दिल्ली दंगों के अभियुक्त ताहिर हुसैन ने मुस्तफ़ाबाद सीट पर क्या बदले समीकरण?

इमेज स्रोत, @aimim_national
- Author, अभिनव गोयल
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
दिल्ली दंगों के अभियुक्त ताहिर हुसैन कस्टडी परोल पर आकर चुनाव प्रचार कर रहे हैं.
उनका हाथ पकड़े हथियारों से लैस दिल्ली पुलिस के जवान उनके साथ-साथ चल रहे हैं. किसी भी समर्थक या व्यक्ति को इस पुलिस घेरे में आने की इजाज़त नहीं है.
करीब दर्जन भर पुलिसवालों के बीच घिरे ताहिर गली-गली घूमकर लोगों से 'पतंग' के सामने वाला बटन दबाने की अपील कर रहे हैं.
पीछे -पीछे दर्जनों समर्थक ताहिर के साथ बढ़ते हुए नारेबाज़ी कर रहे हैं- 'शेर आया, शेर आया.'
कांग्रेस और आम आदमी पार्टी के पोस्टरों से पटी गलियों से निकलते हुए इस नारे की आवाज़ अचानक से तेज़ हो जाती है.

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ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (एआईएमआईएम) पार्टी ने ताहिर हुसैन को दिल्ली विधानसभा चुनाव में मुस्तफ़ाबाद सीट से अपना उम्मीदवार बनाया है.
ख़ुद असदुद्दीन ओवैसी उनके प्रचार के लिए घूम- घूमकर वोट मांग रहे हैं. उनका कहना है, "पांच साल जेल में बंद शख़्स ताहिर हुसैन का अदालत इंसाफ़ करेगी. आपको अपने वोट से ताहिर हुसैन को इंसाफ़ दिलाना है…ताहिर हुसैन नहीं जीतेगा तो कोई आपकी हिफ़ाज़त नहीं कर पाएगा."
चुनाव प्रचार के लिए दाख़िल ज़मानत याचिका पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने ताहिर हुसैन को छह दिन की कस्टडी परोल दी है.
परोल के दौरान वे अपने घर नहीं जा सकते. उन्हें हर शाम जेल वापस लौटना होगा. यही वजह है कि वे बिना रुके कई घंटों से लगातार अपना चुनाव प्रचार कर रहे हैं.
एक तंग गली से गुज़रते हुए एक महिला से कहते हैं, "मेरे पास पोस्टर, बैनर के लिए पैसे नहीं हैं. मेरा ध्यान अब आपको रखना है. पतंग का निशान भूलना नहीं है."
ताहिर हुसैन ने बदले समीकरण?

उत्तर पूर्वी दिल्ली की मुस्तफ़ाबाद विधानसभा सीट 2008 के परिसीमन के बाद अस्तित्व में आई थी. पहले यह करावल नगर विधानसभा सीट का हिस्सा थी.
साल 2020 में यहां से आम आदमी पार्टी के उम्मीदवार हाजी यूनुस ने जीत दर्ज की थी. इस बार पार्टी ने आदिल अहमद ख़ान को चुनावी मैदान में उतारा है.
कांग्रेस ने पूर्व विधायक हसन मेहदी के बेटे अली मेहदी को और भारतीय जनता पार्टी ने करावल नगर के मौजूदा विधायक मोहन सिंह बिष्ट को इस सीट से टिकट दिया है.
2020 के सांप्रदायिक दंगों का केंद्र रहे मुस्तफ़ाबाद में क़रीब 2.6 लाख वोटर हैं. राजनीतिक विश्लेषकों के मुताबिक़ मुस्तफ़ाबाद में क़रीब 40 प्रतिशत मुसलमान और क़रीब 60 प्रतिशत हिंदू आबादी है.
लेकिन अब इस त्रिकोणीय लड़ाई में ताहिर हुसैन की भी एंट्री हो गई है. कांग्रेस और आम आदमी पार्टी उन पर वोट काटने और बीजेपी को फ़ायदा पहुंचाने के आरोप लगा रही है.

दिल्ली के वरिष्ठ पत्रकार डॉ. रामेश्वर दयाल का कहना है, "कांग्रेस, आप और ओवैसी ने मुस्तफ़ाबाद में मुस्लिम उम्मीदवार उतारा है. ऐसे में संभावना है कि ताहिर हुसैन के आने से मुस्लिम वोट आपस में बंटेंगे, जिसका सीधा फ़ायदा बीजेपी को हो सकता है."
वोट काटने के सवाल पर बीबीसी से बातचीत में ताहिर कहते हैं, "जब भी कोई व्यक्ति दलित, मुसलमान, वंचित, और पिछड़ों के हक़ की बात उठाता है, तो उस पर वोट कटवा के आरोप लगाए जाते हैं."
वो कहते हैं, "अगर हमारी पार्टी वोट कटवा है तो कांग्रेस और आप ने आपस में समझौता क्यों नहीं किया? अगर दोनों पार्टियां गठबंधन में यहां चुनाव लड़ रही होतीं, तो आप कह सकते थे कि मैं वोट काट रहा हूं. इस बार जनता को समझ आ गया है कि कैसे दोनों पार्टियां (कांग्रेस और आप) गुमराह करने का काम कर रही हैं."
क्या कह रहे हैं स्थानीय लोग

ताहिर हुसैन उन्हीं इलाकों में प्रचार कर रहे हैं, जो मुस्लिम बहुल हैं.
अपने समर्थकों के साथ जैसे ही वे किसी गली में दाख़िल होते हैं, लोग उन्हें देखने के लिए अपनी दहलीज़ पर खड़े हुए दिखाई देते हैं.
राजीव गांधी नगर की गली नंबर 22 में परचून की छोटी सी दुकान चला रहीं फ़हमीदा के घर के बाहर कांग्रेस का झंडा लगा है, लेकिन वे ताहिर को देखने के लिए काफ़ी उत्साहित नज़र आती हैं.
वो कहती हैं, "बहुत सालों के बाद ताहिर को देखा है. उन्होंने दंगों में मुसलमानों का बहुत साथ दिया है. उन्हें जानबूझकर फंसाया गया है."
फहमीदा कहती हैं, "वो बहुत अच्छे हैं, लेकिन महिलाएं उसी पार्टी का साथ देंगी, जो उन्हें सुविधाएं दे रही हैं. पार्टी वाले आते हैं, वे अपनी मर्ज़ी से झंडा लगा देते हैं. आपका मन करे तो आप भी अपना लगा लो, हमें कोई दिक्कत नहीं है."

थोड़ा आगे बढ़ने पर हमारी मुलाक़ात जान मोहम्मद से हुई. ख़ुद को वो ओवैसी का फ़ैन बताते हैं, लेकिन ताहिर को लेकर उनकी राय अलग है.
नाले की तरफ़ इशारा करते हुए वो कहते हैं, "ये वही नाला है जहां दिल्ली दंगों के समय दंगाइयों ने लोगों को मारकर फेंक दिया था और बाद में उनकी लाशें निकली थीं."
मोहम्मद कहते हैं, "दंगों की याद हमारे भीतर आज भी ताज़ा है, लेकिम हमें डर है कि अगर पतंग (ताहिर) को वोट करेंगे तो आम आदमी पार्टी हार जाएगी, जिसका सीधा फायदा बीजेपी को होगा. हम अपना वोट ख़राब नहीं करना चाहते. 'आप' मजबूरी का नाम है. लोग बहती हवा के साथ जाना चाहते हैं."
वो बताते हैं, "पार्षद के चुनाव में हमारे यहां केजरीवाल को पांच में से एक भी सीट नहीं मिली थी, लेकिन विधानसभा में हमारे पास कोई चारा नहीं है. अगर कांग्रेस मज़बूत स्थिति में होती तो लोग उनके उम्मीदवार को वोट करते."
ऐसी ही बात स्थानीय निवासी गुल मोहम्मद करते हैं. वो कहते हैं, "लोगों को ताहिर के साथ सहानुभूति तो है, लेकिन वोट नहीं है. ये बात सबको पता है कि इस सीट पर सिर्फ़ मुसलमानों के दम पर चुनाव नहीं जीता जा सकता. हिंदुओं का भी वोट चाहिए और ताहिर को हिंदू वोट करेंगे नहीं. इसलिए उनके जीतने के चांस बिल्कुल नहीं हैं."

ऐसा ही डर स्थानीय निवासी औसाफ़ को भी है. उम्र के 70वें वर्ष में दाख़िल हो चुके औसाफ़ कहते हैं, "ताहिर, सैफ़ी बिरादरी से हैं. उनके 10-12 हज़ार वोट हैं. वे अगर उन्हें मिल गए तो यहां बीजेपी की जीत को कोई नहीं रोक पाएगा."
दूसरी तरफ़ ब्रिजपुरी पुलिया पर पिछले 25 साल से पटरी लगाने वाले हसन ख़ुद को बीजेपी समर्थक बताते हैं. वो कहते हैं, "यहां 40 प्रतिशत मुसलमान आबादी है जो तीन उम्मीदवारों के बीच बंटी हुई है. असली लड़ाई आम आदमी पार्टी और बीजेपी के बीच है."
ब्रिजपुरी पुलिया से कुछ किलोमीटर आगे बढ़ने पर शिव विहार पड़ता है. ये इलाक़ा हिंदू बहुल है. यहां ताहिर के ना तो पोस्टर दिखाई देते हैं और ना उनका प्रभाव.
कटारिया वेल्डिंग नाम से दुकान चलाने वाले नितिन कटारिया शिकायती लहजे में कहते हैं, "कांग्रेस वालों ने हमारे यहां मंच लगाया, उसका मुंह शिव विहार की जगह मुस्लिम बहुल मुस्तफ़ाबाद की तरफ़ रखा. ये बताता है कि उनके लिए मुस्लिम वोट ज़्यादा ज़रूरी है."
वो कहते हैं, "हमारी यह सीट मुस्लिम बहुल है लेकिन नाम मुस्तफ़ाबाद है. इसका नाम बदलकर शिव विहार होना चाहिए. ये एक पुरानी मांग है, जिसे पूरा किया जाना चाहिए."
कटारिया कहते हैं, "हिंदू भले यहां मुसलमानों से ज़्यादा हों, लेकिन वे वोट कम करने जाते हैं. अगर इस बार हिंदुओं ने अच्छे से वोट किया तो बीजेपी उम्मीदवार की जीत तय है."
कौन हैं ताहिर हुसैन

दिल्ली के उत्तर पूर्वी हिस्से में 23 फ़रवरी से 26 फ़रवरी, 2020 के बीच दंगे हुए थे. इन दंगों में 53 लोगों की जान गई थी.
दिल्ली पुलिस के मुताबिक़ मरने वालों में 40 मुसलमान और 13 हिंदू थे. उस वक़्त ताहिर हुसैन आम आदमी पार्टी के पार्षद थे, लेकिन दंगों में नाम आने के बाद पार्टी ने उन्हें सस्पेंड कर दिया था.
उन पर आईबी कर्मचारी अंकित शर्मा की हत्या समेत कई मामले दर्ज हैं. अंकित शर्मा की लाश 26 फ़रवरी को ताहिर हुसैन के घर के पास के एक नाले से मिली थी.
चुनावी हलफ़नामे के मुताबिक़ ताहिर के ख़िलाफ़ दिल्ली पुलिस की 10 और प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) की 1 एफ़आईआर दर्ज है.
बीबीसी से बातचीत में ताहिर ख़ुद को निर्दोष बताते हुए कहते हैं, "मुझे न्यायालय पर पूरा भरोसा है. वहां से मुझे न्याय मिलेगा."
हलफ़नामे के मुताबिक़ उनके पास क़रीब 42 लाख रुपये और उनकी पत्नी के पास क़रीब 43 लाख रुपये की चल संपत्ति है. वहीं अचल संपत्ति की बात करें तो उनके पास 8.85 करोड़ और उनकी पत्नी के पास 9 करोड़ से अधिक की संपत्ति है.
ताहिर के परिवार में पत्नी के अलावा दो बच्चे हैं. बेटे का नाम मोहम्मद शादाब हुसैन है, जो पिता के लिए सारा चुनाव प्रचार संभाल रहे हैं. वहीं बेटी का नाम राफ़िया ज़ारा हुसैन है.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित















