आईपीएल में धोनी कप्तानी क्यों पड़ी सब पर भारी

धोनी

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    • Author, सुरेश मेनन
    • पदनाम, खेल पत्रकार

जब आज से क़रीब 15 साल पहले एक 38 वर्षीय कप्तान ने अपनी टीम को इंडियन प्रीमियर लीग (आईपीएल) के पहले संस्करण का खिताब दिलाया तो कइयों को लगा कि वो जुमला सही है कि- ये वो महान खिलाड़ी थे जो अपने देश की टीम के कभी कप्तान नहीं बने.

शेन वॉर्न ने उस तरह से सोचा हो या नहीं, लेकिन बतौर कप्तान राजस्थान रॉयल्स की उस जीत में उन्होंने दोहरा किरदार निभाया- एक तो रणनीति बनाने वाले के तौर पर और दूसरा, समस्याएं सुनने और सुलझाने वाले के रूप में.

हालांकि ऑस्ट्रेलिया ने उन्हें कप्तान के तौर पर कभी नहीं देखा लेकिन फ़्रेंचाइज़ी ने देखा और उन्होंने उस विश्वास का (ट्रॉफ़ी से) माकूल जवाब भी दिया.

ये वही कप्तानी का किरदार है, जिसे महेंद्र सिंह धोनी ने उतनी ही संजीदगी से निभाया है.

अपने 250वें आईपीएल मैच में, जो कि इसी हफ़्ते खेला गया फ़ाइनल मुक़ाबला भी था, धोनी मैदान में चेन्नई सुपर किंग्स के सबसे बड़े रणनीतिकार हैं. जितनी उनकी क्रिकेट पर पकड़ है उतनी ही अपने खिलाड़ियों की क्षमताओं की उन्हें समझ है.

वह जानते हैं कि कब स्क्वेयर लेग पर खड़े फ़ील्डर को उसके बाएं खिसकाना है, ये भी जानते हैं कब किस खिलाड़ी की अनदेखी करनी है या उसे सख़्त चेहरा दिखाना है.

दीपक चाहर ने फ़ाइनल मैच के शुरुआती ओवरों में ही जब शुभमन गिल का कैच टपका दिया तब धोनी ने केवल स्टंप्स के पीछे अपनी जगह पर वापस जाकर वहां से ताली बजा कर गेंदबाज़ की (और संभवतः रन रोकने के लिए फ़ील्डर की भी) सराहना की.

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धोनी के नज़रिए का सम्मान

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41 की उम्र और 538 अंतरराष्ट्रीय मैचों की वजह से धोनी की उम्र और उनके अनुभव का सम्मान किया जाना तो स्वाभाविक था.

लेकिन उनके नज़रिए का सम्मान उस मानसिकता की वजह से आया, जिसने खेल को महत्वपूर्ण तो माना लेकिन जीने मरने के प्रश्न जैसा नहीं.

आप ग़लती करते हैं, आप कैच छोड़ते हैं, आपकी चूक से आपका साथी खिलाड़ी रन आउट भी होता है- ऐसी चीज़ें होती हैं. लेकिन अगर ये सब बिना सोचे समझे हो तो कप्तान आपसे कुछ कह सकता है.

अन्यथा तो उसे ज़्यादा तवज्जो नहीं देता, आगे बढ़ जाता है. खेल के दौरान जब धोनी ऐसी स्थिति में आगे बढ़ जाते हैं तो साथ ही उनकी टीम भी ऐसा ही करती है. पोस्टमॉर्टम मैच के दौरान नहीं, बाद के लिए छोड़ दिया जाता है.

जब धोनी ने पहली बार सीएसके को आईपीएल की ट्रॉफ़ी दिलाई थी तो वह 28 साल के थे. वो आईपीएल का तीसरा संस्करण था. उसके एक साल पहले 38 साल के एडम गिलक्रिस्ट ने वो ट्रॉफ़ी हैदराबाद की टीम डेक्कन चार्जर्स के लिए जीती थी.

तो क्या आईपीएल की कप्तानी दिग्गज क्रिकेटर्स के लिए छोड़ देनी चाहिए जो इस तेज़ी से बदलते गेम को सभी एंगल से देख सकते हैं?

तो बतौर कप्तान क्या किसी करिश्माई व्यक्ति का होना ज़्यादा ज़रूरी है क्योंकि डगआउड में वैसे भी बड़ी रक़म पर रखे गए पूर्व खिलाड़ी रणनीति को लगातार अपडेट करते होते हैं?

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“चलो ये कप्तान के लिए करें…”

धोनी अब अपनी टीम को 35 की उम्र के बाद तीन ट्रॉफ़ी दिला चुके हैं. टी20 युवाओं का खेल हो सकता है लेकिन इसमें पुराने क्रिकेटर का बतौर कप्तान होना फ़ायदेमंद रहा है, कोई वैसा जिसकी तरफ़ टीम के सभी खिलाड़ी देखते हैं और उसके लिए खेलते हैं.

“चलो ये कप्तान के लिए करें”, एक अच्छी टीम नीति है, जो खुल्लमखुल्ला प्रचार करने वाले गुण टीमवर्क को दर्शाता है.

अच्छे कप्तान खिलाड़ियों के साथ अच्छा व्यवहार और उनका सम्मान कर औसत टीम को भी जिताऊ बना सकते हैं और ये संदेश भी देते हैं कि वो उनके कोने में हैं.

अंतिम दो गेंदों पर 10 रन बना कर सीएसके को ट्रॉफ़ी दिलाने वाले रवींद्र जडेजा ने कहा कि “ये टाइटल धोनी के लिए है.”

हार्दिक, धोनी

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हार्दिक को धोनी से हारने का मलाल नहीं

प्रतिद्वंद्वी टीम के कप्तान की बातें और भी कुछ बता रही हैं, “मैं धोनी के लिए बहुत ख़ुश हूँ.”

ये बात हार्दिक पंड्या तब कह रहे थे जब फ़ाइनल मैच का ये फ़ैसला तीसरे दिन सुबह डेढ़ बजे आया (बारिश के कारण पहले दिन मैच नहीं हो सका) और दो महीने की मशक्कत के बाद वो इस फ़ाइनल में पहुंचे थे, जिसे वो हार चुके थे.

हार्दिक बोले, उनसे हारने का कोई मलाल नहीं है. अच्छी चीज़ें अच्छे लोगों के साथ होती हैं. मैं जितने लोगों से मिला हूं, वो सबसे अच्छे व्यक्ति हैं.”

वॉर्न और धोनी दोनों ही बाहर से नरम दिखते हैं लेकिन वास्तव में मज़बूत और दृढ़ निश्चयी व्यक्तित्व हैं, वो खिलाड़ियों के टूटे मनोबल को उठाते हैं और उसे अपने बूते सफलता लाने के लिए छोड़ देते हैं.

ये वॉर्न ही थे, जिन्होंने रवींद्र जडेजा को ‘रॉकस्टार’ का नाम दिया था, उनकी ऑलराउंड क्रिकेट क्षमताओं के लिए नहीं बल्कि उनके रवैये और समय पर नहीं पुंँचने की वजह से. ये उस खिलाड़ी को किसी भी तरह फिट करता है और ये नाम आज भी बरक़रार है.

रायुडू, धोनी, जडेजा

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ताकि टीम खुलकर खेल सके

एक महान कप्तान समय के साथ ख़ुद को ग़ैर ज़रूरी बनाने की दिशा में काम करता है क्योंकि उसकी टीम की ज़रूरतों को उसकी जगह दे दी होती है और उसके खिलाड़ी अपना काम बख़ूबी जानते होते हैं.

ये देखना दिलचस्प होगा कि क्या धोनी अगले साल आईपीएल में फिर खेलेंगे या नहीं और अगर नहीं खेलते हैं तो उनकी जगह कप्तान कौन बनेगा.

ऋतुराज गायकवाड़ के नाम की चर्चा है लेकिन इस परिपक्व खिलाड़ी के बारे में ये भी है कि वो राष्ट्रीय टीम में अपनी जगह बनाने की जद्दोजहद में नहीं दिखता है.

वॉर्न ने चार सीज़न के बाद आईपीएल छोड़ दिया था, फिर उनकी टीम को वैसा जादुई कप्तान नहीं मिला और राजस्थान रॉयल्स पहली बार के बाद अब तक यह ट्रॉफ़ी नहीं जीत सकी है. तो इस पैटर्न में जैसा दिखता है वो हो जोखिम भरा हो सकता है.

(सुरेश मेनन एक लेखक और स्तंभकार हैं)

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