निठारी कांड: किसी पीड़ित ने लाखों किए ख़र्च तो किसी ने इंसाफ़ की उम्मीद छोड़ी - प्रेस रिव्यू

निठारी कांड

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इमेज कैप्शन, निठारी कांड का प्रमुख अभियुक्त मोनिंदर सिंह पंढेर

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने सोमवार को चर्चित ‘निठारी कांड’ के दो प्रमुख अभियुक्तों सुरेंद्र कोली और मोनिंदर सिंह पंढेर को बरी कर दिया. दोनों को मौत की सज़ा दी गई थी.

लेकिन दोनों को सज़ा से बरी किए जाने के फैसले से निठारी कांड के पीड़ित बेहद निराश दिखे.

‘द हिंदू’ के मुताबिक़ सोमवार को जैसे ही निठारी कांड में कोली और पंढेर को बरी किए जाने की ख़बर आई नोएडा में एक बच्चे के पिता ने पंढेर के बंगले की ओर ज़ोर से एक ईंट फेंकी.

ये उन लोगों की हताशा को दिखा रहा था, जिनके बच्चे इस खौफ़नाक कांड में मारे गए थे.

अख़बार लिखता है कि रामकिशन का पंढेर के बंगले की ओर ईंट फेंकना बताता है कि इलाहाबाद हाई कोर्ट के इस फैसले से वो किस कदर निराश हुए हैं. उन्हें लगता है कि अब उनके सामने सिर्फ अंधेरा है.

रामकिशन का छह साल का बेटा 2006 में पंढेर के बंगले के आसपास हुई सीरियल किलिंग का शिकार बना था.

अख़बार लिखता है कि सोमवार को इस मामले में कोली और पंढेर को बरी किए जाने के बाद ऐसा लगा कि पीड़ितों के जख्म हरे हो गए हैं. कोली और पंढेर पर क़त्ल, रेप, मानव तस्करी और सुबूत मिटाने के आरोप थे.

कोली और पंढेर को छोड़े जाने के साथ लोगों के जेहन में 17 साल पहले का वो खौफनाक मामला उभर आया, जब नोएडा के निठारी गांव से सटे सेक्टर 31 स्थित पंढेर के बंगले से एक के बाद एक बच्चों के कंकाल बरामद होने शुरू हुए थे.

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इमेज कैप्शन, निठारी कांड के सह अभियुक्त सुरेंद्र सिंह कोली

'अब ऊपर वाले की अदालत का भरोसा'

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झब्बू लाल अब 63 साल के हो चुके हैं और उनकी पत्नी सुनीता देवी 60 साल की हैं.

दोनों ने इस सीरियल किलिंग में अपनी 14 साल की बेटी को खो दिया था. दोनों ने हाई कोर्ट के इस फैसले पर दुख जताते हुए कहा, "हम इस फैसले से संतुष्ट नहीं हैं. जब कोई शख्स एक के बाद एक कई बच्चों को मार कर बरी हो सकता है तो सोचिए एक या दो मर्डर करने वालों को क्या ही सजा मिल सकती है.’’

पति-पत्नी अब पंढेर के खाली बंगले से महज़ 50 मीटर की दूरी पर कपड़े पर इस्त्री कर गुज़ारा करते हैं.

झब्बू लाल ने बताया कि अब तक इस केस में उसने वकीलों को चार लाख रुपये दे चुके हैं. यहां तक कि वो अपना एक प्लॉट भी बेच चुके हैं.

अशोक और राजवती ने भी इस सीरियल किलिंग में अपने पांच साल के बेटे को खो दिया था. दोनों निठारी गांव में अब जूते-चप्पल की दुकान चलाते हैं.

राजवती ने ‘द हिंदू’ के संवाददाता को बताया, "शादी के आठ साल बाद हमारा बेटा पैदा हुआ था. अब तो इस कांड के 17 साल हो चुके हैं. हमने इंसाफ़ की उम्मीद छोड़ दी है.’’

इस हत्याकांड में अपनी आठ साल की बच्ची को खो चुके पप्पू लाल कहते हैं, "इतने पैसे नहीं हैं हमारे पास जो इतने सालों तक लड़ सकें इंसाफ के लिए.’’

इस कांड के पीड़ितों को दिए गए उत्तर प्रदेश सरकार के एक मकान में रह रहे दुर्गा प्रसाद ने कहा, "अदालत ने भले ही वहशियों को छोड़ दिया हो भगवान की बड़ी अदालत उन्हें नहीं छोड़ेगी.’’

सुप्रीम कोर्ट

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अबॉर्शन पर सुप्रीम कोर्ट का ये फ़ैसला इतना अहम क्यों?

सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को उस महिला की याचिका खारिज़ कर दी, जिसने 27 हफ्ते के गर्भ के अबॉर्शन की मांग की थी.

सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में कानून की भावना को ध्यान में रखते हुए फैसला दिया है.

सुप्रीम कोर्ट ने महिला की मेडिकल रिपोर्ट पर फैसला दिया. इस रिपोर्ट में कहीं भी ये नहीं लिखा गया था कि गर्भपात न कराने से महिला के स्वास्थ्य को ख़तरा है और न भ्रूण असामान्य है.

हिन्दुस्तान टाइम्स के मुताबिक़ कोर्ट ने कहा कि वो गर्भाधान के इस चरण में भ्रूण की दिल की धड़कन को रोकने के ख़िलाफ़ है.

2021 के मेडिकल टर्मिनेशन ऑफ प्रिग्नेंसी एक्ट के मुताबिक़ 24 साल से ज्यादा के गर्भ के गर्भापात की इजाज़त सिर्फ इसी सूरत में है जब भ्रूण काफी असामान्य हो या फिर गर्भवती महिला की जान या स्वास्थ्य को ख़तरा हो.

इस मामले में महिला ने अदालत से कहा था कि वह लेक्टेशन अमोनोरिया नाम की बीमारी की वजह से अपने तीसरे गर्भाधान के बारे में नहीं जान सकीं.

इसके साथ वो संतानोत्पति के बाद के अवसाद यानी पोस्टपार्टम डिप्रेशन की शिकार थीं. उनकी आर्थिक स्थिति भी ठीक नहीं है.

इस मामले में पहले दो महिला जजों ने अलग-अलग फैसला दिया था. ये फैसले 48 घंटों के भीतर ही दिए गए थे. हालांकि बाद में महिला को सर्वसम्मति से गर्भपात कराने की इजाज़त दे दी गई थी. लेकिन एक सप्ताह के बाद बड़ी बेंच ने इस फैसले को नकार दिया.

चीफ जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ की अगुआई वाली बेंच ने इसमें कानून की भावना को ध्यान में रखते हुए कहा कि मामले मे 24 सप्ताह से ज्यादा के गर्भ के गर्भपात कराने के कानून को नहीं माना जा सकता.

पंजाब

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पंजाब से बिहार तक फ्रेट कॉरिडोर का काम पूरा, देश को कितना बड़ा फायदा?

बिजनेस स्टैंडर्ड’ ने पंजाब से बिहार तक जाने वाले 1,337 किलोमीटर लंबे ईस्टर्न डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर (EDFC) का काम पूरा होने को एक बड़ी उपलब्धि के तौर पर पेश किया है.

अख़बार लिखता है कि 1 नवंबर को उसके संभावित उद्घाटन को उत्सव के रूप में देखा जा रहा है.

यह कॉरिडोर पंजाब, हरियाणा के अलावा उत्तर प्रदेश से होता हुआ बिहार तक गया है और निश्चित रूप से यह मालवहन के समय को लगभग आधा कर देगा.

इससे पश्चिमोत्तर के राज्यों में स्थित ताप बिजली घरों तक कोयला जल्द पहुंचाने में मदद मिलेगी.

गर्मियों में जब बिजली की मांग बहुत बढ़ जाती है तो यह समस्या बहुत परेशान करती है. ऐसे में इसे एक बेहतरीन फायदा माना जा सकता है.

ईडीएफसी एक व्यापक परियोजना का हिस्सा है जिसमें 1,506 किलोमीटर लंबा वेस्टर्न डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर शामिल है जो महाराष्ट्र और गुजरात को उत्तर प्रदेश और हरियाणा के साथ जोड़ेगा.

2005 में प्रस्तावित और 2008 में कैबिनेट की मंजूरी पाने वाली इस परियोजना को बेहतरीन इन्फ्रास्ट्रक्चर परियोजना होना था.

इस समय जबकि ईडीएफसी की शुरुआत की तैयारी हो चुकी है, इस परियोजना को लेकर कई प्रश्न उठ खड़े हुए हैं जो भविष्य में इतने बड़े पैमाने पर शुरू होने वाली परियोजनाओं के लिए जरूरी सबक प्रदान कर सकते हैं।

इनमें प्रमुख सबक है 2017-18 की मूल समयसीमा से पांच वर्ष की देरी. यह देरी परियोजना के दोनों चरणों पर बहुत भारी पड़ी और इसकी लागत 54 फीसदी बढ़कर 1.24 लाख करोड़ रुपये हो गई.

उत्तर प्रदेश

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यूपी में फसल बीमा योजना में भारी हेरा-फेरी

अमर उजाला अख़बार की रिपोर्ट के मुताबिक़ उत्तर प्रदेश के कई जिलों में किसानों ने फसल बीमा योजना में हेरा-फेरी की है. कहीं बिना फसल बोए तो कहीं रकबा बढ़ाकर बीमा का लाभ ले लिया.

कुछ जगहों तो एक ही फसल का दो-दो बैंकों से बीमा राशि ली गई है. अब तक इस तरह के करीब आठ हजार मामले सामने आए हैं.

‘अमर उजाला’ ने लिखा है कि अब बीमा लेने वाले सभी किसानों की नए सिरे से जांच की जा रही है. गलत तरीके से लाभ लेने वालों से वसूली होगी. वहीं, कृषि विभाग इस तरह की हेरा-फेरी रोकने के लिए रणनीति भी बना रहा है.

अख़बार लिखता है कि प्रदेश में फसल बीमा का दायरा लगातार बढ़ रहा है.

वर्ष 2022-23 में खरीफ व रबी फसल को मिलाकर 41.47 लाख किसानों का बीमा हुआ. करीब 28.95 लाख हेक्टेयर खेत और 16009.19 करोड़ रुपये का बीमा किया गया.

इसमें किसानों ने 283.58 करोड़, राज्य सरकार ने 612.12 करोड़ और केंद्र ने 610.61 करोड़ रुपये का प्रीमियम दिया.

विभाग ने 10.67 लाख किसानों को 795.96 करोड़ रुपये की क्षतिपूर्ति बांटीं.

अखबार सूत्रों के हवाले से लिखा है कि बीमा क्लेम के भुगतान के दौरान करीब आठ हजार मामले में हेरा-फेरी का पता चला है.

कुछ किसानों ने दो से तीन बार क्लेम ले लिया है तो कुछ ने क्लेम लेने की कोशिश की है.

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