श्रीकांत बोल्ला: राजकुमार राव की फ़िल्म के असली नेत्रहीन हीरो से मिलिए, जिन्होंने करोड़ों की कंपनी खड़ी की

श्रीकांत बोल्ला

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''आपने अपने दिमाग में हमारे लिए अलग ही कहानी बना रखी है. बेचारा... कितना बुरा हुआ इसके साथ. कुछ बुरा नहीं हुआ है हमारे साथ. बेचारे तो हम बिलकुल भी नहीं हैं...''

ये बात अभिनेता राजकुमार राव की नई फ़िल्म 'श्रीकांत' के ट्रेलर में सुनाई देती है. ये कहानी है श्रीकांत बोल्ला की. फ़िल्म में राजकुमार श्रीकांत की भूमिका निभा रहे हैं.

श्रीकांत की कहानी को फ़िल्म ट्रेलर के एक हिस्से से भी समझा जा सकता है.

इस सीन में ट्रैफिक सिग्नल पर आकर कार रुकती है.

ड्राइवर सीट के पास एक नेत्रहीन आकर पैसे मांगते हुए कहता है- भैया अंधे की मदद करो.

जैसे ही शरद केलकर का किरदार पैसे देने की कोशिश करता है, श्रीकांत का रोल निभा रहे राजकुमार राव कहते हैं- ''पैसे दे रहो हो? मुझे दो. इसे हम जॉब देंगे.''

श्रीकांत बोल्ला की कहानी भी कुछ कुछ ऐसी ही है. श्रीकांत बोल्ला ने नेत्रहीन होने की चुनौतियों से जूझते हुए क़रीब 500 करोड़ रुपये की कंपनी खड़ी की. इस कंपनी में श्रीकांत ने विकलांगों को नौकरी देने का फ़ैसला किया.

मगर श्रीकांत बोल्ला की कहानी इतनी भर नहीं है.

बीबीसी हिंदी ने साल 2022 में श्रीकांत बोल्ला की कहानी प्रकाशित की थी. पढ़िए श्रीकांत के सफ़र की दिलचस्प कहानी.

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श्रीकांत का बचपन

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आंध्र प्रदेश का मछलीपट्टनम.

इस शहर से कुछ दूरी पर श्रीकांत का गांव था. श्रीकांत जब छह साल के थे, तब लगातार दो साल तक हर दिन वह कई किलोमीटर पैदल चलकर स्कूल पहुँचते.

अपने सहपाठियों और भाई की मदद से श्रीकांत रोज़ यह सफ़र तय करते.

स्कूल का रास्ता कीचड़ भरा था, जो दोनों ओर से झाड़ियों से घिरा हुआ था और मॉनसून के समय तो यहां बाढ़ आ जाती थी, तो हालात और बदतर हो जाते.

श्रीकांत ने इस बारे में बताया था, "मुझसे कोई बात नहीं करता था क्योंकि मैं देख नहीं सकता था."

ग़रीब, अशिक्षित परिवार में जन्में श्रीकांत का उनके समुदाय ने भी बहिष्कार कर दिया था.

वे बोले थे, "मेरे माता-पिता को बताया गया था कि मैं अपने घर तक कि रखवाली करने में अक्षम हूं क्योंकि अगर एक कुत्ता भी मेरे घर में घुस जाए तो मैं वह भी नहीं देख सकता."

क़रीब 32 साल के श्रीकांत अपने बुरे अनुभवों को याद करते हुए बोले थे, "बहुत से लोग मेरे माता-पिता के पास आते और उन्हें तकिए से दबाकर मेरी हत्या करने तक का सुझाव देते थे."

लोगों की बातों को अनदेखा करते हुए श्रीकांत के माता-पिता ने हमेशा अपने बच्चे का साथ दिया.

जब वह आठ साल के हुए तो श्रीकांत के पिता ने कहा कि उनके पास एक अच्छी खबर है.

श्रीकांत को नेत्रहीनों के बोर्डिंग स्कूल में दाखिला मिल गया था और इसके लिए उन्हें अपने घर से करीब 400 किलोमीटर दूर हैदराबाद शहर जाना था.

माता-पिता से दूर रहने के बावजूद श्रीकांत जल्दी ही नई व्यवस्था में ढल गए थे.

उन्होंने यहां तैराकी सीखी, शतरंज खेला और क्रिकेट में भी हाथ आज़माया.

यह क्रिकेट ऐसी बॉल से खेली जाती थी जिसकी गेंद में अलग तरह की आवाज़ होती, जिससे नेत्रहीन भी गेंद की दिशा पता लगा सकें.

उन्होंने कहा, "सारा काम हाथ और कान का था."

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नेत्रहीन होने के कारण विज्ञान और गणित पढ़ने पर थी रोक

हैदराबाद में श्रीकांत अपने शौक पूरे कर रहे थे लेकिन साथ ही वह अपने भविष्य के बारे में भी सतर्क थे.

उनका हमेशा से सपना रहा कि वह इंजीनियर बनें और वह जानते थे कि इसके लिए विज्ञान और गणित पढ़ना ज़रूरी है.

जब समय आया, तो श्रीकांत ने ये मुश्किल विषय चुने लेकिन स्कूल ने इसे अवैध बताकर मना कर दिया.

श्रीकांत का स्कूल आंध्र प्रदेश राज्य शिक्षा बोर्ड के तहत आता था और वहां एक नेत्रहीन को विज्ञान और गणित की पढ़ाई करने की इजाज़त नहीं थी.

यह नियम इसलिए था क्योंकि ग्राफ़ और डायग्राम जैसी चीज़ों की वजह से इन्हें नेत्रहीनों के लिए चुनौतीपूर्ण समझा जाता था. इसके बजाय ऐसे छात्र कला, भाषा, साहित्य और सोशल साइंस की पढ़ाई कर सकते थे.

श्रीकांत इस नियम से तंग आ चुके थे. श्रीकांत के एक शिक्षक भी इस नियम से नाख़ुश थे और उन्होंने अपने छात्र को प्रोत्साहित किया कि वह इसके खिलाफ कोई क़दम उठाए.

दोनों अपने मामले की पैरवी करने के लिए आंध्र प्रदेश माध्यमिक शिक्षा बोर्ड के पास गए, लेकिन उन्हें बताया गया कि इसमें कुछ भी नहीं किया जा सकता है.

बिना डरे आगे बढ़ रहे शिक्षक और छात्र की इस जोड़ी को एक वकील मिला. इसके बाद स्कूल प्रबंधन टीम के समर्थन से दोनों ने आंध्र प्रदेश के हाई कोर्ट में मामला दायर किया, जिसमें नेत्रहीन छात्रों को गणित और विज्ञान की पढ़ाई करने की मंज़ूरी देने के लिए शिक्षा कानून में बदलाव करने की अपील की गई थी.

श्रीकांत बोले थे, "हमारी ओर से कोर्ट में वकील ने लड़ाई लड़ी. छात्र को खुद अदालत में पेश होने की ज़रूरत नहीं थी."

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कोर्ट केस के बीच मिला मौक़ा

केस आगे बढ़ ही रहा था कि श्रीकांत ने एक ख़बर सुनी.

हैदराबाद के एक मेनस्ट्रीम स्कूल- चिन्मय विद्यालय ने नेत्रहीन छात्रों को विज्ञान और गणित पढ़ाने की पेशकश की थी.

यह स्कूल श्रीकांत के लिए एक मौके से कम नहीं था. श्रीकांत ने ख़ुशी-ख़ुशी स्कूल में दाखिला लिया.

अपनी कक्षा में श्रीकांत एकमात्र नेत्रहीन छात्र थे.

वो बोले थे, "उन्होंने तहेदिल से मेरा स्कूल में स्वागत किया. मेरी क्लास टीचर बहुत स्नेहशील थीं. उन्होंने मेरी मदद के लिए हर संभव प्रयास किया. उन्होंने स्पर्श रेखाचित्र (टैक्टाइल डायग्राम) बनाना भी सीखा."

टैक्टाइल डायग्राम रबड़ की मैट पर पतली सी फिल्म का इस्तेमाल करके बनाए जाते हैं.

जब इस पर पेंसिल से चित्र बनाते हैं, तो वह एक उभरी सी रेखा बनती है, जिसे हाथों से छूकर महसूस कर सकते हैं.

इसके छह महीने बाद कोर्ट से ख़बर आई- श्रीकांत अपना केस जीत चुके हैं.

कलाम के साथ श्रीकांत बोल्ला

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श्रीकांत का संघर्ष लाया रंग

अदालत ने फ़ैसला सुनाया था कि नेत्रहीन छात्र आंध्र प्रदेश राज्य बोर्ड के सभी स्कूलों में विज्ञान और गणित की पढ़ाई कर सकते हैं.

श्रीकांत ने कहा था, "मैं बेहद खुश था. मुझे दुनिया के सामने यह साबित करने का पहला मौका मिला था कि मैं यह कर सकता हूं और आने वाली पीढ़ी को अब मुकदमे दायर करने और अदालत में लड़ने की चिंता करने की ज़रूरत नहीं है."

अदालत के फ़ैसले के कुछ ही समय बाद श्रीकांत राज्य सरकार के स्कूल में लौटे और वहां उन्होंने अपने प्रिय विज्ञान और गणित जैसे विषयों की पढ़ाई की.

श्रीकांत को परीक्षा में 98 प्रतिशत अंक मिले.

श्रीकांत की योजना भारत के प्रतिष्ठित इंजीनियरिंग कॉलेज यानी इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी (आईआईटी) में आवेदन करने की थी.

आईआईटी के लिए कड़ी प्रतियोगिता थी और छात्र अक्सर प्रवेश परीक्षा पास करने के लिए लंबे समय तक कोचिंग करते हैं. लेकिन कोई भी कोचिंग स्कूल श्रीकांत को दाखिला नहीं देता.

श्रीकांत बोल्ला

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आईआईटी छोड़ अमेरिकी विश्वविद्यालयों में भेजे आवेदन

श्रीकांत ने बताया कि उन्हें शीर्ष कोचिंग संस्थानों ने यह कहा कि वो कोर्स का भार वह नहीं संभाल सकेंगे.

यह ठीक वैसा ही होगा जैसे एक छोटे से पौधे पर भारी बरसात हो जाए. इन संस्थानों को लगता था कि श्रीकांत शैक्षणिक स्तर के हिसाब से फ़िट नहीं बैठेंगे.

श्रीकांत बोले थे, "लेकिन मुझे कोई अफ़सोस नहीं है. अगर आईआईटी मुझे दाखिला नहीं देना चाहता, तो मुझे भी आईआईटी नहीं चाहिए."

इसकी बजाय श्रीकांत ने अमेरिकी यूनिवर्सिटियों में आवेदन किया और उन्हें पांच प्रस्ताव भी मिले.

श्रीकांत ने मैसाचुसेट्स के कैंब्रिज के एमआईटी को चुना जहां वह पहले नेत्रहीन अंतरराष्ट्रीय छात्र थे.

श्रीकांत साल 2009 में वहां पहुंचे और अपने शुरुआती अनुभव को उन्होंने 'मिला-जुला' करार दिया.

इन अनुभवों के बारे में श्रीकांत बोले थे, ''यहां की भीषण ठंड मेरे लिए पहला झटका था क्योंकि मुझे इतने सर्द मौसम में रहने की आदत नहीं थी. इसके अलावा खाने का स्वाद और सुगंध भी कुछ अलग थी. मैंने शुरुआती एक महीने तक सिर्फ़ फ़्रेंच फ़्राइज़ और फ़्राइड चिकन फ़िंगर्स खाकर गुज़ारा किया."

लेकिन श्रीकांत जल्द ही यहां के रहन-सहन में ढलने लगे थे.

श्रीकांत बोले थे, "एमआईटी में बिताया समय मेरे जीवन के सबसे प्यारे पलों में से है. पढ़ाई के स्तर पर यह काफ़ी कठिन था. लेकिन यूनिवर्सिटी ने मुझे वहां रहने और मेरे हुनर को निखारने में मदद की."

पढ़ाई करते हुए ही श्रीकांत ने हैदराबाद में युवा विकलांगों को प्रशिक्षित और शिक्षित करने के लिए एक गैर-लाभकारी संगठन की शुरुआत की, जिसका नाम समन्वय सेंटर फॉर चिल्ड्रन विद मल्टिपल डिसेबिलिटी था. उन्होंने अपने जुटाए पैसों से हैदराबाद में एक ब्रेल लाइब्रेरी भी खोली.

श्रीकांत का जीवन अच्छा चल रहा था. एमआईटी से मैनेजमेंट साइंस की पढ़ाई करने के बाद उन्हें कई नौकरियों के प्रस्ताव मिले लेकिन उन्होंने अमेरिका में ना रहने का फैसला किया.

श्रीकांत के स्कूल के अनुभवों के निशान उनके मन से मिटे नहीं थे. उन्हें हमेशा लगता रहा कि अपने देश में उनके काम अधूरे पड़े हैं.

श्रीकांत बोल्ला

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विकलांगों को नौकरी देने के लिए बना दी कंपनी

श्रीकांत बोले थे, "मुझे जीवन में हर चीज़ के लिए इतना संघर्ष करना पड़ा. यह स्थिति तब थी जब मेरी तरह हर कोई नहीं लड़ सकता या यूं कहें कि मेरे जैसे गुरु सबके पास नहीं हो सकते."

वो बोले कि उन्हें एहसास हुआ कि निष्पक्ष शिक्षा व्यवस्था के लिए लड़ने का तब तक कोई औचित्य नहीं, जब तक विकलांगों के लिए पढ़ाई के बाद नौकरी के भी सामान्य विकल्प ना हों.

श्रीकांत बोले, "मैंने सोचा कि अपनी कंपनी ही क्यों न शुरू करूं, जहां मैं ऐसे लोगों को नौकरी दूं जो शारीरिक रूप से अक्षम हैं."

श्रीकांत साल 2012 में हैदराबाद लौटे और उन्होंने "बोलेंट इंडस्ट्रीज़" की शुरुआत की. यह ऐसी पैकेजिंग कंपनी है, जो इको-फ़्रेंडली उत्पाद का निर्माण करती है. 2022 तक ये 483 करोड़ की कंपनी थी.

इस कंपनी में अधिक से अधिक विकलांग लोगों के साथ ही मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी समस्याओं वाले लोगों को रोज़गार दिया जाता है.

कोरोना महामारी से पहले तक कंपनी के 500 कर्मचारियों में से करीब 36 प्रतिशत ऐसे ही लोग थे.

साल 2021 में श्रीकांत को वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम की यंग ग्लोबल लीडर्स की सूची में शामिल किया गया था.

श्रीकांत को उम्मीद थी कि तीन सालों के अंदर उनकी कंपनी बोलेंट इंडस्ट्रीज़ ग्लोबल आईपीओ बन जाएगी, जहां इसके शेयर एक साथ कई अंतरराष्ट्रीय स्टॉक एक्सचेंजों में सूचीबद्ध होंगे.

श्रीकांत बोले थे, "जब मैं किसी से मिलता हूं तो लोग सोचते हैं...अरे यह अंधा है..कितना दुःखद है लेकिन जैसे ही मैं उन्हें यह बताता हूं कि मैं कौन हूं और क्या करता हूं, सब कुछ बदल जाता है."

(रिपोर्ट- अरुंधति नाथ)

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.

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