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राजस्थान के कोटा ही तैयारी के लिए क्यों जाना पसंद करते हैं बिहार-यूपी के छात्र?
- Author, चंदन कुमार जजवाड़े
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, पटना (बिहार) से
"कोटा में सबसे बड़ा माहौल का फ़र्क है. अगर वहां किसी बैच में 60 बच्चे कोचिंग ले रहे हैं तो आमतौर पर सभी बच्चे कॉम्पिटिशन को लेकर गंभीर मिलेंगे. उनकी बातचीत भी पढ़ाई के इर्द-गिर्द ही होती है. लेकिन पटना में ऐसा ज़रूरी नहीं है, वहां बच्चों के बीच चर्चा का विषय पढ़ाई के अलावा भी बहुत कुछ होता है."
ये शब्द हैं पटना के वरुण सिंह के. उन्होंने कोटा में कोचिंग की है और आज गोवा में एक अच्छी नौकरी कर रहे हैं.
राजस्थान के कोटा शहर का नाम सुनते ही सबसे पहले ज़ेहन में जो ख़याल आता है, वो है यहां के कोचिंग इंस्टीट्यूट. भारत के कई शहरों के बच्चे अच्छे इंजीनियरिंग और मेडिकल कॉलेज में दाख़िले का सपना लेकर इस शहर में आते हैं.
कोटा क्यों जाते हैं बिहार और यूपी के छात्र
माना जाता है कि हर साल क़रीब ढाई लाख बच्चे कॉम्पिटिशन की कोचिंग लेने कोटा पहुंचते हैं. इनमें बड़ी संख्या में बिहार, झारखंड, उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश जैसे राज्यों के बच्चे होते हैं.
एक अनुमान के मुताबिक़, यहां सबसे ज़्यादा 20 से 25 प्रतिशत विद्यार्थी बिहार के होते हैं.
क़रीब इतनी ही संख्या यानी 20 से 25% उत्तर प्रदेश के विद्यार्थियों की होती है. वहां के छात्रों में क़रीब 8 से 10 प्रतिशत मध्य प्रदेश के, 5-5 प्रतिशत हरियाणा और झारखंड के होते हैं.
राजस्थान के स्थानीय बच्चे भी कोचिंग के लिए कोटा पहुंचते हैं और वे क़रीब 25 फ़ीसदी होते हैं.
कोटा और बिहार की राजधानी पटना में कोचिंग इंस्टीट्यूट के मैनेजमेंट से जुड़े बलराम बताते हैं, "हम कोटा में कई साल से यही ट्रेंड देख रहे हैं. ख़ास बात यह भी है कि कोचिंग में पढ़ाने वाले भी क़रीब आधे शिक्षक बिहार और यूपी जैसे राज्यों के होते हैं, जबकि कोचिंग के मालिक आमतौर पर राजस्थान के होते हैं."
कोटा ही क्यों बना छात्रों की पसंद
कुछ साल पहले तक बिहार, झारखंड या मध्य प्रदेश जैसे राज्यों के लिए पटना, रांची, बोकारो, इंदौर और दिल्ली, ऐसी कोचिंग का पसंदीदा केंद्र हुआ करता था.
जिन अभिभावकों की आर्थिक स्थिति थोड़ी बेहतर होती थी, वे बच्चों को कोचिंग के लिए भारत के दक्षिणी शहर चेन्नई भी भेजा करते थे. लेकिन उत्तर भारत के शहरों से कोटा क़रीब है और अब कोटा इस तरह की कोचिंग का हब बना हुआ है.
भागलपुर के रहने वाले और आईआईटी चेन्नई से इंजीनियरिंग कर चुके विकास ठाकुर अब दिल्ली में कोचिंग चलाते हैं.
विकास ठाकुर बताते हैं, "साल 2004 और उसके आसपास से कोटा में कोचिंग कर रहे बच्चे इंजीनियरिंग के कॉम्पिटिशन में टॉप रैंकर रहने लगे. उसी समय से बच्चों और अभिभावकों का रुझान कोटा की तरफ होने लगा."
झारखंड के एक अभिभावक का कहना है कि पटना या रांची जैसे शहरों में पढ़ाई का स्तर कोटा की तरह नहीं है, इसलिए लोग वहां जाना पसंद करते हैं.
इसके अलावा कई बार छात्र या अभिभावक दूसरों को देखकर भी कोटा की तरफ़ रुख़ करते हैं. पश्चिमी चंपारण के आशीष कुमार ने कोटा से कोचिंग की है और एनआईटी से बीटेक करने के बाद अब पटना में बच्चों को कोचिंग देते हैं.
आशीष कहते हैं, "कोटा नाम ऐसा हो गया है कि एक-दूसरे को देखकर भी बहुत से लोग वहां कोचिंग के लिए पहुंचते हैं."
सफलता पाने का सपना और हक़ीकत
ऐसा भी नहीं है कि जितने बच्चे कोटा में कोचिंग करने के लिए पहुंचते हैं, सभी इंजीनियर और डॉक्टर बन जाते हैं या सबका दाख़िला अच्छे कॉलेज में हो ही जाता है.
बलराम, कोचिंग संस्थानों और छात्रों की सफलता के आंकड़ों पर भी नज़र रखते हैं.
उनका कहना है, "अगर आप अच्छे कॉलेज या संस्थानों में मौजूद सीट के लिहाज़ से देखें तो कोटा के कोचिंग से 1% से भी कम बच्चे कॉम्पिटिशन में सफल होते हैं. सफलता की यही दर पटना में कोचिंग करने वालों की है. फ़र्क बस यह है कि कोटा के बच्चे टॉप रैंक में आते हैं."
आंकड़ों के लिहाज़ से इंजीनियरिंग और मेडिकल की प्रवेश परीक्षा में टॉप रैंकिंग में 25 से 30 प्रतिशत छात्र कोटा के कोचिंग संस्थानों के होते हैं.
इसके पीछे एक बड़ी वजह यह भी होती है कि कोटा में देशभर के प्रतिभावान छात्र पहुंचते हैं. कई कोचिंग संस्थान छात्रों के लिए आठवीं-नौवीं क्लास से ही कोचिंग और स्कूलिंग की एक साथ व्यवस्था कर देते हैं.
इससे बच्चों का बेस और फ़ोकस दोनों बेहतर हो जाता है. कॉम्पिटिशन में बड़ी संख्या में ऐसे बच्चे टॉप रैंकिंग में आते हैं, जबकि पटना जैसे शहर में ज़्यादातर स्थानीय या आसपास के शहरों के बच्चे होते हैं और यहां कोटा जैसे कोचिंग-स्कूलिंग एक साथ कराने वाले संस्थान नहीं हैं.
कोटा की महंगी कोचिंग और घर से दूरी
कोटा शहर में रहने और कोचिंग की फ़ीस मिला दें तो वहां दो साल में क़रीब 5 लाख़ रुपये तक का ख़र्च होता है. यानी जिन अभिभावकों के पास कोचिंग पर ख़र्च करने के लिए पांच लाख़ रुपये हों, वे अपने बच्चे को कोटा भेज सकते हैं.
वहीं किसी और शहर से पटना आकर भी कोटा के मुक़ाबले आधे ख़र्च में कोचिंग की जा सकती है. इसके अलावा बिहार और झारखंड जैसे राज्य से कोटा की दूरी भी एक बड़ी समस्या है. बिहार की राजधानी पटना से इसकी दूरी क़रीब 1,200 किलोमीटर है.
ट्रेन से कोटा पहुंचने में क़रीब 20 घंटे का वक़्त लगता है, और सड़क के रास्ते इससे भी ज़्यादा. मांग की वजह से कई बार कोटा के लिए अचानक ट्रेन का टिकट मिलना भी संभव नहीं होता.
ट्रेन का टिकट न मिलने से त्योहारों के मौक़े पर छात्रों के लिए घर पहुंचना काफ़ी मुश्किल होता है. घर और घरवालों से दूर छात्र कई बार होम सिकनेस (घर की याद) के शिकार हो जाते हैं.
यहां रह रहे बच्चे की तबीयत यदि ख़राब हो तो अपना ख़याल रखते हुए भी पढ़ाई करनी होती है. जबकि पटना जैसे शहर में बच्चों को ऐसे मौक़े पर सहारा मिल जाता है.
सिमरन सिंह बिहार के सिवान की रहने वाली हैं और पटना में इंजीनियरिंग की कोचिंग ले रही हैं. उनका मोबाइल फ़ोन चोरी हो गया तो पिताजी दो दिन में ही नया फ़ोन लेकर पहुंच गए.
सिमरन के पिता सुधीर सिंह के मुताबिक़ बच्चे घर के क़रीब हों तो उनकी खोज ख़बर लेना ज़्यादा आसान होता है.
सुधीर सिंह कहते हैं, "हमारा घर केवल सौ किलोमीटर दूर है, इससे बहुत सहुलियत होती है. बच्चे का हाल-चाल लेना हो या बच्चे को देखना हो, या बच्चे को घर जाना हो, पटना हर मामले में बेहतर है."
दार्जिलिंग से पटना आईं आफ़रीन परवीन कहती हैं कि पटना में भी कोचिंग अच्छी है और यहां मेरे रिश्तेदार रहते हैं, इसलिए मैंने पटना को चुना.
भावनात्मक सहारा न मिलना
दुर्गापुर के पिंकूमनी कोटा से वापस लौट चुके हैं. वो अब पटना में कोचिंग ले रहे हैं.
पिंकूमनी ने बीबीसी को बताया, "कोटा में ख़र्च ज़्यादा था और पटना में भैया भी रहते हैं जिससे मेरे लिए पढ़ाई करना आसान हो गया."
एक अनुमान के मुताबिक़ पटना में हर साल क़रीब 70 हज़ार बच्चे इंजीनियरिंग और मेडिकल की तैयारी के लिए आते हैं. घर के पास होने से बच्चे एक-दो दिन की छुट्टी में भी घर जा सकते हैं. इससे उन्हें हमेशा घरवालों के संपर्क में रहने का मौक़ा मिल जाता है.
बिलासपुर के हर्ष कुमार कहते हैं कि पटना में मेरे रिश्तेदार हैं, कोटा में अगर आप किसी दबाव में हैं या किसी तरह का मानसिक तनाव है तो आपके पास कोई सहारा नहीं होता. वहां का खाना भी अलग है.
बिहार या झारखंड जैसे राज्यों के बच्चों के लिए कोटा में ऐसी सुविधा नहीं होती. वहां कोचिंग करने वाले ज़्यादातर बच्चे 17-18 साल के होते हैं. छात्रों को कम उम्र में ही नए शहर में पढ़ाई के दबाव, घरवालों की उम्मीदें और असफलता का डर सब कुछ अकेले ही सहना होता है.
असफलता का डर
हाल ही में कोटा में कॉम्पिटिशन की तैयारी करने गए तीन बच्चों की आत्महत्या की ख़बर ने एक बार फिर से इस शहर को सुर्ख़ियों में ला दिया है. इनमें से दो बिहार और एक मध्य प्रदेश का छात्र था.
बीबीसी संवाददाता मोहर सिंह मीणा के मुताबिक़ बीते एक महीने में कोटा में आठ छात्रों की मौत हो चुकी है.
पटना के वरुण सिंह बताते हैं, "अगर बच्चों को मां-बाप से अलग रहने की आदत नहीं है, तो उन्हें काफ़ी ज़्यादा होम सिकनेस हो जाती है. ऐसी उम्र में घरवालों से दूर रहने पर कई बार बच्चों के भटकने का भी डर होता है."
कोटा में रहने वाले ज़्यादातर बच्चे दूर के शहरों के होते हैं. ऐसे में उन्हें भावनात्मक सहारा नहीं मिल पाता. बच्चे की तबीयत ख़राब हो तो भी उनके पास देखभाल के लिए कोई नहीं होता.
कम उम्र या 11वीं-12वीं की पढ़ाई के दौरान कई बार बच्चे कॉम्पिटिशन को लेकर ज़्यादा गंभीर हो जाते हैं. इससे बाद में उन्हें 12वीं में ही कम अंक आने या फ़ेल हो जाने का डर सताने लगता है.
वरुण सिंह बताते हैं कि अपनी जान लेना कोई छोटी बात नहीं होती, लेकिन कोटा में बच्चों को मशीन बना दिया जाता है, उस पर भी घरवालों का दबाव और उम्मीदें बच्चों की आत्महत्या की बड़ी वजह बन जाते हैं.
कोचिंग से जुड़े बलराम बताते हैं कि पटना में कोचिंग कर रहे बच्चे अकेलेपन या किसी अवसाद के शिकार हुए हों, ऐसा आमतौर पर देखने को नहीं मिलता.
एक अभिभावक ने नाम न लेने की शर्त पर बताया कि 'कोटा की पढ़ाई बेहतर है, लेकिन सभी बच्चे अच्छा नहीं कर सकते. अगर बच्चे पढ़ाई में अच्छा नहीं कर पा रहे हैं, तो कुछ और कर लेंगे, उन पर किसी भी तरह का दबाव ठीक नहीं है.'
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