एक दूसरे को दोस्त नहीं बना पाता है. बच्चा अकेला छूट जाता है. ये बहुत दुख की बात है."
"पैसे पैसा, कितना पैसा. कितना पैसा चाहिए? इतना पैसा नहीं चाहिए कि हम बच्चों को ही खो दें. हमको बच्चों को नहीं खोना. हमें बच्चों को कुछ बनाना है. अच्छे इंसान बनाना है."
परिवारों के मुताबिक हर साल इंस्टीट्यूट की फ़ीस एक से डेढ़ लाख रुपए के बीच की होती है.
मोशन एजुकेशन कोचिंग के एमडी नितिन विजय मानते हैं कि क्लासरूम का आकार बड़ा होता है, लेकिन उनके मुताबिक "समस्या ये है कि प्रतिस्पर्धा की वजह से फीसें बहुत कम है. पोचिंग की वजह से टीचर्स का प्राइस प्वाइंट बहुत ज्यादा हो गया है."
कोटा में हर कोचिंग ऐसे टीचर्स को अपनी ओर खींचने की कोशिश करती है जिनकी छात्रों के बीच में फ़ैन फ़ॉलोइंग होती है.
नितिन विजय कहते हैं, "मीडिया हमें दिखा रहा है कि कोटा माफिया है. बिजनेस है. आप बताइए कि बिज़नेस होता कोटा में पिछले 10 साल में 25 कोचिंग बंद गईं. 50-50 करोड़ रुपए का लॉस बुक करके."
नितिन विजय के मुताबिक़, मोशन में अभी तक आत्महत्या की कोई घटना नहीं घटी है और समस्या से निपटने के लिए फन ऐक्टिविटी करवाना, कोर्सेज़ को छोटा रखना, काउंसिलिंग, छात्रों की अटेंडेंस को मॉनिटर करना जैसे कदम उठाए गए हैं.
कितना कठिन है बच्चों का जीवन?
कोटा में कई जिंदगियां थम गईं, लोग दुखी हैं, लेकिन सपनों की उड़ान रुकी नहीं है.
यहां 20-25 हज़ार रुपये महीना किराए के मकान हैं जहां उच्च वर्ग के छात्र रहते हैं, लेकिन ये मकान सब की पहुंच में नहीं.
शहर के विज्ञान नगर में संकरे, अंधेरे कॉरीडॉर से होते हुए, सीढ़ियां चढ़कर एक मकान की दूसरी मंज़िल पर हम अर्नव अनुराग के कमरे में पहुंचे.
बिहार के अर्नव का सपना डॉक्टर बनने का है. उनके पिता शिक्षक हैं. अगले कई महीनों तक यही कमरा उनका घर है. अर्नव की साल भर की कोचिंग की फीस एक लाख बीस हज़ार रुपए है और महीने का खर्च 12 से 13 हज़ार का है.
वो इस कमरे का साढ़े आठ हज़ार रुपए किराया देते हैं.
कमरा किसी बैचलर के कमरे जैसा ही है, सीलन वाली शेल्फ़, बिस्तर पर रखी किताबों का ढेर, मेज़ पर लैपटॉप के साथ जगह शेयर करता इंडक्शन हीटर, नमक का डिब्बा और ग्लास, साथ लगी दीवार पर चिपका पीरियॉडिक टेबल, पसीने से निपटने के लिए कोने में रखा कूलर और बहुत कुछ.
वो कहते हैं, "(कमरे में) घुटन-सी होती है, मगर मेहनत मुझे यहीं करनी है. इस घुटन के बाद जब रिजल्ट आएगा, मेरा सेलेक्शन हो जाएगा. तो मैं घूमने आऊंगा तो कहूंगा कि ये भी एक कमरा था, यहीं मैंने पढ़ाई की थी, तो अच्छा भी लगेगा."
कोटा में रह रहे कई छात्र तो कोटा की आबोहवा में ढल जाते हैं और सबके साथ ऐसा नहीं हो पाता.
बच्चों के मन को समझने की सलाह
जब हम कोटा में थे, तब हमें ख़बर मिली कि वहां के हॉस्टल में रह रही एक और लड़की ने आत्महत्या कर ली है. हॉस्टल के सभी लोग सदमें में थे. केयरटेकर ने कहा, "वो हमारी बेटी जैसी थी."
इस छात्रा के पिता कोटा के रास्ते में थे जब फ़ोन पर उनसे बात हुई.
उन्होंने बताया, ''बेटी ने कोटा में आत्महत्याओं का ज़िक्र किया था, जिस पर हमने बोला कि बेटा इन सब चीज़ों पर ध्यान मत दो...दो बेटी हैं हमारी, एक छोड़ कर चली गई."
राजस्थान पुलिस के कोटा स्टूडेंट सेल के इंचार्ज चंद्रशील ने बताया कि आत्महत्याओं को रोकने के लिए उनकी टीम लगातार हॉस्टल आदि जगहों पर जाते हैं और ये पता लगाने की कोशिश करते हैं कि क्या किसी छात्र के व्यवहार में कोई फ़र्क तो बदलाव तो नहीं दिख रहा. वो हॉस्टल वॉर्डन, खाना बनाने वाले लोगों से बात करते हैं.
छात्रों के अकेलेपन को दूर करने, उन्हें घर का खाना और माहौल देने के लिए कई बच्चों की मां उनके साथ यहां रहती हैं.
जानकारों के मुताबिक़, ज़रूरी है कि मां-बाप बच्चों के मन को कुरेदें, उनसे बात करें, उनके साथ लंबा वक्त बिताएं ताकि ये बच्चे खुलकर समझा सकें कि उनके मन में क्या चल रहा है.
(कुछ लोगों की पहचान छिपाने के लिए उनके नाम बदले गए हैं)
महत्वपूर्ण जानकारी-
मानसिक समस्याओं का इलाज दवा और थेरेपी से संभव है. इसके लिए आपको मनोचिकित्सक से मदद लेनी चाहिए, आप इन हेल्पलाइन से भी संपर्क कर सकते हैं-
सामाजिक न्याय एवं आधिकारिता मंत्रालय की हेल्पलाइन- 1800-599-0019 (13 भाषाओं में उपलब्ध)
इंस्टीट्यूट ऑफ़ ह्यमून बिहेवियर एंड एलाइड साइंसेज़-9868396824, 9868396841, 011-22574820
हितगुज हेल्पलाइन, मुंबई - 022- 24131212
नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ़ मेंटल हेल्थ एंड न्यूरोसाइंस - 080 – 26995000
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