बिहार की वो जगह, जहां पुल गिरा तो 12 इंच का स्लैब बना सहारा- ग्राउंड रिपोर्ट

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इमेज कैप्शन, सारण जिले के ढोढ़नाथ मंदिर के पास गिरा पुल
    • Author, सीटू तिवारी
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता, सिवान और सारण से

चौथी में पढ़ने वाला अभिषेक अपने दोस्तों के ‘संग’ से अचानक महरूम हो गया है.

वो बिहार के सिवान के डायनेमिक पब्लिक स्कूल के छात्र हैं.

गोल मटोल चेहरे वाले बातूनी अभिषेक के इस दुख की वजह एक टूटा हुआ पुल है.

वो पुल जो उनके गांव गरौली को पटेढ़ी बाज़ार से जोड़ता है.

अभिषेक कहते हैं, “पहले हम सारे दोस्त साथ साथ पुल पार करके स्कूल जाते थे. लेकिन पुल टूटने के बाद लड़कियों ने स्कूल जाना बंद कर दिया है. स्कूल जाने के लिए बहुत पैदल चलना पड़ता है और लौटते वक्त बहुत घाम (धूप) लगती है. पुल था तो रास्ता बहुत सीधा था.”

गरौली गांव, गंडकी नाम की नदी के किनारे बसा है. इस पर बना पुल बीती 22 जून को सुबह साढ़े पांच बजे गिर गया था.

गंडकी ही वो नदी है जिस पर बने कुल 7 पुल बीते दिनों गिरे हैं. एक 22 जून को और बाकी सभी छह पुल 3 और 4 जुलाई को.

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इमेज कैप्शन, पटेढ़ी बाज़ार, सारण

क्या है पूरा मामला?

सिवान जिले के दरौंदा प्रखंड के गरौली गांव में गंडकी नदी पर बना पुल गरौली, खेदूछपरा ,राजगढ़ा, शंकरपुर, मर्दनपुर, सिमरिया, भगोछा सहित कई गांव को पटेढ़ी नाम के स्थानीय बाज़ार से जोड़ता था.

पटेढ़ी बाज़ार को इस इलाके की लाइफलाइन कहा जा सकता है.

जैसा कि गरौली गांव के शत्रुघ्न प्रसाद कहते है, “गांव में सरकारी प्राथमिक विद्यालय के अलावा कुछ नहीं है. हाईस्कूल, मिडिल स्कूल, कॉलेज, कोचिंग, गांव का प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र से लेकर बस स्टैंड और रेलवे स्टेशन (महामाया हॉल्ट) तक सारी खरीददारी पटेढ़ी बाज़ार में है. पटना दिल्ली कहीं जाना हो, पटेढ़ी बाजार जाना पड़ता था. अपने खेत तक जाने के लिए हमको पुल चाहिए.”

गांव के लोग बताते हैं कि 22 जून को पुल गिरने से पहले बिहार सरकार के कर्मचारियों ने पुल की नींव के पास खुदाई की.

लोगों ने जब इसका विरोध किया तो उन्हें डराया धमकाया गया. इसके कुछ दिन बाद ही ये पुल भरभराकर गिर गया. जिसके चलते पटेढ़ी बाज़ार से स्थानीय लोगों का सीधा संपर्क कट गया.

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इमेज कैप्शन, लोगों ने नदी के पानी को छूता हुआ तकरीबन दस से बारह इंच की चौड़ाई का एक स्लैब नदी पर रख दिया है

दस से बारह इंच के स्लैब के सहारे ज़िंदगी

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गांव के नितेश कुमार बताते हैं, “ पुल गिरने के बाद स्थानीय कर्मचारी आए और पुल का मलबा उठा ले गए. हम लोग पूछते रह गए कि पुल कब बनेगा, लेकिन किसी ने कोई जवाब नहीं दिया. सात - आठ किलोमीटर घूमकर पटेढ़ी बाज़ार जाना पड़ता था तो गांव के लड़कों ने ही लोहे का एक स्लैब रखकर पैदल चलने वालों के लिए पुल बना दिया.”

दरअसल, नदी पार करने के लिए लोगों ने नदी के पानी को छूता हुआ तकरीबन दस से बारह इंच की चौड़ाई का एक स्लैब नदी पर रख दिया है.

ये इतना संकरा है कि एक व्यक्ति अपनी साइकिल लेकर भी साथ साथ नहीं चल सकता.

अगर आपको अपनी साइकिल के साथ इस पुल को पार करना है तो साइकिल आगे रखनी होगी और उसके पिछले हिस्से को पकड़कर आपको पीछे चलना होगा.

गोलू कुमार इसी स्लैब के सहारे नदी को पार करते हुए मिले.

वो स्कूल ड्रेस में थे. वो कहते हैं, “बहुत डर लगता है. जरा सा पांव गलत पड़ा तो नदी में गिर जाएंगे. लेकिन स्कूल जाना जरूरी है.”

गोलू कुमार सहित कई बच्चे इस संकरे स्लैब के सहारे स्कूल जा रहे हैं लेकिन कई मां बाप ने अपने बच्चों को स्कूल भेजने से तौबा कर ली है.

जो बच्चे स्कूल नहीं जा पा रहे हैं, उनमें लड़कियों का प्रतिशत ज्यादा है.

ग्रेजुएशन कर रही सना खातून कहती हैं, “पुल टूटने से लड़कियों की जिंदगी बर्बाद हो रही है. इस पुल से सीधे चले जाते थे. अब घूम कर जाते हैं तो छेड़खानी और छिनतई (चोरी) दोनों का डर है. ऐसे में कैसे जाएंगी लड़कियां ?”

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इमेज कैप्शन, गरौली का पुल

'सरकार नहीं देती है ध्यान'

खेत मजदूर बसंती देवी भी अपने तीन पोते पोतियों को स्कूल नहीं भेज रहीं.

उनके बच्चे पटेढ़ी बाजार स्थित सरस्वती ज्ञान मंदिर नाम के स्कूल में पढ़ते हैं, जहां हर माह 350 रूपये फीस के तौर पर देने पड़ते हैं.

बसंती कहती हैं, “पहले बच्चे खुद चले जाते थे. अब सात किलोमीटर चलकर दूसरा पुल पकड़ना होगा. हमारे पास साइकिल – मोटर तो है नहीं कि बच्चों को पहुंचा दें. इतना समय भी नहीं है. कमाने खाने वाले आदमी हैं. वोट सुविधा के लिए देते हैं लेकिन सरकार तो हमारी तरफ़ ध्यान नहीं दे रही.”

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लोगों के चंदे से बना था पुल

बसंती के पास खड़े सरोज देवी और टुटु मांझी के घर के बच्चे भी स्कूल नहीं जाते.

लेकिन बच्चों के स्कूल ना जाने की तुलना में ये परिवार दूसरा बड़ा संकट झेल रहा है.

दरअसल, सरोज देवी का कहना है कि नदी में से मिट्टी खुदाई (गाद निकासी) हुई तो नदी किनारे घर की नींव के पास भी मिट्टी खोद दी गई.

बसंती ने बताया, “अब तो लगता है कि घर कभी भी गिर जाएगा. रात में नींद नहीं आती. औंघाते (झपकी लेना) रहते हैं. मुंह से कौर अंदर नहीं जाता.”

30 साल पहले लोगों ने आपसी सहयोग से ये पुल बनाया था.

गांव के लालू अंसारी बताते हैं, “हमारे लोगों ने चंदा किया और इस पुल को बनाना शुरू किया. इस पुल के पिलर हमारे चंदा के पैसे और सहयोग से ही ढाले गए. बाद में जब स्थानीय विधायक उमा शंकर सिंह को पता चला तो मारे शर्म के उन्होंने अपने फंड से ऊपर का स्लैब डलवाया. उसके बाद ये पुल चालू हुआ और हमारी जिंदगी आसान हुई.”

सब्जी की खेती करके पटेढ़ी बाज़ार में बेचने वाले जितेन्द्र राम कहते हैं, “ये पुल हम लोगों ने अपनी सुविधा के लिए बनवाया था. सारी साग सब्जी वहीं जाकर बेचते थे. पुल टूट गया तो जो दो पैसे का कमीनी (कमाई) था वो सब ठप हो गया. रोजी रोजगार नहीं होगा तो घर में खाने को क्या मिलेगा. रोज किच – किच करता है परिवार.”

पुल टूट जाने से लोगों के लिए स्वास्थ्य सुविधाओं तक पहुंच भी मुश्किल हो गया है.

किसान धनन साव कहते हैं, “पुल था तो तुरंत दवा दारू हो जाती थी. अब रात को कोई बीमार पड़ जाए तो कोई जल्दी अस्पताल नहीं पहुंच पाएगा. एंबुलेंस भी नहीं आ पाएगी.”

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इमेज स्रोत, Nitesh/ BBC

इमेज कैप्शन, गरौली में पुल की जगह स्लैब लगाते युवा

पंचर बनाने वाले से लेकर ईंट भट्ठा मालिक तक परेशान

ऐसा नहीं है कि परेशानी सिर्फ गरौली गांव की तरफ है. बल्कि ये पुल जिस पटेढ़ी बाजार को जोड़ता है, वहां की अर्थव्यवस्था को धक्का लगा है.

ये भी दिलचस्प है कि पटेढ़ी बाज़ार के 40 फीसदी दुकानदार गरौली तरफ स्थित गांवों से ही आते हैं.

पिंटू सिंह गरौली के रहने वाले हैं और पटेढ़ी बाजार में उनकी किराने की दुकान है. उन्होंने पुल ना होने के चलते अपने बच्चों का ट्यूशन छुड़वा दिया है.

वो कहते हैं, “पटेढ़ी बाज़ार में होने वाली आमदनी और पुल देखकर यहां दुकान ली थी. दस मिनट में बाजार पहुंच जाते थे और दस मिनट में घर. लेकिन अब तो डायरेक्ट संपर्क टूट गया. बिजनेस 10 से 15 परसेंट पर आ गया है.”

पिंटू सिंह की दुकान से कुछ दूरी पर रूस्तम मंसूरी की पंचर की दुकान है.

वो कहते हैं, “ सब गांव के लोग आते थे तो पंचर बनवाने वाली साइकिल से पूरी सड़क भर जाती थी, अब तो उसकी चौथाई भी नहीं रह गई.”

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इसी तरह दर्जी का काम करने वाले शमशाद आलम, नाईं का काम करने वाले त्रिभुवन ठाकुर, मिठाई दुकानदार शिवम पंडित, अगरबत्ती का कारोबार करने वाले संतोष कुमार सिंह भी ग्राहक के ना आने से परेशान हैं.

आलम ये है कि ईंट भट्ठों के मालिक तक को कारोबार में नुकसान हो रहा है.

ईंट भट्ठा मालिक अरूण कुमार सिंह बताते हैं, “ पहले गरौली पुल से ही कंस्ट्रक्शन का सारा सामान लादकर ट्राली पर चला जाता था. अब बड़ा चक्कर लगाना पड़ता है. फिर वहां का आदमी भी यहां नहीं आ रही कि कोई बिक्री हो. वो सबके लिए जनता बाज़ार जाना आसान हो गया अब. बिजनेस डाउन पड़ा है.”

दिलचस्प है कि जहां एक तरफ गरौली सहित दर्जनों गांवों में सब्जियां खेतों में पड़ी सड़ रही हैं, वहीं पटेढ़ी बाज़ार में उनकी आमद ना होने से सब्जियां महंगी हैं.

पटेढ़ी बाजार के नागेन्द्र पांडेय बताते हैं, “पहले गरौली, मर्दनपुर, सिकटिया में सब्जी की बहुत खेती होती है. वहां से लाकर लोग सब्जी बेचते थे लेकिन अब तो आ नहीं पा रहे हैं तो यहां सब्जियां महंगी बिक रही हैं.”

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इमेज कैप्शन, सारण जिले के ढोढ़नाथ मंदिर के पास गंडकी नदी पर बना पुल टूट गया, जबकि अंग्रेज़ों का यहीं बना पुल खड़ा है

ब्रिटिश काल में बना पुल सुरक्षित, 2004 में बना पुल धंसा

सारण जिले के ढोढ़नाथ मंदिर के पास गंडकी नदी पर बना पुल, उन पुलों में से एक है जो बीती 3 जुलाई की दोपहर तकरीबन एक बजे अचानक गिर गया.

ये पुल साल 2004 में निर्दलीय विधायक धूमन सिंह ने अपने फंड से बनवाया था.

दिलचस्प है कि इस पुल के समानान्तर बना अंग्रेजों का बनवाया पुल सही सलामत है और लोगों की लाइफ लाइन बना हुआ है.

हालांकि अंग्रेजों के बनवाए पुल से सिर्फ पैदल और साइकिल ही गुजर सकती है.

सरकार ने मानी लापरवाही

पुल के पास संगम मेगा मार्ट नाम की दुकान है जिसके मालिक हरिकिशोर प्रसाद कहते हैं, “ हम लोगों को लगा था अंग्रेज वाला पुल गिर जाएगा लेकिन नया पुल गिर गया. इसके गिरने से बड़ी गाड़ियां नहीं आ पा रही है. दुकानदारी दस हजार से घटकर दो हजार पर आ गई है. ढोढ़नाथ मंदिर में सावन में श्रद्धालु नहीं आ पा रहे हैं. गाड़ी आ ही नहीं सकती छोटे पुल से.”

ढोढ़नाथ मंदिर के इस धराशायी पुल के थोड़ी दूर पर सारण नाम के गांव के पास गंडकी नदी पर बना पुल भी गिर गया है.

लोगों ने गिरे हुए पुल के समानान्तर चचरी (बांस का पुल) पुल बना दिया है. पुल के पास ही रविन्द्र प्रसाद कुशवाहा का घर है. वो कहते हैं, “सबने बांस का सहयोग किया और पुल बना दिया. हमारे खेत और स्कूल सब उधर है. इस पुल से पैदल तो पार किया जा सकता है.”

गंडकी नदी पर 7 पुल गिरने के बाद बिहार सरकार ने प्रेस विज्ञप्ति जारी करके इसे इंजीनियरों की लापरवाही माना है.

दरअसल, सिवान, सारण और गोपालगंज में बहने वाली गंडकी नदी (इसे छाड़ी नदी भी कहते है) में नदी जोड़ परियोजना के तहत गाद निकासी का काम होना था.

69.89 करोड़ राशि की इस योजना के तहत 170 किलोमीटर की लंबाई में 19 मीटर चौड़ाई और औसतन 3 मीटर गहराई में गाद निकासी का काम इंजीनियरों ने किया.

जल संसाधन विभाग ने पुल गिरने की घटनाओं के बाद 11 अभियंताओं को निलंबित कर दिया है.

राज्य के जल संसाधन विभाग की तरफ से जारी प्रेस विज्ञप्ति के मुताबिक, “गाद निकासी के कार्य के दौरान अभियंताओं ने नदी पर बने पुल पुलिया को सुरक्षित रखने के लिए ज़रूरी कदम नहीं उठाए. ”

सरकार ने अपने इंजीनियर्स की लापरवाही मानी है लेकिन इससे पुल से जुड़े लोगों की जीवन की मुश्किलें जल्द कम हो जाएंगी, ऐसा फिलवक्त नहीं लगता.

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