गर्भपात पर क़ानून क्या कहता है, भ्रम क्यों है, जानिए ज़रूरी सवालों के जवाब

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- Author, उमंग पोद्दार
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
पिछले कुछ दिनों से 26 सप्ताह की गर्भवती विवाहित महिला की गर्भपात की गुहार सुर्खियों में है.
27 साल की उम्र में उसकी गर्भावस्था को समाप्त करने की याचिका को 9 अक्टूबर को अनुमति दे दी गई थी लेकिन अब इस अनुमति पर पुनर्विचार हो रहा है.
जानिए की गर्भपात पर कानून क्या कहता है और सुप्रीम कोर्ट अपने ही फैसले पर पुनर्विचार क्यों कर रहा है.
भारत में गर्भपात कब कराया जा सकता है?

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क़ानून के मुताबिक़ भारत गर्भपात के लिए एक उदार देश है.
भारत में गर्भपात को नियंत्रित करने वाले कानून, मेडिकल टर्मिनेशन ऑफ प्रेगनेंसी एक्ट 1971 के अनुसार, एक पंजीकृत चिकित्सक गर्भपात कर सकता है, यदि गर्भावस्था से गर्भवती महिला के मानसिक या शारीरिक स्वास्थ्य को खतरा हो या भ्रूण के गंभीर मानसिक रूप से पीड़ित होने की संभावना हो, या प्रसव होने पर शारीरिक असामान्यताएँ हो सकती हों.
यदि कोई महिला 20 सप्ताह से कम समय से गर्भवती है, तो केवल एक चिकित्सक को यह तय करना होगा कि गर्भपात सुरक्षित है या नहीं.
अगर गर्भावस्था 20 से 24 सप्ताह के बीच है, तो दो डॉक्टरों को स्वास्थ्य संबंधी चिंताओं का आकलन करना होता है.
20-24 सप्ताह के बीच गर्भपात के विकल्प का उपयोग केवल कुछ महिलाएं ही कर सकती हैं, जैसे बलात्कार पीड़िता, नाबालिग, मानसिक या शारीरिक रूप से बीमार महिलाएँ.
क्या अविवाहित महिलाएं भी गर्भपात करा सकती हैं?

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हाँ. पिछले साल सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुनाया था कि एकल महिलाओं को भी 24 सप्ताह तक गर्भपात कराने की अनुमति दी जानी चाहिए.
यदि कोई महिला गर्भनिरोधक के बावजूद गर्भवती हो जाए तो क्या होगा?
कानून में कहा गया है कि ऐसे मामले में जहां गर्भावस्था गर्भनिरोधक विफलता का परिणाम है तो यह अपने-आप मानसिक सदमा माना जाएगा और गर्भपात की अनुमति होगी.
इसी तरह 20 सप्ताह से कम के गर्भ के मामले में उन्हें आसानी से गर्भपात कराने की अनुमति होनी चाहिए, 20-24 सप्ताह के बीच, यह मामले के तथ्यों पर निर्भर करेगा कि अनुमति मिलती है या नहीं.
रेप केस के बारे में क्या?

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बलात्कार के मामले में कानून कहता है कि 24 सप्ताह तक का गर्भपात कराया जा सकता है.
क्या 24 सप्ताह के बाद गर्भपात कराया जा सकता है?
हाँ. कानून कहता है कि अगर सरकारी मेडिकल बोर्ड को भ्रूण में पर्याप्त असामान्यताएं मिलती हैं, तो 24 सप्ताह के बाद भी, गर्भपात कराया जा सकता है.
इसके अलावा, ऐसे मामलों में जहाँ एक डॉक्टर का मानना है कि गर्भवती महिला के जीवन को बचाने के लिए गर्भावस्था को तुरंत समाप्त करना आवश्यक है, तो ऐसे में गर्भपात की अनुमति किसी भी समय दी जा सकती है, यहां तक कि मेडिकल बोर्ड की राय के बिना भी.
कई मामलों में जहां गर्भावस्था का पता देर से चलता है, गर्भवती महिलाओं को अदालत का दरवाजा खटखटाना पड़ता है जो अंततः गर्भपात का निर्देश देता है.
गर्भपात कहाँ हो सकता है?
कानून के मुताबिक, गर्भपात सरकारी अस्पताल या सरकार से मान्यता प्राप्त जगहों पर हो सकता है.
अदालत के समक्ष वर्तमान मामला क्या है?

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27 साल की एक महिला ने अक्टूबर में सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया. उन्होंने तर्क दिया कि वह 26 सप्ताह (लगभग 6 महीने) से गर्भवती थी लेकिन उसे कुछ दिन पहले ही गर्भावस्था के बारे में पता चला.
उन्होंने कहा, वह अपनी गर्भावस्था का पता चलने पर हैरान रह गईं, क्योंकि उन्होंने पिछले साल ही एक बच्चे को जन्म दिया था और गर्भनिरोधक विधि के रूप में स्तनपान का उपयोग कर रही थीं, जो गर्भावस्था से 95% से अधिक सुरक्षा प्रदान करता है और इसके परिणामस्वरूप मासिक धर्म नहीं होता है. अभी हाल तक उन्हें पता नहीं था कि वे गर्भवती हैं.
उन्होंने तर्क दिया कि वह प्रसवोत्तर मनोविकृति से पीड़ित है, जो गर्भावस्था के दौरान और भी बदतर हो रही है, उसने यह भी तर्क दिया कि उसके पास दूसरे बच्चे का भरण-पोषण करने की वित्तीय क्षमता नहीं है, क्योंकि उनके पहले से ही 2 बच्चे हैं.
भले ही मेडिकल बोर्ड ने कहा कि भ्रूण सामान्य है और उसके जीवित रहने की उचित संभावना है, फिर भी अदालत ने नौ अक्टूबर को गर्भपात की अनुमति दे दी. उन्होंने कहा कि चूंकि याचिकाकर्ता के पहले से ही दो बच्चे हैं और उसने पर्याप्त सुरक्षा ले रखी है. इसके अलावा, याचिकाकर्ता का मानसिक स्वास्थ्य खराब है इसलिए अनुमति देनी चाहिए.
फिर कोर्ट का फ़ैसला कैसे बदला?

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एक दिन बाद, मेडिकल बोर्ड के एक डॉक्टर ने सरकारी वकील को एक ईमेल भेजा, ईमेल में सुप्रीम कोर्ट से दिशा-निर्देश मांगे गए क्योंकि डॉक्टर ने कहा था कि गर्भावस्था को समाप्त करने से पहले भ्रूण के दिल को बंद करना होगा.
अन्यथा, यह गर्भपात नहीं बल्कि समय से पहले प्रसव होगा, जहां पैदा होने वाले बच्चे को गहन देखभाल में रहना होगा, और उसे दीर्घकालिक शारीरिक और मानसिक विकलांगता हो सकती है इसलिए डॉक्टर यह स्पष्ट करना चाहते थे कि क्या भ्रूण की हृदय गति रोक दी जानी चाहिए?
इस ईमेल का इस्तेमाल करते हुए सरकारी वकील ने कोर्ट से आदेश वापस लेने को कहा. चीफ जस्टिस चंद्रचूड़ ने इसके बाद तीन जजों की बेंच का गठन किया, जो अब इस मामले की सुनवाई कर रही है.
तीन जजों की बेंच ने क्या कहा?
तीनों न्यायाधीशों ने भ्रूण के स्वास्थ्य और बच्चे के मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य की आगे की जांच के लिए महिला को एम्स, दिल्ली भेज दिया था.
सोमवार को कोर्ट ने गर्भपात की अनुमति देने से इनकार कर दिया.
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