क्या हथियार छोड़ सकता है हिज़्बुल्लाह?

    • Author, ह्यूगो बशेगा
    • पदनाम, मध्य-पूर्व संवाददाता

बेघर होकर अलग-अलग जगहों पर रह रहे लेबनान के हज़ारों लोगों ने पिछले महीने 26 जनवरी को दक्षिणी लेबनान में मौजूद अपने घरों की ओर लौटने की कोशिश की.

उन्होंने गीत बजाकर और हिज़्बुल्लाह के पीले रंग के झंडे लहराते हुए झुंड में यात्रा की.

कई लोगों ने पाया कि एक साल की जंग के बाद उनका घर बचा ही नहीं था, जहां वो वापस लौट सकें.

उन्होंने जो खो दिया उस पर शोक जाहिर किया और टूट चुकी इमारतों के मलबे में हसन नसरल्लाह को याद करते हुए पोस्टर लगाए.

इस दिन इसराइली सैनिकों की वापसी होनी थी क्योंकि ये युद्धविराम की शर्त थी. युद्धविराम के तहत ही हिज़्बुल्लाह को दक्षिणी लेबनान से अपने हथियार और लड़ाके भी हटाने थे.

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युद्धविराम के तहत लेबनान को दक्षिणी इलाके में अपने हजारों सैनिकों की तैनाती भी करनी थी. लेकिन इसराइल ने कहा है कि लेबनान ने युद्धविराम की शर्तों को पूरी तरह से लागू नहीं किया है इसलिए वो अपनी सेना नहीं हटा रहा है.

लेबनान ने भी इसराइल पर देरी करने का आरोप लगाया है.

हैरान करने वाली बात नहीं है कि इस पर हिंसा भी हुई. कुछ इलाकों में इसराइली सैनिकों ने गोलियां चलाई और लेबनान के एक सैनिक समेत 24 लोगों की मौत भी हुई.

हिज़्बुल्लाह जो कि दक्षिणी लेबनान में सालों तक ताकतवर रहा है उसके लिए हिंसा अपने आप को मज़बूती से पेश करने का मौका है. लेकिन सवाल ये है कि लेबनान और मध्य पूर्व में हो रहे बदलाव के बीच क्या हिज़्बुल्लाह टिक पाएगा?

हिज़्बुल्लाह के पास क्या विकल्प?

हिज़्बुल्लाह सालों से राजनीतिक और समाजिक आंदोलन के ज़रिए लेबनान का सबसे मज़बूत ग्रुप बना रहा है. ईरान के समर्थन के साथ हिज़्बुल्लाह की फोर्स लेबनान की सेना से ज़्यादा मज़बूत रही है.

हिज़्बुल्लाह के लिए हिंसा का इस्तेमाल करना हमेशा एक विकल्प रहा है. संसद में ताक़तवर गुट होने का मतलब है कि उसकी सहमति के बिना कोई बड़ा फैसला नहीं लिया जा सकता है.

सीधे शब्दों में कहें तो हिज़्बुल्लाह के पास देश को ठप्प करने की क्षमता है और उसने कई बार ऐसा किया भी है.

ताज़ा तनाव की शुरुआत अक्तूबर 2023 में हुई, जब हिज़्बुल्लाह ने इसराइल के खिलाफ मोर्चा खोला और इसराइल ने ग़ज़ा के हमलों का जवाब देने के लिए जंग की शुरुआत की.

बीते साल सितंबर में इसराइल ने हिज़्बुल्लाह को ज़बरदस्त नुकसान पहुंचाया. पहले हिज़्बुल्लाह के सदस्यों के पास मौजूद पेजर में धमाके हुए. फिर वॉकी टॉकी में धमाके हुए.

इसके बाद इसराइल के हवाई हमलों में लेबनान में चार हज़ार से ज़्यादा लोग मारे गए, जिनमें से अधिकतर सामान्य नागरिक थे.

हिज़्बुल्लाह का फोकस कहां है?

हसन नरल्लाह जो कि क़रीब तीन दशक तक हिज़्बुल्लाह का चेहरा रहे, उनके समेत ग्रुप के कई नेताओं की हत्या हुई. उनके उत्तराधिकारी नेम कसीम ने माना कि उन्हें बेहद गहरा नुक़सान पहुंचा है.

नवंबर में लागू हुआ युद्धविराम समझौता एक तरह से इसराइल के सामने हिज़्बुल्लाह का आत्मसमपर्ण था. हिज़्बुल्लाह को अमेरिका, ब्रिटेन और कई अन्य देश आतंकवादी संगठन मानते हैं.

इस नई हकीकत के बीच लेबनान की संसद ने पिछले महीने यानी जनवरी में नए राष्ट्रपति को चुना. देश के पूर्व सेना प्रमुख रहे राष्ट्रपति जोसेफ़ ओन को अमेरिका का समर्थन मिलता रहा है.

ओन ने प्रधानमंत्री के तौर पर नवफ़ सलाम की नियुक्ति की जो कि इंटरनेशनल कोर्ट ऑफ जस्टिस के चीफ रहे हैं और किसी भी तरह हिज़्बुल्लाह के साथ जुड़े हुए नहीं रहे.

हिज़्बुल्लाह दावा करता रहा है कि इस संघर्ष में उसकी जीत हुई है लेकिन कई लोग जानते हैं कि सच क्या है.

इस जंग में हिज़्बुल्लाह को जान और माल का बड़ा नुक़सान पहुंचा है. वर्ल्ड बैंक के अनुमान के मुताबिक इमारतों को पहुंचे नुकसान की कीमत करीब तीन अरब अमेरिकी डॉलर है.

क्या हैं हिज़्बुल्लाह पर दबाव डालने के ख़तरे?

ढह चुकी अर्थव्यवस्था वाले देश लेबनान की मदद कौन करेगा यह कोई नहीं जानता है. अगर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मदद होगी भी तो लेबनान पर हिज़्बुल्लाहके खिलाफ कदम उठाने की शर्त रखी जा सकती है.

हिज़्बुल्लाह ने कुछ पीड़ित परिवारों को मुआवजा दिया है. ऐसा साल 2006 की जंग के वक्त भी किया गया था. लेकिन अब लोगों में असंतोष के संकेत भी मिले हैं.

मध्य पूर्व मामलों के जानकार और 'वॉरियर्स ऑफ गॉड' के लेखक निकोलस ब्लेनफ़ोर्ड कहते हैं, "अगर 6 महीने से लोग शिविर में रह रहे हैं और उनके घर ढह चुके हैं तो वो हिज़्बुल्लाह को जिम्मेदार ठहराएंगे, सरकार या इसराइल को नहीं. उसी से बचने के लिए हिज़्बुल्लाह इतनी कोशिशें कर रहा है. अभी की स्थिति में आप हिज़्बुल्लाह को थोड़ा पीछे धकेल सकते हैं."

लेकिन किसी भी कार्रवाई के अपने खतरे होते हैं.

26 जनवरी को घंटों की मशक्कत के बाद जब लोग घर लौटने की कोशिश में थे तो एक युवा को अपनी मोटरसाइकिल पर बेरूत के आस-पास गैर शिया बहुल इलाकों में हिज़्बुल्लाह के झंडे को लहराते हुए देखा गया. कुछ लोगों ने उसका विरोध भी किया.

एक ऐसे देश में जहां सांप्रदायिकता की जड़ें गहरी रही हैं, वहां साल 1975 से 1990 तक चली सिविल वॉर की यादें भी ताजा हैं. वहां इसे डराने और धमकाने वाले कदम के रूप में देखा गया.

ब्लेनफ़ोर्ड कहते हैं, "हिज़्बुल्लाह की सैन्य शक्ति के कारण हिंसा का ख़तरा है. अगर आप उन्हें धकेलने की कोशिश करेंगे तो वो जोरदार तरीके से वापसी करेंगे."

एक पश्चिमी राजनयिक ने नाम नहीं बताने की शर्त पर कहा, "अगर आप हिज़्बुल्लाह को ठिकाने लगाने की कोशिश करेंगे तो इसका उलटा अंजाम भी हो सकता है और हिंसा का ख़तरा बहुत ज़्यादा बढ़ जाएगा."

लेकिन फिर भी भ्रष्टाचार और हिंसा के गवाह रहे लेबनान में एक नए अध्याय की शुरुआत हुई है.

नए राष्ट्रपति ओन ने संसद में अपने शुरुआती भाषण में सुधारों का वादा किया और कहा कि इसके बिना लेबनान को नहीं बचाया जा सकता.

उन्होंने सार्वजनिक संस्थानों और अर्थव्यवस्था को मजबूत करने की कसम खाई. उन्होंने कहा कि लेबनान की सेना ही देश में एकमात्र सैन्य ताक़त होगी.

ओन ने हिज़्बुल्लाह का नाम नहीं लिया, लेकिन उनके कहने का मतलब यही था. कुछ लोगों ने इसकी सराहना की, लेकिन हिज़्बुल्लाह के सांसद चुप रहे.

ईरान क्या फ़ैसला लेगा?

माना जाता है कि हिज़्बुल्लाह के सैन्य शक्ति बने रहने का मुद्दा लेबनान से दूर ईरान से तय होगा. इसराइल को घेरने के लिए ईरान हथियारों और पैसे का निवेश करता रहा है. हिज़्बुल्लाह इसकी मुख्य कड़ी रहा है और उसके पास हजारों प्रशिक्षित लड़ाके हैं.

फिलहाल इसराइल से लेबनान का प्रतिरोध खत्म हो चुका है और अगर ईरान भी यही चाहता है तो इसका दोबारा खड़ा होना आसान नहीं होगा.

दिसंबर में सीरिया में असद के शासन का अंत भी हिज़्बुल्लाह को लगने वाले झटकों में से एक रहा. इससे वो रास्ता बंद हो गया, जिसके जरिए ईरान हिज़्बुल्लाह को हथियार और आर्थिक सहायता भेजता था.

इसराइल का कहना है वो हिज़्बुल्लाह पर तब तक हमले जारी रखेगा जब तक कि पूरी तरह से उसकी कमर नहीं टूट जाती.

ब्लेनफ़ोर्ड ने कहा, "हिज़्बुल्लाह के बारे में सवालों के जवाब ईरान ही दे सकता है. ऐसी संभावना है कि ईरान या फिर हिज़्बुल्लाह अलग तरह से सोचें और सिर्फ एक राजनीतिक या समाजिक दल बनकर रह जाएं. लेकिन यह ईरान का फैसला होगा."

क्या ऐसी कल्पना हो सकती है?

हिज़्बुल्लाह के आतंरिक मामलों की जानकारी रखने वाले एक सोर्स से हमने यह जानने की कोशिश की क्या हिज़्बुल्लाह हथियार छोड़ सकता है.

उन्होंने कहा, "यह आगे की बातचीत का हिस्सा हो सकता है. ईरान अपने परमाणु कार्यक्रम के लिए पश्चिमी देशों के साथ किसी समझौते पर पहुंचने की तैयारी कर सकता है."

उन्होंने कहा, "लेकिन पूरी तरह से हथियार छोड़ने और सरकार के मुताबिक उनका इस्तेमाल करने में बहुत फर्क है. ऐसी भी कोई संभावना बन सकती है."

लेबनान के नए नेताओं पर जल्द एक्शन में आने का दबाव है. विदेशी सहयोगी मध्य पूर्व में ताकत के बदलाव को ईरान को कमजोर करने के एक मौके के रूप में देख रहे हैं. वहीं लेबनान के लोग स्थिरता आने की उम्मीद लगा रहे हैं.

लेबनान के लोग खुद को कमजोर बताए जाने की बात को पसंद नहीं करते हैं. हालांकि एक व्यक्ति ने कहा कि, "वो एक सामान्य देश में शांति के साथ जिंदगी जीना चाहते हैं."

हिज़्बुल्लाह के समर्थक भी यह सवाल करेंगे कि उसे क्या भूमिका निभानी चाहिए.

हिज़्बुल्लाह अब वैसा नहीं हो सकता जैसा कि वो जंग शुरू होने से पहले था. इसलिए अब उसके हथियार छोड़ने की कल्पना की जा सकती है.

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़ रूम की ओर से प्रकाशित

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