क़ासिम सुलेमानी: ईरान के 'हीरो' ने गठजोड़ खड़ा किया था उसका भविष्य क्या है?

    • Author, क़श्यार जुनैदी और फ़र्ज़ाद सिफ़िकरन
    • पदनाम, बीबीसी फ़ारसी सेवा

पिछले महीने ईरान समर्थित सीरियाई सरकार के पतन ने मध्य पूर्व के प्रमुख खिलाड़ियों में से एक माने जाने वाले गठजोड़ 'एक्सिस ऑफ़ रेज़िस्टेंस' को बहुत बड़ा झटका दिया है.

यह गठजोड़ हिज़्बुल्लाह समेत मध्य पूर्व के प्रमुख सशस्त्र गुटों से मिलकर बना है.

इस गठजोड़ को खड़ा करने के पीछे प्रमुख चेहरों में से एक ईरान की एलिट कुद्स फोर्स के कमांडर क़ासिम सुलेमानी थे. क़ासिम सुलेमानी की मौत को पाँच साल पूरे हो गए हैं.

पाँच बरस पहले जब अमेरिकी सेना ने बग़दाद में क़ासिम सुलेमानी को निशाना बनाकर उन्हें मारा था, उस वक़्त डोनाल्ड ट्रंप अमेरिका के राष्ट्रपति थे.

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इस गठजोड़ के भविष्य पर एक नज़र...

क़ासिम सुलेमानी ईरान की एलिट कुद्स फ़ोर्स के कमांडर थे. ये फ़ोर्स इस्लामिक रिवॉल्यूशन गार्ड कोर (आईआरजीसी) की एक प्रमुख शाखा है, जो विदेशों में ईरान के अभियानों को अंजाम देती है. साथ ही सुलेमानी पूरे क्षेत्र में ईरान के प्रभाव और उसकी सैन्य रणनीति के भी प्रमुख वास्तुकार थे.

तीन जनवरी 2020 को एक अमेरिकी ड्रोन हमले में सुलेमानी की मौत हो गई थी. मारे जाने से तीन महीने पहले सुलेमानी ने आईआरजीसी के कमांडरों को एक गुप्त भाषण दिया था. इस दौरान उन्होंने एक्सिस ऑफ़ रेज़िस्टेंस के 'मात्रात्मक और गुणात्मक विस्तार' पर बात की थी.

ऐसा लग रहा था कि शायद सुलेमानी को कुछ दिनों बाद आने वाली मौत का अंदाज़ा लग रहा था. कुद्स फ़ोर्स के कमांडर के तौर पर अपने दो दशकों के कार्यकाल पर वह एक रिपोर्ट पेश करना चाहते थे.

अपने भाषण में उन्होंने कहा, "आईआरजीसी ने रेज़िस्टेंस को विस्तार और ताक़त दोनों रूप से विकसित किया है. इसका दायरा दक्षिणी लेबनान के 2000 वर्ग किलोमीटर से बढ़कर 5 लाख वर्ग किलोमीटर तक फैल गया है."

सुलेमानी ने कहा, "आईआरजीसी ने एक्सिस ऑफ़ रेज़िस्टेंस के बीच एक क्षेत्रीय गठजोड़ बनाया. यानी इसने ईरान को इराक़, इराक़ को सीरिया और सीरिया को लेबनान से जोड़ा. आज आप तेहरान में एक कार में बैठ सकते हैं और सीधे बेरूत के दक्षिणी इलाक़ों में उतर सकते हैं."

ईरान में एक्सिस ऑफ़ रेज़िस्टेंस को सुलेमानी की प्रमुख उपलब्धियों में से एक के तौर पर देखा गया था लेकिन पिछले एक साल में इस गठजोड़ को कई बड़े झटके लगे हैं.

मध्य पूर्व को बदलने वाला विचार

ईरान के क्षेत्रीय विस्तार का आरंभ 1980 के दशक के शुरुआती सालों में हुआ, जब उसने लेबनान में अमेरिका और इसराइल का सामना करने के लिए शिया संगठन हिज़्बुल्लाह को खड़ा किया.

2003 में इराक़ पर अमेरिकी हमले, 2011 में अरब स्प्रिंग की शुरुआत और फिर इस्लामिक स्टेट जैसे सुन्नी चरमपंथी संगठनों के उभार ने इस क्षेत्र में अस्थिरता पैदा कर दी. हालांकि, ये ईरान के लिए इस क्षेत्र में अपनी मौजूदगी को और मज़बूत बनाने का मौक़ा बना.

सीरिया में आईआरजीसी बलों की तैनाती और इराक़ के साथ ही लेबनान में शिया चरमपंथी गुटों की मौजूदगी ने ईरान की सीमाओं से लेकर भूमध्यसागर के तट तक एक क्षेत्रीय संपर्क स्थापित किया, जिसका दायरा इसराइल की सीमाओं तक पहुंच गया.

यरुशलम की हिब्रू यूनिवर्सिटी के प्रोफ़ेसर डैनियल सोबलमैन का मानना है कि साल 2003 में इराक़ पर अमेरिकी हमले से पहले ईरान और उसके नियंत्रित क्षेत्रों के बीच ऐसा कोई लैंड कॉरिडोर बनाने का विचार संभव नहीं था.

उन्होंने कहा, "इराक़ युद्ध ने ईरान को अपने रास्ते इराक़, सीरिया और वहां से सीधे लेबनान से जोड़ने का मौक़ा दिया. ये वाकई अहम है क्योंकि इसी के ज़रिए हिज़्बुल्लाह लेबनान में ईरान के क्षेत्रीय योजना का झंडाबरदार और एक्सिस ऑफ़ रेज़िस्टेंस की आधारशीला बन गया."

यमन भी गृह युद्ध में फंस गया, जिसकी राजधानी और कई प्रमुख शहर ईरान के साथ गठजोड़ रखने वाले हूती शिया मिलिशिया के नियंत्रण में आ गए.

इसराइल की चारों ओर से घेराबंदी

हालिया वर्षों में 'एक्सिस ऑफ़ रेज़िस्टेंस' मुख्य तौर पर शिया गुटों, फ़लस्तीनी गुट हमास, इस्लामिक जिहाद जैसे कुछ सुन्नी समूहों के बीच क्षेत्रीय गठबंधन का प्रतीक बन गया है, जिसका मकसद मध्य पूर्व के क्षेत्र में पश्चिमी और इसराइली प्रभाव का सामना करना है.

ये गठजोड़ यानी एक्सिस लेबनान में हिज़्बुल्लाह, इराक़ में शिया मिलिशिया और यमन के हूती विद्रोहियों जैसे नॉन स्टेट एक्टर्स के साथ ही सीरिया में बशर अल-असद की सरकार से मिलकर बना है. ये गठजोड़ ईरान के सबसे अहम भू-राजनीतिक हथियार के तौर पर काम करता रहा है.

वास्तव में, अगर इस नेटवर्क का समर्थन न रहता तो सीरिया में असद शासन का पतन बहुत पहले ही हो चुका होता.

एक्सिस ऑफ़ रेज़िस्टेंस ने इसराइली सीमाओं के चारों ओर घेराबंदी जैसा किया है. इसराइल और अमेरिका को संभालने में ये गठजोड़ ईरान का अहम ज़रिया भी बन गया है.

जॉर्ज डब्लू बुश के कार्यकाल में शुरू इराक़ और अफ़ग़ानिस्तान में अमेरिकी सेना की जंग और उसके बाद ओबामा प्रशासन की ईरान के साथ परणामु समझौते के टूटने से जुड़ी चिंता, उन बड़े कारणों में थे जिनसे ईरान को क्षेत्र में अपनी स्थिति मज़बूत करने और एक्सिस ऑफ़ रेज़िस्टेंस को विस्तार देने में मदद मिली.

ट्रंप के पिछले राष्ट्रपति कार्यकाल के दौरान अमेरिकी राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार रहे जॉन बोल्टन का कहना है कि इस गठजोड़ के विस्तार के साथ अपनी सेना को मज़बूत करने के ईरान के प्रयास सफल रहे.

वह कहते हैं, "ईरान का एक्सिस ऑफ़ रेज़िस्टेंस बनाने प्रयास एक गंभीर प्रयास था. वही चीज़ जिसे सुलेमानी और कुद्स फ़ोर्स अक्सर इसराइल के ख़िलाफ़ 'रिंग ऑफ़ फ़ायर' की रणनीति कहा करते थे."

"मुझे लगता है कि उन्होंने अपनी इस कोशिश में लंबे अरसे तक अरबों डॉलर लगाए, जो वास्तव में लेबनान में हिज़्बुल्लाह के गठन के साथ शुरू हुआ था. जब आप इसे ईरान के परमाणु और बैलिस्टिक मिसाइल प्रोग्राम के साथ जोड़ते हैं, तो यह बेहद महत्वाकांक्षी योजना थी और इसमें ईरान को बहुत बड़ी सफलताएं भी मिलीं."

ट्रंप ने दिया था हत्या का आदेश

पांच साल पहले अमेरिका के तत्कालीन राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने क़ासिम सुलेमानी की हत्या करने का आदेश दिया था. इसने 'एक्सिस ऑफ रेज़िस्टेंस' का असर ख़त्म करने की भूमिका तैयार कर दी थी.

आने वाले कुछ दिनों में ट्रंप एक बार फिर व्हाइट हाउस में लौट रहे हैं. ये वो दौर है जब ईरान मध्य पूर्व में अब तक के अपने सबसे कमज़ोर हालत में दिख रहा है.

ट्रंप अपने पहले कार्यकाल में ईरान के ख़िलाफ़ ''अधिकतम दबाव'' का अभियान चलाते रहे थे.

इसमें अमरिका का अंतरराष्ट्रीय परमाणु संधि से अलग होना और ईरान पर कड़े प्रतिबंध लगाने जैसा कदम शामिल था. इन प्रतिबंधों के बाद सात साल के दौरान ईरान की अर्थव्यवस्था लगभग चरमरा गई.

कमांडर सुलेमानी की मौत के साथ ही इस दबाव ने मिलकर मध्य पूर्व में ईरान की भूमिका को काफी कमज़ोर कर दिया.

हालांकि इसराइल पर 7 अक्टूबर 2023 के हमास के हमले के बाद ईरान की चुनौतियां और बढ़ गई हैं.

इस बीच, हमास नेताओं की मौत और ग़ज़ा में इसकी ताक़त के ध्वस्त होने के साथ बेरूत में हिज़्बुल्लाह नेता हसन नसराल्लाह की हत्या ने भी ईरान को कमज़ोर किया है.

हिज़्बुल्लाह के कई नेताओं को निशाना बनाए जाने की वजह से ईरान की प्रतिरोधी क्षमता कमज़ोर हो गई.

डेनियल सोबलमैन के मुताबिक़ हिज़्बुल्लाह की सैन्य मशीनरी के कमज़ोर पड़ने की वजह से लंबे समय के लिए क्षेत्रीय समीकरण को इसराइल के पक्ष में कर दिया है.

वो कहते हैं, ''हिज़्बुल्लाह ने पिछले कुछ सालों में खुद को एक्सिस ऑफ़ रेज़िस्टेंस के सबसे ताकतवर घटक के तौर पर स्थापित कर लिया था. अब स्थिति ये है कि इसके टिके रहने की संभावना पर चर्चा करने की नौबत आ गई है. इस पर अचरज होता है.''

उनका कहना है , "एक्सिस ऑफ़ रेज़िस्टेंस संतुलन को ईरान के पक्ष में करने में कामयाब रहा था. लेकिन अब हालात पूरी तरह पलट गए हैं.''

दूसरी ओर सीरिया में राष्ट्रपति बशर अल-असद के शासन का भी अंत हो चुका है. इसे ईरान के समर्थकों ने प्रतिरोध के दायरे का एक स्तंभ करार दिया था. असद शासन के अंत ने एक्सिस ऑफ़ रेज़िस्टेंस को ऐसी चोट पहुंचाई है, जिसकी भरपाई मुश्किल है.

जॉन बॉल्टन कहते हैं, ''असद के शासन के ख़ात्मे का किसी ने अंदाजा नहीं लगाया था. इसमें कोई शक़ नहीं है कि ये ईरान की एक बड़ी हार है.''

उन्होंने कहा, ''यह हिज़्बुल्लाह के लिए भी एक बड़ी हार है. हिज़्बुल्लाह इसराइल के दबाव में है और हथियारों की सप्लाई की गंभीर समस्या से जूझ रहा है.''

एक्सिस ऑफ़ रेज़िस्टेंस के लिए आगे क्या?

बीते दिनों जो कुछ हुआ उसमें ईरान एक्सिस ऑफ़ रेज़िस्टेंस के कई कमांडरों और नेताओं को खो चुका है.

अपने क्षेत्रीय सहयोगियों से संपर्क टूटने की वजह से वो खुद को मुश्किल हालात में पा रहा है.

इराक़ में कुछ शिया मिलिशिया समूहों के साथ-साथ यमन में हूती विद्रोही ही अब इस क्षेत्र में ईरान की ताक़त रह गए हैं. लेकिन दोनों अमेरिका और इसराइल के व्यापक हमलों की ज़द में हैं.

एक दौर में एक्सिस ऑफ़ रेज़िस्टेंस को बड़ी क्षेत्रीय ताकत माना जाता था. लेकिन अब ईरान के अरबों डॉलर के निवेश और सीरिया और संघर्ष से घिरे दूसरे इलाक़ों में हज़ारों लोगों का खून बहाने के बाद, इसके सामने अभूतपूर्व चुनौतियां आ खड़ी हुई हैं.

अब व्हाइट हाउस में ट्रंप दोबारा आ रहे हैं. अगर ईरान और अमेरिका के बीच कोई समझौता नहीं होता है तो अमेरिकी प्रशासन चीन और इराक़ पर दबाव बढ़ा सकता है. उन पर ये दबाव बनाया जा सकता है कि वो ईरान से तेल न खरीदें. अमेरिका पॉपुलर मोबाइल फ़ोर्सेज (पीएमएफ़) के शिया मिलिशिया के ख़ात्मे के लिए भी कदम उठा सकता है.

बहरहाल, मध्य पूर्व के उथलपुथल भरे माहौल के बीच पिछले साल दिसंबर में ईरान के सर्वोच्च नेता आयातुल्लाह अली ख़ामेनेई ने कहा था, ''एक्सिस ऑफ़ रेज़िस्टेंस पर जितना दबाव बढ़ेगा वो उतना ही प्रेरित होगा. अब रेज़िस्टेंस का दायरा इस क्षेत्र से भी आगे जाएगा.''

उनकी टिप्पणी से ऐसा लगता है कि ईरान एक्सिस ऑफ़ रेज़िस्टेंस को दोबारा खड़ा करने की कोशिश कर सकता है. इसके साथ वो अपने ख़त्म हो चुके क्षेत्रीय कनेक्शन को भी दोबारा बहाल करने के लिए मशक्कत कर सकता है.''

इसराइली सेना में पूर्व ख़ुफ़िया अधिकारी और सुरक्षा ख़तरों से जुड़े मामलों के विशेषज्ञ इब्राहिम लेविन का कहना है कि एक्सिस ऑफ़ रेज़िस्टेंस में बदला लेने की भावना उफ़ान पर है. इसके नेता फिर से इसकी पुरानी ताक़त को बहाल करने की कोशिश कर सकते हैं.

लेविन का मानना है कि कुछ हद तक सीरिया को खो देने के बाद ईरान एक बार फिर वहां खुद को स्थापित करने की कोशिश कर सकता है. वो हयात अल-तहरीर अल-शाम (एचटीएस) नेता अल-शारा (अल-जुलानी) जैसे लोगों से सीरियाई इलाक़ों के फिर से इस्तेमाल की इज़ाज़त मांग सकता है.

सोबलमैन का मानना है कि मौजूदा समय मध्यपूर्व में राजनीतिक इनोवेशन करने के लिहाज़ से बेहद अहम हो सकता है.

उन्होंने कहा, ''शायद ये इसराइल-फ़लस्तीन संघर्ष को ख़त्म करने का भी अवसर हो सकता है.''

वो कहते हैं, ''ये राजनेताओं के लिए सही वक़्त है जब राजनेता और राजनीति को शक्ल देने वाले लोग युद्ध से पैदा हालात की समीक्षा करें और क्षेत्र के बेहतर भविष्य के लिए कोई वैकल्पिक रास्ता तलाशें.''

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