अश्विन को वर्ल्ड टेस्ट चैंपियनशिप में मौक़ा न देकर क्या रोहित शर्मा ने की सबसे बड़ी भूल?

विमल कुमार

वरिष्ठ पत्रकार, लंदन के ओवल मैदान से

रविचंद्रन अश्विन

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  • अब तक 92 टेस्ट मैच में 2.76 की औसत से रन देते हुए 474 विकेट लिए.
  • अब तक 113 एकदिवसीय मैचों में 4.9 की औसत से रन देते हुए 151 विकेट लिए.
  • टेस्ट रैंकिंग में दुनिया के नंबर वन गेंदबाज़ हैं.
  • सबसे तेज़ी से 250 विकेट लेने वाले, 300 विकेट लेने वाले और 350 विकेट लेने वाले खिलाड़ी हैं.
  • सबसे अधिक बार प्लेयर ऑफ़ द मैच का ख़िताब जीतने वाले दुनिया के दूसरे खिलाड़ी हैं.

इस लेख की शुरुआत रविचंद्रन अश्विन के साथ इंग्लैंड दौरे के पहले दिन के क़िस्से से करता हूँ.

31 मई को मैं टीम इंडिया का प्रैक्टिस सेशन कवर करने के लिए लंदन से क़रीब दो घंटे की दूरी पर बसे छोटे से शहर अरुनडेल पहुँचा.

अश्विन के साथ शुरुआती औपचारिकता और हाल-चाल लेने के बाद मैं अपने काम में व्यस्त हो गया.

कुछ घंटे बाद अश्विन मेरे पास आए और उत्सुकतावश पूछा कि क्या मैं पिछले दिन ओवल मैदान गया था, अगर था तो क्या मैंने पिच को देखा था.

अचानक किए गए सवाल के कारण मुझे ये समझ नहीं आया कि मैं इसका क्या जवाब दूँ, क्योंकि मैं ओवल मैदान गया तो था, लेकिन अधिकारियों ने मुझे पिच तक पहुँचने की इज़ाजत नहीं दी थी.

मैंने अश्विन से कहा कि मैं पिच तो देख नहीं पाया, लेकिन वो बेहतर होनी चाहिए.

इस पर अश्विन ने कहा, "पिच कैसी भी हो हर गेंदबाज़ को ख़ुद को ढालना पड़ता है."

ये अनौपचारिक बातचीत थी.

लेकिन वर्ल्ड टेस्ट चैंपियनशिप के पहले दिन टीम इंडिया के गेंदबाज़ों के निराशाजनक खेल के बाद अचानक ही अश्विन के साथ हुई मुलाक़ात मेरे ज़ेहन में तैर गई.

रविचंद्रन अश्विन

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प्लेइंग इलेवन में अश्विन का न होना

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ऐसे बहुत कम मौक़े ऐसे होते हैं, जब क्रिकेट के दिग्गज पंडित और आम क्रिकेट फ़ैन टीम इंडिया के किसी एक फ़ैसले को लेकर पूरी तरह से सहमत होते हैं.

अश्विन को प्लेइंग इलेवन में शामिल न करने का फ़ैसला कुछ ऐसा ही है. सभी इस बात पर सहमत हैं कि उन्हें प्लेइंग इलेवन में शामिल किया जाना चाहिए था.

रिकी पोंटिंग से लेकर नासिर हुसैन जैसे जाने-माने पूर्व क्रिकेट कप्तानों ने इस फ़ैसले पर हैरानी जताई तो संजय मांजरेकर भी हतप्रभ दिखे.

पहले दिन के खेल के दौरान मेरी मुलाक़ात कम से कम दर्जनों दर्शकों से हुई और हर कोई इस बात पर अफ़सोस जता रहा था कि टीम इंडिया आख़िर टेस्ट रैंकिंग में दुनिया के नंबर वन गेंदबाज़ अश्विन को कैसे पिच और मौसम जैसी बातों का हवाला देकर बाहर बैठा सकती है?

लेकिन, टीम इंडिया के इस बेहतरीन गेंदबाज़ को इस तरह के फ़ैसलों को झेलने की अब आदत-सी हो गई है.

2021 में हुए इंग्लैंड दौरे के समय टीम इंडिया ने चार मैचों के दौरान विराट कोहली की कप्तानी में अश्विन को एक भी मैच में शामिल नहीं किया था.

इस फ़ैसले पर पूर्व दिग्गज स्पिनर शेन वार्न सार्वजनिक तौर पर नाराज़ हुए थे.

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अश्विन की रैंकिंग

भारतीय क्रिकेट में टीम का कोच बदल गया और कप्तान भी बदल गया, लेकिन टेस्ट में अश्विन की रैंकिग नहीं बदली. उनके साथ विदेशी ज़मीन पर होने वाले रवैए में भी कोई बदलाव नहीं आया.

क्रिकेट के मैदान में भारत को बल्लेबाज़ों का देश कहा जाता है जहाँ सुपरस्टार का दर्जा कोहली, रोहित और शुभमन गिल जैसे खिलाड़ियों को मिलता है.

लेकिन अश्विन जिन्होंने 92 टेस्ट मैचों में 51 की स्ट्राइक रेट और तीन रन प्रति ओवर से भी कम वाली किफ़ायती गेंदबाज़ी करते हुए अब तक कुल 474 विकेट झटके हैं, उनकी कद्र अब भी ड्रेसिंग रुम में नहीं है.

ऐसे में सवाल ये उठता है कि क्या आईसीसी की रैंकिग बेकार और छलावा तो नहीं है?

आख़िर दुनिया में ऐसा कौन-सा खेल होगा जिसके नंबर एक खिलाड़ी को उसी की टीम में प्राथमिकता नहीं दी जाती?

अगर टीम इंडिया इस मैच को जीतने में नाकाम होती है तो अश्विन को लेकर लिया गया ये फ़ैसला, आने वाले कई सालों तक राहुल द्रविड़ और रोहित शर्मा को परेशान करेगा.

शायद इस फ़ैसले की तुलना 2003 वर्ल्ड कप के दौरान वीवीएस लक्ष्मण जैसे बल्लेबाज़ को दरकिनार करते हुए दिनेश मोंगिया जैसे खिलाड़ी को ले जाने से की जा सकती है.

जॉन राइट ने अपनी आत्मकथा में इस बात को स्वीकार किया है कि ये फ़ैसला उन्हें अब भी कचोटता है.

सौरव गांगुली ने एक बार मुझसे बातचीत में दबी ज़ुबान में ही सही इस बात को स्वीकार किया था कि उस फ़ैसले के बाद लक्ष्मण काफ़ी महीनों तक उनसे नाराज़ रहे थे.

ये सच है कि अश्विन उस तरीक़े से शायद रोहित और द्रविड़ से नाराज़ नहीं रहेंगे, क्योंकि इन दोनों के साथ उनके संबध काफ़ी बेहतर है.

अधिक दूर जाने की ज़रूरत नहीं है. अगर आप पिछले साल टी20 वर्ल्ड कप को याद करें तो अश्विन की वापसी कोच और कप्तान के ज़ोरदार समर्थन के कारण ही हुई थी.

प्लेइंग इलेवन

स्पिनर की भूमिका में अश्विन

एक और अहम सवाल जिस पर बहुत कम लोग ध्यान देते हैं, वो ये है कि अगर टीम इंडिया को मैच में सिर्फ़ एक स्पिनर के साथ उतरना है तो क्या अश्विन, रवींद्र जडेजा से बेहतर स्पिनर नहीं है?

आप चाहे देश में खेले गए मैचों के आँकड़ों पर नज़र दौड़ाएँ या फिर अंतरराष्ट्रीय मैचों के आँकड़ों पर, दोनों मौक़ों पर अश्विन आपको बेहतर गेंदबाज़ दिखेंगे.

अगर आपको याद नहीं हो तो दो साल पहले न्यूज़ीलैंड के ख़िलाफ़ साउथैंपटन में वर्ल्ड टेस्ट चैंपियनशिप का पहला फ़ाइनल याद कर लें.

उस मैच में ना सिर्फ एक सेशन में बल्कि पूरे मैच में ही तेज़ गेंदबाज़ों का दबदबा रहा था. लेकिन अश्विन ने उस मैच में भी अपनी अहमियत साबित की थी.

पहली पारी में उन्होंने 15 ओवर में सिर्फ़ 28 रन देकर दो विकेट, तो दूसरी पारी में 10 ओवर में मात्र 17 रन देकर दो विकेट लेने का कमाल किया था.

उस मैच में जडेजा भी खेले थे लेकिन वो बिल्कुल असरदार साबित नहीं हुए थे.

विराट कोहली

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कोहली को नहीं बैठाया तो अश्विन को क्यों?

ऐसे में सवाल ये उठता है कि अगर कोहली को तीन साल तक शतक नहीं बनाने के बावजूद प्लेइंग इलेवन से कोई बाहर रखने के बारे में कल्पना नहीं कर सकता, तो अश्विन जैसे बेहतरीन रिकॉर्ड वाले गेंदबाज़ के साथ पूरे करियर में इस तरह के बर्ताव पर शोर क्यों नहीं मचता है?

शायद इसलिए कि क्रिकेट में अब भी बल्लेबाज़ों के लिए पक्षपातपूर्ण नज़रिया रखा जाता है.

देश में खेलते हुए हज़ारों रन बनाने वाले बल्लेबाज़ों को कभी भी ये तर्क देकर अंतरराष्ट्रीय मैदान में खेल से बाहर नहीं किया जाता कि वो बाउंसी पिचों पर या तो सीम-स्विंग के लिए या फिर मददगार पिचों पर सामंजस्य नहीं बना सकते.

ऐसा मान लिया जाता है कि ये एक स्वाभाविक प्रकिया है और अगर खिलाड़ी नाकाम होता है तो इसे भी खेल का हिस्सा कह कर आसानी से स्वीकार किया जा सकता है. लेकिन गेंदबाज़ों के साथ ये तर्क नहीं दिया जाता है.

आप शायद ये तर्क दे सकते हैं कि किसी भी प्लेइंग इलेवन में अमूमन छह बल्लेबाज़ होते हैं जबकि गेंदबाज़ों की संख्या अक्सर चार ही होती है. लेकिन, ये तर्क भी ओवल टेस्ट के चयन पर सही नहीं बैठता.

क्योंकि अगर आप उमेश यादव या फिर शार्दुल ठाकुर से भी ये पूछेंगे कि क्या वाकई में वो प्लेइंग इलेवन में अश्विन से पहले जगह पा सकते हैं, तो शायद एक ईमानदार क्रिकेटर होने के नाते वो भी आपकी और हमारी राय से सहमत हों कि इसमें अश्विन को पहले जगह मिलनी चाहिए.

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