गर्भपात प्रक्रिया के दौरान ज़िंदा भ्रूण पैदा होने का क्या है मामला

सांकेतिक तस्वीर.

इमेज स्रोत, Getty Images

इमेज कैप्शन, सांकेतिक तस्वीर.
    • Author, सुशीला सिंह
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

एक दंपती के लिए घर में नन्हें मेहमान के आने की ख़बर उन्हें ख़ुशियों से सराबोर कर देती है.

लेकिन किसी कारणवश अगर महिला को छठे महीने में गर्भपात कराना पड़ जाए और भ्रूण जीवित पैदा हो तो?

इस सवाल को पढ़कर ही आपको बैचेनी होने लगी होगी.

लेकिन ये कोई कहानी नहीं बल्कि एक सच्ची घटना है.

अख़बारों में छपी ख़बर के मुताबिक़, मुंबई में पिछले दो-तीन महीने में मेडिकल टर्मिनेशन ऑफ़ प्रेग्नेंसी (एमटीपी) के तीन मामलों में महिलाओं ने जीवित भ्रूण को जन्म दिया है.

भारत में मेडिकल टर्मिनेशन ऑफ़ प्रेग्नेंसी (संशोधित) एक्ट 2021 आया था. इसमें गर्भपात करवाने की मान्य अवधि को कुछ विशेष परिस्थितियों में 20 हफ़्ते से बढ़ाकर 24 हफ़्ते कर दिया गया.

भारत उन चंद देशों में से एक है जिसने साल 1971 में ही गर्भपात को वैध क़रार दिया था और 20 हफ़्तों तक एक महिला को गर्भपात कराने की अनुमति दी गई थी.

हालांकि संशोधन करने के बाद इसका दायरा बढ़ाया गया और इसमें कई प्रावधान जोड़े गए कि किन-किन परिस्थितियों में एक महिला गर्भपात करा सकती है.

सांकेतिक तस्वीर.

इमेज स्रोत, Getty Images

इमेज कैप्शन, सांकेतिक तस्वीर.

इसे तीन चरणों में विभाजित किया गया है.

  • पहला चरण - 0-20 हफ़्ते
  • इसके लिए जायज़ कारण जैसे महिला मां बनने के लिए तैयार न हो या गर्भनिरोधक फ़ेल हो गया हो.

दूसरा चरण - 20-24 हफ़्ते

  • मां और बच्चे के स्वास्थ्य पर असर.
  • इसमें डॉक्टर की अनुमति को अनिवार्य बनाया गया.

तीसरा चरण - 24 हफ़्ते के बाद

  • महिला यौन उत्पीड़न की शिकार हुई हो.
  • गर्भावस्था के दौरान महिला का विवाह संबंध टूट गया हो या वो विधवा हो गई हो.
  • महिला अगर शारीरिक रूप से विक्षिप्त हो.
  • गर्भ में पल रहे भ्रूण में विकृति हो जिससे ज़िंदा बचने की आशंका हो.
  • प्रेग्नेंसी के कारण मां की जान को ख़तरा हो.

इन परिस्थितियों में महिलाओं को एमटीपी एक्ट के तहत गर्भपात कराने की अनुमति दी गई है.

सांकेतिक तस्वीर

इमेज स्रोत, Getty Images

इमेज कैप्शन, सांकेतिक तस्वीर

जीवित भ्रूण का मामला

मुंबई में हाल ही में एक मामला सामने आया है जिसमें 27 हफ़्तों के बाद हुए गर्भपात के मामले में भ्रूण ज़िंदा पैदा हो गया.

इस मामले में बॉम्बे हाई कोर्ट ने निर्देश दिया था कि आपात स्थिति में हुए गर्भपात से जो जीवित भ्रूण पैदा हुआ है उसे पार्ले के केईएम अस्पताल से बाहर न ले जाया जाए.

इस मामले की सुनवाई कर रहे न्यायधीशों ने कहा था, ''मेडिकल सलाह के बिना इस नवजात को अस्पताल से बाहर न ले जाया जाए.''

सांकेतिक तस्वीर

इमेज स्रोत, Getty Images

क्या हुआ था?

छोड़कर पॉडकास्ट आगे बढ़ें
कहानी ज़िंदगी की

मशहूर हस्तियों की कहानी पूरी तसल्ली और इत्मीनान से इरफ़ान के साथ.

एपिसोड

समाप्त

दरअसल दादर और नगर हवेली के एक दंपती ने गर्भपात कराने की अनुमति को लेकर हाईकोर्ट का दरवाज़ा खटखटाया था.

इस महिला को मार्च महीने में ये पता चला कि वो गर्भवती हैं.

जुलाई महीने में उन्हें तेज़ ख़ांसी की शिकायत हुई और सांस लेने में भी दिक्कत हुई जिसके बाद उन्हें स्थानीय अस्पताल में भर्ती कराया गया.

जांच के बाद ये पता चला कि इस महिला के दिल में 20 मिलीमीटर का छेद है.

डॉक्टरों ने उन्हें गर्भपात कराने और कॉर्डियोलॉजिस्ट से सलाह लेने को कहा.

ख़बरों के मुताबिक़, इसके बाद दंपती ने मुंबई के पार्ले स्थित केईएम अस्पताल का रुख़ किया.

केईएम अस्पताल के मेडिकल बोर्ड ने कहा कि ये ख़तरनाक हो सकता है. एमटीपी कराने की सिफ़ारिश की और इसके लिए मरीज़ और रिश्तेदार से सहमति लेने को कहा.

इस मामले हाई कोर्ट ने एमटीपी की प्रक्रिया होने से पहले दंपती की सहमति लेने को कहा और फिर 27 हफ़्ते पर गर्भपात की अनुमति दे दी.

बीबीसी ने केईएम अस्पताल से इस मामले में बात करने की कोशिश की लेकिन कोई जवाब नहीं मिला.

छपी ख़बरों के मुताबिक़, इस मामले पर केईएम अस्पताल ने बॉम्बे हाई कोर्ट के समक्ष विस्तृत रिपोर्ट पेश की जिसमें इस महिला की मेडिकल स्थिति पर जानकारी दी गई वहीं कोर्ट ने कॉर्डियोलॉजिस्ट की राय भी जानी और इसमें ये भी बताया गया कि बच्चा ज़िंदा पैदा होगा.

डॉ निखिल डी दातार
इमेज कैप्शन, डॉ निखिल डी दातार.

'ज़िंदा पैदा नहीं होना चाहिए था भ्रूण'

मुंबई में स्त्री रोग विशेषज्ञ डॉ निखिल डी दातार कहते हैं कि ये कोई नया मामला नहीं है और गर्भपात के दौरान जीवित भ्रूण होने के मामले पहले भी सामने आते रहे हैं लेकिन ऐसा नहीं होना चाहिए.

वे कहते हैं, ''भ्रूण जिंदा पैदा ही नहीं किया जाना चाहिए था क्योंकि गवर्मेंट रेस्युलेशन या जीआर में बताया गया है कि अगर गर्भवती महिला का तीसरे चरण में गर्भपात होता है तो क्या प्रक्रिया होनी चाहिए और इसके बारे में डॉक्टरों, वकीलों और सरकार को जागरूक होना चाहिए था.''

वे कहते हैं कि एमटीपी एक्ट 2021 में कुछ बदलावों के लिए उन्होंने नई याचिका सुप्रीम कोर्ट में डाली हुई है.

उनके अनुसार, ''24 हफ़्ते के बाद जब भी गर्भपात होगा भ्रूण ज़िंदा ही पैदा होगा लेकिन इसलिए जब भी एमटीपी होती है तो पूरी दुनिया में प्रावधान है और जीआर में भी लिखा है कि भ्रूण के दिल में इंजेक्शन देकर धड़कन को रोका जाए.''

वहीं जीआर में स्थायी मेडिकल बोर्ड की बात कही गई है.

दरअसल साल 2017 में एक नाबालिग़ के बलात्कार के मामले में सुनवाई करते हुए कोर्ट ने केंद्र से राज्यों में स्थायी मेडिकल बोर्ड गठन करने की बात की थी.

इसमें बताया गया था कि अगर कोई नाबालिग या महिला का गर्भपात का मामला तीसरे चरण में आता है तो बोर्ड इस तरह के मामलों में अपना पक्ष रखे, महिला के स्वास्थ्य, भ्रूण की स्थिति और उसके स्वास्थ्य के बारे में जानकारी दें.

इसके बाद केंद्रीय स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय ने विशेषज्ञों के समूह से विचार-विमर्श करने के बाद गवर्मेंट रेस्यूलेशन या जीआर तैयार किया था. इसमें मेडिकल बोर्ड के बारे में कहा गया कि राज्य एक से अधिक स्थायी मेडिकल बोर्ड गठित करेंगे.

इस बोर्ड में इन विभाग से विशेषज्ञों का होना अनिवार्य है-

स्त्री रोग, पीडिएट्रिक, रेडियोलॉजी, कार्डियोलॉजी, न्यूरोलॉजी, मनोचिकित्सक, अस्पताल प्रशासन से प्रतिनिधि और फिटल मेडिसिन से विशेषज्ञ.

अनुभा रस्तोगी, वकील.

इमेज स्रोत, Anubha Rastogi

इमेज कैप्शन, अनुभा रस्तोगी, वकील.

जीआर क्या कहता है?

इसमें गर्भपात कराने के तरीकों के बारे में भी बताया गया है कि गर्भपात सर्जरी या मेडिकल तरीके से होना चाहिए.

डॉ निखिल दातार बताते हैं, ''जब लड़की या महिला गर्भधारण के तीसरे चरण में होती है और गर्भपात का मामला सामने आता है तो जीआर में स्त्री रोग विशेषज्ञ को दो-तीन मिलीलीटर (15%) का पोटेशियम क्लोराइड का इनजेक्शन भ्रूण के दिल में दिए जाने की बात कही गई है.''

वहीं इसके बाद सोनोग्राफ़ी के ज़रिए देखने के बाद भ्रूण की दिल की धड़कन रुक गई है ये देखने के बाद गर्भपात किया जाता है.

डॉ निखिल दातार कहते हैं कि ये सब बातें जीआर में दी गई हैं लेकिन इस पर अमल नहीं हो रहा है.

वकील अनुभा रस्तोगी महिलाओं के गर्भपात कराने के अधिकारों के लिए काम करती हैं.

वे कहती हैं, ''ये एक क़ानूनी नहीं बल्कि मेडिकल मुद्दा है और गर्भवती महिला के तीसरे चरण में जब गर्भपात के ऐसे मामले आते हैं तो डॉक्टरों को भ्रूण को इंजेक्शन देने वाली प्रक्रिया का ही इस्तेमाल करना चाहिए ताकि ऐसे मामले सामने न आएं.''

उनके मुताबिक़ ऐसे मामलों में केवल महिला और डॉक्टर के बीच बात होनी चाहिए और कोर्ट तक ऐसे मामले पहुंचने ही नहीं चाहिए.

मानवाधिकार और एमटीपी एक्ट पर काम करने वाली वकील अदिति सक्सेना कहती हैं कि स्वास्थ्य मंत्रालय के परामर्श नोट के बारे में मेडिकल बोर्ड को जागरूक करना बहुत ज़रूरी है ताकि ऐसे मामले न हो.

वहीं ये भी देखा जाना चाहिए कि ऐसे मामलों के लिए सभी राज्यों में मेडिकल बोर्ड है भी या नहीं.

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)