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सीरिया में असद के पतन के बाद ईरान के सैन्य अड्डों का क्या हाल है?
बंक बेड पर छोड़ दिए खाने में फफूंद लग गया है. वहीं पर एक मिलिट्री यूनिफॉर्म और कुछ हथियार यूं ही पड़े हुए हैं. ये इस सैन्य अड्डे से अचानक पीछे हटने के दौरान छोड़ दी गई निशानियां हैं. ये सैन्य अड्डा कभी ईरान और सीरिया में इसके सहयोगी समूहों का हुआ करता था.
ये मंजर दहशत की कहानी बयां करता है. यहां तैनात सेनाएं बहुत जल्दी भाग खड़ी हुईं. ये एक दशक से मौजूद थीं लेकिन महज कुछ ही हफ़्तों में वो नदारद हो गईं.
ईरान पिछले दस साल से अधिक समय से सीरिया के पूर्व राष्ट्रपति बशर अल-असद का सबसे महत्वपूर्ण सहयोगी था. इसने यहां सैन्य सलाहकारों को तैनात किया था. विदेशी लड़ाकों को संगठित किया था और सीरिया के युद्ध में बेशुमार पैसा झोंका था.
ईरान के इलिट इस्लामिक रेवोल्यूशनरी गार्ड्स कोर (आईआरजीसी) ने यहां अंडरग्राउंड अड्डों का मजबूत नेटवर्क खड़ा किया था. इसने हजारों लड़ाकों को ट्रेनिंग दी और उन्हें हथियार दिए. ईरान के लिए ये उसकी ' सिक्योरिटी बेल्ट' का अहम हिस्सा था.
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बीबीसी ने क्या देखा?
हम इस वक़्त इदलिब प्रांत में ख़ान शायकुन शहर के पास हैं. आठ दिसंबर को असद की सत्ता के ख़ात्मे से पहले तक ये आईआरजीसी और उसके सहयोगियों के लिए अहम रणनीतिक ठिकाना हुआ करता था.
मुख्य सड़क से प्रवेश द्वार मुश्किल से ही दिखता है. ये रेत के ढेर और चट्टानों से ढका हुआ है. एक पहाड़ी की चोटी पर जो वॉचटावर बना हुआ है वो अभी भी ईरानी झंडे के रंग से रंगा हुआ है. यहां से ठीक सामने सैन्य अड्डा दिखता है.
एक रसीदी नोटबुक से इस अड्डे के नाम का पता चलता है. ये शहीद ज़ाहेदी का ठिकाना है. इसका नाम मोहम्मद रज़ा ज़ाहेदी के नाम पर पड़ा है. वो आईआरजीसी के कमांडर थे, जिनकी 1 अप्रैल 2024 को सीरिया में ईरानी दूतावास पर कथित इसराइली हमले में मौत हो गई थी.
यहां हाल में ही चीजों की सप्लाई हुई थी. हमें चॉकलेट, चावल, खाना पकाने के तेल वगैरह की रसीदें मिलीं.
इससे पता चलता है कि यहां आखिरी वक़्त तक रोजमर्रा की ज़िंदगी चल रही थी. लेकिन अब अड्डे पर नए लोगों का कब्जा है. और वो हैं हयात तहरीर अल-शाम (एचटीएस) के सशस्त्र वीगर लड़ाके.
ये एक इस्लामी चरमपंथी समूह है और जिसके नेता अहमद अल-शरा को सीरिया का नया अंतरिम राष्ट्रपति बनाया गया है.
'जितने भी ईरानी यहां थे सब भाग गए'
वीगर लड़ाके अचानक एक मिलिट्री वैन में पहुंचे और हमसे हमारे मीडिया मान्यता पत्र की मांग करने लगे.
उनमें से एक ने अपनी मातृभाषा तुर्की से निकली बोलियों में से एक में कहा, '' जितने भी ईरानी यहां थे वो सब भाग गए. जो कुछ भी यहां बचा है वो सब उन्हीं का है. ये प्याज और बचा हुआ खाना भी.''
खुले में पड़ी पेटियों में रखे प्याज अब अंकुरित होने लगे थे.
ये सैन्य अड्डा सुरंगों की एक भूलभुलैया जैसा था. ऐसी सुरंगे जो सफेद चट्टानी पहाड़ियों में अंदर तक चली गई थीं. कुछ कमरों में बंक बेड थे. उनमें खिड़कियां नहीं थीं. एक गलियारे की छत को ईरानी झंडे के रंग के कपड़े से सजाया गया है. पत्थर की एक ताक पर फ़ारसी में लिखी कुछ किताबें दिखीं.
यहां मौजूद रही सेनाओं ने अपने संवेदनशील जानकारियों से भरे कुछ दस्तावेज अपने पीछे छोड़ दिए हैं. ये सभी फारसी भाषा में हैं.
इनमें लड़ाकों की व्यक्तिगत जानकारी, सैन्य कर्मियों के कोड, घर के पते, पति-पत्नी के नाम और मोबाइल फोन नंबरों का ब्योरा है.
इसमें लिखे नामों से साफ है कि इस सैन्य अड्डे में कई लड़ाके अफ़गान ब्रिगेड के थे. ईरान ने सीरिया से लड़ने के लिए इसका गठन किया था.
ईरान समर्थित संगठनों से जुड़े सूत्रों ने बीबीसी फ़ारसी को बताया कि इस सैन्य अड्डे में मुख्य रूप से ईरानी "सैन्य सलाहकारों" और उनके ईरानी कमांडरों के साथ अफगान सेनाएं रह रही थीं.
ईरान के मुताबिक़ वो "जिहादी समूहों के ख़िलाफ़ लड़ने" और कट्टरपंथी सुन्नी चरमपंथियों के ख़िलाफ़ "शिया समूह के पवित्र स्थलों की रक्षा के लिए सीरिया में अपनी सैन्य मौजूदगी बनाए हुए था.''
आर-पार की लड़ाई के वक़्त तैयार नहीं था ईरान
ईरान ने मुख्य रूप से अफ़ग़ान, पाकिस्तानी और इराकी लड़ाकों के अर्द्धसैनिक बल बनाए थे.
लेकिन आर-पार की लड़ाई का वक़्त आया तो ईरान इसके लिए तैयार नहीं था. कुछ सैन्य अड्डों पर पीछे हटने का आदेश बिल्कुल आख़िरी वक़्त पर आया.
ईरान समर्थित एक इराकी अर्द्धसैनिक गुट के वरिष्ठ सदस्य ने मुझसे कहा, " घटनाक्रम इतना तेज़ था कि लोगों को सिर्फ अपना बैकपैक उठाने और यहां निकलने का ही समय मिल पाया.''
आईआरजीसी के करीबी कई सूत्रों ने बीबीसी को बताया कि ज्यादातार लड़ाकों को इराक भागना पड़ा. कुछ लोगों को लेबनान या रूस में मौजूद सैन्य अड्डों में जाने को कहा गया. उन्हें रूसी सैनिकों ने सीरिया से निकलने में मदद की.
हयात तहरीर अल-शाम के एक सैनिक मोहम्मद अल रब्बात ने साथी लड़ाकों के समूह को इदलिब से अलेप्पो और सीरिया की राजधानी दमिश्क तक कूच करते देखा है.
उन्होंने बताया कि उन लोगों ने ये सोचा था कि उनका ये ऑपरेशन "लगभग एक साल" चलेगा. ज्यादा से ज्यादा अलेप्पो कब्जा करने में उन्हें तीन से छह महीने लगेंगे. लेकिन उनकी खुशी का ठिकाना नहीं रहा जब वो कुछ ही दिनों के बाद वो अलेप्पो में घुस गए.
7 अक्टूबर को इसराइल पर हमास के हमले के बाद जिस तेज़ी से घटनाक्रम बदला और उसकी वजह से सीरिया के बशर अल-असद की सत्ता का अंत हो गया.
उस हमले के कारण सीरिया में आईआरजीसी और ईरान समर्थित समूहों के खिलाफ इसराइली हवाई हमले बढ़ गए.
साथ ही ईरान के प्रमुख सहयोगी के ख़िलाफ़ भी युद्ध शुरू हो गया
35 वर्षीय लड़ाके रब्बात का कहना है कि ईरान और हिज़बुल्लाह इसकी वजह से मनोवैज्ञानिक तौर पर कमजोर हो गए. लेकिन सबसे बड़ा झटका अंदर से मिला. असद और उनके ईरान से जुड़े सहयोगियों के बीच दरार थी.
"उनके बीच भरोसा और सैन्य सहयोग पूरी तरह से ख़त्म हो गया. आईआरजीसी से जुड़े समूह असद पर विश्वासघात का आरोप लगा रहे थे और मान रहे थे कि वो अपने ठिकानों पर इसराइल को कब्जा करने दे रहे हैं.''
क्या कहते हैं स्थानीय लोग?
जैसे ही हम ख़ान शायकुन से गुज़रते हैं, हमें ईरानी झंडे के रंग में रंगी हुई एक सड़क मिलती है. ये हमें यह एक स्कूल बिल्डिंग की ओर ले जाती है, जिसका इस्तेमाल ईरानी हेडक्वार्टर के तौर पर किया जा रहा था.
यहां टॉयलेट्स के पास दीवारों पर 'इसराइल मुर्दाबाद' और 'अमेरिका मुर्दाबाद' के नारे लगे दिखे.
ये भी साफ था कि इन हेडक्वार्टर्स को बिल्कुल थोड़े समय पहले दी गई सूचना के आधार पर खाली कराया गया था. यहां भी हमें बेहद संवेदनशील गोपनीय दस्तावेज मिले.
65 वर्षीय अब्दुल्ला और उनका परिवार उन बहुत थोड़े लोगों में शामिल हैं जो आईआरजीसी के नेतृत्व वाले समूहों के साथ रहते थे. उनका कहना है कि यहां ज़िंदगी बेहद मुश्किल थी.
उनका घर मुख्यालय से महज कुछ मीटर की दूरी पर है और बीच-बीच में कंटीले तारों वाली गहरी खाइयां हैं.
वह कहते हैं, ''रात में आना-जाना प्रतिबंधित था.''
अब्दुल्ला का कहना है कि पड़ोस में ईरान समर्थित समूहों की मौजूदगी ने जीवन को कठिन बना दिया है.
उनके पड़ोसी के घर को एक सैन्य चौकी में तब्दील कर दिया गया है.
वो याद करते हैं, ''वे सड़क पर अपनी बंदूकें तानकर बैठ रहे थे और हम सभी के साथ संदिग्धों जैसा व्यवहार करते थे.''
वो कहते हैं, '' उनका कहना है कि ज़्यादातर लड़ाके अरबी नहीं बोलते थे. वो अफ़गानी, ईरानी और हिज़बुल्लाह के लड़ाके थे. लेकिन हम उन सभी को ईरानी कहते थे क्योंकि ईरान ही उन्हें नियंत्रित कर रहा था."
अब्दुल्ला की पत्नी जौरीह का कहना है कि वह खुश हैं कि "ईरानी मिलिशिया" चले गए हैं लेकिन उन्हें उनकी वापसी से पहले का "तनावपूर्ण" पल अभी भी याद है.
उसने सोचा था कि वो गोलीबारी में फंस जाएंगे क्योंकि ईरान समर्थित समूह अपनी स्थिति मजबूत कर रहे थे और लड़ने के लिए तैयार हो रहे थे, लेकिन फिर "वो कुछ ही घंटों में गायब हो गए.''
अब्दो कहते हैं "यह एक कब्ज़ा था. ईरानी कब्ज़ा,". अब्दो दूसरे लोगों की तरह दस साल बाद अपने परिवार के साथ यहां लौटे हैं. उनका घर भी सैन्य अड्डा बन गया था.
सीरिया में अब ईरान से दूरी
वर्षों तक अपनी सैन्य मौजूदगी का विस्तार करने के बाद, ईरान ने सीरिया में जो कुछ भी खड़ा किया था वो अब बरबाद हो चुका है.
युद्ध के मैदान में और ऐसा लगता है सीरिया की एक बड़ी आबादी की नज़र में जो कुछ भी बना था वो ध्वस्त हो चुका है.
इस छोड़ दिए गए सैन्य अड्डे में आख़िरी क्षणों में भी ईरान का सैन्य विस्तार जारी था. कैंप के बगल में सुरंगें बन रही थीं.
ये साफ़ था के यहां एक फील्ड हॉस्पिटल बनाया जा रहा था. दीवारों पर सीमेंट अभी भी गीला था और पेंट ताज़ा.
लेकिन अब बेहद कम समय में ख़त्म हो गई लड़ाई के सबूत बच गए हैं. गोलियों के कुछ खोखे और ख़ून से सनी एक सैनिक वर्दी.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़ रूम की ओर से प्रकाशित