महिला आरक्षण बिल क्या 2029 में हो पाएगा लागू?

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    • Author, मयूरेश कोन्नूर
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

लोकसभा और विधानसभाओं में जब दशकों के इंतज़ार के बाद महिला आरक्षण का रास्ता अब साफ़ होता दिख रहा है, तब ये सवाल भी उठने लगे हैं कि ये अपनी 'मंज़िल' तक कब पहुँचेगा.

महिला आरक्षण 2023 में आ तो गया लेकिन क्या ये 2024, 2029 या उसके बाद भी हक़ीकत बनेगा?

इसका कारण है 'परिसीमन', जिसे कराए बग़ैर महिला आरक्षण कानून लागू नहीं हो सकता.

परिसीमन यानी निर्वाचन क्षेत्रों की सीमा तय करने की प्रक्रिया.

आप ये सोच सकते हैं कि जब सभी राजनीतिक दल इसके समर्थन में हैं, तो फिर इसके लागू होने की समयावधि पर सवाल क्यों हो रहे हैं?

लेकिन एक समस्या जो प्रस्तावित बिल का हिस्सा है, जो ये कहता है कि आरक्षण आधारित बदलाव जनगणना के बाद ही लागू होंगे और सभी निर्वाचन क्षेत्रों को जनगणना के डेटा के आधार पर फिर से तैयार किया जाएगा.

महिला आरक्षण के मुद्दे पर भले ही विपक्षी दलों ने अपना समर्थन दिया हो, लेकिन साथ ही सरकार को सवालों के कठघरे में भी डाल दिया है.

दरअसल, विपक्ष का कहना है कि बिल तो पास हो जाएगा और क़ानून भी अस्तित्व में आ जाएगा, लेकिन असल में महिलाओं को किस चुनाव में आरक्षण मिलेगा.

इसका सटीक जवाब फ़िलहाल किसी के पास नहीं है.

"मैं एक सवाल पूछना चाहती हूं. भारतीय महिलाएं पिछले 13 साल से इस राजनीतिक ज़िम्मेदारी का इंतज़ार कर रही हैं. अब उन्हें कुछ और साल इंतज़ार करने के लिए कहा जा रहा है. कितने साल? दो साल, चार साल, छह साल, या आठ साल?"

ये सवाल कांग्रेस नेता सोनिया गांधी ने लोकसभा में उठाया.

अन्य विपक्षी दलों के सांसदों ने भी ये सवाल संसद में चर्चा के दौरान पूछा. क्योंकि, कानून लागू करने के लिए जनगणना और परिसीमन की दोनों शर्तें कब पूरी होंगी, इसकी कोई निश्चित समय सीमा नहीं है.

लेकिन ऐसा क्यों है, इसे समझने के लिए इन प्रक्रियाओं को समझना होगा.

जनगणना, परिसीमन और महिला आरक्षण

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भारत में समय-समय पर जनसंख्या के आधार पर लोकसभा और विधानसभा निर्वाचन क्षेत्रों का पुनर्गठन (परिसीमन) किया जाता रहा है.

इस परिसीमन के साथ ही बढ़ती जनसंख्या के अनुरूप संसद और विधानसभाओं में उचित प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करने के लिए, निर्वाचन क्षेत्रों की संख्या भी बढ़ने की उम्मीद है.

भारत में वर्ष 1976 में संवैधानिक संशोधन के बाद लोकसभा में निर्वाचन क्षेत्रों की संख्या का विस्तार वर्ष 2001 तक के लिए रोक दिया गया था.

फिर 2001 में संविधान संशोधन करके इसे वर्ष 2026 तक के लिए फ़्रीज़ कर दिया गया.

वर्ष 2008 में देश के कुछ राज्यों में निर्वाचन क्षेत्रों का पुनर्गठन किया गया और 2009 में अगले आम चुनाव हुए.

लेकिन इसमें सीटों की संख्या नहीं बढ़ाई गई और लोकसभा सदस्यों की संख्या 543 ही रही.

इस दौरान देश की जनसंख्या में वृद्धि हुई.

भारत ने जनसंख्या के मामले में चीन को पीछे छोड़ दिया है, विभिन्न राज्यों में शहरीकरण की गति अलग-अलग दर से बढ़ रही है.

नतीजतन हर मतदाता को उचित प्रतिनिधित्व दिलाने के लिए लोकसभा सदस्यों की संख्या बढ़ाना ज़रूरी समझा गया.

अब सरकार कह रही है कि महिलाओं के लिए आरक्षित सीटें निर्वाचन क्षेत्रों के परिसीमन के बाद लागू होंगी. इसका अर्थ है कि आरक्षण भविष्य में बढ़ाई जाने वाली सीटों के आधार पर दिया जाएगा.

ताज़ा जनगणना को स्वाभाविक रूप से निर्वाचन क्षेत्र के पुनर्गठन और विस्तार का आधार माना जाता है. भारत में आख़िरी बार वर्ष 2011 में जनगणना हुई थी.

हर दस साल में ये प्रक्रिया होती है लेकिन 2021 में जनगणना नहीं हुई. अगली जनगणना कब होगी, इसको लेकर भी अनिश्चतता है.

भारतीय निर्वाचन आयोग की वेबसाइट के अनुसार, साल 2001 के संविधान संशोधन के अनुसार लोकसभा सदस्यों की संख्या 2026 के बाद ही बढ़ाई जा सकती है.

यानी वर्ष 2026 के बाद 2031 में होने वाली जनगणना के आधार पर निर्वाचन क्षेत्रों का परिसीमन और विस्तार किया जाएगा.

तब तक 2001 की जनगणना के अनुसार मौजूदा निर्वाचन क्षेत्रों की संरचना वही रहेगी.

महिला आरक्षण 2024 के चुनाव में नहीं तो कब?

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इस सवाल पर विचार करने से पहले ये जान लेते हैं कि निर्वाचन क्षेत्रों के पुनर्गठन यानी परिसीमन का अर्थ क्या है.

दरअसल, परिसीमन का अर्थ है जनसंख्या के अनुसार देश में लोकसभा निर्वाचन क्षेत्रों और राज्यों की विधानसभा के निर्वाचन क्षेत्रों की संरचना का निर्धारण करना.

बेशक, समय के साथ बदलती आबादी के हिसाब से ये एक सतत प्रक्रिया है. इसके लिए क़ानून बनाकर परिसीमन आयोग की स्थापना की जाती है.

इस आयोग का गठन वर्ष 1952, 1962, 1972 और 2002 में कानून के ज़रिए ही किया गया था.

इस आयोग को संविधान द्वारा शक्तियाँ और स्वायत्तता प्रदान की गई हैं. उनके लिए गए निर्णयों को किसी भी अदालत में चुनौती नहीं दी जा सकती.

जनसंख्या किसी भी निर्वाचन क्षेत्र की सीमा तय करने का मापदंड है. प्रत्येक राज्य को उसकी जनसंख्या के अनुपात में लोकसभा सीटें मिलती हैं.

ये 'एक व्यक्ति, एक वोट' के फॉर्मूले पर तय होता है. यानी हर वोट का प्रतिनिधित्व सदन में होना चाहिए. छह विधानसभा क्षेत्रों को मिलाकर एक लोकसभा क्षेत्र बना.

अभी जो निर्वाचन क्षेत्र हैं, उन्हें 2001 की जनगणना के अनुसार 2002 में गठित आयोग ने तय किए थे.

वर्ष 2002 में किए गए संविधान संशोधन के अनुसार 2026 तक इन निर्वाचन क्षेत्रों की सीमा यथावत रहेगी. 2026 के बाद पहली जनगणना 2031 में होगी.

इस जनगणना के बाद अंतिम आंकड़े आने भी थोड़ा वक़्त लगेगा. इसके बाद परिसीमन आयोग का काम शुरू होगा.

उस प्रक्रिया को पूरा करना और आख़िरकार पुनर्गठन और बढ़े हुए निर्वाचन क्षेत्रों की घोषणा करना भी एक लंबी प्रक्रिया होगी.

इसमें कुछ साल लग सकते हैं. अगर जनगणना योजना के अनुसार 2031 में होती है, तो महिला आरक्षण 2029 के चुनावों के बाद ही वास्तविकता बन सकता है.

अमित शाह

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राजनीतिक विश्लेषक और कार्यकर्ता योगेंद्र यादव ने सोशल मीडिया साइट एक्स पर अपने विचार ज़ाहिर करते हुए कहा है कि इस आरक्षण को वास्तविकता बनने में एक दशक से अधिक समय लगेगा.

उन्होंने लिखा है, "संविधान के अनुच्छेद 82 में (2001 में किए गए संशोधन के बाद) के अनुसार, 2026 तक जनगणना के पहले आंकड़े आने से पूर्व परिसीमन नहीं कराया जा सकता. ये जनगणना 2031 तक होगी."

वो कहते हैं, "परिसीमन आयोग को अपनी फ़ाइनल रिपोर्ट देने में कम से कम 3 से 4 साल का समय लगता है. पिछले आयोग ने 5 साल में रिपोर्ट दी थी. इनके अलावा आबादी की दर में बदलाव को देखते हुए अगला परिसीमन बहुत विवादित हो सकता है. वर्ष 2037 के आसपास रिपोर्ट मिलेगी और ये 2039 तक ही लागू किया जा सकेगा."

विपक्ष ने कहा 'जुमला', सरकार ने बताया 'पारदर्शिता'

राहुल गांधी

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कांग्रेस सहित विपक्षी दलों ने संसद में मांग रखी कि जनगणना और निर्वाचन क्षत्रों के परिसीमन का इंतज़ार किए बिना आरक्षण तुरंत लागू किया जाना चाहिए. और 2024 के चुनावों में इसे वास्तविकता बनाया जाना चाहिए.

सोनिया गांधी, राहुल गांधी सहित कई विपक्षी सांसदों ने ये कहा कि इस विधेयक को फ़ौरन अमल में लाया जाना चाहिए.

विपक्षी दलों का आरोप है कि इस आरक्षण को अनिश्चितकाल तक बढ़ाने के पीछे बीजेपी सरकार की राजनीति है और आगामी चुनाव में महिला मतदाताओं के वोटों पर नज़र रखते हुए इसे लाया जा रहा है.

लेकिन सरकार कह रही है कि संविधान में दी गई प्रक्रियाओं को पूरा करने के बाद ही इस आरक्षण को लागू करना उचित होगा.

गृहमंत्री अमित शाह ने लोकसभा में विपक्ष को जवाब देते हुए कहा कि यहाँ पारदर्शिता एक अहम मुद्दा है. आरक्षण का निर्धारण परिसीमन आयोग को ही करना चाहिए.

लेकिन 2001 के संविधान संशोधन की वजह से परिसीमन आयोग 2026 के बाद होने वाली जनगणा के अनुसार ही रिपोर्ट तैयार कर सकता है.

अमित शाह ने कहा, "ये सीटें जो आरक्षित की जानी हैं, ये कौन तय करेगा? हम करें? अगर फिर वायनाड आरक्षित हो गया तो आप क्या करोगे? ओवैसी का हैदराबाद (सीट) आरक्षित हो गया तो? फिर हमको कहेंगे कि ये राजनीति की वजह से हुआ है. इसलिए यह बहुत अच्छा है कि एक परिसीमन आयोग ही इन निर्वाचन क्षेत्रों को आरक्षित करे."

उन्होंने कहा, "ये आयोग जगह-जगह जाकर, खुली सुनवाई कर के इस आरक्षण प्रक्रिया को पारदर्शी तरीके से संचालित करते हैं. इसलिए इस फ़ैसले के पीछे एकमात्र मुद्दा पारदर्शिता है. कोई पूर्वाग्रह नहीं होना चाहिए."

विपक्ष की आपत्ति ये है कि आरक्षण और परिसीमन के बीच क्या संबंध है?

राज्यसभा में कांग्रेस सांसद जयराम रमेश ने एक्स पर अपनी राय रखी.

उन्होंने कहा, "लोकसभा में भाजपा की ओर से बोलने वाले यह समझाने की बहुत कोशिश कर रहे हैं कि वे 2026 के बाद पहली जनगणना के उपरांत परिसीमन के प्रावधान के संबंध में संविधान का पालन कर रहे हैं."

"लेकिन वे यह समझाने में सफल नहीं होंगे कि महिला आरक्षण को लागू करने के लिए सबसे पहले परिसीमन से जोड़ने की आवश्यकता क्यों है? भाजपा ने 2010 में ऐसी कोई शर्त के बिना ही विधेयक का समर्थन किया था. यह और कुछ नहीं बल्कि प्रधानमंत्री द्वारा 2024 के चुनावों में महिलाओं के आरक्षण को वास्तव में लागू किए बिना उनके वोट को भुनाने की बेताबी को दिखाता है!"

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सवाल ये है कि अगर ये आरक्षण तत्काल लागू नहीं होने वाला तो सरकार ने तत्काल विशेष सत्र बुलाकर संसद में इसका प्रस्ताव क्यों रखा?

राजनीतिक विश्लेषक अभय देशपांडे कहते हैं, "इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि ये आरक्षण विधेयक 2024 के चुनावों को ध्यान में रखकर लाया गया है. ये आधी आबादी के वोटों का सवाल है और वे इसे खींचना चाहते हैं. लेकिन एक बार 2026 की समय सीमा बीत जाएगा, तब सरकार इस आरक्षण को जल्द से जल्द लाने के लिए कुछ करेगी. हमें देखना होगा कि क्यों? कम से कम अगले दो चुनावों में ऐसा नहीं लगता कि आरक्षण लागू हो पाएगा."

इससे पहले महिला आरक्षण का श्रेय लेने के लिए भी कांग्रेस और बीजेपी आमने-सामने आ चुके हैं. अब अहम मुद्दा ये है कि आरक्षण कैसे लागू किया जाएगा.

ये मतदाताओं के लिहाज़ से भी अहम है. सवाल ये है कि क्या मतदाता ये मानेंगे कि सालों से लंबित आरक्षण अब क़ानून के जरिए लागू होगा या फिर ये मतदाताओं की नाखुशी की वजह बनेगा क्योंकि आरक्षण निकट भविष्य में लागू नहीं हो पाएगा.

आगामी चुनावों में महिला उम्मीदवारों के लिए कोई आरक्षण नहीं होगा, लेकिन ये तय है कि आरक्षण का ये मुद्दा चुनावों में गर्म रहेगा.

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